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सुरेश चव्हाणके को हौंकते हुए सुप्रीम कोर्ट ने और किस-किसकी क्लास लगा दी

‘बिंदास बोल’. ये सुदर्शन न्यूज़ चैनल का प्रोग्राम है. ‘यूपीएससी जिहाद’ पर इस कार्यक्रम के दो एपिसोड आए. अब सुप्रीम कोर्ट ने इससे जुड़े बाकी के एपिसोड पर रोक लगा दी है. क्यों? क्योंकि शुरुआती तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने पाया है कि इस प्रोग्राम का मकसद मुस्लिमों की गलत छवि पेश करना है. कब तक रहेगी रोक? जब तक इस केस में सुनवाई पूरी नहीं हो जाती और कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आ जाता.

ये फैसला जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच ने एडवोकेट फिरोज़ इकबाल खान की याचिका पर दिया. एडवोकेट फिरोज़ ने एयर हुए एपिसोड्स की ट्रांसक्रिप्ट कोर्ट में जमा की थी. इसकी स्टडी करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला दिया.

क्या है इस प्रोग्राम में

25 अगस्त को सुदर्शन न्यूज़ टीवी के एडिटर इन चीफ सुरेश चव्हाणके ने शो का प्रोमो जारी किया था. इसमें दावा किया गया कि नौकरशाही में मुस्लिमों की घुसपैठ का पर्दाफाश किया जाएगा. इसके साथ ‘यूपीएससी जिहाद’, ‘नौकरशाही जिहाद’ जैसे हैशटैग्स का भी इस्तेमाल किया.

शो का प्रोमो रिलीज़ होने के बाद आईपीएस एसोसिएशन और इंडियन पुलिस फाउंडेशन ने इस प्रोग्राम की निंदा की थी. पुलिस फाउंडेशन ने ट्वीट में लिखा था, “ये विशुद्ध ज़हर है, इसलिए हम इसे रीट्वीट करने से भी बच रहे हैं.”

कई और आईपीएस और आईएएस अधिकारियों ने इस कार्यक्रम को नफरत फैलाने वाला बताया था. हालांकि, 28 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्यक्रम पर टेलीकास्ट से पहले बैन लगाने से इनकार कर दिया था. अब कार्यक्रम के दो एपिसोड की ट्रांसक्रिप्ट देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस प्रोग्राम में कुछ ऐसे दावे किए गए, जो फैक्चुअली गलत थे. जैसे- यूपीएससी परीक्षा में मुस्लिम उम्मीदवारों की अधिकतम आयु-सीमा और वो कितनी बार इस परीक्षा में शामिल हो सकते हैं, इससे जुड़े दावे गलत पाए गए.

तो रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

‘बार एंड बेंच’ वेबसाइट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा- 

“कोर्ट को लगता है कि प्रोग्राम का मकसद मुस्लिमों को बदनाम करना और उनको सिविल सर्विसेज़ में छल-कपट से घुसपैठ का ज़िम्मेदार साबित करना है. लोकतंत्र का मूल है कि सभी समुदाय एकसाथ मिल-जुलकर रहें. ऐसे में किसी एक धर्म को बदनाम करने की कोशिश का समर्थन नहीं किया जा सकता है.”

सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम को लेकर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा- 

“एंकर की शिकायत है कि एक समूह विशेष को सिविल सर्विसेज़ में एंट्री मिल रही है. यह कितना कपटपूर्ण है. इन आरोपों का कोई आधार नहीं है. इसकी अनुमति कैसे दी जा सकती है? क्या एक स्वतंत्र समाज में ऐसे कार्यक्रम दिखाए जा सकते हैं?”

कोर्ट ने फैसला दिया कि अगले आदेश तक सुदर्शन न्यूज़ अपने शो के बचे हुए एपिसोड का प्रसारण नहीं कर सकता है. नाम बदलकर भी प्रसारण करने पर रोक रहेगी.  

कोर्ट के फैसले का जब सुदर्शन टीवी के वकील श्याम दीवान ने विरोध किया, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

“जब आप ये कहते हैं कि सिविल सर्विसेज़ में घुसपैठ करने वाले ग्रुप में जामिया मिल्लिया इस्लामिया से जुड़े स्टूडेंट्स भी शामिल हैं, तो हम ये बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. न ही आप ये कह सकते हैं कि एक पत्रकार को ऐसा कहने की पूरी आज़ादी है.”

लेकिन कोर्ट का असली गुस्सा फूटा ब्रॉडकास्ट की दुनिया के ज़िम्मेदारों पर. कोर्ट ने सबको खरी-खरी सुनाई.

इस सुनवाई में न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स असोसिएशन (NBA) की तरफ से एडवोकेट निशा भंभानी पेश हुई थीं. उनसे जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूछा-

“हमें आपसे पूछना होगा कि क्या आप अपने लेटरहेड के इतर भी एग्ज़िस्ट करते हैं? तब आप क्या करते हैं, जब मीडिया में एक पैरलल इन्वेस्टिगेशन चल रहा होता है और लोगों की इमेज को तार-तार किया जा रहा होता है?”

‘बार एंड बेंच’ के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया पर भी गंभीर टिप्पणी की. प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की तरफ से जब कहा गया कि उनकी एक फुली फंक्शनल बॉडी है और तय रेगुलेशंस हैं, तब जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा-

“सच में? अगर चीज़ें इतनी ही सिंपल होतीं, तो हमें वो सब न देखना पड़ता, जो हम टीवी पर हर दिन देखते हैं.”

इसके बाद आई केंद्र सरकार की बारी.

सुदर्शन टीवी के वकील श्याम दीवान ने कोर्ट में कहा कि अदालत के 28 अगस्त के फैसले के बाद कुछ भी नहीं बदला है. श्याम दीवान ने कोर्ट में कहा कि 9 सितंबर को केंद्र सरकार ने कार्यक्रम टेलीकास्ट करने के आदेश दिए. ‘बार एंड बेंच’ के मुताबिक, इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सवाल किया कि 11 और 14 सितंबर को जो एपिसोड एयर हुए, उन्हें अनुमति देते वक्त सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने ‘दिमाग का इस्तेमाल’ किया था?

इसके बाद कोर्ट ने केंद्र, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स असोसिएशन और सुदर्शन न्यूज़ को नोटिस दिया.

इसके साथ ही कोर्ट ने तीन बातें दो टूक कहीं

1. दुनिया में कहीं भी प्रेस को अमेरिका जितनी आज़ादी नहीं है. भारत में देश की जनता को मिलने वाली आज़ादी के आधार पर प्रेस की आज़ादी तय होती है.

2. फायदे के लिए नफरत फैलाने का मॉडल यहां काम नहीं करेगा. सुप्रीम कोर्ट के रेगुलेशन से इसके लिए कड़े कदम उठाएंगे.

3. ये आज़ादी के लिए अच्छा नहीं है. लेकिन ये भी सच है कि मीडिया ने हद पार की है और कोर्ट ये बर्दाशत नहीं करेगा.

न्यूज़ चैनलों के रेवेन्यू मॉडल पर बात करते हुए जस्टिस जोसेफ ने कहा-

हमें विज़ुअल मीडिया की ओनरशिप पर भी गौर करने की ज़रूरत है. कंपनी का पूरा शेयरहोल्डिंग पैटर्न उनकी वेबसाइट पर होना चाहिए, ताकि पब्लिक देख सके. कंपनी के रेवेन्यू मॉडल पर भी नज़र रखनी चाहिए, ताकि ये देखा जा सके कि कहीं सरकार एक चैनल को ज्यादा और दूसरे को कम ऐड तो नहीं दे रही.”

फैसला सुनाते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने ये भी कहा कि वो पांच नागरिकों की एक ऐसी कमिटी बनाने पर भी विचार कर रहे हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए कुछ स्टैंडर्ड तय कर सके. ‘बार एंड बेंच’ के मुताबिक, जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि वो एडवोकेट श्याम दीवान को इस कमिटी में रखने पर विचार कर रहे थे. लेकिन वो सुदर्शन टीवी के लिए पेश हो रहे हैं, ऐसे में उन्हें इस कमिटी में रखने का सवाल ही खत्म हो गया.

एक को रेगुलेट नहीं कर सकते, इसका ये मतलब नहीं कि किसी को नहीं करेंगे

सुनवाई के दौरान जस्टिस जोसेफ ने टीवी डिबेट्स को लेकर टिप्पणी की. कहा कि ये देखा जाना चाहिए कि एंकर डिबेट्स में कैसा बर्ताव करते हैं, वो सुनते हैं या खुद ही बोल रहे होते हैं. कई बार देखा गया है कि स्पीकर को म्यूट करके एंकर सवाल पूछते हैं. इसी बात को आगे बढ़ाते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पावर बहुत अधिक है. इससे किसी समुदाय या समूह को आसानी से टारगेट किया जा सकता है.”

इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पत्रकारों की आज़ादी की बात की. साथ ही कहा कि इलेक्ट्रॉनिक के साथ-साथ एक पैरलल मीडिया चल रहा है, जिसमें एक पत्रकार अपने लैपटॉप से कॉन्टेंट जनरेट करके लाखों व्यूवर खींच सकता है. उन्होंने वेबसाइट्स की ओनरशिप और रेगुलेशन को लेकर भी बात की. इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा,

“हम इस वक्त सोशल मीडिया पर बात नहीं कर रहे हैं. हम मीडिया के सभी प्लैटफॉर्म्स को रेगुलेट नहीं कर सकते, इसका ये मतलब नहीं है कि जिसे रेगुलेट करना है, उसे भी न करें.”

और इस तरह इस्लामोफ़ोबिक कार्यक्रम ‘यूपीएससी जिहाद’ पर भारतीय न्यायपालिका की तरफ़ से फिलहाल रोक लग गई.


जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया

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