Thelallantop

कसाब ने क्यों पहन रखा था लाल कलावा?

मुंबई आतंकी हमलों को लेकर 2020 में पूर्व कमिशनर राकेश मारिया ने अपनी किताब में कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए (तस्वीर: एएफ़पी)

मुंबई में उस रोज़ घड़ी 12:47 बजा रही थी. उसी वक्त मुंबई पुलिस कंट्रोल रूम के पास एक मेसेज पहुंचता है. वहां अफ़रातफ़री का माहौल था. कंट्रोल रूम में मौजूद इंचार्ज राकेश मारिया को खबर मिलती है कि चौपाटी पर दो आतंकियों को गोली मारी गई है. मारिया पूछते हैं, ‘बॉडी कहां है’. उन्हें जवाब मिलता है, ‘‘एक मर चुका है और एक ज़िंदा है’

मारिया अपनी कार बुलाते हैं. और तेज़ी से दरवाज़े की ओर बढ़ते हैं. इससे पहले कि वो दरवाज़े को पार करते, उनके पास मुंबई पुलिस कमिशनर हसन गफ़ूर का कॉल आता है. गफ़ूर उनसे रुकने को कहते हैं. मामला चौपाटी पुलिस के जयूरिसडिक्शन में आता था. इसलिए तहक़ीक़ात उन्हीं को करनी थी. मारिया को डर था कि पूछताछ में कोई गलती ना हो. शहर अभी भी आतंकियों के कब्जे में था. और ऐसे में छोटी से छोटी इन्फ़ोर्मेशन क्रूशियल साबित को सकती थी. बहरहाल, मारिया को सिर्फ़ 5 सवालों के जवाब चाहिए थे.

कितने आतंकी हैं?
उन्हें भेजा किसने?
वो मुंबई में कैसे घुसे?
उनका लक्ष्य क्या है?

और सबसे ज़रूरी सवाल कि आतंकियों का कंट्रोल सेंटर कहां है? जिस डिटेल्ड प्लानिंग से आतंकी हमले में जुटे थे, उससे साबित होता था कि उन्हें कहीं से लाइव सपोर्ट मिल रहा था. मुंबई बम धमाकों की तहक़ीक़ात हुई तो इन सारे सवालों के जवाब मिले. तहक़ीक़ात को बाद में मुंबई पुलिस के पूर्व कमिशनर राकेश मारिया ने ही लीड किया था. मारिया ने अपनी तहक़ीक़ात में इन सारे सवालों के जवाब तो ढूंढ लिए. लेकिन साल 2020 में उन्होंने खुद एक सवाल खड़ा कर दिया. सवाल ये कि क्या मुंबई में हमला करने वाले आतंकियों को हिंदू साबित करने का प्लान बनाया गया था?

27 नवंबर की रात

शुरुआत 26 नवंबर 2008 से. एक ऐसी तारीख जिसे इंट्रोडक्शन की ज़रूरत नहीं है. लेकिन घड़ी, हर पल अपना कांटा बदलते हुए, बदलाव दर्ज करती है. सो उस रात भी कर रही थी. तीनों सुइयां 12 के मार्क को पार करती हैं और दिन बदल जाता है. 27 नवंबर की तारीख़ आ चुकी थी. रात 12:40 पर समय दुबारा अपनी प्रेजेंस दर्ज कराता है, जब सन्नाटे को चीरती हुई एक गाड़ी मुंबई की सड़कों पर दौड़ने लगती है.

2008 मुंबई आतंकी हमलों के दौरान पुलिस कमिशनर रहे हसन गफ़ूर (तस्वीर: AFP)

कोई आम दिन या कहें कि रात होती तो अपोलो बंदर से अंधेरी तक का 13 मील का रास्ता इतना कंजस्टेड होता कि कार से पहले कछुए पार कर लेते. कछुए, जो ख़रगोशों से जीत सकते हैं, लेकिन उस रात मुंबई शहर में भेड़िए घुस चुके थे. इन भेड़ियों से निपटने के लिए आर्मी और पुलिस ने शहर से सभी मुख्य रास्तों पर रोडब्लॉक लगा रखे थे. कभी ना रुकने वाली मुंबई, श्मशान की शांति ओड़े हुए थी.

ताज के ठीक पीछे मरीन ड्राइव की हेलोजन लाइट्स की रौशनी तले सिल्वर स्कोडा बढ़ी चली आ रही थी. रोशनी में चमकती कार को देखकर एक पुलिस वाला अपना रेडियो सेट उठाता है. वहां से कुछ दूर चौपाटी जंक्शन में पुलिस रोडब्लॉक पर मेसेज पहुंचता है.

‘स्कोडा… स्कोडा कार, MH 02 JP 1276, कलर- सिल्वर, कार आतंकियों ने हाईजैक कर ली है.’

ये हमें ज़िंदा चाहिए

यूं तो उस दिन पूरी मुंबई ही हाइजैक हो चुकी थी. लेकिन चौपाटी जंक्शन पर मौजूद पुलिस वाले अपने हिस्से की मुंबई बचाने में लगे हुए थे. मुंबई पुलिस के एक सब-इन्स्पेक्टर, जैसे ही कार की हेडलाइट देखते हैं, सीटी बजाकर कार को रुकने का इशारा करते हैं. पुलिस को देखकर कार का ड्राइवर वायपर चलाकर सामने के शीशे पर पानी छोड़ देता है. ताकि पुलिस को कुछ दिखाई ना दे. सब इंस्पेक्टर अनाउन्स करते हैं,

‘लाइट बंद करो और हाथ उठाकर बाहर आ जाओ’

शिवाजी बस टर्मिनस के CCTV में कैद क़साब की तस्वीर (फ़ाइल फोटो)

तभी कार के इंजन में तेज हरकत होती है, और वो फुल स्पीड में आगे बढ़ने लगती है. कार का बैलेन्स बिगड़ता है तो वो आगे जाकर रोड डिवाइडर से टकरा जाती है. दो पुलिस वाले कार की बायीं तरफ जाते हैं. वहां क़साब बैठा हुआ था, अज़मल क़साब. तारीख की ही तरह इस नाम को भी इंट्रोडक्शन की ज़रूरत नहीं है. क़साब अपने साथी इस्माइल से कहता है, हाथ ऊंचे कर लो. लेकिन खुद बंदूक़ निकालकर खिड़की से पुलिस पर गोलियां चलाने लगता है. पुलिस रिटर्न फ़ायर करती है. और एक गोली इस्माइल की गर्दन पर जाकर लग जाती है. वो वहीं पर ढेर हो जाता है.

दूसरी तरफ़ क़साब कार का दरवाज़ा खोलता है. और लड़खड़ाते हुए अपने पीछे से एक असॉल्ट राइफ़ल निकाल लेता है. रायफल की नली एक पुलिस वाला पकड़ लेता है. दोनों में खींचतान होती है. तभी क़साब की उंगली ट्रिगर तक पहुंचती है और वो पुलिस वाले के पेट में गोलियों की बौछार कर देता है. सांस टूट रही थी लेकिन पुलिसवाला बंदूक़ की नली नहीं छोड़ता. अगले ही सेकंड ख़ाकी वर्दियां क़साब पर टूट पड़ती हैं. लात घूसों की बरसात के बीच, एक आवाज़ आती है, ‘रुक जाओ, हमें ये ज़िंदा चाहिए.’

‘लेट मी से इट नाव’

इसके बाद पुलिस क़साब को एमब्युलेंस में डाल देती है. जहां उसी के बग़ल में इस्माइल की लाश पड़ी थी. रोड पर क़साब के स्नीकर पड़े थे. खून से सने जूतों में मिट्टी का निशान तक नहीं था. साफ़ पता चल रहा था कि उन्हें नया-नया ख़रीदा गया है. 26 नवंबर 2008 को शुरू हुए इस खूनी खेल में 166 लोग मारे गए और 600 से अधिक लोग घायल हो गए थे. आज ही दिन यानी 29 नवंबर 2008 को सुरक्षा बलों ने 9 आतंकियों को मार गिराया और अज़मल क़साब को पकड़ लिया गया. उससे पूछताछ हुई तो उसने साज़िश का खुलासा किया. ये भी बताया कि उसे कैसे रिक्रूट किया गया.

सिल्वर स्कोडा जिसे आतंकियों ने हाईजैक कर लिया था (फ़ाइल फोटो)

साल 2020 में मुंबई पुलिस के पूर्व कमिशनर राकेश मारिया एक संस्मरण लिखा. किताब का नाम था, ‘लेट मी से इट नाव’. इसमें उन्होंने 26/11 मुंबई बम धमाकों को लेकर बहुत से खुलासे किए. उनका एक दावा बहुत चर्चा में आया, जिसमें मारिया ने कहा कि लश्कर-ए -तैयबा ने 26/11 हमलों में आतंकियों को हिन्दू दिखाने की साज़िश की थी. किताब में मारिया ने लिखा,

‘अगर सब कुछ आतंकियों के प्लान के मुताबिक़ होता तो क़साब मारा गया होता और उसके हाथ में हिंदूओं की तरह लाल कलावा बंधा होता’

आगे मारिया लिखते हैं,

‘क़साब के पास समीर चौधरी नाम से कुछ ID कार्ड मिले थे. अगर हम उसे ज़िंदा ना पकड़ते तो न्यूज़पेपर की हेडलाइन्स में छपा होता कि कैसे हिंदू आतंकियों ने मुंबई पर हमला किया. और TV के एंकर बंगलुरु में क़साब के परिवार का इंटरव्यू लेने पहुंच जाते. लेकिन ये सब नहीं हो पाया. क़साब को ज़िंदा पकड़ लिया गया. और हमें पता चल पाया कि वो पाकिस्तान के फ़रीदकोट का रहने वाला था’

सारे मुसलमानों को जेल से रिहा कर दो

इस खुलासे ने राजनीति और धर्म की खिचड़ी में एक नया तड़का लगाया और एक नई बहस शुरू हो गई. हालांकि ये कोई पहली बार नहीं हुआ कि ‘हिंदू आतंकी’ वाला एंगल सामने आया हो. छत्रपति शिवाजी बस टर्मिनस के CCTV में कैद हुई क़साब की पहली तस्वीर में उसके हाथ में बंधे लाल तागे साफ़-साफ़ देखे जा सकते थे. इसके अलावा हमले के कुछ महीनों बाद ही मीडिया रिपोर्ट्स में ये बताया गया था कि आतंकी, हिंदू पहचानों के ज़रिए पब्लिक में घुल मिल जाना चाहते थे.

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिशनर राकेश मारिया (फ़ाइल फोटो)

जून 2012 में टाइम ऑफ़ इंडिया ने एक रिपोर्ट छापी थी. जिसमें बताया गया कि लश्कर-ए तैयबा के कमांडर अबु जिंदल ने इस बात की तस्कीद की थी. लश्कर का प्लान था कि हिंदू पहचान से आतंकियों को ट्रैवल करने में आसानी होगी. इन सब रिपोर्ट्स से इतना तो पता चलता था कि आतंकियों को हिंदू पहचान देने की कोशिश की गई थी. लेकिन इसके पीछे आतंकियों का मकसद क्या था, इसको लेकर कुछ पेंच थे.

मारिया अपनी किताब में हमलों के दौरान एक आतंकी और पाकिस्तान में उसके हेंडलर के बीच बातचीत का ब्योरा देते हैं, जिसमें हेंडलर आतंकी को बताता है कि लोगों को हॉस्टेज बना लेने के बाद उन्हें क्या करना है. आतंकियों से कहा गया कि अगर उनसे उनके संगठन के बारे में पूछा जाए तो डेक्कन मुजाहिदीन का नाम लेना है. आगे हेंडलर कहता है कि अगर सरकार पूछे कि उनकी मांगें क्या हैं. तो उन्हें कहना है, सारे मुसलमानों को जेल से रिहा कर दो.

लॉजिक में पेंच

हेंडलर आतंकियों से मुसलमानों को रिहा करने की मांग रखने को कह रहे थे. और ये बात, बाद में उन्हें हिंदू साबित करने की बात से मेल नहीं खाती. कई लोगों ने ऑफ़िसर मारिया की बात से इत्तेफ़ाक ना रखते हुए ये तर्क दिया कि अगर क़साब मारा जाता, तो उसकी बॉडी में मुस्लिम धर्म से जुड़ी पहचान (जैसे ख़तना आदि) तो होते ही. ऐसे में उन्हें हिंदू साबित कर देने का आतंकियों का प्लान बहुत ही बचकाना जान पड़ता है. कई सुरक्षा अधिकारियों का भी इस मामले में अलग मत था. उनका कहना था कि आतंकियों के कलावा पहनने और हिंदू नाम वाले ID कार्ड रखने के पीछे उनकी मंशा थी कि उन्हें पब्लिक में घुलने-मिलने में आसानी हो.

ताज होटल से गेस्ट को निकालते हुए दमकल कर्मचारी (तस्वीर: एएफ़पी)

इस बात के कुछ संकेत मारिया के लिखे में भी मिलते हैं. एक जगह किताब में मारिया इस बात का ज़िक्र करते हैं कि क़साब के लश्कर जॉइन करने के पीछे उसका मक़सद डकैती करना था, जिहाद नहीं. लेकिन वहां उसे पट्टी पढ़ाई गई कि भारत में मुसलमानों की हालत बहुत ख़राब है. और उन्हें नमाज़ तक अदा करने नहीं दी जाती. इस तरह क़साब को हमले के लिए तैयार किया गया. जब क़साब को मेट्रो सिनेमा के पास मस्जिद में ले ज़ाया गया तो उसे बहुत हैरत हुई, ये देखकर कि उसे नमाज़ अदा करने दी जा रही है.

इस बात से इशारा मिलता है, आतंकियों को ज़रूर ये आशंका थी कि मुस्लिम पहचान से उन पर शक किया जाएगा. इसलिए हिंदू पहचान होना ज़रूरी है. प्लान था कि हिंदू पहचान के चलते उन्हें ट्रैवल करने में आसानी होगी और अपने गंतव्य तक आराम से पहुंच जाएंगे. बाकी जो कुछ हो इतना तय है कि इस घटना के पीछे पाकिस्तान के आतंकी संगठन थे. जिन्हें पाकिस्तान की सरकार से मदद मिलती रही है. और आज तक मुंबई आतंकी हमले के पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया है.

वीडियो देखें- अंबेडकर ने क्यों किया आंदोलनोंं और प्रदर्शनों का विरोध?

Read more!

Recommended