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कौन हैं ये लोग, जो पूरी तरह कोरोना प्रूफ हैं!

कोरोना से जहां पूरी दुनिया बेहाल है, वहीं देश का छोटा-सा कोना ऐसा है, जो अभी इस महामारी से बचा हुआ है. आखिर कैसे, आइए जानते हैं उस आदिवासी बहुल इलाके के बारे में, जिसने कोरोना बीमारी को पास फटकने नहीं दिया.

10 जिलों में एक भी नहीं हुआ कोरोना पॉजिटिव

झारखंड के 10 जिलों में आदिवासी ताना भगत समाज के लोग रहते हैं. इन्होंने खुद को कोरोना के खतरे से बचाने के लिए नायाब मॉडल तलाश लिया है. जिन जिलों में ये रहते हैं, उनमें से मुख्य हैं- खूंटी, गुमला, सिमडेगा, सरायकेला, खरसावां, लातेहार, दुमका, जामताड़ा और पाकुड़. आदिवासी बहुल इन 10 जिलों में प्रदेश के कुल कोरोना संक्रमण के 16 फीसदी केस सामने आए हैं.

‘इंडिया टुडे’ के सत्यजीत कुमार के अनुसार, इन जिलों में आदिवासी समाज ताना भगत का एक भी शख्स ऐसा नहीं है, जो कोरोना से संक्रमित हुआ हो. झारखंड में अब तक 75 हजार से ज्यादा कोरोना संक्रमण के केस सामने आ चुके हैं और 650 लोगों की मौत हो चुकी है.

आला दर्जे की साफ-सफाई बना है कोरोना से मुक्ति का कारण

ताना भगत समाज में 3481 परिवार हैं, जिनकी कुल आबादी 21,783 है. अभी तक इनमें से कोई भी कोरोना वायरस से पॉजिटिव नहीं पाया गया है. इसका सबसे बड़ा कारण इस समाज में साफ-सफाई को लेकर मौजूद भरपूर जागरूकता है. जानकारों का कहना है कि इसकी वजह से इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बहुत अच्छी है.

ओरांव समाज की तरह ताना भगत आदिवासी भी गांधीजी के दर्शन से बहुत प्रभावित रहते हैं. ये सादा तरीके से जीवन जीने की फिलॉसफी पर चलते हुए हर गुरुवार भारत के तिरंगे झंडे की पूजा करते हैं.

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ताना भगत समाज के लोग तिरंगे की पूजा करते हैं और आजादी की लड़ाई में शहीद अपने पूर्वजों को हमेशा याद करते हैं. (फोटो- सत्यजीत कुमार)

साफ-सुथरा साधारण पहनावा और शाकाहार बना ढाल

इस समाज में ज्यादातर लोग बिना सिले हुए कपड़े ही पहनते हैं और इन्हें रोज धोते हैं. ये लोग पूरी तरह से शाकाहारी हैं. शराब का सेवन भी नहीं करते. इसके अलावा ये लोग सिर्फ घर का बना खाना ही खाते हैं. ये लोग जब काम पर जाते हैं, तब भी घर का बना खाना ही साथ ले जाते हैं. रांची से सिर्फ 40 किलोमीटर दूर बसे बरीधी गांव में लंबे वक्त से ताना भगत समाज के लोग रहते हैं. 80 बरस की उम्र के बाद भी साफ-सुथरी सफेद पोशाक में गंगा ताना भगत ने ‘इंडिया टुडे’ को बताया कि उनके यहां एक परंपरा है, जिसके तहत गुरुवार की पूजा से पहले तिरंगे झंडे के आसपास की जगह को अच्छी तरह से साफ किया जाता है और गाय के गोबर से लीपा जाता है.

इस समाज में न तो एयर कंडिशनर का चलन है, न ही फ्रिज का. ताना भगत आमतौर पर दूसरे समाजों से दूरी बना कर रखते हैं. यह भी उनके संक्रमण से बचे रहने का सबसे बड़ा कारण है. इनका खान-पान और रहन-सहन का तरीका उन्हें इस बीमारी से बचाने में और भी मददगार साबित होता है.

महात्मा गांधी से प्रभावित है पूरा ताना भगत समाज

ताना भगत समाज के मांगरा और सोमरा अपने पूर्वज जातरा की मूर्ति के नीचे खड़े होकर बताते हैं कि उनके यहां महात्मा गांधी को कितना महत्व दिया जाता है. वह याद करते हुए बताते हैं कि कैसे अंग्रेजों से आजादी के लिए ताना भगत समाज उठ खड़ा हुआ था और कुर्बानियां दी थीं. ताना भगत समाज के शहीदों के नाम पूरे गांव में जगह-जगह उकेरे गए हैं. ये समाज को शांति का संदेश देते हैं.

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आजादी की लड़ाई में लड़ने वाले अपने पुरखों को अब भी याद करते हैं ताना भगत समाज के लोग. (फोटो- सत्यजीत कुमार)

सरकार भी तारीफें करती नहीं थकती

आम जनता ही नहीं, झारखंड सरकार भी ताना भगत समाज के क्रिया-कलापों की दाद देती नहीं थकती. झारखंड के हेल्थ मिनिस्टर बाना गुप्ता, जो खुद कोरोना संक्रमित हो गए थे, ताना भगत समाज की उपलब्धियों पर खुशी जताते हैं. वह और कैबिनेट के दूसरे मंत्री लगातार अदिवासी समाज के रहन-सहन को कोरोना से बचने का बेहतरीन तरीका बताते रहते हैं.

कोरोना काल ने इस बात को साबित किया है कि आदिवासी समाज द्वारा अपनाया जा रहा रहन-सहन, कोरोना से बचने का एक बेहतरीन तरीका हो सकता है.


वीडियो – चीन की इस डॉक्टर ने कोरोना वायरस पर WHO की भूमिका को संदिग्ध बताया है

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