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अपनी पुस्तक 'स्वांग' में व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी ने मूर्खता का पर्यायवाची किसे बताया?

लोग हमारे आसपास समय-समय पर कई तरह के ‘स्वांग’ रचते हैं. कितनी बार ऐसा हप्ता है कि हम उस स्वांग को पहचान लेते हैं लेकिन ज़्यादातर बार हम उसमें फंसते चले जाते हैं. ठीक इसी विषय पर वरिष्ठ व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी की पुस्तक आई हैं जिसका नाम भी ‘स्वांग’ ही है.

‘स्वांग’ में ज्ञान चतुर्वेदी ने कोटरा गांव के जनजीवन के जरिये दिखलाया है कि किसी समय मनोरंजन के लिए किया जाने वाला स्वांग अर्थात अभिनय अब लोगों के जीवन का ऐसा यथार्थ बन चुका है जहां पूरा समाज एक विद्रूप हो गया है. सामाजिक, राजनीतिक, न्याय और कानून, इनकी व्यवस्था का सारा तंत्र ही एक विराट स्वांग में बदल गया है. एक नकलीपना हर तरफ हावी है, इस रूप में यह उपन्यास न केवल बुंदेलखंड के बल्कि हिंदुस्तान के समूचे तंत्र के एक विराट स्वांग में तब्दील हो जाने की कहानी है. आइए पढ़ते हैं इसी ‘स्वांग’ पुस्तक का एक अंश –

 

मूर्खता का पर्यायवाची?

बिस्मिल. लोग इसी नाम से बुलाते हैं उन्हें. बिस्मिलजी.

वैसे असली तथा पूरा नाम है, रामनरेश बिलगैंया ‘बिस्मिल’. बिस्मिल उनका उपनाम है. कभी-कभी कविताएं भी लिख लेते हैं, सो मजबूरन एक उपनाम रखना पड़ा. इस तरह हर कवि को रखना पड़ता है. यह नाम तो बस यूं ही रख लिया वर्ना तो नाम रखने के तीन साल बाद जाकर उन्हें ‘बिस्मिल’ शब्द का सही अर्थ पता चला था. और कवि तो वे ‘बाई-द-वे’ हैं. बस, यूं ही. वास्तव में तो वे इस इलाके में पत्रकारिता करते हैं. लखनऊ के एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार-पत्र के स्थानीय प्रतिनिधि हैं. वैसे वे पत्रकार भी ‘बाइ-द-वे’ ही हैं. …यार, फिर वे हैं क्या? वास्तव में तो वे एक विशुद्ध दलाल हैं. अफसरों के मुंहलगे हैं. नेताओं की चिलम भरते हैं. पत्रकारिता, साहित्य और समाजसेवा की ऊपरी सजावट से दलाली की झांकी सजाई हुई है बिस्मिलजी ने.

कभी वे भी छरहरे बदन के होते थे. इधर कई सालों से मुटा गए हैं. दलाली में दुबलापन वैसे भी नहीं चलता. ख़ुद ही दुबले हों तो लोग आप पर ठीक से विश्वास नहीं करते. यार, जो ख़ुद ही ठीक से न खा पा रहा हो, वह हमें क्या खिलवाएगा— दुबलेपन का ऐसा कुछ फालतू-सा प्रभाव बनता है. उस लिहाज से अभी उनका बदन देखें तो उनका व्यक्तित्व विकट प्रभावी है. पेट इतना आगे आ चुका है कि उसके लौटने की अफ़वाह तक शेष नहीं रही.

बिस्मिलजी का पेट उनकी सफल दलाली के घोषणापत्र जैसा है. यह पेट किसी सरकारी दफ्तर में लम्बित मामले की तरह हरदम लटका रहता है. यह उद्दंड पेट अब बेल्ट, बटन और पैंट के बस का नहीं रह गया है. बेल्ट असहाय-सी, ‘भाड़ में जाओ’ के भाव के साथ अदृश्य कमर पर बंधी रहती है और पैंट के बटन बन्द होने के बावजूद खुले से लगते हैं.

वैसे पेट को संतुलित करने हेतु नितम्ब भी पीछे की ओर बड़ा-सा प्रभावी मोर्चा बनाए हुए हैं; देखने वाला यह बिलकुल भी तय नहीं कर पाता कि इनके व्यक्तित्व का आकलन सामने से किया जाए कि पिछवाड़े से? जब आप इस उलझन से निकलने की कोशिश में रहते हैं कि तभी उनकी मुस्कान आपका ध्यान खींच लेती है. वे सदा मुस्काते मिलते हैं. उनका मुंह हरदम फटा-सा रहता है. बोलते कम, ‘हें, हें’ ज्यादा करते हैं. मुस्कुराते और ‘हें, हें’ करते हुए भी उनकी आंखें कतई नहीं हंसतीं. इन आंखों में सदैव एक किस्म की हिंसक आक्रामकता और चौकन्नापन बना रहता है जो सामने वाले को भी लगातार चेतावनी-सी देता है कि इस शख़्स से तनिक बचकर ही चलो तो बेहतर. पर बिस्मिलजी से बचकर चल पाना भी तो बड़ा कठिन कार्य है.

सबको ही कभी न कभी, कहीं न कहीं बिस्मिलजी की ज़रूरत आन पड़ती है. सो भला कैसे?…कोटरा से लेकर कालपी तक के समस्त सरकारी दफ्तरों में उनकी पहुंच है. अखबार के ज़रिए वे अपनी छोटी-मोटी सत्ता बनाए हैं. वे स्थानीय नेताओं के ख़ास होने का दावा भी करते हैं. तहसीलदार के मुंहलगे हैं. पटवारी की पत्नी को मुंहबोली बहिन बना रखा है. एसडीएम की पत्नी को भाभी-भाभी कहते हैं. थानेदार के घर, पीछे के दरवाजे से उनका आना-जाना होता रहता है. कोटरा की दलित तथा सवर्ण राजनीति के पोखर में वे समान गति से तैरते हैं. उनका यह तैरना किसी तैराक वाला तैरना नहीं है. वे स्थानीय राजनीति में काई जैसे तैरते हैं.

सार्वजनिक स्थान पर खड़े हों, या अकेले ही कहीं हों—बातें कर रहे हों या यूं ही खड़े-बैठे कुछ सोच रहे हों, वे अचानक ही थोड़ा-सा वक्र होकर, अपनी ही पीठ पीछे विस्फोट जैसा करते रहते हैं. अपान वायु को ऐसे सहज भाव से देश निकाला देते हैं कि देश के चल रहे अन्य कामों में कोई व्यवधान न पड़े. इस दौरान भी वे अपनी बात उसी सहजता से चलाते रहते हैं; ऐसे आगे बढ़ जाते हैं, मानो कुछ घटा ही न हो.

इधर गनेशी पान सदन से पंडिज्जी की मोटरसाइकिल निकली, उधर बिस्मिलजी दुकान पर पहुंचे. पैदल ही थे. वहीं पास ही रहते हैं. किसी क्लाइंट को कहा होगा कि अपुन वहां गनेशी पान सदन पर मिलेंगे, सो यहां आ गए हैं. क्लाइंट यहां आएगा तो उसी की मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर कालपी निकल जाएंगे. वहां अपने अखबार के दफ्तर होते हुए तहसील जाया जाएगा. जो शख़्स उन्हें लेकर जा रहा है, उसके काम की वहां कुछ सेटिंग की जाएगी. फिर वहां से और कुछ जगह. शाम या रात तक कोटरा वापस.

बिस्मिलजी आए तो दुकान पर वे ही चारों लोग अभी भी खड़े थे. बस, यूं ही. कुछ अनर्गल चर्चा चल रही थी. बतकही. फालतूफंड की बातें. समय काटा जा रहा था.

“अरे, आप बस दो मिनट पहले आए होते तो आपको पंडिज्जी भी मिल जाते.” किसी ने कहा.

“उनसे तो हम सुबह ही मिल चुके हैं भैया. …कल का अखबार नहीं देखे क्या?” बिस्मिलजी ने कहा.

गनेशी को पता है कि बिस्मिलजी कैसा पान खाते हैं. मुस्कराते हुए वह उनका पान बनाने लगा.

“देखे हैं न! हम देखे हैं. आपने तो एकदम से फ्रंट पेज पर ही जे खबर छपवा दी बिस्मिलजी, वाह.” पान बनाते हुए गनेशी लाल चौरसिया ने कहा.

कल, पंडिज्जी के चिर प्रतिद्वन्द्वी नेताजी के अपने ही आदमियों के बीच कुछ सिर-फुटव्वल हो गई थी. कौन नेताजी?…अरे, बेई, पंखीलाल कहार. नेताजी का असली नाम तो केवल तहसील के कागजों में और पुलिस की कुछ एफआईआर में दर्ज है वर्ना कोटरा में लोग उन्हें केवल नेताजी के नाम से ही जानते हैं. यहां कभी, कहीं, कोई ‘नेताजी’ शब्द उच्चारे तो उसका मतलब शेष भारत की तरह सुभाषचंद्र बोस नहीं माना जाता है—यहां नेताजी कहो तो उसका मतलब पंखीलाल कहार ही माना जाता है.

नेताजी इस इलाके में पिछड़ों और दलितों की राजनीति चलाते हैं. वैसे यह वाली राजनीति चलती तो लखनऊ से है अलबत्ता कोटरा में दलित राजनीति की जड़ों में पानी और आग में घी डालने का जिम्मेवारी वाला काम नेताजी के हवाले है. कमीनेपन और जोड़तोड़ के इस धर्मयुद्ध में उनका सीधा मुकाबला पंडिज्जी से रहता है जो सवर्णों की राजनीति भी एकदम उसी जज्बे से चलाते हैं. इलाके के लोग आज तलक तय नहीं कर सके हैं कि दोनों में से ज़्यादा हरामी कौन है?

“इत्ते बड़े अखबार के पहले पन्ने पर ख़बर छपवाना कोई ठठ्ठा समझे हो क्या चौरसियाजी?” बिस्मिलजी ने गर्व से कहा.

“बड़ी उपलब्धि है भाई. वाह बिस्मिलजी.” कोई प्रशंसापूर्वक बोला.

“आपने पूरी दुनिया में कोटरा की मशहूरी करवा दी भाई साब.” किसी और ने बिस्मिलजी को प्रशंसा भरी नज़रों से देखकर कहा.

“जे तो है. कोटरा का नाम तो खूब चमका दिये आप.” तीसरा बोला.

चौथा व्यक्ति अभी पूरा सन्तुष्ट नहीं.

“यदि घटनास्थल की फोटू भी साथ में छप गई होती तो हम और मानते.” वह बोला.

बिस्मिलजी मुस्कुराने लगे.

“कभी अखबार में हमारे बाप का राज चलने लगेगा तो फिर आपकी जे तमन्ना भी पूरी हो जाएगी.” वे बोले.

“हम तो भैया जेई मान के चलते हैं कि वहां आपका ही राज चल रहा है.” एक बोला.

बिस्मिलजी ‘हें, हें’ करके हंसने लगे.

तभी बिस्मिलजी हंसते-हंसते किंचित तिरछे होने लगे.

“इतें लंकलाट न फाड़ियो बिस्मिलजी.”

“भैया, लंकलाट बनेगा तो चिरेगा भी.” बिस्मिलजी निवृत्त होते हुए बोले.

“कछू गिरफ्तारी-फिरफ्तारी भी भई है कि ऐसेई?” पान पेश करते हुए चौरसिया जी ने पूछा.

“होगी. वो भी होगी. पंडिज्जी ऐसे ही छोड़ने देंगे क्या? लगे हैं.”

“फिर तो दरोगाजी दोनों तरफ से खेंचेंगे, क्यों बिस्मिलजी?”

“अच्छा, तुम ही बताओ—यदि तुम दरोगा होते तो ऐसे में क्या करते? …खेंचते कि ऐसेई चूतिया घांई जीप में घूमते भागते? ऐसे में भी पैसा न खेंचा तो फिर वर्दी डालना तो अकारथ ही कहाया न, है कि नहीं, बताओ?” बिस्मिलजी ने उसके फालतू प्रश्न पर ऐतराज जताया.

“जे तो खैर है.”

“…और इसमें तुमाई काय को जल रही?” किसी और को भी ऐतराज है कि दरोगा की किस्मत से रश्क क्यों किया जा रहा है?

“हमारी क्यों जलेगी? अरे, हमें भी पता है कि जो भी कुर्सी पे बैठा है सो नोटपानी तो मांगेगा ही. जमाने की जेई रीत चली आती है भाई.”

बिस्मिलजी मुस्कुराकर पान चबाते हुए विमर्श का मजा लेते रहे. फिर बिस्मिलजी ने दरोगा होने को देह धरे का दंड टाइप चीज बताते हुए कहा, “बड़ा कठिन काम है दरोगाजी का भी.”

“कठिन? वो कैसे?” किसी ने जानना चाहा.

“भौत कठिन काम है भाईसाहब. देखिए न, नेताजी तो लगे होंगे अपने आदमियन को बचावे में, और पंडिज्जी का दबाव होगा कि इनको अन्दर करो.”

“फिर?”

“दुविधा दूसरी भी होगी …” कोई और बोला.

“…कैसी दुविधा?”

“जेई कि किससे लें, किसे छोड़ें?” वह बताने लगा.

“फिर तो बड़ा ही कठिन काम है बेचारे दरोगाजी का. सच.” एक ने बनावटी सहानुभूति का स्वांग करते हुए कहा.

सब लोग हंसने लगे. बिस्मिलजी भी हंसे.

“वैसे तो चोट की जैसी रिपोर्ट डाक्टर साहब बनाएंगे वैसी ही धाराएं लगेंगी, है न?” कोई पूछने लगा.

“देखो, क्या होता है.” बिस्मिलजी बोले.

“तो डाक्टर साब भी लेंगे?” उसी नादान ने पूछा.

“क्यों न लेंगे?…पेट तो उनके भी लगाया है ईश्वर ने. वे भी लेते हैं.”

“वाह रे ईश्वर, तेरी महिमा!”

“वैसे भी, दरोगा लोग डाक्टरों को साध के ही चलते हैं.”

“सबको ठीक से न साधा जाए तो फिर कानून का राज कैसे चलेगा भाई?”

***

तभी सामने से नन्हे मास्साब आते दिखे. खद्दर का कुर्ता. उसी का पाजामा. चेहरे पर हल्की दाढ़ी. बिखरे बाल. चमड़े की चप्पल. नज़र का चश्मा.

यही रास्ता विपिन बिहारी इंटर कॉलेज तरफ जाने का भी है. पंडिज्जी के कॉलेज में नन्हे मास्साब भूगोल पढ़ाते हैं.

“कुशवाहाजी चले आ रहे हैं.” कोई बोला.

कुशवाहाजी मतलब नन्हे मास्टर.

उनका यह नाम कब पड़ा, पता नहीं. सब यहां उन्हें नन्हे मास्साब ही कहते हैं. नरेन्द्र सिंह कुशवाहा—उनका यह असली नाम प्रायः कहीं भी काम नहीं आता. पड़ा-पड़ा धूल खाता रहता है.

“ठाठ हैं…” कोई उनको आता हुआ देखकर बोला. ठाठ से यहां उसका तात्पर्य क्या है, यह उसने बताया नहीं. किसी ने उससे पूछा भी नहीं. कोटरा में ठाठ के विषय में सबका अपना-अपना दृष्टिकोण है. पता नहीं कि अभी किस बात को ठाठ माना जा रहा है?

“चूतिया हैं.” बिस्मिलजी नन्हे मास्साब की तरफ देखकर बोले.

मूर्ख मानने के भी कोटरा में अपने ही मापदंड हैं.

“बताइए! हैं तो अदने से मास्टर, पर हिम्मत देखिए कि सीधे पंडिज्जी से ही बैर लेने की ठाने हुए हैं.” बिस्मिलजी ने उन्हें चूतिया घोषित करने का अपना मापदंड बताया.

“अरे!” चौरसियाजी को आश्चर्य है कि ‘जल में रहकर मगर से बैर’ वाली कहावत नन्हे मास्टर जैसे पढ़े-लिखे आदमी ने नहीं सुनी है.

“और जे मूर्ख-शिरोमणि चाहते हैं कि हम पंडिज्जी के कॉलेज में चलने वाली नकल के बारे में अपने अखबार में छपवाएं.” बिस्मिलजी ने सबको बताया और ठठाकर हंसने भी लगे.

“जे खबर स्साली कौन छापेगा? अखबार वाले खुदई छापबे से मना कर देंगे. कॉलेज में नकल न चलेगी तो कहां चलेगी?…जे भी स्साली कोई खबर है, बताइए?…देश के सब कॉलेजों में चलती है—वैसी यहां भी तो चलेगी न?”

“नन्हे मास्साब की दिक्कत जे है कि वे आदर्शवादी हैं. सिद्धांतों की चपेट में आ गए हैं. समझ नहीं पा रहे कि क्या करें? …दुनिया बदल गई और इन सरऊ को अब तक जे बात पता ही नहीं चली है.” बिस्मिलजी और भी जोर से हंसे.

“बेचारे नन्हे मास्साब!” कोई बोला.

“पास आ रहे हैं. तनिक धीरे बोलो. नाराज हो जाएंगे.” एक बोला.

“जे तो है. बड़ी जल्दी रूठ जाते हैं श्रीमान्. हमसे भी नाराज हो रहे थे. एक दिन कागज-पत्तर का इतना बड़ा ढेर साथ लाए थे. कहने लगे कि देखिए, हम इत्ते सारे ठोस प्रमाण अपने साथ लाए हैं. अब आप अपने अखबार में इसका सब लिखो. हमने इत्ता भर कहा कि काहे आप पंडिज्जी से बैर पाल रहे हो—बस, नाराज हो गए.” बिस्मिलजी बोले.

“चूतिया हैं.”

“सिद्धांतवादी हैं.”

“एकई बात है.”

“धीरे बोलो यार. …बे आ गए.”

नन्हे मास्साब अब वहीं पहुंच गए थे.

“नमस्कार कुशवाहाजी. आइए. …पान खाएंगे?” कोई बोला.

“हम पान नहीं खाते हैं. और हमारी क्लास का टाइम भी हो गया है. हम चलेंगे.” नन्हे मास्साब ने चलते-चलते ही सबको हाथ जोड़े और चलते चले गए.

सब उन्हें जाते हुए देखते रहे. बिस्मिलजी मुस्कुराए. बाकी लोग हंसने लगे.

“हमने कहा था न? सिद्धांतवादी हैं. बताइए. कहते हैं कि पान न खाएंगे. क्यों न खाओगे यार?…पूछो तो कहेंगे कि जे तो हमारा सिद्धांत है.”

“बेचारे!”बिस्मिलजी ने कहा.

कह तो दिया पर दूर जा रहे नन्हे मास्साब को देखते हुए एक नामालूम-सा डर भी महसूस हुआ उनको. इन स्साले आदर्शवादी और सिद्धांतवादी लोगों में आखिर ऐसा क्या होता है जो खामखां भयभीत करता है? वे सोचने लगे.

“यार, जरा दो ठो पान बांध भी देना. कालपी ले जाना है.” बिस्मिलजी ने कहा.


 

पुस्तक : स्वांग

लेखक : ज्ञान चतुर्वेदी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

भाषा : हिंदी

पेपरबैक : 392 पेज


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