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कश्मीर को 'द्विपक्षीय मसला' बता चुका तालिबान अब धीरे-धीरे सुर बदल रहा है!

अफगानिस्तान में जो भी घट रहा है, पूरी दुनिया उसे बारीकी से देख रही है. आतंकी कहा जाने वाला संगठन अब सरकार किस तरह से बनाएगा, दुनिया से किए वादे कितने निभाएगा, ये देखने वाली बात है. भारत की चिंता आंतकवाद और कश्मीर के फ्रंट से है. कश्मीर और तालिबान, ये दो शब्द एक वाक्य में आते हैं तो हमारे कान खड़े हो जाते हैं. इसीलिए तालिबानी नेताओं के कश्मीर पर आ रहे हैं बयानों से उसकी पॉलिसी का अनुमान लगाने की कोशिश हो रही है.

दो हफ्ते पहले तालिबान ने कश्मीर को द्विपक्षीय मसला बताया था लेकिन अब एक नेता का नया बयान आया है. और इस बयान में भारत के लिए चिंता की बात है. तो तालिबान ने अब क्या कहा है, उस पर विस्तार से बात करेंगे. लेकिन पहले तालिबान की सरकार बनने को लेकर जो जानकारी आई है, उसकी बात करते हैं.

तालिबान सरकार का खाका

3 सितंबर को तालिबान अपनी सरकार बनाने का आधिकारिक ऐलान करने वाला था, लेकिन आखिरी वक्त पर ये टाल दिया गया. अब ये ऐलान 4 सितंबर को होगा. हालांकि सरकार कैसी होगी, इसकी सूत्रों वाली जानकारियां आ रही हैं. न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के हवाले से जानकारी आई कि तालिबान ने अपनी सरकार का ढांचा तैयार कर लिया है. सरकार को लीड करेंगे मुल्ला अब्दुल गनी बरादर. इनके बाद दो अहम पदों पर होंगे मुल्ला याकूब और शेर मोहम्मद स्टानिकजई.

मुल्ला याकूब तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के बड़े बेटे हैं. तो इन तीनों नेताओं के पास सरकार में ज़्यादा पावर रहेगी, ऐसे खबरें मीडिया में हैं. इसमें भारत के लिए एक राहत की बात भी देखी जा सकती है. शेर मोहम्मद स्टानिकजई ही तालिबान के वो नेता हैं, जिनसे दोहा में भारत की बातचीत हुई थी. बातचीत के बाद इन्होंने भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखने का भरोसा दिया था. एक बात और. शेर मोहम्मद की ट्रेनिंग देहरादून स्थित IMA यानी इंडियन मिलिट्री एकेडमी से हुई. वो 1980 के दशक के शुरुआती सालों में भारत में थे. तो मुमकिन है कि ये लिंक भारत और तालिबान के सहज रिश्ते रखने में काम आए.

बात बरादर की

अब मुल्ला बरादर पर आते हैं. जानकार मान रहे हैं कि मुल्ला बरादर की नीतियों पर पाकिस्तान की छाप कम ही रहेगी. पहले भी पाकिस्तान से उनकी ज़्यादा नहीं बनी. 8 साल वो पाकिस्तान की जेल में रहे. उनके बारे में कई और भी बातें कही जाती हैं, जो तालिबान के बाकी नेताओं से उनको थोड़ा अलग खड़ा करती हैं. मुल्ला बरादर वो आदमी है जिसने ओसामा बिन लादेन को अफगानिस्तान में शरण देने का विरोध किया था. उस वक्त के तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर ने लादेन को 1996 में अफगानिस्तान में शरण दी थी. मुल्ला बरादर को ये फैसला ठीक नहीं लगा था. लादेन को शरण देने का अंजाम क्या हुआ, वो आपको पता ही है. इसके अलावा 1996 में सरकार बनाने के बाद जब तालिबानी नेताओं में पश्चिमी देशों का विरोध बढ़ रहा था, तब भी मुल्ला बरादर की ये राय थी कि अफगानिस्तान को सबके साथ रिश्ते रखने चाहिए.

Mullah Baradar
मुल्ला बरादर (बीच में) पर तालिबान सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी है. (फाइल फोटो- PTI)

बरादर की गिरफ्तारी और रिहाई

कहते हैं कि मुल्ला बरादर ही तालिबान का पहला नेता था, जिसे 2009 में ही लग गया था कि अब अफगानिस्तान सरकार से बात करनी चाहिए. 2009 में जब हामिद करज़ई अफगानिस्तान के राष्ट्रपति थे तो मुल्ला बरादर ने बातचीत शुरू की थी. रिपोर्ट्स हैं कि तब मुल्ला बरादर भारत की एजेंसियों के भी संपर्क में था. हालांकि इसकी जानकारी पाकिस्तान को मिल गई और फिर 2010 में पाकिस्तान ने मुल्ला बरादर को गिरफ्तार कर लिया था. 8 साल तक पाकिस्तान की हिरासत में रहा. जब तालिबान ने अमेरिका से बातचीत शुरू की तो उनको लगा कि नेगोसिएशन के लिए मुल्ला बरादर बेहतर आदमी है. इसलिए अमेरिका और कतर ने पाकिस्तान पर दबाव बनाकर मुल्ला बरादर को रिहा करवाया. कतर की राजधानी दोहा में हुई बातचीत में भी मुल्ला बरादर अहम भूमिका में रहा है. तो इस बैकग्राउंड के आधार पर माना जा रहा है कि मुल्ला बरादर की सरकार में पाकिस्तान की ज़्यादा नहीं चलेगी.

पाकिस्तान मौके तलाश रहा 

ये तो हुई अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार की बात. सरकार में आने के बाद तालिबान की क्या ऑफिशियल पॉलिसी भारत को लेकर रहती है, इसका अभी अनुमान ही लगाया जा रहा है. लेकिन ये भी सच है कि तालिबान की आमद के बाद पिछले कुछ दिनों में कश्मीर मसले को हवा दी जाने लगी है. पाकिस्तान से भी कश्मीर और तालिबान को जोड़कर बयान आ रहे हैं. और कुछ बयान तालिबान की तरफ से भी आए हैं, जो भारत की सरकार को असहज कर सकते हैं. पहले पाकिस्तान की बात करते हैं.

सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के न्यूज़ चैनल की डिबेट का एक हिस्सा वायरल हो रहा है. इसमें पाकिस्तान की सत्ताधारी पार्टी PTI की नेता नीलम इरशाद शेख शामिल थीं. उनके मुताबिक तालिबान ने कहा है कि वो पाकिस्तान के साथ है और मिलकर कश्मीर फतह करके देंगे.

हम मान सकते हैं कि टीवी बहस में हुई ये बातें गंभीरता के स्तर पर नहीं रही होंगी. ये पाकिस्तानी नेता का बड़बोलापन ही रहा होगा. ख्याली पुलाव टाइप, जैसे हमारे यहां के नेता टीवी की बहसों में पाकिस्तान बैशिंग करते हैं वैसा ही कुछ. लेकिन ये मानने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि पाकिस्तान ने कश्मीर को लेकर तालिबान के सत्ता में आने का फायदा उठाना शुरू कर दिया है. ये काम वहां की खुफिया एजेंसियों के स्तर पर भी शुरू हो गया है. आपको हमने आतंकी गुट अलकायदा के कश्मीर पर आए बयान के बारे में बताया था. अलकायदा ने कश्मीर के कथित लिबरेशन की बात कही थी. इस को लेकर अब रिपोर्ट्स आ रही हैं कि असल में ये बयान पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की कारस्तानी थी.

LOC पर लॉन्च पैड्स एक्टिव!

NDTV पर नीता शर्मा की रिपोर्ट बताती है कि कश्मीर का ज़िक्र करना और चेचेन्या और शिन्जियांग का नाम नहीं लेना, ये पाकिस्तान का काम था. चेचेन्या रूस में है और शिन्जियांग चीन में. यहां भी इस्लामिक उग्रवाद बरसों से चल रहा है. पाकिस्तान चीन का सहयोगी होने की वजह से शिन्जियांग के मुस्लिमों पर हो रहे ज़ुल्म पर कभी नहीं बोलता. इसलिए अलकायदा वाले बयान में भी शिन्जियांग को छोड़कर कश्मीर का नाम लिया गया. एनडीटीवी की सरकारी सूत्रों पर आधारित रिपोर्ट के मुताबिक एलओसी के पार कई दिनों से खाली पड़े लॉन्च पैड्स को फिर से एक्टिव करने का काम शुरू हो गया है. कुल मिलाकर पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर में फिर गड़बड़ करने की कोशिश शुरू हो गई है. ये अप्रत्याशित भी नहीं है. हम जानते ही हैं कश्मीर और आतंक पाकिस्तान की भारत नीति का सालों से हिस्सा रहा है.

तालिबान के बदलते सुर

असली चिंता तालिबान के कश्मीर को लेकर रुख की है. बीबीसी हिंदी के विनीत खरे ने तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन का इंटरव्यू किया था. इसमें कश्मीर को लेकर सवाल पूछा गया था. उनका जवाब था कि हमने दोहा एग्रीमेंट को साइन किया है, और हम अपनी सरजमीं किसी गुट या संस्था को दूसरे देशों के खिलाफ इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देंगे. ये बात तो तालिबान की तरह से पहले से कही जा रही हैं. इंटरव्यू में तालिबान नेता ने एक नई बात भी कही. उन्होंने कहा कि कश्मीर में या भारत में या किसी और मुल्क में मुसलमानों पर अत्याचार हो रहा हो, तो बतौर मुसलमान हमें हक है कि हम अपनी आवाज़ उठाएंगे. कहेंगे कि ये मुसलमान आपके नागरिक हैं, कानून के मुताबिक बराबर हक मिले. लेकिन किसी देश के खिलाफ कार्रवाई करना, मिलिट्री ऑपरेशन करना हमारी नीति नहीं है.

यानी तालिबान के नेता ये कहने लगे कि वो कश्मीर का मसला उठा सकते हैं. हालांकि दो हफ्ते तालिबान की तरफ कश्मीर पर एक बयान और मीडिया में आया था. तब तालिबान ने कहा था कि कश्मीर द्विपक्षीय मसला है और तालिबान का उससे कोई मतलब नहीं है. तो तालिबान की असल मंशा क्या है, क्या कश्मीर को लेकर किसी तरह की दिक्कतें हो सकती हैं, ये अभी साफ नहीं है. हालांकि तालिबान ने भारत के साथ बातचीत में ये भरोसा दिया है कि वो अफगानिस्तान की सरज़मी को आंतक के लिए इस्तेमाल नहीं होने देंगे.


भारत के साथ बातचीत में आतंकवाद को लेकर तालिबान क्या बोला?

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