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एक आंख और एक पैर वाले आदमी ने जो बात कही, वो तालिबान का सच सामने ला देगी

वो सितंबर का महीना था. साल 1963. महान अमेरिकी संगीतकार ड्यूक एलिंगटन को बुलावा आया. यूएस स्टेट डिपार्टमेंट ने उनके बैंड से एक दरख़्वास्त की थी. उनसे काबुल में परफ़ॉर्मेंस देने के लिए कहा गया था. कोल्ड वॉर के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ, दोनों अफ़ग़ानिस्तान पर दांव लगा रहे थे. बढ़त हासिल करने का एक तरीका संगीत भी था.

एलिंगटन ने निवेदन स्वीकार कर लिया. वो अपने बैंड के साथ काबुल आए. उन्होंने कॉन्सर्ट में हिस्सा लिया. किंग ज़हीर शाह समेत पांच हज़ार से अधिक लोग उन्हें देखने के लिए इकट्ठा हुए थे. उनमें से बहुतों ने जैज़ म्युज़िक का नाम भी नहीं सुना था. वे इस विधा से अनजान ज़रूर थे, लेकिन संगीत का मर्म समझते थे. एक मौके को छोड़कर भीड़ पूरे समय तक जमी रही. एक मौका वो था जब लोग नमाज पढ़ने के लिए बाहर निकले थे. उसके बाद तो पूरे कॉन्सर्ट के दौरान झूमते रहे.

जिस जगह पर एलिंगटन का आयोजन हुआ था, वो काबुल का ग़ाज़ी स्टेडियम था. इसे 1923 में किंग अमानुल्लाह ख़ान ने बनवाया था. यहां खेलों के अलावा और भी कई तरह के आयोजन होते रहते थे. दशकों तक ये स्टेडियम अफ़ग़ानिस्तान में इंसानों की आज़ादी का प्रतीक बना रहा.

Duke Ellington
महान अमेरिकी संगीतकार ड्यूक एलिंगटन

एलिंगटन की तस्वीर बदली

फिर एक दिन अचानक सब बदल गया. भीड़ अपनी जगह पर कायम रही. आयोजन भी कायम था. बस उसका स्वरूप बदल गया था. ऊनदार लबादा ओढ़े और नुकीली बंदूक ताने कुछ सिरफिरे पिकअप ट्रकों में भरकर अंदर घुसे. वैसी ही सूरत और सीरत वाले कुछ लोग भीड़ को कंट्रोल कर रहे थे. बेकाबू होने को बेताब भीड़ का चेहरा ख़ूंखार हो चुका था. तभी एक ट्रक मैदान के बीच में रूका. उसमें से एक महिला को नीचे उतारा गया. महिला अपने साथ अपने जुड़वां बच्चों को लेकर आई थी. वो बार-बार अपने बच्चों की कसम खाकर रहम की गुहार लगा रही थी.

लेकिन ना ऐसा होना था और ना हुआ. उसे मैदान पर घुटने के बल बैठने के लिए कहा गया. उस महिला पर अपने पति की हत्या का आरोप था. उसका कहना था कि उसने अपनी बेटियों को बचाने के लिए पति की हत्या की थी. एक दिन की सुनवाई में सज़ा तय हो गई. सरेआम सज़ा देने के लिए उसे ग़ाज़ी स्टेडियम लाया गया था. जो लोग पूरे ड्रामे को कंट्रोल कर रहे थे, उनमें से एक ने मृत व्यक्ति की फ़ैमिली को बंदूक थमाई. पलक झपकते ही ट्रिगर दबा और महिला बेज़ान पेड़ की तरह ढह गई. उसके बाद लाश को उठाकर एक ट्रक में रखा गया और ट्रक पूरी रफ़्तार से स्टेडियम से बाहर निकल गया. उस दिन का खेल खत्म हो चुका था.

ये सब कैसे बदल गया?

ड्यूक एलिंगटन के कॉन्सर्ट और अमानवीय सज़ा, दोनों घटनाएं एक ही जगह पर घटीं थी. इस बीच में क्या बदल गया था? काल-चक्र और शासन. 1990 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का शासन चल रहा था. ये घटना उसी तालिबानी शासन की एक बानगी थी. पांच बरस के शासन में तालिबान ने ऐसी हज़ारों घटनाओं को अंज़ाम दिया था.

Ghazi Stadium
गाज़ी स्टेडियम.

सितंबर 2001 में अमेरिका पर हमला हुआ. अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया. तालिबान की सत्ता खत्म हो गई. उस घटना को बीस साल बीत चुके हैं. अब क्या स्थिति है? अमेरिका हार कर बाहर निकल चुका है. काबुल की गद्दी पर तालिबान का क़ब्ज़ा है. इसे ‘तालिबान 2.0’ का नाम दिया जा रहा है. जब से तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा किया है, तब से एक फ़्रेज ख़ूब चर्चा में है. बदला हुआ तालिबान. दावा ये कि जो गुनाह पुराने शासन में हुए, उन्हें दोहराया नहीं जाएगा. लोगों को बुनियादी अधिकार दिए जाएंगे. महिलाओं को काम करने से नहीं रोका जाएगा. मीडिया को आज़ादी रहेगी आदि-आदि.

सच क्या है? पिछले एक महीने में जो कुछ घटा है, उससे ये सारे दावे खोखले साबित होते हैं. ताज़ा मसला तालिबान के एक बड़े अधिकारी के इंटरव्यू से जुड़ा है. इस इंटरव्यू के बाद बदले तालिबान के दावों को एक और झटका लगा है. इससे ये भी साफ़ हो चुका है कि बर्बरता तालिबान का स्वभाव है और वो इसे कतई नहीं छोड़ने वाला.

इस इंटरव्यू में और क्या-क्या कहा गया है? तालिबान के पिछले शासन में किस तरह की हैवानियत होती थी? और, तालिबान ने पत्रकारों के लिए क्या नियम बनाए हैं? सब विस्तार से बताएंगे.

बात मुल्ला तुराबी की

ये कहानी तब की है, जब दुनिया 21वीं सदी में कदम रखने के लिए बेकरार थी. विकास की गाड़ी विज्ञान के पहियों पर सवार थी. नया वक़्त, नई सोच, नए सपने, हर कोई नए कल की परिभाषा गढ़ने में जुटा था. सॉरी, हर कोई नहीं… कुछ ऐसे भी लोग थे, बदलाव से खार खाते थे. उन्हें आदम ज़माने में रहना अच्छा लगता था. इनमें से एक तालिबान भी था. तालिबान उस समय अफ़ग़ानिस्तान का सर्वेसर्वा था.

उसी ज़माने की बात है. काबुल में एक इमारत के बाहर एक आंख और एक पैर वाला आदमी बैठा रहता था. उसकी ये हालत सोवियत-अफ़ग़ान वॉर के दौरान हुई थी. वो रोज़ाना इमारत के सामने से गुज़रने वाले लोगों को गौर से देखता रहता था. उनकी वेश-भूषा ठीक है या नहीं, दाढ़ी ज़रूरत से ज़्यादा तो नहीं कटी है, कोई गाने-वाने तो नहीं सुन रहा है, महिला ने ख़ुद को पूरा ढका है या नहीं, वो बैठकर यही सब चेक किया करता था. जो कोई उसके मानदंड पर खरा नहीं उतरता, उसे सरेआम चाबुक से पीटा जाता था.

पता है, वो आदमी कौन था? वो तालिबान की सरकार में न्यायमंत्री के पद पर था. वो तालिबान की धार्मिक पुलिस का मुखिया भी था. उसका नाम था, मुल्ला नुरूद्दीन तुराबी. तुराबी तालिबान के संस्थापक सदस्यों में से एक था. हमने ऐपिसोड की शुरुआत में ग़ाज़ी स्टेडियम में एक महिला को सरेआम मौत की सज़ा देने की कहानी सुनाई थी. ये काम तुराबी के ही जिम्मे था. वो तय करता था कि किस मामले में क्या सज़ा होगी? इस्लामिक कानून के हिसाब से क्या करना ग़लत है और क्या सही? किस चीज़ को गुनाह माना जाए और किसे नहीं आदि.

तुराबी का अलोकतांत्रिक समाज

तुराबी के काल में जिस तरह की सज़ा प्रचलन में थी, किसी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में उसकी इजाज़त कभी नहीं दी जा सकती. मसलन, हत्या के बदले हत्या. पीड़ित परिवार को दो विकल्प दिए जाते थे. या तो हत्यारे से ज़ुर्माना लेकर उसकी जान बख़्श दे दे या फिर उसे गोली मार दे. अधिकतर मामलों में पीड़ित परिवार जान के बदले जान का विकल्प चुनते थे. उन्हें स्टेडियम या किसी ईदगाह में हज़ारों की भीड़ के सामने कथित तौर पर न्याय करने का मौका मिलता था.

और क्या होता था? चोरी के लिए हाथ काटने की सज़ा थी. सड़क पर छिनैती के लिए एक हाथ और एक पैर काट दिया जाता था. कथित तौर पर अनैतिक संबंध बनाने के लिए पत्थर से मारने का कानून था. अगर कोई महिला नेल पॉलिश लगा ले तो उसकी कलाई काट दी जाती थी. विदेशी महिला से बात करने वालों को जेल में डाला जा सकता था. एक बार एक तालिबान कमांडर ने महिला पत्रकार को इंटरव्यू दिया था. इस बात से तुराबी इतना नाराज़ हुआ कि उसने कमांडर को सबके सामने थप्पड़ रसीद दिया था. इसके अलावा, छोटी-छोटी ग़लतियों के लिए कोड़े मारने की सज़ा तो थी ही.

Taliban (3)
तालिबान के बदलने के तमाम दावे झूठे दिख रहे हैं.

काबुल स्टेडियम का वीडियो

इनमें से अधिकतर घटनाएं कभी बाहर नहीं आतीं थी. 1999 में काबुल स्टेडियम का एक वीडियो लीक हो गया. पूरी दुनिया ने तालिबानी शासन की निंदा की. तब जाकर लोगों को पता चला कि तालिबान आख़िर है क्या चीज़. तमाम आलोचनाओं के बावजूद तालिबान ने पूरे शासन के दौरान बर्बरता कायम रखी. नवंबर 2001 में कुर्सी से उतारे जाने के बाद तालिबानी नेता इधर-उधर भागने लगे. इनमें तुराबी भी थी. एक समय वो मोस्ट वॉन्टेड तालिबानी नेताओं की लिस्ट में शामिल हुआ. बाद में वो पाकिस्तान में गिरफ़्तार हुआ. 2012 में उसे जेल से रिहा कर दिया गया. तालिबान 2.0 की अंतरिम सरकार में तुराबी को जेल मामलों का मंत्रालय सौंपा गया है.

आज तुराबी की चर्चा की वजह क्या है? दरअसल, उसने न्यूज़ एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (एपी) को एक इंटरव्यू दिया है. इस इंटरव्यू में उसने कहा कि जो सज़ा पिछले शासन में दी जाती थी, वो इस बार भी कायम रहेगी. तुराबी ने कहा –

‘सबने स्टेडियम में दी जाने वाली सज़ा के लिए हमारी आलोचना की, लेकिन हमने कभी उनकी व्यवस्था, उनके कानून पर कुछ नहीं कहा. हमें कोई ये ज्ञान न दे कि हमारे यहां का कानून कैसा होगा. हम इस्लाम का पालन करेंगे और क़ुरान के आधार पर नियम बनाएंगे.’

बदले तालिबान में फिर क्या बदला है? इस सवाल के जवाब में तुराबी ने कहा कि इस बार पुरुषों के साथ-साथ महिला जजों को भी शामिल किया जाएगा, लेकिन पुरानी वाली सज़ा बरकरार रहेगी. कैबिनेट इस बात पर विचार करेगी कि सज़ा सबके सामने दी जाए या चहारदीवारी के भीतर.

तुराबी ने ज़ोर देकर कहा कि सुरक्षित रहने के लिए हाथ काटना बेहद ज़रूरी है. इससे लोगों में खौफ़ बना रहता है. मुल्ला तुराबी का बयान काफी अहम माना जा रहा है. पाकिस्तान अलग-अलग मंचों पर तालिबान की सरकार को मान्यता देने के लिए ज़ोर डाल रहा है. बाकी देशों का कहना है कि तालिबान अगर बदला है तो बदलाव नज़र आना ज़रूरी है. मान्यता पाने के लिए उसे साबित करना होगा कि वो मानवीय अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति सजग हो गया है. हाल-फिलहाल में तो ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा है. तुराबी के बयानों ने साबित कर दिया है कि तालिबान अपना असली स्वभाव नहीं भूलने वाला है. और, वो स्वभाव लोकतंत्र और मानवीयता के दायरे से कोसों दूर है.

प्रेस के लिए नियम

आपने तालिबान के जस्टिस सिस्टम की बात सुनी. अब चलते हैं प्रेस की तरफ़. गवर्नमेंट मीडिया एंड इन्फ़ोर्मेशन सेंटर (GMIC) ने इस हफ़्ते पत्रकारों के लिए 11 नियम जारी किए. इनमें से कुछ नियमों की अलग तरह से व्याख्या हो रही है. जैसे, इस्लाम या महान विभूतियों के ख़िलाफ़ कुछ भी पब्लिश नहीं किया जाएगा.

इस्लाम के हिसाब से क्या लिखना या प्रकाशित करना ग़लत होगा, ये तय करने का पूरा अधिकार तालिबान के पास है. जो कोई रिपोर्ट उसे पसंद ना आए, वो उसे इस्लाम-विरोधी ठहरा सकता है. जहां तक विभूतियों की बात है, हो सकता है किसी समुदाय का दुश्मन तालिबान का प्रणेता हो. ऐसे में सही मुद्दों पर आलोचना भी पत्रकारों को भारी पड़ सकती है. इसी लिस्ट में एक नियम ये भी है कि पत्रकार GMIC के साथ मिलकर न्यूज़ रिपोर्ट्स पब्लिश करेंगे. GMIC एक सरकारी संस्था है. वो क्यों चाहेगी कि तालिबान के ग़लत काम बाहर आए. बहुत संभव है कि वो ऐसे रिपोर्ट्स को भी निशाना बनाए. एक तरह से, ये तालिबान द्वारा प्रेस पर नियंत्रण करने की साज़िश है.

तालिबान के क़ब्ज़े के बाद से सौ से अधिक मीडिया संस्थान और रेडियो स्टेशन बंद हो चुके हैं. अधिकतर पत्रकार देश छोड़कर भाग चुके हैं. जो बचे हैं, उनमें अपने पेशे को लेकर ख़तरा समाया हुआ है. 09 सितंबर को काबुल में एक प्रोटेस्ट कवर करने पहुंचे कई पत्रकारों को तालिबान ने हिरासत में ले लिया था. दो को बुरी तरह पीटा भी गया था. उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया में ख़ूब वायरल हुईं थी.

तालिबान ने पत्रकारों के लिए जारी नियमों में कुछ बड़ी-बड़ी बातें भी की हैं. जैसे, निष्पक्ष और ईमानदार रिपोर्टिंग, पत्रकारिता के नियमों का पालन और सच्चाई से छेड़छाड़ न करने की अपील. यहां पर एक सवाल आता है. अगर इन नियमों का पालन करते समय तालिबान की नाक बीच में आ गई तो क्या होगा? अगर सच्चाई से तालिबान की साख को खतरा हुआ तो क्या होगा? क्या तब तालिबान उन्हें अपना काम करने देगा? फिलहाल तो लक्षण ठीक नहीं लगते. आगे क्या होगा, ये भविष्य के गर्त में है. इस पर हमारी नज़र बनी रहेगी.


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