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1984 नरसंहार: इंदिरा को बहन बताया तो भीड़ ठहाका लगाने लगी

पॉलिटिकल साइंस का विद्यार्थी पूरी तैयारी से डिबेट में पहुंचा था. राजनीतिक टॉकिंग पॉइंट्स इकट्ठा किए जा चुके थे. जॉन स्टुअर्ट मिल से लेकर बर्ट्रेन्ड रसेल और जॉन रॉल्स से भी दीक्षा ग्रहण की जा चुकी थी. कहीं ये सवाल न उठ जाए कि भारतीय कहां हैं, ये सोचकर गोपाल कृष्ण गोखले, डॉक्टर आम्बेडकर और अरबिंदो घोष के विचार भी आत्मसात् कर लिए जा चुके थे.

डिबेट शुरू हुई. और पहले राउंड में पॉलिटिकल साइंस के विद्यार्थी ने अपने विरोधी को चित कर दिया. विरोधी ने ओपनिंग रिमार्क्स में एक भी तर्क नहीं दिया. लेकिन अगला राउंड क्वेस्चन आंसर राउंड था. अब मौक़ा विरोधी के पास था. और उसने ऐसा प्रश्न पूछा कि एक ही सवाल में पॉलिटिकल साइंस के विद्यार्थी ने हार मान ली. सीधा सरल सा प्रश्न था. राजनीति का तो था भी नहीं. इतिहास का था.

‘1984 में कहां थे?’

पहली बार के लिए तो पॉलिटिकल साइंस के विद्यार्थी को लगा कि जॉर्ज ऑरवेल के महान उपन्यास, 1984 की बात हो रही है. लेकिन बात साल 1984 की हो रही थी. और 1984 मेंशन भर हो जाने से, कोई डिस्क्रिप्शन ज़रूरी नहीं रह गया था.

प्रश्नकर्ता का तात्पर्य सिर्फ़ इतना था कि 1984 के सिख दंगों में तुम कहां थे. पॉलिटिकल साइंस के विद्यार्थी को कोई जवाब ना सूझा. तर्क अपनी सीमा तक पहुंच चुके थी. विद्यार्थी ने अदालती कार्यवाही के काग़ज़ातों को अपने दिमाग़ में टटोला. दोषियों के नाम याद किए. मारे गए लोगों के आधिकारिक और अनाधिकारिक आँकड़ों को तराज़ू में तोलने की कोशिश की. लेकिन सारी कोशिश नाकाम हो चुकी थी. सिर्फ़ एक आंसू रह गया था. उस आंसू के पास कोई तर्क नहीं था. ना कोई सबूत. सिर्फ़ एक कहानी थी जो आज हम सुनाने जा रहे हैं.

हम गरीब हैं, हम पर कौन हमला करेगा?

दिल्ली का त्रिलोकपुरी इलाका. चौथा सिंह यहां घर पर चटाई और दरी बनाने का काम करते थे. इसी से घर चलता था. तीन बेटे थे. सबसे बड़े बेटे का नाम था, बलबीर सिंह, उम्र 14 साल. बलबीर दरी बनाने के काम में पिता का साथ दिया करता. 31 अक्टूबर 1984 की शाम को ऑल इंडिया रेडियो ने एक अनाउन्समेंट किया. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मृत्यु हो चुकी थी. लेकिन चौथा सिंह और बलबीर के लिए ये दिन की सबसे बड़ी खबर नहीं थी.

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नई दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान दुकानें भी लूट ली गई थीं. (तस्वीर: getty)

सुबह 11 बजे ही रेडियो बता चुका था कि इंदिरा पर गोलियां चली हैं. लेकिन इस अनाउन्समेंट में एक ऐसा शब्द था जिसने चौथा सिंह और बलबीर को हिलाकर रख दिया था. ये शब्द था, ‘सिख’. खबर प्रसारित करते हुए ऑल इंडिया रेडियो ने स्पेसिफिकली मेन्शन किया था कि इंदिरा पर गोली चलाने वाले सिख थे. शाम तक दिल्ली में हालात नाज़ुक हो चुके थे. सेंट्रल दिल्ली के कुछ इलाक़ों से हिंसक खबरें आने लगी थीं. शायद खुद को दिलासा देने की कोशिश करते हुए चौथा सिंह ने बलबीर से कहा,

हम गरीब हैं. हम पर कौन हमला करेगा? राजधानी है, दंगे कुछ ही देर में ख़त्म हो जाएंगे. माहौल में शांति आ जाएगी.

लेकिन शांति कहीं आती-जाती नहीं. वो हमेशा मौजूद रहती है. आती अशांति है. जो उस शाम बेशक्ल भीड़ का लबादा ओढ़कर त्रिलोकपुरी तक आ चुकी थी. लोगों ने चिंताजनक हालात देख अपनी रक्षा के लिए कुछ डंडे और हथियार इकट्ठा कर लिए थे. और इन लोगों को देख भीड़ दूर से ही गुजर भी गई. इसके कुछ देर बाद पुलिस पहुंची. भरोसा दिलाया कि भीड़ को वहाँ पहुंचने नहीं दिया जाएगा. रक्षा के लिए जो डंडे-हथियार जुटाए थे, ये कहते हुए साथ ले गई कि हथियार देख कर भीड़ हमला करने के लिए और आतुर होगी.

ख़ुशफ़हमी

चौथा सिंह और बलबीर को लगा पुलिस ने भरोसा दिया है तो कुछ नहीं होगा. लेकिन पुलिस का आना महज़ ख़ुशफ़हमी साबित हुआ. थोड़ी देर में भीड़ ने और बड़ा आकार लिया और चौथा सिंह के घर तक पहुंच गई. उनके हाथ में क्रोबार और केरोसीन के केन थे. देखते ही देखते भीड़ ने सिख घरों पर हमला कर दिया. लोगों को घरों से निकाल कर पीटा गया. कपड़े फाड़ दिए गए. बलबीर अपने तीन भाइयों और मां के साथ अपने चाचा के घर में जा छुपा. भीड़ वहाँ भी पहुंच गई. दरवाज़े को तोड़ दिया गया.

मौत की आहट सुन बलबीर की मां ने तीनों बच्चों को लड़कियों के कपड़े पहना दिए. इस आस में कि शायद उन्हें छोड़ दिया जाए. भीड़ ने बलबीर के चाचा को बाहर खींचा और डंडे ही डंडे बरसा दिए. उन्हें इतना मारा गया कि आंखें बाहर निकल चुकी थीं. इतने में भी दिल शांत ना हुआ तो केरोसिन डाल कर आग लगा दी गई. इसके बाद चौथा सिंह के घर को भी आग लगा दी गई. भीड़ में से एक बोला,

“ये सांप के बच्चे हैं. एक-एक कर सबको मार डालो.” 

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सिख विरोधी दंगों के दौरान नई दिल्ली से बाहर निकलने के लिए रेलवे स्टेशन पर खड़े लोग (फ़ाइल फोटो)

बलबीर जान बचाकर मां और भाइयों के साथ भागा. ये लोग सड़क पर पड़ी लाशों के ऊपर से गुजरते हुए किसी तरह एक दूसरे मुहल्ले में पहुंचे. वहां एक दूध वाले ने अपने यहां शरण दी. इस सबके बीच चौथा सिंह का कोई अता-पता नहीं था. बलबीर का सबसे छोटा भाई भी गायब था. 3 नवंबर को आर्मी पहुंची तब जाकर बलबीर अपने घर लौट सका. बलबीर की मां ने जले हुए फ़र्नीचर को हटाया तो वहां चौथा सिंह भी था.

इंदिरा की तस्वीर

बलबीर की मां वहीं बेहोश हो गई. बलबीर को पता चला कि भीड़ ने चौथा सिंह को अपने साथ ले जाकर पूरी गली में घुमाया था. इंदिरा की तस्वीर दिखाकर चौथा सिंह भीड़ से बोलते जा रहे थे, इनको तो मैं अपनी बड़ी बहन जैसा मानता हूं. इंसान होते तो फ़र्क पड़ता. लेकिन इंसानियत कहीं पीछे छूट चुकी थी. भीड़ ने ठहाका लगाया और मार-मार कर चौथा सिंह की हत्या कर दी. एक लम्बा आदमी जो डॉक्टरी का पेशा करता था, उसने बलबीर की आंखें निकाल ली थी. बाकी सभी लाशों के साथ भी यही सुलूक किया गया था.

इसके 3 दिन बाद बलबीर को अपने सबसे छोटे भाई का पता चला. वो एक लोकल अस्पताल में भर्ती था. घर-बार सब जल चुका था. महीनों तक बलबीर और परिवार को एक टेंट में रहना पड़ा. बाद में तिलक नगर की एक DDA कॉलोनी में एक कमरा अलॉट कर दिया गया. पूरी कॉलोनी सिर्फ़ विधवाओं और बच्चों से भरी हुई थी. एक भी आदमी ना बचा था. 14 साल के बलबीर ने तब से पगड़ी बांधना और केश बढ़ाना बंद कर दिया. इससे पहले कि बलबीर को जज करें, हमें समझना होगा कि धर्म इंसान की ज़िंदगी का ज़रूरी पहलू है किंतु जान बचाने का इन्स्टिंक्ट धर्म से कहीं पुराना.

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जैसे ही इंदिरा पर गोली चलने की खबर फैली, सिख जनता को निशाना बनाए जाने की खबरें आने लगी (तस्वीर: getty)

लेकिन जिस इन्स्टिंक्ट ने 1984 के नरसंहार को जन्म दिया था, वो इंसानी स्वभाव के सबसे स्याह पहलुओं में से एक है, पर्सनैलिटी कल्ट या व्यक्ति पूजा. तब ये कल्ट इंदिरा गांधी का हुआ करता था. 31 अक्टूबर 1984 की सुबह 9 बजकर 10 मिनट पर इंदिरा गांधी अपने आवास 1 सफ़दरजंग रोड से PMO ऑफ़िस, 1 अकबर रोड की तरफ़ निकली. गेट पर पहुंचते ही उनके बॉडी गार्ड बेअंत सिंह ने उन पर गोली चला दी. पहली गोली उनके पेट में लगी. अगली दो छाती पर. दूसरा गार्ड सतवंत सिंह पास ही खड़ा था. बेअंत ने उससे कहा,

“देख क्या रहे हो? गोली चलाओ.”

सतवंत ने अपनी ऑटोमैटिक कार्बाइन से 25 गोलियां ज़मीन पर गिरी हुई इंदिरा पर उतार दीं. 9 बजकर 32 मिनट पर इंदिरा को AIIMS ले ज़ाया गया. 25 गोली लगने के बावजूद उनका दिल सही सलामत था. इंदिरा को बचाने की भरपूर कोशिश की गई. लेकिन उन्हें नहीं बचाया जा सका. दोपहर 2 बजकर 23 मिनट पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

दंगों की शुरुआत

साढ़े पांच बजे राष्ट्रपति ज़ैल सिंह अपने क़ाफ़िले के साथ AIIMS पहुंचे. तब तक AIIMS के बाहर अच्छी ख़ासी संख्या में लोग पहुंच चुके थे. नारे लग रहे थे, ‘खून का बदला खून’. सबसे पहला हमला यहीं हुआ. राष्ट्रपति ज़ैल सिंह की गाड़ी पर पत्थरबाजी हुई. किसी तरह उन्हें वहां से बचाकर ले ज़ाया गया. और इसके बाद हिंसक घटनाओं की शुरुआत हो गई. पूरी दिल्ली की सड़कों पर सिखों को गाड़ियों से खींच कर मारा-पीटा गया. उनकी पगड़ी जला दी गई. ये उन्माद स्वतः था. लोग ग़ुस्से में ये सब कर रहे थे. लेकिन अगली सुबह तक कुछ भी स्वतः नहीं रह गया था.

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1 नवंबर 1984 को नई दिल्ली में तीन मूर्ति हाउस के बाहर “खून के बदले खून” जैसे नारे लगाए गए (तस्वीर: AFP)

बाद में जो हुआ, सब कुछ प्लान के तहत हुआ. सिख दिल्ली के अलग-अलग इलाकों और मुहल्लों में रहते थे. उन्मादियों का एक-एक घर तक पहुँचना इस बात का सबूत था कि उन्हें चुन-चुन कर निशाना बनाया गया. पुलिस भी दंगाइयों का साथ दे रही थी. आगे की कई स्वतंत्र जांच रिपोर्ट्स में दर्ज हुआ कि कांग्रेस के कई बड़े नेता इसमें शामिल थे. लोगों को पैसे और शराब बांटी गई. DTC की बसों में भीड़ को सिख घरों तक पहुंचाया गया.

ट्वेंटी ईयर ऑफ़ इंप्यूनिटी नाम की किताब के अनुसार – सरकारी बसों का उपयोग दंगाइयों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए किया जाने लगा था. पुलिसवालों का नाकारापन बढ़ के दंगाइयों की सहायता करने के स्तर तक जा पहुंचा था. अगर सिख अपने बचाव के लिए कहीं इकट्ठा होते तो पुलिसवाले उनके हथियार ले लेते और घर वापस भेज देते, ताकि ये अपनी सुरक्षा न कर सकें. कई बार तो इन्होंने भी दंगे और हत्याओं को अंजाम दिया.

कलम की ताक़त 

सरकार और नेताओं की शह पर तीन दिन तक दिल्ली और भारत के कई हिस्सों में हैवानियत का नंगा नाच चलाया गया. और आज ही दिन यानी 3 नवंबर 1984 को जब आर्मी को ज़मीन पर उतारा गया, तब जाकर ये नरसंहार रुका. इसी दिन इंदिरा का अंतिम संस्कार भी हुआ था. और तब तक हजारों सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया था.

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3 नवंबर के दिन राज घाट पर इंदिरा का अंतिम संस्कार किया गया (तस्वीर: getty)

1984 के एंटी-सिख दंगों की जांच के लिए कई कमीशन बनाए गए. कई साल तक मामला कोर्ट में चला. हज़ारों गवाहों के बयान दर्ज़ हुए. न्याय हुआ या नहीं. ये सबको पता है. लेकिन तारीख़ की कलम से ये सब कुछ इतिहास में दर्ज़ हो चुका है, सुरक्षित, सलामत.

एक बड़ी फ़ेमस लाइन है,

कलम की ताक़त तलवार से ज़्यादा होती है.

कभी सोचा किसलिए?
सिर्फ़ इसलिए नहीं कि कलम के लिखे का असर तलवार से तेज होता है. बल्कि इसलिए कि तलवार तो सिर्फ़ हमलावर का साथ देती है. लेकिन काग़ज़ पर जब इस तलवार का वार दर्ज़ होता है तो विक्टिम की गवाही देने के लिए सिर्फ़ एक कलम ही साथ बचती है.


वीडियो देखें- जब 36 बिहारी मज़दूरों ने मॉरीशस के घाट पर कदम रखा और इतिहास में दर्ज़ हो गए 

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