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कोरोना काल में ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई; केंद्र और राज्यों के ऐसा कहने की वजह ये है?

मंगलवार 20 जुलाई, 2021. राज्यसभा में हेल्थ मिनिस्ट्री ने एक बयान दिया और देशभर में हंगामा शुरू हो गया. अपनी एक रिपोर्ट के हवाले से मिनिस्ट्री ने कहा था कि उसके पास कोरोना (Corona) की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन (Oxygen) की कमी से किसी की मौत होने की कोई रिपोर्ट नहीं है. बयान के बाद विपक्ष से लेकर सोशल मीडिया तक  मोदी सरकार पर हमलावर हो गया. वहीं, केंद्र सरकार ने अपना बचाव करते हुए कहा कि ये रिपोर्ट उसने राज्यों से मिली रिपोर्ट के आधार पर तैयार की है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि जैसा राज्यों ने बताया उसने वैसे ही आंकड़े सदन के सामने रख दिए.

इधर राजनीति का एक और रंग देखने को मिला. जो विपक्षी दल केंद्र सरकार को इस रिपोर्ट पर घेर रहे थे, उनकी ही राज्य सरकारें कह रही थीं कि उनके पास भी कोरोना में ऑक्सीजन की कमी से मरने वालों की कोई रिपोर्ट नहीं है. इस लिहाज से तो जो केंद्र सरकार कह रही है वो सही है. लेकिन लोगों के मन में एक सवाल अटक कर रह गया है. वो ये कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन के लिए जो अफरा-तफरी देश ने देखी वो क्या था? कैसे ये रिपोर्ट दे दी गई कि मौतें ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुईं? राज्यों में मौतें रिपोर्ट करने का सिस्टम क्या है? आइए आज नजर डालते हैं इन जरूरी पहलुओं पर.

मौत का कारण दर्ज होता कैसे है?

राज्यसभा में केंद्र सरकार की तरफ से ऑक्सीजन की कमी से किसी के भी न मरने वाली बात के अलावा एक बात और कही गई थी. वो ये कि हेल्थ राज्य का विषय है. मतलब हेल्थ पर नीति बनाने का काम राज्य सरकार का है. इस पर केंद्र सरकार कोई एक्शन नहीं ले सकती. किसी आपात स्थिति को छोड़ कर. ऐसे में मौत को रिपोर्ट करने का काम राज्य सरकारों के जिम्मे रखा गया. मौत को रिपोर्ट करने का पूरा सिस्टम ICMR यानी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने बना रखा है. इसकी एक खास शाखा नेशनल सेंटर फॉर हेल्थ इंफॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च (NCDIR) इन मौतों को रजिस्टर करने का तरीका तैयार करता है.

Oxygen
मेडिकल ऑक्सीजन लेती एक कोरोना मरीज. (फाइल फोटो- पीटीआई)

NCDIR की वेबसाइट के अनुसार, मौत की वजह रिकॉर्ड करने को तकनीकी भाषा में ‘मेडिकल सर्टिफिकेट ऑफ कॉज ऑफ डेथ’ कहा जाता है. शॉर्ट में MCCD. हर हॉस्पिटल को ये तरीका फॉलो करना होता है. किसी मौत को एक फॉर्म में 2 तरह के फॉर्मेट में रिकॉर्ड किया जाता है. एक ‘इंस्टिट्यूशनल डेथ’ के मामले में और दूसरा ‘नॉन इंस्टिट्यूशनल डेथ’ के मामले में. मतलब अगर मौत किसी अस्पताल में हुई है तो डॉक्टर को फॉर्म नंबर 4 में इसके बारे में बताना होगा. अगर मौत अस्पताल के बाहर हुई है तो डॉक्टर को 4A नाम का फॉर्म भरना होगा. इन दोनों ही फॉर्म में मौत की वजह बतानी होती है. लिखना होता है कि मौत के तात्कालिक और पहले के कारण क्या रहे. वो जगह भी लिखनी होती है जहां मौत हुई. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि सरकारी हॉस्पिटल तो इसे पूरी तरह से फॉलो करते हैं. लेकिन प्राइवेट हॉस्पिटल इसमें अपने हिसाब से कुछ कॉलम घटा-बढ़ा लेते हैं. हालांकि ऐसा कोई कॉलम नहीं जोड़ा जाता जो गाइडलाइंस में न बताया गया हो.

कोरोना से हुई मौतों के लिए अलग से कोई गाइडलाइन?

हां. जब देश में कोरोना वायरस आया तो ICMR ने इससे होने वाली मौतों को रजिस्टर करने के लिए गाइडलाइंस तैयार की थीं. ये बात 2020 की है. इनमें तफ्सील से बताया गया कि कोरोना से हुई मौत को कैसे रजिस्टर करना है. बाकायदा फॉर्म के जरिए समझाया गया कि कैसे मौत दर्ज करनी है. इसमें सबसे पहले ये बताया गया है कि मौत का कारण कैसे लिखना है. आईसीएमआर की गाइडलाइन के मुताबिक मौत का कारण मतलब-

“वो सभी बीमारियां, रोग की स्थिति या असामान्यता या चोट, जिसकी वजह से या तो मौत हुई. या ऐसी परिस्थितियां जिनकी वजह से एक्सीडेंट या हिंसा हुई और उसके परिणामस्वरूप चोट लगी.”

मौत का कारण दर्ज करने के लिए फॉर्म 4/4A में 3 कॉलम दिए गए हैं. इनमें ये बताना होता है-

भाग 1
# तात्कालिक कारणः मरने के वक्त बीमारी, चोट या परिस्थिति जिसकी वजह से मौत हुई. न कि मौत कैसे हुई जैसे हार्ट अटैक आदि.
# पूर्ववर्ती या पहले से मौजूद कारणः मरने वाले की वो बीमारी जिसकी वजह से वो अस्पताल में पहुंचा और मौत हो गई. मतलब जब लाया गया तो उसको किस तरह के लक्षण थे.

भाग 2
# दूसरी परिस्थितियां जिनकी वजह से मौत हुई, लेकिन जिनका बीमारी से लेना-देना नहीं है. जैसे कोई हिंसा या एक्सीडेंट आदि. (तस्वीर देखें)

Corona Death Register
किसी भी मौत को दर्ज करने का एक सेट प्रोफार्मा है. इससे अलग कुछ डॉक्टर भी नहीं लिख सकता.

इस फॉर्म को भरने का तरीका क्या है?

इसे भरने का भी एक सेट तरीका है. गाइडलाइन के अनुसार, पहले भाग में मतलब तात्कालिक कारण में सिर्फ एक कारण ही लिखा जा सकता है. उसके बाद पूर्ववर्ती कारणों में 2 लाइन में दो मुख्य कारण बताए जा सकते हैं. अगर इसके अलावा अन्य कोई बात है तो उसे भाग 2 में तफ्सील से बताया जा सकता है.

इसे कोरोना के एक मरीज के केस में उदाहरण की तरह समझते हैं. मान लीजिए कोरोना के मरीजों की मौत हुई तो पहले वाले सेक्शन में सिर्फ तत्काल, मतलब उस वक्त दिख रहे कारण को लिखा जाएगा. इसे मान लेते हैं Respiratory Acidosis या सांस की नली में अम्लता आ जाना. इसके बाद दूसरे सेक्शन में मरीज के लाए जाने के वक्त के शुरुआती लक्षण जैसे Acute Respiratory Distress Syndrome (ARDS) और COVID-19 लिखा जाएगा. इसके बाद सेक्शन 2 में इनके अलावा अगर कोई बीमारी या लक्षण हैं, तो भरा जा सकता है.

अब वो बात, जिसके लिए ये सब बताया.

इस गाइडलाइन में हमें कहीं भी ऐसा कॉलम या निर्देश नहीं दिखा जिसमें किसी कमी की वजह से मौत का जिक्र किया जा सके. मिसाल के तौर पर पावर सप्लाई न होना, ऑक्सीजन खत्म हो जाना या इंजेक्शन की कमी होना. मौत के कारण बताने के दिशा-निर्देश साफ हैं. यानी सिर्फ बीमारी और मौत के कारण का जिक्र करें. उसके अलावा कुछ नहीं.

(ये पूरी गाइडलाइन आप यहां पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.)

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

एमसीडी में मेडिकल ऑफिसर रहे फिजीशियन डॉक्टर अनिल बंसल के मुताबिक, मौत का कारण लिखते वक्त डॉक्टर के पास बहुत विकल्प नहीं होते. वो ज्यादा डिटेल नहीं लिख सकता. लल्लनटॉप से बातचीत में डॉ. अनिल बंसल ने बताया,

“बने हुए कॉलम में बीमारी और मरने के सिर्फ फौरी कारण को लिखा जाता है. जहां तक बात कोरोना की है तो कोरोना से मौत और इससे होने वाली दिक्कतों का जिक्र किया जा सकता है. कोई भी डॉक्टर ऑक्सीजन न मिलने की वजह से मौत हुई जैसे कारण नहीं लिख सकता. इससे न सिर्फ डॉक्टर, बल्कि पूरा अस्पताल कानून के शिकंजे में आ जाएगा. अगर मेडिकल लापरवाही का कोई मामला आता है तो जांच कराई जाती है. इसमें इस तरह के कारण लिखे जा सकते हैं. लेकिन डॉक्टर तो सिर्फ मेडिकल कारण ही बता सकता है.”

हमने कोरोना की बीमारी पर लगातार नज़र बनाए हुए डॉक्टर विपिन विशिष्ठ से भी बात की. उनका कहना है,

“कोरोना से किसी की मौत होने पर डॉक्टर के पास उसके मेडिकल कारण लिखने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. वो सिर्फ कोरोना की वजह से पैदा हुई दिक्कत और मौत का कारण लिख सकता है. हॉस्पिटल में कोई बदइंतजामी थी या किसी कारण से कोई सुविधा हॉस्पिटल में नहीं पहुंची इसका डॉक्टर से कोई लेना-देना नहीं होता. वो ऐसी बात मौत के कारण की जगह पर लिख भी नहीं सकता. पूरी दुनिया में मौत का कारण लिखने की यही प्रैक्टिस है. ऑक्सीजन या किसी और चीज़ की कमी प्रशासनिक मामला है. उस पर वही जांच करवा सकते हैं.”

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कोलकाता के एक अस्पताल में कोरोना मरीज का ऑक्सीजन लेवल चेक करती हेल्थ वर्कर. (फाइल फोटो- पीटीआई)

सरकारी अस्पताल में तैनात एक डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि ये सुनिश्चित कर पाना लगभग नामुमकिन है कि किसी की मौत ऑक्सीजन की वजह से हुई है या नहीं. वो कहते हैं,

“ऑक्सीजन की कमी से अगर किसी की मौत हुई भी है तो इसकी सटीक तफ्तीश के लिए पोस्टमार्टम करना होगा. कोरोना की दूसरी लहर में जिस तरह से लोग हॉस्पिटल में आ रहे थे, उसमें उनका बेसिक इलाज कर पाना ही मुश्किल हो पा रहा था. ऑक्सीजन या दवाई की कमी से किसी की मौत को स्थापित करना अनुसंधान का काम है. जब रोज हजारों लोग हॉस्पिटल पहुंच रहे हों ऐसे में ये कर पाना नामुमकिन है”

एक्सपर्ट्स का ये भी कहना है कि मौत के पीछे बदइंतजामी को जिम्मेदार ठहराने के लिए अलग से ऑडिट या जांच कराई जा सकती थी. उन्होंने कहा कि ये काम तब कराया जा सकता था, जब लगातार ऑक्सीजन और दवाइयों की कमी की खबरें आ रही थी. अब ये कर पाना भी मुमकिन नहीं है.


वीडियो – सोशल लिस्ट: सरकार ने कहा – ऑक्सीजन की कमी से मौत का रिकॉर्ड नहीं आया, लोग भड़के

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