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1929 में अमेरिका से शुरू हुआ ग्रेट डिप्रेशन भारत पहुंचा तो किसानों की कमर तोड़ गया

अवसाद यानी डिप्रेशन. 21वीं सदी में इस मुद्दे पर चर्चा कुछ आगे बढ़ी है. सुधीजन कहते हैं कि बात ज़्यादा हो तो रही है लेकिन फिर भी कम है. लेकिन TV एंकर का कहना है, बिल्कुल झूठ. एक डिप्रेशन ही तो है जिस पर बात हो रही है. सुबह 9.15 से दोपहर 3.30 तक 30 एंकर 330 बार समझा चुके होते हैं कि डिप्रेशन कैसे आएगा या कैसे आने से बच जाएगा.

एंकर महोदय आर्थिक डिप्रेशन की बात कर रहे हैं. हिंदी में इसे मंदी कहते हैं. एक ही शब्द के दो मतलब होने के चलते एंकर महोदय कन्फ़्यूज़ हो गए. लेकिन टेक्निकली उनकी बात सच भी है. मानसिक अवसाद पर चाहे बात हो ना हो आर्थिक मंदी पर इंसान तब से बात कर रहा है, जबसे दुनिया में व्यापार शुरू हुआ.

द ग्रेट डिप्रेशन

वैसे तो अर्थशास्त्र की चर्चा के लिए लल्लनटॉप का डेली प्रोग्राम खर्चा पानी है. और हर हफ़्ते ‘अर्थात्’ भी आता है. लेकिन इतिहास के स्टूडेंट होने के चलते अपन आज इस एरिया में सेंधमारी कर रहे. वो भी वाजिब कारण से. क्योंकि बाकी सभी चीजों की तरह अर्थशास्त्र का भी इतिहास होता है. और इतिहास आज सुबह बताकर गया कि दुनिया में पहली मंदी आई पहली सदी में. एनो डोमिनी वाले कलेंडर के हिसाब से. पहले लगा कि कोई वैभवशाली कारण रहा होगा. सम्राट को किसी युद्ध में पराजय मिली होगी या ऐसा ही और कुछ.

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न्यू यॉर्क स्टॉक एक्स्चेंज के बाहर इकट्ठा हुए लोग और रोज़गार की तलाश में लोग (तस्वीर: getty)

लेकिन पता चला कि तब भी मंदी के कर्ता-धर्ता बैंक ही थे. रोमन बैंकों ने बिना सिक्योरिटी लोन बांटने शुरू किए और लोग चुका नहीं पाए. तब से लेकर 20वीं सदी तक पचासों बार मंदी आई. कभी ट्यूलिप के दाम बढ़ने के कारण तो कभी तम्बाकू की कमी के चलते. लेकिन ये सब फाइनेंशियल क्राइसिस लोकल थे. पहला विश्व युद्ध लड़ा गया तो सब ग्लोबल होने लगा. मंदी भी. पहली वैश्विक मंदी आई 1929 में. अमेरिका में.

आप कहेंगे हम तो भारत का इतिहास बताते हैं. तो आज अमेरिका की बात क्यों. बात हिंदुस्तान की ही है. लेकिन बात की शुरुआत हुई अमेरिका से. इसलिए शुरुआत वहीं से होना लाज़मी है. पहली वैश्विक मंदी का भारत पर क्या असर हुआ. उसके कारण क्या थे और उसका भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर क्या असर पड़ा?

आइए जानते हैं

शुरुआत 24 अक्टूबर 1929 से. गुरुवार का दिन था. न्यू यॉर्क स्टॉक एक्स्चेंज पर रोज़ की तरह ब्रोकर्स की भीड़ इकट्ठा थी. ओपनिंग बेल बजी और मार्केट ऐसे गिरा मानो, किसी ने पांव में पहिए लगा दिए हों. जब तक रुका तब तक मार्केट 11% गिर चुका था. आज की तरह मिनटों में इन्फ़ॉर्मेशन तो मिलती नहीं थी. टिकर टेप का ज़माना था. अगले कई घंटों तक ब्रोकर्स को कोई खबर नहीं थी कि कौन से शेयर बिके हैं और कौन से ख़रीदे जा रहे हैं.

आनन फ़ानन में वॉल स्ट्रीट के सारे बैंक मैनेजरों की मीटिंग बुलाई गई. रिचर्ड विट्नी, न्यू यॉर्क एक्स्चेंज के वाइस प्रेसिडेंट हुआ करते थे. उन्होंने मोर्चा सम्भाला. बैंकों के पैसों की ताक़त के बल पर सारे ब्लू चिप स्टॉक मार्केट से कहीं ऊंचे दाम पर ख़रीदे गए. उम्मीद थी कि लोगों का भरोसा बढ़ेगा.

ऐसा हुआ भी. क्लोज़िंग बेल बजने तक मार्केट ऊपर उठा और 50% रिकवर भी कर गया. सबकी सांस में सांस आई. किसी को नहीं पता था कि अचानक ऐसा क्यों हुआ. लेकिन बला टली तो कौन पूछे वाले एटिट्यूड से मंडे को फिर मार्केट खुला. और उस दिन मार्केट के देवताओं ने ऐसा प्रकोप दिखाया कि क्लोज़िंग बेल बजने तक मार्केट 12.82% गिर चुका था.

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1930 के बाद की आर्थिक मंदी में हालत इतने बुरे थे कि लोग सरेआम अपनी सम्पत्ति बेचने लगे (तस्वीर: Getty)

ये हुआ था आज ही के दिन यानी 28 अक्टूबर 1929 को. बाद में इस दिन को ब्लैक मंडे के नाम से जाना गया. क्योंकि इसी दिन से वैश्विक आर्थिक मंदी की शुरुआत हुई थी जिसे ग्रेट डिप्रेशन के नाम से जाना गया. अगले दिन यानी 29 अक्टूबर को भी कमोबेश यही हाल रहा. दो दिन में इन्वेस्टर्स को 30 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. मार्केट यहीं पर नहीं रुका. अगले 2 सालों तक लगातार गिरता रहा और 1932 में जब ये गिरावट रुकी, तक तक इंडेक्स 90% तक गिर चुके थे.

भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर

भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर समझने के लिए तब की भारतीय इकॉनमी को समझना ज़रूरी है. भारतीय अर्थव्यवस्था शुरुआत से ही खेती पर आधारित थी. लेकिन अंग्रेजों ने इसमें एक ख़ास बदलाव किया. मैनचेस्टर की कपड़ा मिलों के लिए कॉटन की ज़रूरत थी जो बाकी दुनिया के मुक़ाबले भारत में कहीं कम क़ीमत पर मिल जाता था. कारण था मोनोप्सोनी. मोनोपॉली का ठीक उल्टा. यानी बेचने वाले तो बहुत सारे लेकिन ख़रीदार सिर्फ़ एक. जिसके कारण दाम तय करने की ताक़त विक्रेता के बदले ख़रीदार के हाथ में थी. यानी अंग्रेजों के हाथ में.

भारत में कपड़े का उद्योग हथकरघा आधारित था. और इंग्लैंड में नई-नई मशीनें आ गई थीं. सो भारतीय व्यापारी चाहकर भी अंग्रेज़ी उद्योगों से मुक़ाबला नहीं कर सकते थे. इस तरह अंग्रेजों ने कपास, नील और तम्बाकू जैसी चीजों की खेती पर ज़ोर दिया. यानी कैश क्रॉप्स पर.

अमेरिका से डिप्रेशन की शुरुआत हुई तो लोगों की ख़रीदने की क्षमता में कमी आई. इकनॉमिक्स 101 के अनुसार मांग में कमी का असर होता है, दाम में गिरावट. भारतीय किसान कैश क्रॉप्स उगा रहे थे. और उनके दाम गिरे तो भारतीय किसानों की हालत ख़स्ता होती चली गई. मांग में कमी के चलते गेहूं-चावल के दामों में भी 50 % तक की कमी आई. मिडिल क्लास और उच्च वर्ग की हालत बेहतर थी. एक तो उन्हें सस्ते दाम पर सामान मिल रहा था. ऊपर से बंधी-बंधाई तनख़्वाह.

निचले तबके के किसानों और मज़दूरों को दोहरी मार पड़ रही थी. अंग्रेज सरकार ने टैक्स में कोई रियायत नहीं दी थी. उल्टा वो उसे बढ़ाते जा रहे थे. ज़मींदारी सिस्टम के चलते लोगों को ज़मीन का किराया देना पड़ता था. और टैक्स देने के लिए ज़मींदार किराया भी दिन पर दिन बढ़ा रहे थे. जो अंत में किसानों को ही चुकाना पड़ता था.

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मैनचेस्टर की कॉटन मिलें (प्रतीकात्मक तस्वीर: Getty)

पहले गेहूं-चावल की खेती से ख़ाने का गुज़ारा हो जाता था. लेकिन कैश क्रॉप्स के चक्कर में गेहूं-चावल बोना कम हो गया था. लिहाज़ा पेट भरने के लिए लोगों को घर का सामान और ज़ेवर बेचने पड़े. इसके अलावा सेना के रखरखाव पर होने वाला खर्चा भी भारत से ही उगाहा जा रहा था. पहला विश्व युद्ध लड़ने में ब्रिटेन का भारी खर्चा हुआ था. भारत के सैनिक लड़ रहे थे अंग्रेजों के लिए. लेकिन उनकी तनख़्वाह का खर्च भी भारत के ख़ज़ाने से ही वसूला जा रहा था. कैसे?

खर्चा अंग्रेज ही उठाते थे. लेकिन उसे भारत को दिए गए लोन के नाम से चढ़ा देते. डिप्रेशन की शुरुआत हुई तो इसी लोन पर इंटरेस्ट के नाम पर भारत का सोना ब्रिटेन भेज दिया गया. 1931-35 के बीच लोन की किश्त के नाम पर 2.3 अरब रुपए की क़ीमत का सोना ब्रिटेन भेजा गया.

अब सवाल ये कि लोन की किश्त की याद 1931 में क्यों आई. इसका कारण था कि भारत का रॉ मैटेरियल तो वैसे भी औने-पौने दाम पर मिल रहा था. और सोना प्रोडक्शन या युद्ध में काम आता नहीं था. इसलिए 1930 से पहले सोने का कुछ ख़ास महत्व था नहीं. सोना का महत्व बढ़ा 1931 में मंदी के बाद. क्यों?

सोने की चमक

दरअसल ब्रिटेन की मुद्रा पाउंड स्टर्लिंग सोने पर आधारित थी. यानी एक किलो सोना ख़रीदने में कितना पाउंड खर्च होगा, ये ही तय करता कि पाउंड की क़ीमत कितनी है. पहले विश्व युद्ध से पहले सोना सस्ता हुआ करता था. लेकिन युद्ध में खर्चा बढ़ा तो भरपाई की गई नोट छापकर. सोना उतना ही रहा और नोट बढ़ गए. मतलब पाउंड की क़ीमत हो गई कम. मुद्रा की क़ीमत कम होती है तो लोग सोने में निवेश करते हैं. यही हुआ और ब्रिटेन को भारतीय सोने के भंडारों की याद आई. यही सोना ले जाकर ब्रिटेन की इकॉनमी को डिप्रेशन से उबारा गया.

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प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सैनिक (तस्वीर: Getty)

भारत में लोग भुखमरी के हालात से गुजर रहे थे. ब्रिटिश सरकार चाहती तो बहुत कुछ कर सकती थी. लेकिन भारत में कोई ज़रूरी कदम नहीं उठाए गए. आज भारत में ऐसी स्थिति होती है तो सरकार पब्लिक एक्स्पेंडिचर बढ़ाती है. इंपोर्ट-एक्सपोर्ट के नियमों में बदलाव करती है. ताकि आम आदमी पर प्रेशर कम पड़े लेकिन ब्रिटिश सरकार खर्च करने के बजाय वसूलने में लगी रही.

यहां तक की 1931 में ब्रिटेन में भारत से इंपोर्ट किए जाने वाले सामान पर भी ड्यूटी बढ़ा दी गई ताकि वहां के लोकल किसानों और मज़दूरों को कंपीटीशन ना झेलना पड़े. भारत में तो बिक्री नहीं हो रही थी, एक्सपोर्ट से होने वाली इनकम भी ख़त्म हो गई. अगले 3 सालों में भारत के इंपोर्ट-एक्सपोर्ट में 50 % तक की कमी दर्ज़ की गई. बंगाल में जूट का व्यापार था जिससे एक्सपोर्ट बैग बनाए जाते थे. वहां किसानों और लोकल कारीगरों ने लोन उठा रखे थे. एक्सपोर्ट बंद हुआ तो उनका काम भी ठप हो गया.

किसानों के अलावा गरीब तबके का एकमात्र सहारा थी रेलवे. इंपोर्ट-एक्सपोर्ट कम हुआ तो ट्रांसपोर्ट का काम भी आधा हो गया. इसके चलते रेलवे में काम करने वाले लाखों भारतीय बेरोज़गार हो गए.

स्वतंत्रता संग्राम पर असर

मज़दूरों और किसानों के पेट पर लात पड़ी तो वो खुलकर अंग्रेज सरकार के विद्रोह में आ खड़े हुए. अंग्रेजों के लिए वो पहले ही ग़द्दार और देशद्रोही थे तो उन्हें इन नामों से फ़र्क भी ना पड़ता था. महात्मा गांधी ने एक बड़े तबके में बढ़ते रोष को महसूस किया और सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत कर दी. मार्च 1930 में सॉल्ट मार्च किया गया.

नमक का चुनाव भी बहुत सोच समझकर किया गया था. नमक एक ऐसी चीज़ थी जो घर-घर में मिलती थी. गरीब से गरीब आदमी के पास भी. और नमक पर लगने वाला टैक्स ब्रिटिश सरकार के कुल रेवेन्यू का 8 % था. अंग्रेज सरकार इससे बेखबर थी. उन्हें लगा सत्याग्रह के लिए नमक का चुनाव एकदम अटपटी बात थी.

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नमक सत्याग्रह की शुरुआत 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से हुई थी (फ़ाइल फोटो)

लेकिन नमक सत्याग्रह पूरे भारत में आज़ादी का सिम्बल बन गया. लोग ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से नमक बनाने और बेचने लगे. खुद महात्मा गांधी का बनाया एक चुटकी नमक 1600 रुपए में बिका. तब के हिसाब से 750 डॉलर. अगले एक महीने में 60 हज़ार लोगों को नमक बेचने के जुर्म में पकड़कर जेल में डाल दिया गया.

जो स्वतंत्रता आंदोलन अब तक सिर्फ़ क्रांतिकारियों और कुछ पार्टियों तक सीमित था, असहयोग आंदोलन के बाद आम लोगों ने उसे अपना लिया. पूर्ण स्वराज की मांग अब सिर्फ़ एक नारा नहीं बल्कि जन आंदोलन में तब्दील हो गई थी.

हालांकि नमक सत्याग्रह के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत को कुछ ख़ास रियायतें नहीं दीं. ना ही इससे भारत को तुरंत आजादी मिली लेकिन इसके क्या मायने थे. इसके लिए अमेरिकन सिविल राइट्स के नायक मार्टिन लूथर किंग का एक कथन आपसे शेयर किए चलते हैं.

“अधिकांश लोगों की तरह मैंने भी गांधी के बारे में सुना लेकिन कभी गंभीरता से उनका अध्ययन नहीं किया था. लेकिन जब मैंने ‘नॉन-वॉयलेंट रेजिस्टेंस’ के बारे में पढ़ा तो मैं बहुत प्रभावित हुआ. ख़ासकर गांधी के उपवासों और नमक सत्याग्रह से. सत्याग्रह की पूरी अवधारणा, जो सत्य यानी प्रेम और आग्रह से मिलकर बनी है, मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थी. जैसे-जैसे मैंने गांधी के दर्शन में गहराई से प्रवेश किया, प्रेम की शक्ति के बारे में मेरा संदेह धीरे-धीरे कम होता गया, और मैंने पहली बार सामाजिक सुधार के क्षेत्र में इसकी शक्ति को महसूस किया”

इस टॉपिक पर रिसर्च करते हुए एक चीज़ नोट हुई. किसानों और ग़रीबों के आज के हालात और आज़ादी के पहले के हालात में अंतर तो महसूस होता है. लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए. और ये बात डरावनी लगती है.


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