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बाजी राउत: 12 की उम्र में देश के लिए शहीद होने वाला क्रांतिकारी

सर्दियों की एक रात में नदी के किनारे 12 साल का एक बच्चा बैठा हुआ है.

‘मां ने आज भी दिन भर काम किया होगा. चावल की भूसी निकालने में कितना ही पैसा मिलता होगा. पिताजी होते तो शायद थोड़ा सहारा हो जाता.’ 

ये सब सोचते हुए उसे बार-बार झपकी आ रही है. कई मर्तबा सिर ढलता तो गर्दन झटक के खुद को जगा लेता. जगना ज़रूरी है. नावों की देखभाल करनी है. मालिक की नौकरी होती तो सो भी जाता, यहां बात अंतरात्मा की है. ये काम चंद सिक्कों के लिए नहीं, एक महत्तम लक्ष्य के लिए किया जाना है.

लक्ष्य कुछ देर में खुद दौड़ता हुआ लड़के के पास ही आ जाता है. आवाज़ आती है, नाव तैयार करो, पार जाना है. लड़का गर्दन हिलाकर इनकार कर देता है. साम से नहीं तो दंड से सही. आवाज़ दुबारा कहती है, नाव निकालो वरना गोली मार देंगे. लड़का फिर इनकार कर देता है. अबकी बार गर्दन नहीं हिलती. सीटी जैसी आवाज़ में लड़का जवाब देता है.

‘नहीं ले जाएंगे. तुमको नदी के पार नहीं ले जाएंगे.’

तभी एक बंदूक़ का ठुड्डा आकर लड़के के सिर पर लगता है. 12 साल के बच्चे की खोपड़ी का क्या हुआ होगा, बताने के लिए डॉक्टरी की पढ़ाई ज़रूरी नहीं. माथा पकड़कर लड़का फिर खड़ा होता है. आवाज़ की पिच और ऊंची हो गई है. मानो किसी को इत्तिला कर रहा हो. लड़का एक और बार वही जवाब दोहराता है,

‘कहा ना, नहीं ले जाएंगे तुमको नदी….

बात पूरी नहीं हो पाई. नदी यूं तो रुकती नहीं, लड़के की ज़बान ने उसे भी रोक दिया है. एक गोली आकर उसके सीने में लगती है और वो वहीं गिर जाता है. ड्यूटी पूरी हो चुकी है. अब नींद से कोई ख़तरा नहीं.

12 साल की उम्र में अपने उद्देश्य के लिए जान देने वाला ये लड़का कौन था? और क्या था उसका उद्देश्य. चलिए जानते हैं.

आज़ादी का चमन मुस्कुरा रहा है

कहानी की शुरुआत एक राजा और उसके राज महल से. राजा के पास मुकुट नहीं था. लेकिन राजशक्ति पूरी थी. एक दिन राजा ने सोचा, उसके लिए नया महल बनाया जाना चाहिए. इसके लिए लोगों पर टैक्स लगाए गए. पेट्रोल और रसोई गैस तो हुआ नहीं करती थी. इसलिए राजा ने देशभक्ति का बैंड बजाया और एक नया टैक्स ईजाद किया. नाम- राजभक्ति टैक्स.

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ढेंकनाल रियासत का राजमहल (तस्वीर: indianrajputs.com)

राजशाही को माफिया राज बना डाला. राजा के गुंडे आए-दिन मनमानी करने लगे. देशभक्ति के नाम पर पैसा उगाहा जाने लगा. और एक दिन महल बनकर तैयार भी हो गया. लेकिन सहन करने की भी सीमा होती है साहब.

राजा के विरोध में जनता उठ खड़ी हुई. ‘प्रजा मंडल’ का गठन किया गया और कुछ ही सालों में जनता ने राजा का ही बाजा बजा डाला. इससे पहले कि आप एनालॉजी ढूंढ़ें. बतलाए देते हैं कि बात आज़ादी के पहले की हो रही है. अब ये सब कहां होता है. अब तो मिल्कियत-ए-मुल्क जनता के हाथ में है. आज़ादी का चमन मुस्कुरा रहा है और कूड़े से भी भीनी-भीनी ख़ुशबू उड़ती है.

जिस राजा साहब की हम बात कर रहे हैं, उनका नाम था शंकर प्रताप. 1926 में इन्होंने उड़ीसा में ढेंकनाल रियासत की बागडोर सम्भाली. पिता का नाम था राजा सूर प्रताप सिंह. नाम के अनुसार ही राजा भी प्रतापी थे. पंचतंत्र सरीखा कहा जाए तो जनता का कल्याण करते थे. प्रजा ने भी राजा को महिंद्र बहादुर की उपाधि दे रखी थी. यानी इंद्र के बराबर महान राजा.

देशभक्ति का लॉलीपॉप

1926 में राजा चल बसे तो बड़े बेटे राजकुमार शंकर प्रताप का राजतिलक हुआ. लेकिन राजकुमार तब तक लोकल ना रहकर ग्लोबल हो चुके थे. ब्रिटेन में उनकी वकालत चल रही थी. सो भरत की तरह राजगद्दी पर चरण पादुकाएं रख, छोटे भाई पत्तायत नृसिंह प्रताप सिंह देव ने राजकाज सम्भाल लिया.

नृसिंह प्रताप ने सोचा राजमुकुट ना हुआ तो क्या, राजमहल ही सही. मुनादी हुई कि छोटे राजा के लिए महल बनाया जाएगा. एकदम भव्य. 100 कमरों वाला. मुफ़्त तो कुछ बनता नहीं. तो सवाल उठा कि पैसा कहां से आएगा. पैसा आया, वहीं से जहां से आज भी आता है. राजशाही के नाम पर नृसिंह प्रताप ने माफिया राज शुरू कर दिया. राजमहल के गुर्गे लोगों को धमका के चंदा उगाहने लगे. नए-नए टैक्स लगाए गए.

जनता को देशभक्ति का लॉलीपॉप थमा दिया गया. इसके बाद कहा गया, केवल आर्थिक दान से कुछ ना होगा, भुजाबल का दान भी ज़रूरी है. प्रजा को बंधुआ मज़दूर बना दिया गया. दो वक्त का खाना भी ना मिलता था. थक कर थम जाओ तो कोड़े पड़ें सो अलग.

प्रजामंडल और बीर बैष्णव

लोगों को लगा शंकर प्रताप लौटेंगे तो उनके साथ अन्याय का हिसाब करेंगे. लेकिन राजा साहब तो अंग्रेज़ी के शग़ल में थे. दोस्ती उन्हीं से, उठाना बैठना भी उन्हीं के साथ. जनता की फ़िक्र उन्हें क्यों कर ही होती. तो जैसे कि पहले बताया, सहन शक्ति ने बाउंड्री लाइन को छुआ तो जनता से राजा को आउट करार दे दिया. एक नया आंदोलन खड़ा हुआ, प्रजामंडल. प्रजा ने ही अपना नायक भी चुना, बैष्णव चरण पट्टनायक.

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बैष्णव चरण पट्टनायक और राजा श्री सूर प्रताप सिंह (तस्वीर: indianrajputs.com)

बीर वैष्णव थे भी बहुत चतुर. पता था कि क्रांति का झंडा उठाकर बीच सड़क पर चलेंगे तो राजा का डंडा मिलेगा, और कुछ नहीं. उन्होंने रेलवे में पेंटर की नौकरी कर ली. इसके लिए प्रजामंडल के लिए पैसा तो मिला ही. साथ ही सरकारी सवारी का मुफ़्त पास भी मिल गया. बीर बैष्णव पेंटिंग के काम से जहां भी जाते, वहां-वहां राजा साहब की महिमा पर काला रंग पोत आते. उनकी मेहनत का नतीजा हुआ कि आसपास की रियासतों में भी प्रजा मंडल खड़े हो गए.

प्रजामंडल आंदोलन का स्कोप इतना व्यापक है कि इस आर्टिकल में उसके साथ न्याय नहीं हो सकता. कोशिश करेंगे कि उसके लिए अलग से एपिसोड बनाए. ख़ैर प्रजा मंडल का रिएक्शन एज एक्सपेक्टेड हुआ. एक तरफ़ की टीम ने नए प्लेयर जोड़े तो दूसरी टीम पीछे कहां रहती. राजा शंकर प्रताप ने ईमान का ऑक्शन किया और अंग्रेजों से मदद मांगी. कोलकाता से 250 अंग्रेज सैनिकों की एक टुकड़ी ढेंकानाल भेजी गई.

आंदोलन के चक्कर में बाकी रियासतों पर भी ख़तरा हुआ तो उन्होंने भी अपनी सेनाएं मदद के लिए ढेंकनाल भेजी.  अब टक्कर सत्ता के गठबंधन और जनता के संगठन के बीच थी. सीधे विद्रोह में राजा का पलड़ा हल्का पड़ सकता था. सो उसने सोचा वकालत की पढ़ाई को ही जस्टिफ़ाई कर लें. राज्य में नया क़ानून लागू हुआ. बीर बैष्णव और आंदोलन के बाकी नेताओं की सारी सम्पत्ति हड़प ली गई.

इतने से भी मन ना भरा तो अंग्रेज सैनिकों को बीर बैष्णव के पीछे लगा दिया गया. 10 अक्टूबर 1938 के दिन अंग्रेजों को खबर लगी कि बैष्णव भुबन गांव में छुपे हुए हैं. उसी दिन गांव पर हमला कर दिया गया. सैनिकों ने पूरा गांव उजाड़ा और लोगों के घरों को जला दिया. गांव के बग़ल से एक नदी बहती थी, ब्राह्मणी नदी.

बानर सेना का बाजी

अंग्रेजों को पता चला कि बैष्णव नदी पार कर भाग निकले हैं. उनका पीछा करते हुए अगली रात सैनिक नीलकंठपुर पहुंचे. प्रजा मंडल में बच्चों की एक अलग सेना बनाई गई थी, बानर सेना. जो मुखबिरी और आंदोलन के नेताओं को ख़तरे से आगाह किया करते थे. इन्हीं में शामिल एक बच्चे को उस दिन घाट पर निगरानी की ड्यूटी दी गई थी. बच्चे का नाम था बाजी राउत.

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बाजी ने छोटी सी उम्र में ही अपने पिता को खो दिया था (तस्वीर: क्विंट )

अंग्रेज सैनिक पहुंचे तो उन्होंने बाजी से नदी पार कराने को कहा. इनकार करने पर उसे गोली मार दी गई. और आज ही के दिन यानी 11 अक्टूबर 1938 को 12 साल का बाजी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाला सबसे कम उम्र का क्रांतिकारी बन गया. अंग्रेजों ने बाजी को मार दिया. लेकिन बाजी अपनी ड्यूटी पूरी कर चुका था. उसकी तेज आवाज़ सुन कुछ ही देर में गांव वाले घाट पर पहुंच गए.

सैनिकों ने गांव वालों को आते हुए देखा तो वो घबरा कर भाग निकले. नाव से जाते हुए उन्होंने गोलियां बरसाईं जिनमें 4 और लोगों की मौत हो गई. पांचों शहीदों के पार्थिव शरीर को ट्रेन से कटक ले ज़ाया गया. कटक की सड़कों पर उस दिन हज़ारों की भीड़ उमड़ पड़ी थी. 12 साल के बाजी की कहानी सुन सभी की आंखें नम थीं.

ज्ञानपीठ पुरुस्कार से सम्मानित सच्चिदानन्द रौत्रे ने बाजी के लिए लिखा,

“बंधु यह चिता नहीं बल्कि
 देश का अंधेरा मिटाने के लिए मुक्ति की मशाल है”

एपिलॉग:

9वीं कक्षा में गणित में सेट थ्योरी के सवाल बनाने में वेंन डायग्राम का यूज़ होता था. दो या तीन गोले जो एक दूसरे के साथ ओवरलैप करते थे. ऐसे ही दो गोलों में अगर पॉलिटिक्स और इंसानी जज़्बात लिखकर उन्हें ओवरलैप कराया जाए तो बीच के हिस्से में क्रांति और बलिदान का नाम आएगा. शहादत का ज़िक्र करने पर मुक्तिबोध का सवाल टांग दिया जाता है, ‘पार्ट्नर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’

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गजानन माधव मुक्तिबोध (फ़ाइल फोटो)

तर्क दिया हाता है कि पॉलिटिक्स सीरियस इश्यू है साहब. एक बच्चे की मौत को यूं रूमानियत का लबादा मत उड़ाओ. तुम बलिदान की आड़ में अंग्रेजों के दमनकारी क़ानून और सामंतवाद को वाइट वॉश कर रहे हो.

लेकिन तर्क और रीज़न के पार एक मैदान है. जहां बाजी मिलेगा तुम्हें. एक 12 साल के बच्चे को जिस देश प्रेम ने अपनी जान न्योछावर करने के लिए प्रेरित किया, उसकी कहानी सिर्फ़ पॉलिटिक्स और ‘इज़्म’ की कलम से नहीं लिखी जा सकती.

उसके लिए कविता भी ज़रूरी है. जैस कवि कालिंदी चरण पाणिग्रही ने बाजी के लिए लिखी,

”आओ लक्षन, आओ नट, रघु, हुरुसी प्रधान, बजाओ तुरी, बजाओ बिगुल, मरा नहीं है, मरा नहीं है, बारह साल का बाजिया मरा नहीं”


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