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हुगली की जंग: मीर जाफ़र का प्लासी-2 का प्लान क्यों फेल हो गया?

1579 में मुग़ल बादशाह अकबर से परमीशन लेकर पुर्तगालियों ने हुगली के किनारे एक नगर बसाया. एक बड़ा बंदरगाह होने के चलते इस नगर में व्यापार खूब फला-फूला. और पूर्व में ट्रेड का एक बड़ा सेंटर बन गया. कलकत्ता तब पिक्चर में नहीं था. इस नगर का नाम था चिनसुराह. पुर्तगाली यहां सेटल हुए और बंदेल का बड़ा फ़ेमस चर्च बनाया. जो आज यानी 21वीं सदी में भी वैटिकन के लिए बहुत महत्व रखता है.

इस चर्च से जुड़ा एक किस्सा मशहूर है. हुआ ये कि 1632 में मुग़लों ने अदावत के चलते चिनसुराह पर धावा बोला और बंदेल का चर्च जला डाला. चर्च का पादरी और शहर के हज़ारों ईसाई बेड़ियों में आगरा भेजे गए. जहां उन्हें मुग़ल बादशाह शाहजहां के सामने पेश किया गया. शाहजहां ने बंदियों को हाथियों के पैरों तले कुचल देने का हुक्म दिया. लेकिन ऐन वक्त पर एक हाथी ने पादरी पर हमला करने से इनकार कर दिया. ये देखकर शाहजहां ने इसे खुदा का इशारा मानते हुए सभी बंदियों को रिहा कर वापस बंदेल भेज दिया. साथ ही चर्च के पुनर्निर्माण के लिए पैसे भी दिए.

गंगा पर यूरोप

आगे जाकर ये इलाक़ा डच कम्पनियों के अधिकार में आया और यहां उन्होंने अपने कारख़ाने स्थापित किए. 18वीं सदी की शुरुआत में हुगली नदी के तट पर डच, फ़्रेंच और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी, तीनों मौजूद थे. तब इसे ‘गंगा पर बसा यूरोप’ भी कहा जाता था. चिनसुराह में डच ईस्ट इंडिया कम्पनी का हेडक्वॉर्टर हुआ करता था. पहले उन्होंने मुग़लों के साथ संधि की थी और बाद में बंगाल के नवाब सिराज-उद दौला के साथ.

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बंदेल का चर्च 1660 में दुबारा बनाया गया (तस्वीर: wikimedia commons)

1756 में अंग्रेजों ने फ़ोर्ट विलियम के आसपास अपनी पकड़ मज़बूत की तो सिराज-उद-दौला ने कलकत्ता पर अटैक कर दिया. और उसे अपने कब्जे में ले लिया. (तब कुछ समय के लिए कलकत्ता का नाम अली नगर रख दिया गया था). इस दौरान डच और फ़्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी ने चिनसुराह और चंद्रनगर में अपने लिए पैसे दे कर रियायत ले रखी थी. 1757 में ब्रिटिश फ़ौज ने चंद्रनगर पर हमला कर उसे अपने कब्ज़े में ले लिया. और फ़्रेंच ईस्ट इंडिया कम्पनी की बंगाल से रूखसती हो गई.

इसके कुछ समय बाद प्लासी का युद्ध हुआ. जिसमें सिराज-उद दौला की हार हुई और मीर जाफ़र नया नवाब बन गया. हालांकि सिर्फ़ नाम का. अगले दो सालों में ही उसे समझ आ गया था कि वो रॉबर्ट क्लाइव के हाथ की मात्र एक कठपुतली है. अंग्रेजों की जकड़ से छुटकारा पाने के लिए साल 1759 ने में उसने प्लासी-पार्ट 2 खेलने की कोशिश की. जिसके चलते 1759 चिनसुराह में डच और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच एक बड़ी लड़ाई हुई. प्लासी की जंग ने अंग्रेजों को भारत में पकड़ मज़बूत करने का जो मौक़ा दिया था. इस जंग ने उस पर मुहर लगा दी थी.

हुगली तट पर डच जहाज़ 

अगस्त 1759 में हुगली के तट पर एक जंगी जहाज़ ने बेड़ा डाला. रॉबर्ट क्लाइव के पास ये खबर पहुंची. वो फ़रियाद लेकर अपने ग़ुलाम मीर जाफ़र के पास पहुंचे. जाफ़र ने पता लगवाया. जहाज़ बटाविया से आ रहा था, जो उस समय पूर्व में डच उपनिवेशों की राजधानी हुआ करता था. जहाज़ के कप्तान ने दरबार में हाजरी लगाई. कप्तान से हुगली पहुंचने का कारण पूछा गया तो उसने जवाब दिया,

“जनाब हम तो नागपट्टनम पहुंचना था. मौसम ख़राब हुआ तो हम बचने के लिए यहां आ ग़ए. खाना-पानी का इंतज़ाम कर दें तो हम जल्द दे जल्द अपने सफ़र पर निकल जाएंगे”

क्लाइव तक ये खबर पहुंची तो उसने जल्द से जल्द डच जहाज़ को रुख़सत करने का फ़रमान दे दिया. ये घटना क्लाइव के लिए ख़तरे की घंटी तो नहीं थी, लेकिन जब पत
चला की डच जहाज़ से 18 मलय(आज का मलेशिया) सैनिक चिनसुराह भेजने की कोशिश की गई तो उसे कुछ शक ज़रूर हुआ. बहरहाल क्लाइव कुछ ही दिनों में इस घटना को भूल गया. भूलता कैसे नहीं, उसके पास चिंता की कुछ ख़ास वजह थी नहीं. डच कोई चाल चलते तब भी नवाब मीर जाफ़र उसकी उंगली पर नाचता था. और वो धीरे-धीर बंगाल सूबे को ब्रिटिश अधिकार में लेता जा रहा था.

मीर जाफ़र का ख़त

कुछ महीनों बाद अक्टूबर में, जब मीर जाफ़र कलकत्ता में था, तब कुछ और डच जहाज़ हुगली के तट पर पहुंचे. ये 7 हथियारबंद जहाज़ थे, जिसमें यूरोपियन और मलय सैनिक भरे हुए थे. ये कोई आम घटना नहीं थी. ब्रिटिश और डच देशों के बीच यूरोप में लड़ाई अभी-अभी शांत हुई थी. ऐसे में क्लाइव कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं था. वो सीधा नवाब के पास पहुंचा और उसे हालात से इत्तिला किया.

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चिनसुराह में डच सेटेलमेंट (तस्वीर: wikimedia commons)

मीर जाफ़र ने क्लाइव को भरोसा दिलाते हुए कहा कि अबकी वो खुद हुगली जाएगा. और चिनसुराह के डच अधिकारियों को दरबार में बुलाकर जवाब मांगेगा. ऐसा उसने किया भी. लेकिन जैसा कि बाद में क्लाइव ने अपने नोट्स में दर्ज़ किया, डच अधिकारी आए तो जाफ़र ने उनकी आवभगत की. मानो वो कोई दुश्मन नहीं बल्कि उसके दोस्त हों.
इसके कुछ दिनों बाद नवाब ने हुगली से क्लाइव को एक पत्र लिखा. जिसमें उसने कहा कि उसने डच जहाजियों को ट्रेड में कुछ रियायतें दीं हैं. जैसे ही मौसम सही होगा वो हुगली से वापस लौट जाएंगे.

ख़त लिखते वक्त जाफ़र खुद अपनी और रॉबर्ट क्लाइव, दोनों की शख़्सियत भूल गया था. जिस मीर जाफ़र ने अपने हमवतन नवाब सिराज-उद दौला से वफ़ादारी नहीं निभाई. वो रॉबर्ट क्लाइव और अंग्रेजों से वफ़ादारी निभाएगा, इसकी कितनी ही उम्मीद की जा सकती थी. और रॉबर्ट क्लाइव की एक ख़ास बात थी कि ख़तरे की गंध मिलते ही वो सियार बन जाता. उसकी समझ और तेज हो जाती और जजमेंट एकदम क्लीयर हो जाया करता था. जाफ़र के पत्र को तो उसने पढ़ा ही, लेकिन वो भी पढ़ लिया जो उसमें नहीं लिखा था. उसे साफ़ समझ आया कि डचों की वापस जाने की कोई मंशा तो नहीं ही है.

साथ ही ये भी कि नवाब डचों को चिनसुराह बुलाकर उनका साथ देने वाला है. अगले कुछ दिनों में उसे पूरी स्कीम समझ आ गई. जब जहाज़ी बेड़े से ना केवल एक डेलीगेशन चिनसुराह पहुंचा बल्कि उन्होंने क़ासिम बाज़ार और पटना में सैनिकों की भर्ती भी शुरू कर दी.

प्लासी-2 का प्लान

इसके बाद क्लाइव ने हिसाब लगाना शुरू किया. कलकत्ता ब्रिटिश EIC के 330 यूरोपियन सैनिकों सहित कुल 1550 ट्रूप्स तैनात थे. दूसरे सूबों में बाकी डिटैचमेंट थे. लेकिन इतनी जल्दी उनका कलकत्ता पहुंचा सम्भव नहीं था. दूसरी तरफ मीर जाफ़र एक और प्लासी प्लान कर रहा था. डच जहाज़ों में 700 यूरोपियन सैनिकों सहित कुल 1500 सिपाही हुगली पहुंचे थे. 150 के आसपास ट्रूप्स चिनसुराह में तैनात थे. जिनकी तादाद में दिनों दिन बढ़ोतरी हो रही थी. और इनके पीछे नवाब की खुद की फ़ौज तो थी ही.

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क़ासिमबाज़ार में डच फ़ैक्टरी (तस्वीर: Wikimedia Commons)

मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए क्लाइव ने फ़ोर्ट विलियम की सुरक्षा बढ़ाई. और हुगली के तट पर तैनात चार जहाज़ों में से एक को उसने अराकान कोस्ट की ओर रवाना किया. वहां एडमिरल कॉर्निश अपनी फ़्लीट के साथ मौजूद थे. जो मदद भेज सकते थे. इसके अलावा हुगली में उसने अपनी डिफ़ेन्सिव पोजिशन मजबूत करना शुरू किया. हुगली को पार करने के दो महत्वपूर्ण रास्ते थे, तनाह का किला और चारनॉक. रॉबर्ट क्लाइव ने यहां तैनात बैटरी को मज़बूत किया और किले पर तोपें तैनात कर दी.

उसी समय मछलीपट्टम को जीत कर कर्नल फ़ोर्ड कलकत्ता पहुंचा. उसके साथ कैप्टन नॉक्स भी था. क्लाइव ने फ़ोर्ड को मौजूदा फ़ोर्स को कमांड करने को कहा और नॉक्स को तानाह और चारनॉक की ज़िम्मेदारी सौंप दी. नवंबर के दूसरे हफ़्ते में डच EIC को क्लाइव की तैयारियों की भनक लगी. तो उन्होंने छोटी ब्रिटिश नावों पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया. इन्हीं जहाज़ों में क्लाइव का ख़त भी था जिसमें उसने एडमिरल कॉर्निश से मदद की गुज़ारिश की थी. देरी ना करते हुए डच सैनिकों ने पट्टी और रायपुर में अपने सैनिक उतारे और वहां मौजूद इंग्लिश एजेंट्स को गिरफ़्तार कर लिया.

इसके बाद क्लाइव ने एक और चाल चली. उसने मीर जाफ़र को एक ख़त भेजा. मीर जाफ़र को अंदाज़ा था कि क्लाइव उससे मदद मांगेगा. लेकिन ख़त में क्लाइव ने इसकी ठीक उल्टी बात कही थी. उसने नवाब से कहा कि ये ब्रिटिश और डच, दो यूरोपियन देशों की लड़ाई है. और उसे इससे दूर रहना चाहिए. आगे क्लाइव ने लिखा कि जाफ़र चाहे तो अपनी फ़ौज को कलकत्ता और आसपास के इलाक़े की निगरानी के लिए नियुक्त कर सकता है. लेकिन एक्टिव बैटल में भाग लेने से उसे बचना चाहिए.

क्लाइव के सामने दो ऑब्जेक्टिव थे

19 नवंबर को अनाधिकारिक तौर पर जंग की शुरुआत हो चुकी थी. क्लाइव ने कैप्टन फ़ोर्ड को बाड़नगर पर क़ब्ज़ा करने का ऑर्डर दिया. बाड़नगर से श्रीरामपुर होते हुए आगे चंद्र नगर का रास्ता निकलता था. और चंद्रनगर डच हेडक्वार्टर के ठीक बग़ल में पड़ता था. 21 नवंबर को डच सैनिक जहाज़ से लैंड कर चिनसुराह की ओर बढ़े तो क्लाइव के सामने दो ऑब्जेक्टिव थे. पहला कि डच सैनिकों को चिनसुराह में बेस बनाने से रोका जाए. और दूसरा कि अगर ये सैनिक वापस जहाज़ की ओर जाएं तो उनका वो बेस भी नष्ट कर दिया जाए. इससे होता ये कि डच सैनिक बीच में फ़ंस जाते और लड़ाई के लिए उनके पास कोई बेस ना बचता.

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चिनसुराह के पास डच नेवी के जहाज़ पहुंचे तो रॉबर्ट क्लाइव के कान खड़े हो गए (तस्वीर: columbia.edu)

24 नवंबर को आधिकारिक रूप से जंग की शुरूआत हुई. जिसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा पानी पर लड़ा गया. संख्या और शक्ति में आधा होने के बावजूद क्लाइव ने सूझबूझ से पानी में डच बेड़े को नष्ट कर डाला. उसका पहला ऑब्जेक्टिव पूरा हो चुका था. अब बारी दूसरे ऑब्जेक्टिव की थी. डच सैनिक जहाज़ से उतरकर चिनसुराह की ओर बढ़ रहे थे. क्लाइव ने कैप्टन फ़ोर्ड और नॉक्स को नदी के मुहाने पर तैनात दो सैनिक बैटरियों की कमान संभालने को कहा.

21 नवंबर को बाड़नगर पर कब्जा करने के बाद नदी पार कर कैप्टन फ़ोर्ड श्रीरामपुर पहुंचा. अगली रात उसने चंदरनगर में पोजिशन ले ली. आगे उसका इरादा चिनसुराह पर हमला करने का था. जो यहां से सिर्फ़ 3 मील की दूरी पर था. फ़ोर्ड इस बात से अंजान था कि जहाज़ से उतरकर डच फ़ोर्सेस उसके पास पहुंचने वाली थी. दो दिन और यही सिचुएशन रहती तो फ़ोर्ड चिनसुराह और जहाज़ से आ रही डच फ़ोर्सेस से घिर जाता.

लेकिन यहां डच EIC से एक गलती हो गई. अपना बेस सम्भालने के बजाय उन्होंने अपनी पूरी फ़ोर्स को फ़ोर्ड से निपटने के लिए रवाना कर दिया. डच टुकड़ी के 120 यूरोपियन सैनिक और लगभग 300 मलय सैनिक 24 नवंबर की सुबह चंदरनगर पहुंचे. जहां फ़ोर्ड ने पोजिशन ले रखी थी.

प्यारे फ़ोर्ड

24 नवंबर की सुबह-सुबह फ़ोर्ड ने अपनी टुकड़ी के साथ डच फ़ैक्शन पर हमला कर दिया. प्लासी की जंग में शामिल हुई ब्रिटिश टुकड़ी भारतीय युद्ध शैली में पारंगत हो चुकी थी. उन्होंने आराम से डच सैनिकों को चंदरनगर के मुहाने तक खदेड़ दिया. और उनकी बंदूकें भी छीन लीं. 24 नवंबर की शाम तक ऑफ़िसर नाक्स भी अपनी टुकड़ी लेकर ब्रिटिश ख़ेमे में शामिल हो चुका था.

चंदरनगर में जिन डच सैनिकों को कब्जे में किया गया था, उन्होंने फ़ोर्ड को खबर दी कि जहाज़ से सैनिक अगले दिन तक चिनसुराह पहुंच जाएंगे. ये सुनकर फ़ोर्ड ने रॉबर्ट क्लाइव को एक संदेश भिजवाया. क्लाइव के पास जब ये संदेश पहुंचा तब वो ताश खेल रहा था. फ़ोर्ड का ख़त पढ़ते ही उसने एक पेंसिल पकड़ी और उसी ख़त के पीछे एक संदेश लिखकर वापस भिजवा दिया.

संदेश में लिखा था,

“प्यारे फ़ोर्ड, तुम बेहिचक लड़ाई में कूद जाओ. काउन्सिल की पर्मिशन मैं ले लूंगा.”

क्लाइव का जवाब मिलते ही फ़ोर्ड और नॉक्स ने अपनी टुकड़ी को मूव किया और बिदेरा पर कब्जा कर लिया. बिदेरा एक छोटा सा मैदान था, जहां एक तरफ़ गांव और दूसरी तरफ़ आम के बाग थे. आज ही के दिन यानी 25 नवंबर 1759 को बिदेरा में डच फ़ोर्स और ब्रिटिश फ़ोर्स के बीच जंग लड़ी गई.

बिदेरा की जंग में

बिदेरा में फ़ोर्ड ने अपनी टुकड़ी को दाएं फ़्लैंक पर आम के बागों की ओट में खड़ा किया. और नॉक्स को बाएं फ़्लैंक से गांव में पोजिशन लेने को कहा. ये एक डिफ़ेन्सिव फ़ॉर्मेशन थी. लेकिन फ़ोर्ड के पास एक एडवांटेज थी कि वो चारों तरफ़ से सिक्योर थे. हमला सिर्फ़ सामने से हो सकता था. इसके अलावा बिदेरा से ठीक पहले एक खाई भी पड़ती थी, जिसे पार करने में डच फ़ोर्सेस को मुश्किल आती.

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ब्रिटिश टुकड़ी संख्या में डच ट्रूप्स से कम थी लेकिन अपनी सूझबूझ से वो डच ट्रूप्स को चकमा देते जा रहे थे (तस्वीर: Wikimedia Commons)

25 नवंबर की सुबह क़रीब 10 बजे डच फ़ोर्सेस बिदेरा पहुंची. इन्हें लीड कर रहा था कर्नल रसेल. खुले मैदान में डच फ़ोर्सेस के पास छुपने के लिए कोई जगह नहीं थी. इसलिए ब्रिटिश बन्दूकों ने उन्हें निशाना बनाना शुरू किया. किसी तरह डच फ़ोर्सेस फ़ॉर्वर्ड प्रेस कर पाई तो उनका सामना खाई से हो गया. पीछे से ट्रूप्स इस बात से अंजान थे कि आगे खाई है. इसलिए जहां एक तरफ़ आगे की डच फ़ोर्स खाई के पीछे अटक गई थी, वहीं दूसरी ओर पीछे से ट्रूप्स प्रेस किए जा रहे थे.

इस अफ़रातफ़री में उनका सारा फ़ॉर्मेशन टूट गया. और वो छोटे से, सामने की तरफ़ खुले हुए मुहाने पर सिमट कर रह गए. ब्रिटिश फ़ोर्स ने गांव और आम के बागों से फ़ायर करना शुरू किया. जिससे अच्छी ख़ासी संख्या में डच सैनिक मारे गए. कई कोशिशों के बाद जो बचे-कुचे सैनिक थे, वो खाई पार करने में सफल हुए. तब फ़ोर्ड ने अपनी घुड़सवार टुकड़ी को आगे भेजा और इससे डच फ़ोर्सेस में खलबली मच गई.

मीर जाफ़र ने मारी पलटी

बिदेरा में नवाब मीर जाफ़र भी अपनी टुकड़ी लेकर पहुंचा था. लेकिन शुरुआती लड़ाई में वो सिर्फ़ देखता रहा. जब उसे लगा कि डच ख़ेमे की हार निश्चित है, तो उसने अपनी एक टुकड़ी ब्रिटिश फ़ोर्स की मदद के लिए भेजी. नवाब और ब्रिटिश फ़ौज ने मिलकर कुछ ही मिनटों में डच फ़ोर्सेस का सफ़ाया कर दिया. डच EIC के लिए बंगाल में ये एक निर्णायक हार थी. डच सेना के 320 सैनिक मारे गए. 300 से ज़्यादा घायल हुए और जो बाकी बचे वो भाग निकले. बचे हुए सैनिकों ने जहाज़ का रुख़ किया. लेकिन वहां क्लाइव पहले ही अपना खेल कर चुका था. इन्हें भी बंदी बना लिया गया.

चिनसुराह में मिली जीत ने क्लाइव को प्लासी से भी ज़्यादा ख्याति दिलाई. इस जीत के बात क्लाइव ने सूझबूझ दिखाते हुए मीर जाफ़र से और बहुत सी रियायतें ले ली. जिन्हें स्वीकार करने के अलावा जाफिर के पास और कोई चारा ना था. इसके कुछ समय बाद ही मीर जाफ़र को नवाब के पद से भी हटा दिया गया और उसने अपनी बाकी ज़िंदगी ज़िल्लत में गुज़ारी.


वीडियो देखें- मुग़लों पर जीत के बाद एक बहरूपिया कैसे बन गया मराठा साम्राज्य का छत्रपति?

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