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2001 संसद हमला: किन कारणों के चलते नहीं हुआ भारत-पाक युद्ध?

भारत और अमेरिका. एक दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र तो एक सबसे बड़ा. दोनों आतंक की मार झेल चुके हैं. यूं तो 9/11 और 26/11, ये दो तारीख़ें दोनों देशों के ऊपर हुए सबसे बड़े आतंकी हमले की गवाह बनी. लेकिन दिसम्बर 2001 में भारत की संसद पर हुआ आतंकी हमला, और जनवरी 2021 में कैपिटल हिल, यानी अमेरिकी संसद में नागरिकों की घुसपैठ, इन दोनों घटनाओं ने दोनों देशों को इससे भी बड़ा नासूर दिया. चूंकि दोनों देशों की पहचान इनके लोकतंत्र से होती है. इसलिए लोकतंत्र के मंदिर पर हमला, प्रतीकात्मक रूप से और भी ज़्यादा गम्भीर था.

9/11 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमलों के बाद अमेरिका ने वॉर ऑन टेरर का बैनर उठाया और अफ़ग़ानिस्तान पर हमला करने पहुंच गया. जबकि इसके दो महीने बाद भारत की संसद पर हमला हुआ तो भारत ने कोई जवाबी कार्यवाही नहीं की. अमेरिका जो खुद पर हुए हमले के लिए युद्ध की घोषणा कर चुका था. भारत को युद्ध ना करने के लिए चेता रहा था. हालांकि कहिए कि मना रहा था. इसमें अमेरिका का अपना फ़ायदा और अपनी चिंताएं थी. लेकिन भारत ने क्यों कोई जवाबी कार्यवाही नहीं की? ये बड़ा सवाल है. क्या भारत की सरकार कमजोर थी? भारत की सेना कमजोर थी? हरगिज़ नहीं. फिर क्या हुआ. क्यों हुआ. क्या प्लानिंग हुई. और उसका एक्ज़िक्यूशन कैसे हुआ? आइए जानते हैं.

श्रीनगर विधानसभा में आतंकी हमला

शुरुआत अक्टूबर 2001 से. 9/11 अटैक के बाद अमेरिका वॉर ऑन टेरर की तैयारी कर रहा था. राष्ट्रपति बुश दुनिया को धमका रहे थे कि जो हमारे साथ नहीं, वो हमारे ख़िलाफ़ माना जाएगा. इस मुद्दे पर अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ़ डिफ़ेंस, डॉनल्ड रम्सफ़ील्ड ने भारत को भरोसा दिलाया कि कश्मीर में आतंकी घुसपैठ पर भी अमेरिका की नज़र रहेगी. लेकिन नज़र ही रही बस. उन्होंने किया कुछ नहीं. अक्टूबर महीने के पहले ही दिन, पाकिस्तान ने अपनी करतूत दिखा दी.

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भारतीय गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला, 03 अक्टूबर 2001 को श्रीनगर विधान सभा परिसर के दौरे पर (तस्वीर: AFP)

चिनार के पत्तों के पीले होने का मौसम था. वादी में सर्फ़ हवाएं बह रही थी. जब वजाहत हुसैन नाम का एक फ़िदायीन बम से लैस एक टाटा सूमो लेकर श्रीनगर विधान सभा परिसर में घुस गया. कार को बम से उड़ाने के बाद कुछ और आतंकी परिसर में घुसे और गोली चलाना शुरू कर दिया. इस हमले में 38 लोग मारे गए. जैश-ए-मुहम्मद ने इस आतंकी हमले की ज़िम्मेदारी ली. जिसका सरग़ना मौलाना मसूद अज़हर पाकिस्तान में खुल्ला घूम रहा था.

किसी रॉकेट साइंस की ज़रूरत नहीं थी ये समझने के लिए कि ये सब ISI की छत्रछाया में हो रहा था. कश्मीर में तब आतंकियों के दो गुट सक्रिय थे. जैश और हिज़बुल मुजाहिदीन. ताहिर नदीम, जिसे गाजी बाबा के नाम से जाना जाता था, कश्मीर में आतंकी ऑपरेशन के लिए जैश का कमांडर था. वो सीधे मसूद अज़हर को रिपोर्ट करता था. वहीं हिज़बुल का कमांडर अब्दुल मजीद दार था. जिस पर गाजी बाबा को शक था कि वो डबल एजेंट है. जिसके चलते इन दोनों गुटों में तनातनी बढ़ रही थी.

रिश्तों में पड़ रही सिलवटों पर इस्त्री करने को ISI ने ‘मेजर इफ़्तिकार’ को डिस्पैच किया. इफ़्तिकार ने गाजी बाबा से मुलाक़ात की और उसे कश्मीर में अपने ऑपरेशन पर लगाम लगाने को कहा. क्योंकि जैश के हमलों का पैटर्न अलकायदा की तरह था. वो फ़िदायीन हमले कर रहे थे, जिसका निशाना आम नागरिक बन रहे थे.

ISI को डर था कि इससे कश्मीर मुद्दे पर मिलने वाला बाकी दुनिया का सपोर्ट कम हो जाएगा. वो भी तब जब अमेरिका अलकायदा के पीछे पड़ा था. और मुशर्रफ पर लगातार दबाव पड़ रहा था कि वो अलक़ायदा के सफ़ाए के लिए अमेरिका का साथ दें. इफ़्तिकार की चेतावनी के बावजूद गाजी बाबा कश्मीर पर हमले करने की फ़िराक में था. यहां तक कि वो भारत में deep targets पर फ़िदायीन हमले करवाने की योजना बना रहा था. इसी का नतीजा था, पहले श्रीनगर विधानसभा पर हमला. और बाद में भारत की संसद पर हमला. जो कि आज ही के दिन यानी 13 दिसंबर 2001 को अंजाम दिया गया था.

2001 संसद हमला

दिसम्बर की उस सर्द सुबह संसद में महिला आरक्षण बिल पर बहस होनी थी. शुक्रवार का दिन था. संसद भवन के बाहर लॉन में पत्रकार धूप सेक रहे थे. सदन की कार्यवाही शुरू होने के पांच मिनट पर ही स्थगित कर दी गई. जिसके चलते प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी उस दिन सदन में नहीं पहुंचे. इसके बावजूद गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी सहित क़रीब 400 सांसद अभी भी सदन के भीतर थे कि संसद परिसर में गोलियां चलने लगी.

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संसद पर हुए हमले में शामिल पांचो आतंकी मारे गए. तब सुरक्षा के लिए केवल गार्ड्स हुआ करते थे. हमले के बाद संसद की सुरक्षा कड़ी कर दी गई (तस्वीर: Getty)

एक सफ़ेद ऐम्बैसडर कार में बैठकर 5 आतंकी संसद भवन के गेट तक पहुंच गए थे. आतंकवादी हड़बड़ी में थे. क़िस्मत से उनकी गाड़ी उप-राष्ट्रपति कृष्णकांत की गाड़ी से टकरा गई और उन्हें पैदल होना पड़ा. मुहम्मद अफ़ज़ल को ये ज़िम्मेदारी मिली थी कि वो TV पर देखकर आतंकियों को फ़ोन पर आगाह करे कि कब कौन सा नेता पहुंच रहा है. लेकिन क़िस्मत से उस दिन दिल्ली की बिजली ने साथ दिया. और ऐन मौक़े पर चली गई. अफ़ज़ल अपने TV पर सदन की कार्रवाई देख नहीं पाया. जिसके चलते सांसद कब सदन से निकले, आतंकियों को फ़ोन से इसकी ठीक-ठीक सूचना नहीं मिल पाई. सुरक्षा बलों की कार्रवाई और थोड़ी क़िस्मत से आतंकी हमला टल गया. आतंकियों को मार गिराया गया.

3 दिन के अंदर सारी तहक़ीक़ात हुई और पता चल गया कि आतंकी लश्कर-ए-तैय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद के ट्रेन किए थे. और ISI इस आतंक को स्पॉन्सर कर रही थी. अक्टूबर में श्रीनगर में कार बम धमाके के बाद से ही भारत ने अमेरिका को चेतावनी दे दी थी कि अगर वो पाकिस्तान पर प्रेशर नही डालेगा तो भारत जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर होगा. संसद पर हमला हुआ तो ये मजबूरी और बड़ी हो गई.

सर्जिकल स्ट्राइक होने वाली थी!

संसद भवन पर आतंकी हमलों के कुछ घंटे बाद ही नई दिल्ली स्थित आर्मी ऑपरेशन रूम में एक बैठक हुई. तीनों सेनाओं के अध्यक्ष, NSA ब्रजेश मिश्रा और रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस मीटिंग में मौजूद थे. मुद्दा सिर्फ़ एक था. भारत में लोकतंत्र के मंदिर पर हमला हुआ था. और जवाब देना ज़रूरी था. सबसे पहले LOC पार पाकिस्तान के आतंकी शिविरों को निशाना बनाए जाने की बात हुई. तब इसे सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कोई नाम तो नहीं दिया गया. लेकिन आशय वही था. ग्वालियर बेस पे मौजूद मिराज 2000 फ़ाइटर जेट को इसके लिए तैयार करने तक की बात हुई.

लेकिन अंतिम क्षणों में इंटेलिजेन्स की एक रिपोर्ट ने प्लान की मुश्किलें बढ़ा दीं. पाकिस्तान को अंदाज़ा था कि भारत कुछ ना कुछ तो ज़रूर करेगा. इसलिए पाकिस्तानी आर्मी ने POK स्थित आतंकी शिविरों को स्कूलों और अस्पतालों के नज़दीक शिफ़्ट कर दिया. तरकीब काम भी कर गई. भारत अमेरिका नहीं था. आम नागरिकों पर ख़तरे की बात उठी तो सर्जिकल स्ट्राइक का प्लान रद्द कर दिया गया. इसके बाद एक नए प्लान की नींव पड़ी. ऑपरेशन पराक्रम. जिसके तहत भारत की सेना को बॉर्डर पर तैनात होना था. और युद्ध की घोषणा का इंतज़ार करना था.

ऑपरेशन पराक्रम

13 दिसम्बर से ही ऑपरेशन पराक्रम की शुरुआत हो चुकी थी. ऑर्डर मिलते ही ‘होल्डिंग फ़ोर्स’ यानी डिफ़ेन्सिव फ़ॉर्मेशन 76 घंटों में युद्ध के लिए तैयार हो जाती. लेकिन तीन स्ट्राइक कोर (1, 2 और 21 कोर) को मोबिलाइज करने में पूरे तीन हफ़्ते का समय लग गया. ये सब बॉर्डर से दूर थे. और जब तक ऑफेंसिव ऑपरेशन की शुरुआत होती जनवरी आ चुका था. भारत पर इंटरनेशनल प्रेशर पड़ रहा था. अमेरिका की इसमें खास दिलचस्पी थी.

 

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भारतीय सेना वॉर गेम्स के थ्रू युद्ध की तैयारी करते हुए (तस्वीर: AFP)

कारण कि अमेरिका तब अफ़ग़ानिस्तान में एंटर हो चुका था. और अल कायदा के सफ़ाए के लिए उसे पाकिस्तान की मदद की दरकार थी. अलक़ायदा के कमांडर तोरा बोरा की पहाड़ियों से पाकिस्तान के क़बीलाई इलाक़ों में शरण लेने के लिए भाग रहे थे. ऐसे में मुशर्रफ ने अफ़ग़ान बॉर्डर पर 11th और 12th पाकिस्तान आर्मी कोर डिप्लॉय कर रखी थी. ताकि अल कायदा के कमांडर पाकिस्तान में शरण ना ले सकें. बाद में क्या हुआ, कैसे ओसामा को पाकिस्तान ने शरण दी. सबको पता है. लेकिन तब, कम से कम दिखावे के लिए ही सही. यही खेल चल रहा था.

ऑपरेशन पराक्रम के तहत भारत की सेना बॉर्डर की तरफ़ बड़ी तो पाकिस्तान ने भी बॉर्डर का रुख़ किया. अफ़ग़ान सीमा से 11th और 12th आर्मी कोर ने LOC की तरफ़ मूव किया. अमेरिका के लिए ये मुसीबत का सबब था. अगर इस दौरान भारत और पाकिस्तान का युद्ध शुरू हो जाता तो अफ़ग़ानिस्तान में उसके लिए और मुश्किल खड़ी हो जाती. बुश ने अपने दो सिपह सलाहकार, सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट, कॉलिन पॉवल और डेप्युटी सेक्रेटरी रिचर्ड आर्मिटेज को भारत भेजा. ताकि किसी तरह भारत पाक युद्ध को टाला जा सके.

NATO की सेनाएं भी अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद थी. इसलिए आने वाले महीनों में ब्रिटेन के PM टोनी ब्लेयर से लेकर जर्मनी और जापान के राष्ट्राध्यक्षों ने भारत का दौरा किया. डेप्युटी सेक्रेटरी रिचर्ड आर्मिटेज ने पाकिस्तान का दौरा कर मुशर्रफ से ये वादा लिया कि वो क्रॉस बॉर्डर टेररिज़म को रोकेंगे. और भारत में आकर मुशर्रफ के बयान की दुहाई देते हुए भारत को किसी तरह रोके रखा.

न्यूक्लियर हथियारों का मसला

एक दूसरा मसला था न्यूक्लियर हथियारों का. ये 1971 जैसे हालात नहीं थे. 3 साल पहले ही 1998 में दोनों देशों ने न्यूक्लियर परीक्षण किया था. इसलिए पूरी दुनिया की निगाह भारत पर थी. और विक्टिम होने के बावजूद भारत पर प्रेशर था कि वो युद्ध की शुरुआत ना करे.

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तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तीनों राष्ट्राध्यक्षों से मुलाक़ात करते हुए (तस्वीर: AFP)

इन सब कारणों के चलते भारत सरकार की मंशा युद्ध से कोअर्सिव डिप्लोमेसी में बदलती चली गई. आर्मी युद्ध के लिए तैयार थी. लेकिन वैश्विक प्रेशर और न्यूक्लियर ख़तरे को देखते हुए, नई असलियत आकर ले चुकी थी. सरकार अब चाहती थी कि अमेरिका के प्रेशर से पाकिस्तान पर दबाव बनाया जाए. क्योंकि युद्ध शुरू हो जाने की स्थिति में चीजें कंट्रोल से बाहर हो जाती.

12 जनवरी 2002 को मुशर्रफ TV पर पेश हुए और उन्होंने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान अपनी धरती से आतंकी गतिविधि नहीं होने देगा. इस घोषणा के बाद युद्ध टल गया. अगले आठ महीनों तक सेना बॉर्डर पर तैनात रही. लेकिन शुरुआती इनिशिएटिव ना लेने के कारण हालात बदलते गए. और अक्टूबर 2002 में कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनावों के बाद सेना को बॉर्डर से हटा लिया गया.

RAW ने दिया ISI को झांसा

चलते चलते आपको एक और किस्सा सुनाते चलते हैं. जब श्रीनगर विधानसभा पर आतंकी हमले के बाद RAW ने पाकिस्तान को झांसे में डाला. हुआ ये कि हमले के बाद भारत ने अमेरिका से पाकिस्तान पर दबाव डालने को कहा. मसला सुलझाने के लिए US सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट कॉलिन पॉवल ने तब पाकिस्तान और भारत का दौरा किया.

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कॉलिन पॉवल 2001 में पाकिस्तान के दौरे पर (तस्वीर: AFP)

पाकिस्तानी दौरे से ठीक पहले CIA ने इस्लामाबाद को एक अलर्ट जारी किया. जिसके अनुसार पाकिस्तान में कॉलिन पॉवल की हत्या की कोशिश होने वाली थी. ISI ने इन्वेस्टिगेशन का वादा किया, लेकिन CIA ने दू टूक शब्दों में कहा कि वो इस साज़िश के मास्टरमाइंड इलयास कश्मीरी को गिरफ़्तार कर लें. इलयास कश्मीरी 313 बटालियन, अल कायद से जुड़े एक गुट का सरग़ना था. मसूद अज़हर से तनातनी के चलते उसने जैश-ए-मुहम्मद का साथ छोड़ दिया था. और अपना एक अलग गुट बना लिया था. तब वो ISI का एक ताकतवर मोहरा हुआ करता था.

CIA के प्रेशर के चलते इलयास कश्मीरी को गिरफ़्तार कर लिया गया. अगली सुबह जब कॉलिन पॉवल इस्लामाबाद लैंड किए, तो पाकिस्तानी सेना के जनरल को बॉर्डर पर शेलिंग की खबर मिली. ISI को लगा ये अच्छा मौक़ा है अमेरिका को सबूत देने का, कि भारत बिना उकसाए उन पर हमला कर रहा है. लेकिन उन्हें बड़ा शॉक लगा जब पता चला कि पॉवल को इलयास कश्मीरी की टिप भारत से ही मिली थी.जहां पॉवल पहले दौरा करने पहुंचे थे. इस घटना के बाद इलयास ISI का दुश्मन हो गया. और 2003 में उसने मुशर्रफ की हत्या का प्रयास भी किया.


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