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ताजमहल या शिव मंदिर? कोर्ट ने यह सच बताया!

तीन बड़े तीर्थ – तीन अदालती मामले और तीन फैसले. काशी, मथुरा और आगरा में मंदिर मस्जिद विवाद चल रहा है, उन्हें लेकर अदालती फैसले भी आए हैं. 1964 में एक फिल्म आई थी, लीडर. इसमें शकील बदायूंनी की एक नज़म है, जो उन्होंने ताज महल के लिए लिखी थी –

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल

सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है

इस के साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे

ख़त्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है

लीडर, दिलीप कुमार का लिखा एक पॉलिटिकल ड्रामा था. आज इसकी नज़्म की याद हमें इसीलिए आई क्योंकि ताज महल को लेकर न पॉलिटिक्स खत्म होने का नाम ले रही है, और न ड्रामा. पूरी दुनिया इस अजूबे को देखने भारत आती है. संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने दुनियाभर में 1 हज़ार 154 जगहों को वर्ल्ड हेरिटेज माना है. माने पूरी दुनिया के लिए एक धरोहर. इनमें से सबसे ज़्यादा दिलचस्पी लोगों को ताज महल में ही रहती है. बीते हफ्ते ज़िटांगो ट्रैवल ने बताया था कि ताज महल को एक ही महीने में 14 लाख बार सर्च किया जा रहा है. बीते तीन साल में ताज महल ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ASI को 200 करोड़ से ज़्यादा कमाकर दिए हैं. इसमें से सिर्फ 13 करोड़ 37 लाख ताज महल पर खर्च हुए, बाकी पैसा बाकी धरोहरों के संरक्षण के काम आया.

इस सब के बावजूद हमारे यहां कुछ लोग असंतुष्ट हैं. और ये ताजमहल को तेजोमहालय बनाकर ही दम लेना चाहते हैं. इसीलिए कभी ईद के दिन पूजा की ज़िद करते हैं, कभी चालीसा पाठ की धमकी देते हैं तो कभी अदालत में ऐसे मुकदमे दर्ज करवा देते हैं जिनका कोई ओर-छोर होता ही नहीं. एक वक्त था, जब तेजोमहालय वाली बात पर खुलकर हंसा जा सकता था. ऐसी बातें करने वालों को मुक्त कंठ से बेवकूफ भी कहा जा सकता था. लेकिन अब वो दौर रहा नहीं. अब जो बेतुका है, उसी की तुक ढूंढने में ये देश अपना वक्त बरबाद करना चाहता है.

तभी तो भाजपा की अयोध्या इकाई के मीडिया प्रभारी डॉ रजनीश सिंह तेजो महालय वाली ज़िद पकड़कर इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंच गए. उनका दावा था कि ये एक मकबरा नहीं, शिव मंदिर है. डॉ सिंह चाहते थे कि न्यायालय ASI को ताज महल में स्थित 22 कमरों को खोलने का निर्देश दे, जो कि सील करके रखे गए हैं. साथ ही ये भी, कि सरकार एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाकर ताज महल के ”असली इतिहास” को मालूम करे.

रजनीश सिंह ने ये कदम उठाने से पहले कितना सोच-विचार किया होगा, इसका अंदाज़ा आप ऐसे लगाइए कि उन्होंने पीएन ओक की किताब ”ताज महल – अ ट्रू हिस्ट्री” का हवाला याचिका में दे दिया. साल 2000 में इन्हीं पीएन ओक की एक याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज हुई थी. इसमें ओक ने ये ऐलान करने की मांग की थी कि ताज महल को एक हिंदू राजा ने बनवाया था. मतलब रजनीश थोड़े बहुत बदलाव के साथ वही मांग लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए, जो सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो चुकी है.

आज की सुनवाई में उत्तर प्रदेश शासन की तरफ से भी वकील पेश हुए. उत्तर प्रदेश सरकार ने दलील दी कि मामला याचिकाकर्ता के क्षेत्राधिकार में ही नहीं आता. फिर आगरा में पहले से एक मामला चल ही रहा है.

इसके बाद आई जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की तरफ से सवालों और टिप्पणियों की बारी. बेंच ने कहा कि याचिका में दो प्रमुख मांगें हैं –

  1. फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाने का आदेश
  2. सील दरवाज़े खोलने का आदेश

बेंच ने साफ किया कि ”मैंडमस” या आदेश सिर्फ तब दिए जा सकते हैं, जब अधिकारों का उल्लंघन होता नज़र आए. कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि आप कौन से हक की बात कर रहे हैं? तब वकील ने कहा कि यहां सूचना के अधिकार की बात हो रही है. बेंच ने इसके जवाब में कहा इस कानून के तहत जानकारी मांगी जा सकती है और न मिले, तो अपील का भी प्रावधान है. लेकिन ताजमहल के अंदर जांच करवाना कौनसे हक के तहत आता है?

इसके बाद और जिरह हुई, जिसमें रजनीश सिंह के वकील ये साबित नहीं कर पाए कि वो जिस कथित रीसर्च की बात कर रहे हैं, वो सूचना के अधिकार से कैसे जुड़ी है. अंततः कोर्ट ने एक मज़ेदार टिप्पणी की, जिसे आप लताड़ भी मान सकते हैं. बेंच ने कहा,

‘जाइए और पढ़िए. पहले एम.ए की पढ़ाई और फिर पी.एच.डी. इसमें आप अपने विषय को चुनिए. और अगर तब उस विषय पर शोध से आपको कोई विश्वविद्यालय रोके, तो हमारे पास आइएगा.”

न्यायालय ने याचिकाकर्ता को NET, JRF भी क्लीयर करने की सलाह दी. कुल मिलाकर न्यायालय कह रहा था कि थोड़ी बहुत पढ़ाई सेहत के लिए बुरी नहीं होती, कर लेनी चाहिए. लेकिन याचिकाकर्ता नहीं माना. अड़ा रहा कि दरवाज़े खुलवाने का आदेश दिया जाए. तब न्यायालय ने फिर एक बार लताड़ लगाई,

कल आकर आप कहेंगे कि मुझे जजों के चेंबर में जाना है. महरबानी करके जनहित याचिकाओं का मज़ाक न बनाएं”

लंच से पहले न्यायालय ने कहा कि इस तरह की बहसे ड्राइंग रूम में हो सकती हैं, न्यायालय में नहीं. लंच के बाद कुछ देर और जिरह हुई और न्यायालय ने अपना फैसला सुना दिया. न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसे विषय पर आदेश चाहता है, जिसपर न्यायालय विचार नहीं कर सकता. इसीलिए फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाने का आदेश नहीं दिया जा सकता. रही बात दरवाज़े खोलने की, तो ऐतिहासिक शोध एक तय प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है. अतः ये आदेश भी नहीं दिया जा सकता. इसी के साथ न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया.

यह प्रसंग सुनने में बड़ा मनोरंजक है. लेकिन इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि ताज महल को लेकर लगातार विवादों की राजनीति हो रही है. दावा असली इतिहास को स्वीकार्यता दिलाने का होता है, लेकिन आप ऊपर की दो-तीन तहें खोलकर देखते हैं, उतने में ही मालूम चल जाता है कि बात दरअसल जा किधर रही है. दो मिसालें देखिए –

11 मई को जयपुर में पत्रकारों से बात करते हुए पूर्ववर्ती जयपुर राजघराने की दिव्या कुमारी ने दावा कर दिया कि जहां ताज महल बना है, वो जयपुर राजघराने का एक महल था और ये ज़मीन ऐतिहासिक रूप से जयपुर राजघराने की थी, जिसे शाहजहां ने कब्ज़ा लिया था. दिव्या ने ये भी कहा कि उनके परिवार के पास इससे जुड़े दस्तावेज़ भी हैं. अब यहां रूककर आपको दिव्या कुमारी का पूरा परिचय देते हैं – दिव्या राजस्थान की राजसमंद लोकसभा सीट से भाजपा सांसद भी हैं.

ईद के दिन, यानी 3 मई को आगरा में परमहंस दास ने ज़िद पकड़ ली कि वो अक्षय तृतीया के मौके पर ताज महल में मंत्रोच्चार के साथ शुद्धिकरण करना चाहते हैं. पुलिस और प्रशासन के अधिकारी उन्हें समझाइश देते नज़र आए. परमहंस दास का कहना भी यही था कि ये तेजो महालय है. उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया तो उन्होंने दावा कर दिया कि वो भूख हड़ताल पर चले जाएंगे. इससे पहले 26 अप्रैल को भी परमहंस दास और उनके शिष्यों को ताज महल के अंदर जाने से रोका गया था. अब परमहंस दास ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका लगाकर मांग की है उन्हें गेरुआ पहनकर ताज महल परिसर में जाने दिया जाए.

आप और पीछे जाएंगे तो आपको ताज महल में पूजा और पूजा की ज़िद की ऐसी ही ढेर सारी खबरें मिलेंगी. नवंबर 2018 में तीन महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद की तीन कार्यकर्ताओं ने ताज महल परिसर स्थित मस्जिद के अंदर जाकर पूजा कर भी दी थी. तब ASI ने इनपर जुर्माना लगाया था. ऐसी घटनाओं का नतीजा क्या होता है, समझने के लिए पीएचडी करने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती है. अभी हमें आगरा से मथुरा भी जाना है.

मथुरा श्रीकृष्ण का शहर है. श्रीकृष्ण, जो अपनी नटखट लीलाओं के लिए उतने ही पसंद किए जाते हैं, जितना भागवत के अपने ज्ञान के लिए. जब अर्जुन के मन में धर्म को लेकर संशय हुआ, तब श्रीकृष्ण ने उसे गीता का उपदेश दिया. लेकिन आज उन्हीं श्रीकृष्ण के शहर में धर्म को लेकर एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसकी नज़र, मथुरा की शांति को कभी भी लग सकती है.

यहां विवाद है श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर. लखनऊ की रहने वाली रंजना अग्निहोत्री ने मथुरा की सेशन्स कोर्ट में श्री कृष्ण जन्मभूमि के पास 13.37 एकड़ ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर याचिका लगाई है. साथ ही वो चाहती हैं कि शाही ईदगाह मस्जिद को हटाया जाए. इस मामले में 6 मई को सुनवाई पूरी हो चुकी है. 19 मई को फैसला भी आने वाला है. इसी मामले में कुछ और याचिकाएं भी लगी हैं.

मस्जिद हटाने की मांग वाले याचिकाकर्ता इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे थे. और उन्होंने मांग की थी कि इस मामले की सुनवाई रोज़ हो और जल्द फैसला दिया जाए. ये मांग भी की गई थी कि अगर दूसरा पक्ष न्यायालय में हाज़िर न हो, तो उसपर कार्रवाई हो और एकतरफा आदेश पारित किया जाए.

इस याचिका पर फैसला सुनाते हुए आज इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मथुरा सेशंस कोर्ट को आदेश दिया है कि अधिकतम चार महीनों में सभी याचिकाओं का निपटारा करें. और अगर दूसरा पक्ष सुनवाई में शामिल न हो, तब भी आदेश पारित किया जाए.

आगरा की तरह ही मथुरा में भी अलग अलग तरीके अपनाए जा रहे हैं. कभी अदालत में केस पर केस दर्ज होते हैं तो कभी जलाभिषेक की धमकी. दो मिसालें यहां भी देखिए –

2021 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा और कुछ दूसरे हिंदू संगठनों ने ज़िद पकड़ ली कि वो 6 दिसंबर के रोज़ शाही ईदगाह मस्जिद के अंदर जलाभिषेक करेंगे. प्रशासन ने तब पूरे मथुरा को किला बना दिया था और समझाइश के बाद जाकर जलाभिषेक का कार्यक्रम रद्द हुआ. लेकिन 6 दिसंबर के दिन किसी मस्जिद में जलाभिषेक का क्या मतलब होता है, ये नासमझ भी जानते हैं.

दूसरी मिसाल – मथुरा में न्यायालय का फैसला आने ही वाला है. इससे पहले एक याचिकाकर्ता ने एक और आवेदन देकर मांग कर दी कि एक एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति हो, जो शाही ईदगाह मस्जिद के अंदर जाकर देखे कि क्या अंदर हिंदू धर्म से संबंधित चिह्न हैं? याचिकाकर्ता का कहना है कि मस्जिद की जगह केशव देव मंदिर था, जिसे गिरा दिया गया था, लेकिन उसके निशान बाकी हैं.

ये समझना बड़ा आसान है कि आसन्न फैसले से पहले यकायक सर्वे की बात कहां से आ गई. ये बात आई थी मथुरा से 700 किलोमीटर दूर काशी से. आइए वहां का दौरा भी कर लिया जाए.

काशी में ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर विवाद चल रहा है, जिसके बारे में हमने समय समय पर आपको बताया है. वाराणसी की एक अदालत में याचिका लगाकर मांग की गई है कि मस्जिद परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर में साल भर पूजा की अनुमति मिले. फिलहाल साल में एक बार अनुमति मिलती है.

इसके बाद न्यायालय ने अजय कुमार मिश्रा को एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया था. और मस्जिद में सर्वे का आदेश दे दिया था. इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन 21 अप्रैल को न्यायालय ने मामले में दखल देने से इनकार कर दिया. इसके बाद 26 अप्रैल को वाराणसी की अदालत ने एक बार फिर सर्वे का आदेश दिया था. इस वीडियो सर्वे के वक्त बवाल भी हुआ था. मस्जिद का काम देखने वाली अंजुमन इंतज़ामिया कमेटी ने शिकायत की थी कि एडवोकेट कमिश्नर निष्पक्ष नहीं हैं. न्यायालय ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद आज के लिए अपना फैसला सुरक्षित रखा था.

आज आए फैसले में न्यायालय ने मिश्रा को तो नहीं हटाया, मगर दो और एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त कर दिए – अजय सिंह और विशाल सिंह. इन सबको 17 मई को अपनी सर्वे रिपोर्ट देनी है. इसका मतलब सर्वे पूर्ववत चलेगा.

हमने आपको आगरा, मथुरा और वाराणसी में चल रहे इन अदालती मामलों के बारे में बताया. अब ज़रा सोचिए अपने उस दोस्त, रिश्तेदार या फिर किसी दूसरे परिचित के बारे में, जिसका कोई मुकदमा अदालत में फंसा हुआ है. आपको अपने इर्द-गिर्द ऐसे लोग मिल जाएंगे जिन्हें अदालती कार्यवाही में कब क्या कहां होता है, ज़बानी याद है. इसीलिए नहीं क्योंकि वो पेश से वकील हैं, बल्कि इसीलिए क्योंकि उन्होंने फैसले के इंतज़ार में अदालत के ढेर सारे चक्कर लगाए हैं.

अक्टूबर 2021 में खबर आई थी कि भारत में तकरीबन 4.5 करोड़ मामले लंबित हैं. इनमें से 3 करोड़ 90 लाख मामले ज़िला और निचली अदालतों में लंबित हैं. 58 लाख मामले अलग-अलग हाईकोर्ट्स में लंबित हैं. और 69 हज़ार से ज़्यादा मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं. ऐसे में ये सोचना बहुत ज़रूरी है कि कब तक हम तेजो महालय जैसी अपीलें लेकर हाईकोर्ट का समय बरबाद करेंगे.

हम ये नहीं कह रहे हैं कि अपनी किसी मांग के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाना गलत है. लेकिन ये देख लेना चाहिए कि मांग में वाकई कोई आधार है कि नहीं. और इसके लिए अदालत सही मंच है कि नहीं.

हम दूसरी बात इतिहास को लेकर कहना चाहते हैं. हिंदू धर्मस्थल आक्रांताओं और शासकों के निशाने पर रहे, ये तथ्य है. और इसके अनेक कारण थे. आबादी की मनोबल तोड़ना, लड़ाई के लिए धन इकट्ठा करना वगैरह. लेकिन हर जगह कहानी एक ही नहीं थी, और न ही एक तरह की थी. ऐसे उदाहरण भी हैं, जब हिंदू शासकों ने मंदिरों को लूटा और मुस्लिम शासकों ने उन्हें दोबारा बनवाया. ऐसे उदाहरण भी हैं, जब मुस्लिम शासकों ने मंदिरों को लूटा और हिंदू शासकों ने उन्हें बनवाया.

इसीलिए एक ही धारणा को सभी जगहों पर लागू नहीं किया जा सकता. फिर हमें ये भी सोचना होगा कि औपनिवेशिक काल या फिर उससे पहले के सामंती काल में हुई घटनाओं का हिसाब लोकतांत्रिक भारत में कैसे और क्यों होगा? आपने गदर फिल्म देखी होगी. उसमें तारा सिंह का पात्र एक मार्के की बात कहता है – एक दौर था पागलपन का, जो बीत गया. अब हमें तय करना है कि हमें पागलपन के दौर में लौटना है, या नहीं.

आज देश में इतिहास और धर्म को लेकर संशय की स्थिति है. और संशय की स्थिति में पुरखों की सीख को याद करना चाहिए. जाते जाते हम हमारे एक पुरखे के वचन आपको सुनाना चाहते हैं.

मोको कहां ढूँढे रे बन्दे

मैं तो तेरे पास में

ना तीरथ मे ना मूरत में

ना एकान्त निवास में

ना मंदिर में ना मस्जिद में

ना काबे कैलास में

मैं तो तेरे पास में बन्दे

मैं तो तेरे पास में

ना मैं जप में ना मैं तप में

ना मैं बरत उपास में

ना मैं किरिया करम में रहता

नहिं जोग सन्यास में

नहिं प्राण में नहिं पिंड में

ना ब्रह्याण्ड आकाश में

ना मैं प्रकुति प्रवार गुफा में

नहिं स्वांसों की स्वांस में

खोजि होए तुरत मिल जाउं

इक पल की तालास में

कहत कबीर सुनो भई साधो

मैं तो हूं विश्वास में

यहां ईश्वर, कबीर के माध्यम से हमसे बात कर रहे हैं. वो बता रहे हैं कि उनका वास किसी जगह या इमारत में नहीं है. और न ही धार्मिक क्रिया कलाप आदि से उन तक पहुंचा जा सकता है. वो तो बस हमारे यकीन में बसते हैं. हम मानते हैं कि ईश्वर है, तो है. काशी के रहने वाले कबीर ने आज से साढ़े पांच सौ साल पहले ईश्वर तक जाने का रास्ता हमें बता दिया था. लेकिन आज उनके ही शहर में धर्म के नाम पर कोलाहल है. आज सोने से पहले सोचिएगा, कि क्या मंदिर मस्जिद के फेर में पड़कर हम अपने पुरखों का अपमान नहीं कर रहे हैं?


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