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सुशांत और साइंस का अनोखा रिश्ता

लाइफ में एक टाइम ऐसा आता है, जब दुनिया एकदम नई लगने लगती है. जो कुछ सीखा, वो एक टाइम पर आकर झूठा या कम लगने लगता है. फिर सबकुछ नए सिरे से समझने की शुरुआत होती है. लोग अपने-अपने ढंग से समझने की कोशिश करते हैं. कोई धर्म से समझता है. कोई फिलॉसफी से. और कोई साइंस से.

सुशांत सिंह राजपूत इस दुनिया को साइंस से समझने की कोशिश कर रहे थे. सुशांत का साइंस के साथ क्या रिश्ता था? इसका ठीक-ठाक अंदाज़ा उनके सोशल मीडिया हैंडल्स स्क्रोल करने से लग जाता है.

सुशांत का ट्विटर और इंस्टाग्राम का बायो देखिए. बायो में कम से कम शब्दों में अपने बारे में बताना होता है. सुशांत ने अपने बारे में बताते हुए लिखा है – Photon in a double-slit 💥.

अगर आप नॉन-साइंस बैकग्राउंड के हैं, तो बहुत मुमकिन है ये बात आपके ऊपर से निकल गई होगी. ये समझने के लिए आपको मॉडर्न फिज़िक्स के सबसे चर्चित हिस्से के बारे में पता होना चाहिए, जिसका नाम है – डबल-स्लिट एक्सपेरिमेंट.

डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट

डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट हमारे ‘नेचर ऑफ रियलिटी’ पर सवाल खड़ा करता है. ये साइंस के सबसे चौंकाने वाले एक्सपेरीमेंट्स में से एक था. सुशांत को क्वांटम फिज़िक्स में भी दिलचस्पी रही होगी.

क्वांटम फिज़िक्स यानी फिज़िक्स का वो हिस्सा जिसमें किसी भी चीज़ को उसके सबसे छोटे (सूक्ष्म) स्तर पर जाकर समझा जाता है.  क्वांटम फिज़िक्स अब तक की सबसे सक्सेसफुल और सबसे ज़्यादा कन्फ्यूज़िंग साइंटिफिक थ्योरीज़ में से एक है. 

डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट को डॉक्टर रिचर्ड फाइनमेन ने ‘सेंट्रल मिस्ट्री ऑफ क्वांटम’ कहा था. क्या है ये डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट? और सुशांत क्या कहना चाहते हैं?

पहली बार डबल-स्लिट एक्सपेरिमेंट आज से करीब 200 साल पहले किया गया था. इस एक्सपेरीमेंट को करने वाले वैज्ञानिक थॉमस यंग ने इससे ये साबित किया, कि रोशनी का बेसिक नेचर एक Wave यानी तरंग जैसा है.

थॉमस यंग के इस एक्सपेरिमेंट से पहले ऐसा समझा जाता था कि रोशनी कई कणों से बनी है. और रोशनी के इन कणों को ‘फोटॉन (Photon)’ कहा जाता था.

ऐसा समझा जाता था कि जैसे रेत के कण होते हैं. वैसे ही रोशनी के कण यानी फोटॉन्स हमारी आंखों पर पड़ते हैं. लेकिन थॉमस यंग ने डबल-स्लिट एक्सपेरिमेंट से ये साबित किया कि रोशनी एक तरंग जैसी है. कैसे साबित किया? बोर्ड पर बनी दो स्लिट की मदद से. स्लिट यानी एक बहुत ही संकरी सी पट्टी.
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By Lookang many thanks to Fu-Kwun Hwang and author of Easy Java Simulation = Francisco EsquembreOwn work, CC BY-SA 3.0, Link

जब य़ंग ने कार्डबोर्ड पर बनी दो संकरी पट्टियों (स्लिट्स) से रोशनी को एक स्क्रीन पर फेंका, तो उन्हें एक इंटरफेरेंस पैटर्न नज़र आया. ठीक वही पैटर्न जो स्लिट से पानी की वेव्स (लहरें) गुज़रने पर दिखता है. यंग ने रोशनी को तरंग साबित कर दिया. लेकिन कहानी यहां नहीं रुकी.

1927 में दो वैज्ञानिकों ने यही एक्सपेरिमेंट इलेक्ट्रॉन्स के साथ किया. उन्हें एक और चौंकाने वाली बात पता चली. उन्हें पता चला कि इलेक्ट्रॉन्स भी तरंगों जैसा व्यवहार कर रहे हैं.

दरअसल, इलेक्ट्रॉन्स किसी एटम (परमाणु) के अंदर पाए जाने वाले सूक्ष्म कण समझे जाते थे. लेकिन जब इलेक्ट्रॉन्स को डबल स्लिट से पार किया गया, तो वही इंटरफेरेंस पैटर्न मिला, जो तरंगों से ही मिल सकता है. इसका मतलब इलेक्ट्रॉन्स भी तरंग जैसा व्यवहार करते हैं.

Wave-particle duality.gif
By Thierry DugnolleOwn work, CC0, Link

धीरे-धीरे ये बात पता चली कि क्वांटम लेवल (बहुत ही छोटे स्तर) पर किसी चीज़ को देखा जाए, तो वो Wave(तरंग) और Particle(कण) दोनों व्यवहार एकसाथ करती है. इसे वेव-पार्टिकल डुएलिटी कहते हैं. डबल स्लिट एक्सपेरिमेंट ने क्वांटम फिज़िक्स के इस इंपॉर्टेंट कॉन्सेप्ट को जन्म दिया.

आम वैज्ञानिक समझ ये कहती रही, कि कोई चीज़ बुनियादी तौर पर या तो कण होगी, या फिर वो तरंग होगी. लेकिन क्वांटम फिज़िक्स की दुनिया इसी आम वैज्ञानिक समझ को उलट-पलट कर रख देती है. सुशांत का बायो भी ऐसा ही उल्टा-पुल्टा है. उसे आम समझ से नहीं समझा जा सकता.

सुशांत की बायो के मायने

शायद सुशांत ने Photon in a double-slit एक मेटाफर की तरह इस्तेमाल किया गया है. ये बताने के लिए कि उनकी असलियत को समझना बहुत मुश्किल है. ठीक डबल-स्लिट एक्सपेरिमेंट और वेव-पार्टिकल डुएलिटी के रहस्य की तरह. इसकी और गहराई में जाएं तो इसके दूसरे मायने भी निकल सकते हैं.

1. जब कोई फोटॉन डबल स्लिट से गुज़रता है, तो वो एक कण न रहकर एक तरंग जैसा व्यवहार करने लगता है. शायद सुशांत का बायो ऐसे ही किसी ट्रांसिशन की ओर इशारा कर रहा है.

2. एक अजीब सा फैक्ट ये भी है कि जब डबल-स्लिट से गुज़रने वाली तरंगों को किसी इंस्ट्रूमेंट के सहारे ऑव्ज़र्व (परखने) की कोशिश की जाती है तो वो एक कण जैसी दिखती हैं. मतलब उन्हें क्वांटम लेवल पर परखे जाने पर वो अपना रवैया बदल देती हैं. किसी पदार्थ का इंटरफेरेंस पैटर्न बता रहा है कि वो एक तरंग है, लेकिन जब उसे नज़दीक से परखने की कोशिश की जाती है तो वो कण जैसा पाया जाता है.

 

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By user:Geek3Own work, CC BY 3.0, Link

इन सारी कन्फ्यूज़िंग बातों के बीच सही जवाब पता कर पाना मुश्किल है. इसका मतलब कुछ भी हो सकता है. सुशांत ने ये क्या सोचकर लिखा, ये वही बता सकते थे. शायद ये बायो भी क्वांटम के इस सिद्धांत की तरह मिस्ट्री ही रहेगी.

साइंस वाली खिड़िकियां

आप में से कुछ लोगों को लग रहा होगा कि हो सकता है सुशांत ने ये ऐसे ही लिख दिया हो. इस बात में इतना साइंस लाने की और इसे इतना गहराई में एनेलाइज़ करने की ज़रूरत क्या है?

अगर आप सुशांत का इंस्टाग्राम और ट्विटर हैंडल स्क्रोल करेंगे तो शायद ऐसा नहीं कहेंगे. आप पाएंगे कि सुशांत को विज्ञान से जुड़ी बहुत सारी चीज़ों में गहरी दिलचस्पी थी. खासकर अंतरिक्ष में. सुशांत ने अपने घर पर एक एडवांस्ड टेलिस्कोप रखा हुआ था. आसमान में जो आंखों से नज़र नहीं आता, वो टेलिस्कोप से दिखता है.


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Spacetime crunch 💥💫 Thank you @siddharth_pithani for this picture ❤

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कभी सुशांत इंस्टाग्राम पर कोई फोटो डालते, जिसमें वो टेलिस्कोप से आसमान ताक रहे हैं. कभी वो अपने टेलिस्कोप से दिखी चांद की ज़ूम्ड-इन इमेज डालते, जिसके कैप्शन में इब्न-ए-इंशा की लिखी गज़ल लिखी होती. कल चौदहवी की रात थी.

 

 

 

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हम भी वहीं, मौजूद थे हम से भी सब पुछा किए हम हंस दिए, हम चुप रहे मंज़ूर था परदा तेरा कल चौदहवीं की रात थी… इस शहर में किस्से मिलें हम से तो छूटी महफिलें हर शख्स तेरा नाम ले हर शख्स दीवाना तेरा कल चौदहवीं की रात थी… कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जायें मगर जंगल तेरे, पर्वत तेरे बस्ती तेरी, सेहरा तेरा कल चौदहवीं की रात थी… कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा कल चौदहवीं की रात थी कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा, चेहरा तेरा कल… ❤️ 🌓 💫💥 A post shared by Sushant Singh Rajput (@sushantsinghrajput) on

सुशांत सिर्फ टेलिस्कोप से अंतरिक्ष नहीं ताकते थे. वो स्पेस मिशन्स, खासकर ISRO के मिशन चंद्रयान 2 को लेकर बहुत एक्साइटेड थे. उनके अकाउंट पर आपको लॉन्च से पहले की विक्रम और प्रज्ञान की फोटो दिख जाएगी.

जब चंद्रयान 2 ने चांद की सबसे नज़दीकी कक्षा में आखिरी मैन्यूवर किया तब का अपडेट दिखेगा.

स्क्रोल करते-करते आपको एक पोस्ट में चक्र जैसी घूम रही गैलेक्सी दिखेगी, जिसके बैकग्राउंड में शिव तांडव स्त्रोत बज रहा है. आपको चंद्रा एक्सरे ऑव्ज़र्वेटरी द्वारा खींची ब्लैक होल की तस्वीर दिखेगी, जिसने पिछले साल सुर्खियां बनाईं थीं.

 

 

 

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कभी सुशांत कोई ग्राफिक इमेज डालकर डार्क एनर्जी और डार्क मैटर जैसे एस्ट्रोफिज़िक्स के कॉन्सेप्ट्स डिस्कस कर रहे हैं. कभी एक सादी कॉपी के पन्ने पर लिखे कंप्यूटर कोड की फोटो डाल रहे हैं. वो कह रहे हैं कि मुझे कंप्यूटर गेमिंग पसंद है, हमेशा से उसके पीछे की लैंग्वेज सीखना चाहता था. सीखने में मज़ा आ रहा है.

 

सुशांत का दसवां सपना

सुशांत के सपनों की लिस्ट साइंस से भरी पड़ी थी.

– पॉलीनेशियन एस्ट्रोनॉमी समझना
– एक्टिव ज्वालामुखी की तस्वीर खींचना
– आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एक्सपोनेंशियल टेक्नॉलजी में काम करना
– रेस्निक हैलिडी की लिखी फिज़िक्स की किताब पढ़ना
– NASA की वर्कशॉप अटेंड करना
– बच्चों को NASA और ISRO वर्कशॉप अटेंड करने भेजना
– और CERN जाकर देखना.

CERN यानी European Organization for Nuclear Research. जहां पर लार्ज हेड्रॉन कोलाइडर से फेमस गॉड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट हुआ था. सुशांत CERN गए भी. टीशर्ट पर त्रिशूल बना हुआ था. और CERN के बाहर जो नटराज की मूर्ति लगी हुई है, उसके साथ विडियो भी बनवाया.

ऐसे ही न जाने कितने सपने पूरे किए. न जाने कितने अधूरे रह गए. लेकिन सपनों की लिस्ट में एक सपना वो भी था जिसका ज़िक्र उनकी बायो को समझते हुए आया था. डबल स्लिट एक्सपेरीमेंट. सपनों की लिस्ट में दसवें नंबर का सपना था – डबल-स्लिट एक्पेरिमेंट करके देखना है.

किसी व्यक्ति को किसी प्रोफशन में होते हुए कैसी चीज़ें आकर्षित करती हैं? ऐसे सवालों के जवाब अक्सर स्टीरियोटाइप्स की श्रेणी में आते हैं. सुशांत ऐसे तमाम स्टीरियोटाइप्स को ध्वस्त करने वाले बॉलीवुड एक्टर थे.


विडियो – सुशांत सिंह राजपूत के 50 सपने कौन-से थे, जिसे वो पूरा करने चाहते थे?

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