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क्रांतिकारी दिनदहाड़े बंदूक़ें लूट ले गए और अंग्रेजों को तीन दिन तक खबर ना लगी

आज 26 अगस्त है और आज की तारीख़ का संबंध है एक डकैती से.

1908 में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार चाकी ने एक अंग्रेज जज किंग्सफोर्ड को बम से हमला कर मारने की कोशिश की थी. लेकिन जिस बग्गी पर हमला किया गया था, उसमें किंग्सफोर्ड था ही नहीं. इस हमले में दो अंग्रेज महिलाओं की मृत्यु हो गई. जिसके बाद दोनों वहां से भाग निकले थे.

यहां पढ़ें –  18 साल की उम्र में खुदीराम बोस फांसी का फंदा देख मुस्कुरा उठा था.

खुदीराम पुलिस से बचते हुए पूसा के नज़दीक एक स्टेशन पर पहुंचे. जहां पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया. इसके कुछ ही महीनों बाद उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया. एक दूसरे स्टेशन पर प्रफुल्ल ट्रेन में बैठ चुके थे और आराम से पुलिस से बचकर निकल सकते थे. लेकिन एक भारतीय, नंदलाल बैनर्जी ने उन्हें धोखा देकर पुलिस के हाथों पकड़वा दिया. प्रफुल्ल ने पुलिस की गिरफ़्त से भागकर खुद को गोली मार ली थी. जिसके बाद शिनाख्त के लिए उनका सिर काटकर कलकत्ता भेजा गया था.

खुदीराम की फांसी को लेकर जनता में रोष था, लेकिन फांसी की सजा में एक डिग्निटी थी. जो प्रफुल्ल को मौत के वक्त नहीं मिली. ऊपर से सिर काटे जाने की बात का पता चला तो क्रांतिकारियों के ग़ुस्से का कोई ठिकाना ना रहा. इस हैवानियत का बदला लिया जाना ज़रूरी था. और प्रफुल्ल की मौत का सबसे बड़ा क़सूरवार था नंदलाल बैनर्जी.

ग्रेटेस्ट डे लाइट रॉबरी

उन दिनों क्रांतिकारी शिरीष चंद्र पाल कोलकाता में नाम बदल कर ठहरे हुए थे. नंदलाल बैनर्जी को मारने की ज़िम्मेदारी उन्हें दी गई. पाल और उनके एक साथी ने मिलकर 9 नवम्बर 1908 को नंदलाल बैनर्जी की हत्या कर दी. और इसी के साथ प्रफुल्ल कुमार चाकी के अपमान का बदला ले लिया गया.  इन्हीं शिरीष चंद्र पाल ने नेतृत्व में आज ही के दिन यानी 26 अगस्त को कलकत्ता में एक लूट को अंजाम दिया था. 30 अगस्त को ‘द स्टेट्समैन’ ने इस लूट की खबर को छापते हुए हेडलाइन दी-

‘ग्रेटेस्ट डे लाइट रॉबरी’ यानी ‘दिनदहाड़े अंजाम दी गई सबसे बड़ी लूट’. 

1908 में प्रफुल्ल और खुदीराम की शहादत ने आज़ादी की क्रांति को एक नई ऊर्जा से भर दिया था. लेकिन ये सिर्फ़ एक छोटी सी चिंगारी थी. जिसे आग में बदला जाना बाक़ी था. इस काम के लिए ज़रूरत थी हथियारों की. लोगों से लूट कर भी चंद ही बंदूक़ें हासिल हो पाती थीं. पैसों का इंतज़ाम किया जा सकता था. लेकिन बड़ी मात्रा में हथियार ख़रीदने का कोई सोर्स नहीं था. एक और ख़तरा ये था कि इससे अंग्रेजों को क्रांतिकारी गतिविधियों का पता लग सकता था.

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रोडा एंड कंपनी का कैटलॉग, 1929-30 (तस्वीर: Cornell Publications)

उन दिनों कलकत्ता में एक कम्पनी हुआ करती थी. नाम था ‘मेसर्स रोडा एंड कम्पनी’. ये कम्पनी अंग्रेजों के लिए जर्मनी से पिस्तौल आदि का इंपोर्ट किया करती थी. आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए बंगाल में क्रांतिकारियों ने एक संस्था बनाई थी. इसके संस्थापक थे ‘बिपिन बिहारी गांगुली’. बिपिन गांगुली के एक दोस्त कालीदास मुखर्जी रोडा कम्पनी में काम किया करते थे. उन्होंने मुखर्जी से कहा कि वे संस्था के किसी सदस्य को कम्पनी में नौकरी दिला दें.

मुखर्जी तैयार हो गए. उन्होंने श्रीश मित्रा को कम्पनी में नौकरी दिला दी. पहले-पहल तो मित्रा ने रोडा एंड कंपनी में क्लर्क का काम किया. बाद में उनके काम से प्रभावित होकर उन्हें कस्टम ऑफ़िस से सामान लाने की ड्यूटी पर लगा दिया गया. इस पोजिशन के मिलने से ये फ़ायदा हुआ कि उन्हें हथियारों के ऑर्डर की पूरी जानकारी रहती थी. मसलन किस टाइप की पिस्टल आने वाली हैं, कितनी और कब.

बंदूकों को लूटने का प्लान 

जून 1914 के आसपास मित्रा को पता चला कि जर्मनी से माउज़र और गोलियों की एक बड़ी खेप आने वाली है. उन्होंने बिपिन गांगुली को ख़त लिखकर इस बारे में बताया. अगले ही दिन शिरीष चंद्र पाल और बिपिन गांगुली ने क्रांतिकारियों की एक मीटिंग बुलाई. तय हुआ कि अगर किसी तरह इस खेप को लूट लिया जाए, तो हथियारों की कमी की समस्या का हल हो सकता है.

अब सवाल था कि हथियारों को लूटा कैसे जाए. मित्रा पहले ही कम्पनी में काम कर रहे थे. कस्टम से हथियार लाकर गोदाम में पहुंचाना उनका ही काम था. इसलिए इस काम में लॉजिस्टिक्स की ज़िम्मेदारी उन्हें दी गई.

हथियारों को कस्टम हाउस से गोदाम तक बैलगाड़ी से पहुंचाया जाता था. प्लान बनाया गया कि हथियार ले जाने वाले जत्थे में एक बैलगाड़ी और जोड़ी जाएगी जिसमें संस्था के सदस्य मौजूद होंगे. बैलगाड़ी चलाने के लिए हरिदास दत्ता को तैयार किया गया. इसके अलावा तय हुआ कि कुछ लोग डलहौज़ी स्क्वायर पर रुकेंगे और अगर पुलिस के आने का अंदेशा हुआ तो गाना गाकर सिग्नल देंगे.

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कोलकाता कस्टम्स हाउस, 1914 (तस्वीर: Wikimedia)

26 अगस्त की सुबह सभी लोगों ने एक बार फिर मीटिंग की और अपने-अपने काम पर निकल गए. मित्रा रोज़ की तरह सुबह-सुबह ऑफ़िस पहुंचे और वहां से 6 बैलगाड़ियां लेकर कस्टम हाउस की तरफ़ चले. 12 बजे के आसपास डलहौज़ी स्क्वायर पर उन्हें हरिदास दत्ता मिले. दत्ता बैलगाड़ी में एक देहाती मज़दूर का भेष धरकर पहुंचे थे. अपना रोल निभाते हुए मित्रा ने दत्ता को देर से आने के लिए लताड़ा. इसके बाद वो कस्टम हाउस की तरफ़ चल पड़े. बैलगाड़ियों की संख्या अब 7 हो चुकी थी.

जर्मनी से बन्दूकों और गोलियों के कुल 202 बक्से डिलीवर हुए थे. मित्रा ने 192 बक्से पहली 6 बैलगाड़ियों में डलवाए. और बाक़ी के 10 बक्सों को हरिदास दत्ता की बैलगाड़ी में रखवा दिया. इसके बाद सातों बैलगाड़ियां वापस कंपनी गोदाम की तरफ़ चल पड़ीं. लेकिन पहुंची सिर्फ़ 6.

हुआ यूं कि एक बैलगाड़ी जिसे दत्ता चल रहे थे, उसने डलहौज़ी स्क्वायर से अपना रास्ता बदल लिया. और कलकत्ता की संकरी गलियों से होते हुए कांति मुखर्जी के स्टॉक यार्ड पहुंच गई. अगले दिन एक कार का इंतज़ाम करवाया गया ताकि बक्सों को एक अन्य साथी, भुजंग भूषण धर के घर पहुंचाया ज़ा सके. वहां से हथियारों को पूरे बंगाल और बाक़ी जगहों पर बांटा जाना था.

प्लान में ये भी शामिल था कि वो लोग हथियारों को पहुंचाकर जल्द से जल्द बंगाल से बाहर निकल जाएंगे. लेकिन कार वाले ने आने में देर कर दी. इसलिए बक्सों को ले जाने के लिए दो बग्गियों का इंतज़ाम किया गया. यहीं पर इन लोगों से एक बड़ी गलती हो गई. जिससे बाद में पुलिस को कुछ महत्वपूर्ण सुराग हाथ लगे.  वो कैसे? ये आगे जानेंगे.

हथियारों को पहुंचाने के बाद शिरीष चंद्र पाल और हरिदास दत्ता स्टेशन गए. शाम को उन्होंने दार्जिलिंग मेल पकड़ी और कलकत्ता से बाहर चले गए.

पुलिसिया तहक़ीक़ात 

दिनदहाड़े इतनी बड़ी डकैती हो चुकी थी और पुलिस को इसकी कोई खबर नहीं थी. 29 अगस्त को जब रोडा कम्पनी में इन्वेंटरी मिलाई गई तो 10 बक्से कम निकले. श्रीश मित्रा को ढूंढा गया तो पता चला कि वो भी 3 दिन से नौकरी पर नहीं आए थे.

तुरंत पुलिस को खबर की गई. तहक़ीक़ात करते हुए पुलिस कांति मुखर्जी के स्टॉक यार्ड पहुंची. यहां पुलिस ने आसपास के बग्गी वालों से पूछताछ की. एक बग्गी वाले ने बताया कि तीन दिन पहले उसे कुछ बक्से पहुंचाने के लिए कहा गया था.

यहां क्रांतिकारियों को वो गलती भारी पड़ गई जिसका ज़िक्र हमने पहले किया था. दरअसल बक्सों को पहुंचाने के लिए बग्गी वाले को आठ आने दिए गए थे. जबकि मेहनताना इससे कहीं कम हुआ करता था. पुलिस को जब ये पता चला तो उसे समझ आ गया कि दाल में ज़रूर कुछ काला है.

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ऐसी 50 बंदूक़ें रोडा एंड कंपनी से लूटी गई थीं (तस्वीर: Icollector.com)

बग्गीवाले से पूछताछ के दौरान पुलिस को भुजंग भूषण धर का पता चला. लेकिन जब तक पुलिस भूषण के घर पहुंचती. वहां सिर्फ़ बक्सों की कीलें बची हुई थी. बन्दूकों और गोलियों को डिस्ट्रिब्यूट करने के बाद बक्से की लकड़ियों को भी जला दिया गया था.

पुलिस ने भूषण को गिरफ़्तार कर लिया. उन्हें सात साल तक जेल में रखा गया. जेल की कोठरी में घुटनों तक पानी भरा हुआ होता था. घटना के कुछ महीनों बाद हरिदास दत्ता भी पकड़ लिए गए. लूटे गए कुछ हथियार पुलिस ने बरामद कर लिए. लेकिन अधिकतर क्रांतिकारियों तक पहुंच चुके थे. जो आने वाले सालों में क्रांति की कई घटनाओं को अंजाम देने के काम आए.

एपिलॉग 

भारत में जब भी क्रांतिकारियों द्वारा अंजाम दी गई लूटों की बात होती है तो 1925 में हुई काकोरी ट्रेन लूट और 1930 चिट्टागोंग आर्मरी रेड का ज़िक्र होता है. लेकिन 1914 में रोडा कम्पनी लूट का नाम कम ही लिया जाता है. इस घटना का महत्व ऐसे समझिए कि 1917 में जब रॉलेट कमेटी का गठन किया गया, तो उसकी रिपोर्ट को पेश करते हुए रॉलेट ने कहा,

‘अगस्त 1914 के बाद बंगाल में क्रांतिकारी आक्रोश की जितनी भी घटनाएं हुई, उनमें से शायद ही कोई हो जिसमें रोडा कम्पनी से चुराई गई माउज़र का उपयोग न हुआ हो.’

रॉलेट कमेटी का मुख्य उद्देश्य बंगाल और पंजाब में बढ़ रही क्रांतिकारी गतिविधियों का मूल्यांकन करना था. उसकी रिपोर्ट के अनुसार कुल 54 क्रांतिकारी अभियानों में इन बन्दूकों का उपयोग किया गया था. 1925 में काकोरी ट्रेन लूट के दौरान भी इन बन्दूकों का उपयोग किया गया.

यहां पढ़ें- काकोरी कांड से पहले बिस्मिल दस रुपये का नोट क्यों छाप रहे थे? 


वीडियो देखें- जब भारत में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ आक्रोश बढ़ रहा था, तब ब्रिटिश संसद में क्या ऐलान हुआ? 

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