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भोपाल गैस त्रासदी के मुजरिम को रिहा करने के लिए किसने फ़ोन किया था?

मिस्टर एंडरसन की डेस्क पर एक पेपर वेट रखा रहता था. पेपर वेट में एक चाइनीज़ कहावत लिखी थी. जिसका हिंदी में अनुवाद करें तो मतलब निकलता था,

“लीडर अच्छा तब होता है जब लोगों को पता ही नहीं चले कि वो है भी”

मिस्टर एंडरशन जिए भी इसी कहावत की तरह ही थे. थे पर नहीं भी थे. एक पल न्यू यॉर्क में थे तो अगले ही पल भोपाल में. भोपाल में अपनी कम्पनी के गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे. कहने को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था. फिर दिल्ली से एक फ़ोन आया. और अगले ही पल मिस्टर एंडरसन सरकारी जहाज़ में थे. फिर दिल्ली पहुंचे और वहां से वापस न्यू यॉर्क. फिर कई साल बाद, 29 सितंबर 2014 को मिस्टर एंडरसन की मृत्यु हो गई थी. वेरो बीच, फ़्लोरिडा के एक नर्सिंग होम में. किसी प्रकार की कोई अनाउंसमेंट नहीं की गई. ना अख़बार के चौथे पन्ने में ‘हमेशा दिल में रहेंगे’, जैसा कोई शोक संदेश छपा. दुनिया की कुछ सबसे बड़ी कम्पनियों में से एक का CEO रहा व्यक्ति, मौत के वक्त भी छुपा रहना चाहता था. लोगों को बाद में पब्लिक रिकॉर्ड से पता चला कि मिस्टर एंडरसन चल बसे.

मिस्टर एंडरसन, नाम से लगता है. मानो एजेंट स्मिथ नियो को बुला रहा हो. लेकिन इन मिस्टर एंडरसन की कहानी किसी नीली या लाल गोली से नहीं. एक ज़हरीली गैस से जुड़ी है. गैस जिसने साँसों को तबाह किया. और दुनिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित त्रासदी को जन्म दिया.

37 साल पुराना भूत

पहले भूत सिर्फ़ घरों में हुआ करते थे. फिर औद्योगीकरण हुआ और भूत कारख़ानों में भी पाए जाने लगे. ऐसी ही एक फ़ैक्टरी है भोपाल में. शहर के ठीक बाहरी छोर पे. 37 साल पुराना एक भूत आज भी यहीं मौजूद है. भोपाल गैस त्रासदी का भूत. होता भी कैसे नहीं. उसके अवशेष ज्यों के त्यों जो रखे हुए हैं. अवशेष जो पानी में रिसते रहते हैं. जिसमें गायें पानी पीती हैं. बच्चे खेलते हैं और बीमार पड़ते हैं.

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यूनियन कार्बाइड प्लांट, भोपाल (फ़ाइल फोटो)

यहां से कुछ दूर पर है JP नगर. यहां रहने वाली ओमवती यादव अब 67 साल की हो गई हैं. द गार्डीयन के हवाले से खबर है. रिपोर्टर उनसे गैस त्रासदी के बाबत कुछ पूछता है, तो जवाब देती हैं.

“अच्छा होता, गर एक और गैस लीक हो जाती. हम सब मर जाते. और इस नर्क से छुटकारा मिलता”

ओमवती की छत से यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी दिखाई देती है. उसकी ओर इशारा कर ओमवती की आंखों में आंसू आ जाते हैं. आंसू पोछते हुए अपनी बात आगे बढ़ाती हैं,

“37 साल नर्क के भोग लिए इस जगह में. कैसे भी ये ख़त्म हो अब बस. ये ज़िंदगी नहीं है. ये मौत भी नहीं है. ये दोनों के कहीं बीच में कुछ अजीब सी जगह है”

पति पन्ना लाल यादव 70 के हो चुके हैं. अपने हाथों पर काले धब्बों और शरीर में जगह-जगह पड़े चकत्तों को दिखाते हुए कहते हैं,

“ये ज़हर मेरे अंदर ही रह गया है. और अब धीमे धीमे रिस रहा है.”

2 दिसंबर 1984 की रात

आज की तारीख़ यानी 2 दिसम्बर 1984. महीना भर पहले ही इंदिरा को गोली मारी गई थी. राजीव गांधी ने कुर्सी सम्भाल ली थी और लोकसभा के चुनावों में भी सिर्फ़ 1 महीने का वक्त था. सूबे के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह राज्यभर में चुनावी रैलियों में व्यस्त थे. भोपाल की यूनियन कार्बाइड कम्पनी घाटे में थी और कीटनाशक उत्पादन का काम, जो कई महीने से ठप पड़ा था, एक महीने पहले ही दुबारा चालू हुआ था. फ़ैक्टरी में 68 हज़ार लीटर क्षमता के तीन स्टोरेज टैंक बने थे. नम्बर था E610, E611, and E619. लिक्विड मिथाइल आइसो साइनाइड (MIC) का उत्पादन कर इनमें स्टोर किया जाता था. जो आगे जाकर कीटनाशक बनाने के काम में आती थी.

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भोपाल त्रासदी के पीड़ितों को 04 दिसंबर, 1984 को भोपाल के अस्पताल में इलाज के लिए इंतजार करना पड़ा, जहां यूनियन कार्बाइड कारखाने से जहरीली गैस के रिसाव से 3,500 से अधिक झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों की मौत हो गई (तस्वीर: एएफ़पी)

सेफ़्टी रेगुलेशन के हिसाब से किसी भी टैंक को 50% से ज़्यादा नहीं फ़िल किया जाना था. हर टैंक को आधा भर के उसमें नाइट्रोजन भर दी जाती थी. नाइट्रोजन इसलिए कि वो नेचर में इनर्ट होती और लिक्विड MIC को किसी भी रिएक्शन से बचाती थी. उसी साल अक्टूबर महीने में टैंक E610 को ख़ामियों के चलते बंद कर दिया गया था. उसमें ज़रूरत से ज़्यादा MIC भर देने के कारण प्रेशर ज़्यादा हो गया था और MIC को निकालने में दिक़्क़त आ रही थी. अक्टूबर और नवंबर महीने में मेंटेनेन्स का काम होना था. सेफ़्टी सिस्टम ख़राब हो चुके थे. और पाइप और वाल्व भी ख़स्ताहाल थे. 2 दिसम्बर 1984 की उस सुबह टैंक E610 को दुबारा चालू करने की कोशिश की गई. लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली.

फिर रात 11 बजे के क़रीब एक कर्मचारी ने नोट किया कि E610 का प्रेशर 10 PSI तक पहुँच गया है. जबकि ठीक आधा घंटा पहले ही प्रेशर 2 PSI के बराबर था. वहां मौजूद वर्कर्स को सांस लेने में कुछ दिक़्क़त हुई तो उन्होंने लीक का पता लगाने की कोशिश की. 11.45 पर लीक का पता चला. उसे ठीक भी कर लिया गया. इस दौरान टैंक का प्रेशर लगातार बढ़ता जा रहा था. हुआ ये था कि एक पाइप की ब्लॉकेज ठीक करने के चक्कर में पानी छोड़ा जा रहा था. और पानी टैंक के अंदर MIC से मिल कर रिएक्शन कर रहा था. एक्सोथर्मिक रिएक्शन से गर्मी और प्रेशर दोनों बढ़ रहा था. रात 12.40 तक टैंक का प्रेशर जब 40 PSI पहुंच गया. तब एक कर्मचारी ने देखा कि टैंक के ऊपर रखी सीमेंट की स्लैब में दरार पड़ने लगी थी. इससे पहले कि कोई कुछ कर पाता इमरजेंसी वाल्व फटा और गैस वातावरण में लीक होने लगी.

शहर गैस चेम्बर बन गया

इस समस्या के हल के लिए इंतज़ाम थे. एक फ़्रीज़िंग सिस्टम लगा हुआ था. सेफ़्टी वाल्व लगे हुए थे. यहां तक कि गैस रिलीज़ हो जाने की स्थिति में फ़्लेयर टावर लगे हुए थे. वो बड़े बड़े टावर जो कारख़ानों से धुआं और कभी-कभी आग छोड़ते दिखाई देते हैं. रिसाव की स्थिति में फ़्लेयर टावर से गैस निकलकर जल जाती है. लेकिन यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी में फ़्लेयर टावर के नीचे वाले पाइप में जंग लग चुकी थी. उसे मेंटेनेंस के लिए हटा लिया गया था. और MIC के साथ एक दिक़्क़त ये है कि वो हवा से भारी होती है. इसलिए बिना पाइप के सहारे ऊपर की ओर नहीं जाती.

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कीटनाशक संयंत्र से लीक हुई एमआईसी गैस के प्रभाव को जानने के लिए डॉक्टर 40 मनुष्यों पर प्रयोग किया उन्हें “गिनी पिग्स” बना दिया गया. (बेदी / एएफपी द्वारा फोटो)

ज़हरीली MIC गैस धीरे धीरे फ़ैक्टरी से बाहर निकलने लगी. अगले दो घंटे में पूरा शहर गैस चेम्बर में तब्दील हो गया. MIC के सिर्फ़ 21 पीपीएम यानी पार्टस पर मिलियन कण हवा में मौजूद हो तों एक मिनट में हज़ारों लोगों की जान जा सकती है. भोपाल में उस दिन 40 टन मिथाइल आइसो साइनाइड गैस लीक हुई थी.

धीरे-धीरे गैस आस-पास के इलाके में एक चादर की तरह फैल चली गई. सांस में ज़हर घुला तो दम घुटने लगा. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक हादसे में करीब 3,787 लोग मारे गए थे. अनाधिकारिक तौर पर ये संख्या 15 हज़ार के क़रीब थी. इन आंकड़ों को लेकर हमेशा मतभेद रहा है. लेकिन इतना तय है कि हादसे में करीब साढ़े पांच लाख सीधे तौर पर प्रभावित हुए थे. उस वक्त भोपाल की आबादी ही साढ़े आठ लाख के आस-पास थी.

सिर्फ़ दो अस्पताल

बात सिर्फ़ इतनी नहीं थी कि लोग मरे थे. मृत्यु से पहले जिस दर्दनाक रूप से लोग तड़पे थे, शब्दों में बयान करना मुश्किल है. दूर इलाक़ों में लोगों की मौत हुई थी. और फैक्ट्री के आस-पास का माहौल तो और भी दर्दनाक था. वहां गांव थे. जिनमें कारख़ाने में काम करने वाले मज़दूर परिवार रहते थे. ना कोई अलार्म बजा, ना किसी ने सूचना दी. सुबह जब तक अलार्म बजा. गांवों में एक भी व्यक्ति सलामत नहीं बचा था.

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लाखों लोगों को आने वाले कई सालों तक गैस लीक के प्रभाव झेलने पड़े (फ़ाइल फोटो)

जो बचे उन्हें अस्पताल ले ज़ाया गया. लेकिन शहर में सिर्फ़ दो अस्पताल थे. ना किसी को MIC का पता था, ना उसके इलाज का. डॉक्टरों की आंखों के सामने लोग मर रहे थे. लेकिन वो कुछ नहीं कर सकते थे. लोगों को आंख- कान के साथ सांस फूलने और स्किन में जलन आदि की प्राब्लम थी. भोपाल के डॉक्टरों ने इस तरह की समस्या का कभी सामना नहीं किया था. इस वजह से हालात और बिगड़ते चले गए. अगले दो दिनों तक इन्हीं दोनों अस्पतालों में करीब 50,000 मरीज भर्ती हुए.

जो इलाज भी किया गया, वो सिर्फ़ सिम्प्टोमेटिक था. यानी बीमारी के प्रभावों का इलाज. कारण ये कि ट्रेड सीक्रेट के नाम पे यूनियन कार्बाइड ने कभी भी लीक हुई गैस का कंपोज़िशन नहीं बताया. सिर्फ़ इतना पता चल पाया कि MIC जब पानी से रिएक्ट करती है तो 300 के आसपास टाक्सिक केमिकल निकलते हैं. उस पर भी सिर्फ़ प्योर MIC के प्रभावों पर रिसर्च हो पाई. उसके कंपोनेंनट्स पर नहीं. 2014 में ‘इंडियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च’ (ICMR) दिल्ली ने अपनी रिसर्च के बाद कहा, भोपाल गैस त्रासदी के बाद लोगों को जिन बीमारियों का सामना करना पड़ा, उनका असली कारण नहीं पता लग पाया है. मार्के की बात कि आज, 2021 तक पता नहीं चल पाया है कि भोपाल में जो गैस रिलीज़ हुई थी, उसके कंपोनेंट्स क्या थे.

मिस्टर एंडरसन को किसने छोड़ा

अब बात मिस्टर एंडरसन की. जिनका पूरा नाम वॉरेन एंडरसन था. और वो तब यूनियन कार्बाइड के CEO हुआ करते थे. घटना के वक्त वो भारत में नहीं थे. उन्हें सेफ़ पेसेज का आश्वासन मिला. तब घटना के 5 दिन बाद यानी 7 दिसम्बर को मिस्टर एंडरसन भोपाल पहुंचे. जहां पुलिस ने गिरफ़्तार कर गेस्ट हाउस में डाल दिया. MP के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह तब एक इलेक्शन रैली में बिज़ी थे. उन्हें दिल्ली से एक फ़ोन आया और एंडरसन को 25 हज़ार रुपए के निजी बॉंड पर छोड़ दिया गया. बाक़ायदा एक सरकारी हवाई जहाज़ में दिल्ली ले ज़ाया गया. जिसके बाद एंडरसन अमेरिका चले गए. पर्सनल बॉंड में लिखित वादा दिया था कि तहक़ीक़ात के लिए मौजूद रहेंगे. लेकिन एक बार एंडरसन अमेरिका पहुंचे तो फिर कभी वापस ना लौटे.

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यूनियन कार्बाइड के CEO, वॉरन एंडरसन (तस्वीर: getty)

सवाल उठा कि किसके कहने पर एंडरसन को रिहा कर दिया गया. आगे जाकर अपनी आत्मकथा,‘अ ग्रेन ऑफ़ सैंड इन द ऑवरग्लास ऑफ़ टाइम’ में अर्जुन सिंह ने लिखा कि उन्हें फ़ोन करने वाले यूनियन होम सेक्रेटरी RD प्रधान थे. सिंह के अनुसार प्रधान ने उन्हें कहा था कि यूनियन होम मिनिस्टर PV नरसिम्हा राव के निर्देशनुसार, एंडरसन को छोड़ दिया जाए. प्रधान से जब पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि दिसम्बर 1984 में वो महाराष्ट्र के चीफ़ सेक्रेटरी थे. और घटना के एक महीने बाद जनवरी 1985 में यूनियन सेक्रेटरी नियुक्त हुए थे.

सवाल आज भी ज्यों का त्यों है. क़यास लगने लाज़मी थे, सो आज तक लगाए जाते हैं. बहरहाल, सरकार की कई कोशिशों के बाद भी एंडरसन को भारत नहीं लाया ज़ा सका 2010 में इस मामले में फ़ैक्टरी के कर्मचारियों को दो-दो साल की सजा सुनाई गई लेकिन वो भी जमानत पर रिहा भी कर दिए गए.


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