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इस आदमी को बचाने के लिए दिल बदलना जरूरी था, डॉक्टरों ने सूअर का लगा दिया!

गणेश जी वाली कहानी सुनी है? कैसे उनका सिर धड़ से अलग हो जाता है. फिर उनके ऊपर एक हाथी का सिर लगाया जाता है. एक स्पीच में नरेंद्र मोदी ने इसे दुनिया की पहली प्लास्टिक सर्जरी बताया था, जिसे लेकर काफी बहस भी हुई थी.

अचानक ये कहानी और बहस क्यों याद आ गई? क्योंकि एक खबर आई है. ऑपरेशन से जुड़ी. कहानी, बहस और खबर, इन तीनों में एक बात कॉमन है. किसी जानवर के अंग को मनुष्य के शरीर में फिट करने की बात. खबर है-

अमेरिका के सर्जन्स ने एक इंसान के अंदर सूअर का दिल लगा दिया. एक ह्यूमन बॉडी में पिग हार्ट ट्रांसप्लांट कर दिया.

सोशल मीडिया पर इस खबर को बहुत हल्के में लिया गया. हीहीहीही, खीखीखीखी, कितनी फनी न्यूज़ है. इंसान के अंदर सूअर का दिल लगा दिया. नया मीम कॉन्टेंट मिल गया. इसका स्क्रीनशॉट ले लो. सब अपने बेवफा बॉयफ्रेंड/गर्लफ्रेंड को टैग कर दो.

अरे, ज़रा ठहरो!

किसी दूसरे जानवर का अंग इंसान में ट्रांसप्लांट करना आसान काम नहीं है. इसे मेडिकल साइंस के लिए एक बड़ा स्टेप बताया जा रहा है. ये ऑपरेशन कैसे किया गया? पहले ये मुश्किल क्यों था? अब क्या बदल गया है? पूरी कहानी क्या है? ये सब बातें डीटेल में जानेंगे.

दिल दा मामला है

अमेरिका का एक हॉस्पिटल. यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड मेडिकल सेंटर. यहां पिछले कुछ दिनों से एक मरीज़ बिस्तर पर लेटा हुआ है. 57 साल के इस मरीज़ का नाम है डेविड बेनेट.

बेनेट को एक टर्मिनल हार्ट डिसीज़ था. हृदय की गंभीर बीमारी. इनका दिल काम करने लायक नहीं रह गया था. इसलिए हार्ट ट्रांसप्लांट कराना ज़रूरी था. ट्रांसप्लांट यानी एक इंसान के अंदर किसी दूसरे अंग लगाना. लेकिन यहां एक दिक्कत थी. कई जांच के बाद पता चला कि बेनेट को किसी इंसान का दिल नहीं लगाया जा सकता.

अब बेनेट के पास दो ही ऑप्शन थे. या तो मौत का इंतज़ार करें. या अपने ऊपर एक एक्सपेरिमेंट होने दें और किसी दूसरे जानवर का दिल लगावा लें. बेनेट ने दूसरा रास्ता चुना. उन्होंने डॉक्टर्स को अपने अंदर एक सूअर का दिल लगाने की परमिशन दे दी.

PIG HEART
अस्पताल में बेटे और डॉक्टर के साथ डेविड बेनेट.

किसी इंसान में दूसरे जानवर के अंग लगाना आसान काम नहीं है. इस तरह के ट्रांसप्लांट को ज़ेनोट्रांसप्लांट (Xenotransplant) कहते हैं. पहले भी इस तरह के कई प्रयास किए गए हैं. लेकिन निराशा ही हाथ लगी है. इससे जुड़ा एक चर्चित केस है.

एक दुर्घटना

साल 1984 में अमेरिका के कैलिफॉर्निया में एक बच्ची का जन्म हुआ. इसे ‘बेबी फे’ नाम से जाना गया. ये बच्ची एक सीरियस हार्ट डिफेक्ट के साथ जन्मी थी. उसके दिल का लेफ्ट हिस्सा पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था. इस केस में बच्चे आमतौर पर दो हफ्ते ही ज़िंदा रह पाते हैं.

इसी बीच लियोनर्ड बेली नाम के एक डॉक्टर सामने आए. डॉ. बेली ने इस बच्ची के अंदर एक बबून का दिल लगाने का सुझाव दिया. बबून बंदर जैसी दिखने वाली एक प्रजाति है. बच्ची की मां इस ऑपरेशन के लिए तैयार हो गई.

डॉ. बेली ने बच्ची में बबून हार्ट ट्रांसप्लांट कर दिया. इस बबून का दिल बेबी फे के अंदर धड़कने लगा. और इसे एक बड़ी सफलता माना गया. इस ऑपरेशन ने दुनियाभर की मीडिया का ध्यान खींच लिया.

लेकिन कुछ दिनों बाद बेबी फे की हालत बिगड़ने लगी. ट्रांसप्लांट के 21 दिन बाद उसकी मौत हो गई. और इस चर्चित केस के बाद ये मेडिकल प्रैक्टिस लगभग गायब होने लगी.

ऐसे ऑपरेशन कभी सक्सेसफुल क्यों नहीं हो पाए? क्योंकि हमारा इंसानी शरीर आसानी से दूसरे अंग को नहीं अपनाता. वो इसे रिजेक्ट कर देता है. इसके पीछे एक बड़ा कारण है ह्यूमन इम्यून रिस्पॉन्स.

जिस्म के रखवाले

इम्यून सिस्टम यानी हमारे शरीर का सिक्योरिटी सिस्टम. जब हमारे शरीर को लगता है कि कोई घुसपैठ हुई है तो अपना इम्यून रिस्पॉन्स एक्टिवेट हो जाता है.

यही वो सिस्टम है जो किसी वायरस या बैक्टीरिया के घुसने पर उसे मार गिराता है. सोचिए, जो सिक्योरिटी सिस्टम छोटे-छोटे वायरस-बैक्टीरिया को नहीं घुसने देता, वो किसी दूसरे का बॉडी पार्ट कैसे स्वीकार कर लेगा?

जब शरीर में कोई दूसरा अंग लगाया जाता है तो बॉडी में खलबली मच जाती है. इम्यून सिस्टम को लगता है कि सिक्योरिटी ब्रीच हो गई है. हमारे इस सिक्योरिटी सिस्टम के जवान मौके पर पहुंचकर उस नए अंग के ऊपर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाने लगते हैं. और इस डेंजरस इम्यून रिस्पॉन्स के कारण इंसानी शरीर नए बॉडी पार्ट को रिजेक्ट कर देता है.

इम्यून रिस्पॉन्स और दूसरे रिस्क के चलते ऐसे ट्रांसप्लांट नहीं किए जाते. लेकिन मैरिलैंड यूनिवर्सिटी के डॉक्टर्स ने अनोखा तरीका अपनाया. Let’s skip to the good part…

जब दिल न लगे दिलदार

साल 2022 में लौटते हैं. डेविड बेनेट के शरीर में सूअर का दिल लगाया जाना है. लेकिन इस ट्रांसप्लांट के लिए सूअर को ही क्यों चुना गया?  क्योंकि सूअर का दिल और मनुष्य का दिल आकार में लगभग एक जैसे होते हैं.

आपने सुना होगा हम मनुष्यों के दिल में चार वॉल्व होते हैं. ये वॉल्व खून का फ्लो बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. कुछ लोगों में ये हार्ट वॉल्व डैमेज हो जाते हैं. ऐसे केस में सूअर के हार्ट वॉल्व मनुष्यों के दिल में लगाए जाते हैं. ये प्रैक्टिस तो कई दशकों से चली आ रही है. लेकिन कभी पूरा का पूरा दिल सफलतापूर्वक रिप्लेस नहीं किया गया. इसलिए इस सर्जरी ने सबका ध्यान खींच रखा है.

इस सर्जरी के लिए सूअर को लैब में तैयार किया गया है. यही सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है. ये कोई साधारण सूअर नहीं है. ये एक जेनेटिकली-मॉडिफाइड पिग है. इसके जीन्स में छेड़छाड़ करके इसे ट्रांसप्लांट के लिए तैयार किया गया है. इसका क्या मतलब हुआ?

हर जीव-जंतु का एक बुनियादी जेनेटिक कोड होता है, जिसे जीनोम या DNA कहते हैं. हर जानवर की छोटी से छोटी डीटेल इसी जेनेटिक कोड से तय होती है. पिछले कुछ सालों में जेनेटिक इंजीनियरिंग या जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी ने खूब तरक्की की है. इस टेक्नोलॉजी के ज़रिए जेनेटिक कोड में बदलाव किए जा सकते हैं. मतलब किसी लैब में अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जानवरों को डिज़ाइन किया जा सकता है.

जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से एक सूअर के DNA में बदलाव किए गए. उसे ऐसे डिज़ाइन किया गया कि मनुष्य के शरीर में सूअर का दिल लगाने पर कोई विरोध न आए. ये जेनेटिकली-मॉडिफाइड पिग बनाने वाली कंपनी का नाम है रिवाइविकोर (Revivicor). रिवाइविकोर ऐसे कई सूअर पैदा कर रही है.

इस हार्ट ट्रांसप्लांट वाले पिग के लगभग 10 जीन्स चेंज किए गए. ताकि ये हार्ट ट्रांस्प्लांट के लिए सूटेबल हो. ये कौन-कौन से जीन्स थे?

– तीन जीन्स, जो मनुष्यों के अंदर इम्यून रिस्पॉन्स एक्टिवेट करते हैं, उन्हें हटा दिया गया.
– छह ऐसे जीन्स जोड़े गए, जिससे मनुष्य का शरीर आसानी से सूअर का दिल एक्सेप्ट कर ले.
– और एक ऐसे जीन को डीएक्टिवेट कर दिया गया, जिससे दिल का आकार बढ़ने लगता है.

इन सबके बावजूद मरीज़ को कुछ एक्सपेरिमेंटल दवाएं दी जा रही हैं. ये दवाएं भी मरीज़ के इम्यून रिस्पॉन्स को नियंत्रित रखने के लिए हैं.

दिल लगा लिया

ऐसी सर्जरी कोई नॉर्मल मेडिकल प्रैक्टिस नहीं है. ये एक तरह का एक्सपेरिमेंट है. इस तरह के प्रयोग करने से पहले अमेरिका में एक संस्था से परमिशन लेनी पड़ती है. फूड एंड ड्रग एड्मिनिस्ट्रेशन. FDA.

FDA ने 31 दिसंबर 2021 की शाम को ‘कंपेशनेट यूज़’ के तहत इस सर्जरी की इजाज़त दे दी. इस तरह का इमरजेंसी ऑथराइज़ेशन तभी दिया जाता है, जब मरीज़ का जीवन खतरे में हो और कोई ऑप्शन न बचा हो.

7 जनवरी 2022 को मैरिलैंड के डॉक्टर्स की टीम ने इस सर्जरी को अंजाम दिया. और 10 जनवरी को इसकी आंशिक सफलता की घोषणा की गई. ये काम अभी पूरा नहीं हुआ है. आने वाले दिन मरीज़ डेविड बेनेट के लिए क्रूशियल हैं.

अगले कुछ दिनों तक बेनेट को कायदे से स्टडी किया जाएगा. डॉक्टर बार्टले ग्रिफिथ ने इस सर्जरी का नेतृत्व किया. उन्होंने बताया,

‘हम रोज़ इस आदमी के साथ बहुत कुछ सीख रहे हैं. और अब तक हम अपने फैसले से खुश हैं.’

इस सर्जरी का डेटा और रिज़ल्ट भविष्य के ऐसे ऑपरेशन्स के लिए मददगार साबित होंगे. इसकी मदद से आगे भी ऐसे ट्रांसप्लांट किए जा सकेंगे.

Hospital
डॉक्टर बार्टले ग्रिफिथ.

हर साल ऐसे कई केस आते हैं, जब मरीज़ को किसी दूसरे से ऑर्गन चाहिए होते हैं. लेकिन बहुत कम इंसान अपने अंग डोनेट करते हैं. इसकी वजह से ट्रांसप्लांट के लिए ह्यूमन ऑर्गन्स की भारी कमी होती है. ट्रांसप्लांट के लिए अंग न मिलने की वजह से हर साल हज़ारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है. अगर ये ज़ेनोट्रांसप्लांट सफल होते हैं, तो ऐसे बहुत सारे लोगों की जान बच जाएगी.

इंसानों की तो जान बच जाएगी, लेकिन उन जानवरों का क्या, जिनकी कीमत पर ये हो रहा है. एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट इस सर्जरी के एथिक्स पर सवाल खड़े कर रहे हैं. इस ट्रांसप्लांट की सफलता जानवरों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ है. यूके की एक संस्था ने इसके विरोध में कहा है-

सभी जानवरों को अपना जीवन जीने का अधिकार है, बिना किसी जेनेटिक छेड़छाड़ के, जो उन्हें सिर्फ पीड़ा और ट्रॉमा में डाल देती है, और वो भी इसलिए कि एक दिन उनकी हत्या करने के बाद उनके अंग निकाल लिए जाएं.

किसी दूसरे जानवर की कीमत पर इंसान की जान बचाना कितना सही है? आपकी इस बारे में क्या राय है? हमें कॉमेंट सेक्शन में बताइए.


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