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इंश्योरेंस क्लेम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया, वो दूर तक असर डालेगा

सुप्रीम कोर्ट ने एक्सिडेंट में हुई मौत के मामले में मुआवजे को लेकर इंश्योरेंश कंपनी के खिलाफ एक बड़ा फैसला सुनाया है. यह फैसला उन लोगों के लिए राहत भरी खबर लेकर आया है, जो एक्सिडेंट के मामले में इंश्योरेंश कंपनी से नाकाफी क्लेम मिलने की शिकायतें लगातार करते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि इंश्योरेंस कंपनी क्लेम देते वक्त मृतक की न सिर्फ मौजूदा आमदनी का ध्यान रखे, बल्कि भविष्य में होने वाली संभावित आमदनी को भी जोड़कर मुआवजा दे.

क्या है मामला

मामला 18 जून, 2007 का है. उत्तराखंड के बनबसा थाने में टैक्सी का बिजनेस करने वाले हरीश आर्या अपने चाचा के साथ कहीं जा रहे थे. रास्ते में टनकपुर-खटीमा हाइवे पर गाड़ी रोक कर जैसे ही वो उतरे, गलत साइड से आ रहे टाटा सूमो ने उन्हें टक्कर मार दी. हरीश को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी मौत हो गई. उनके चाचा के बयान के आधार पर केस दर्ज किया गया. हल्द्वानी जिला अदालत में मोटर व्हीकल क्लेम ट्रिब्यूनल ने इंश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया कि वह हरीश के परिजनों को 12 लाख, 55 हजार रुपये मुआवजे का भुगतान करे.

घटना में शामिल वाहन का इंश्योरेंस कवर करने वाली कंपनी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दे दी. हाई कोर्ट ने हरीश की सालाना आमदनी एक लाख से घटाकर सिर्फ 52 हजार रुपये माना और मुआवजा राशि कम करके 5 लाख 81 हजार रुपये तय कर दी. इस फैसले को मृतक के परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

आखिरी इनकम टैक्स रिटर्न बना फैसले का आधार

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि उत्तराखंड हाई कोर्ट ने मृतक के आखिरी इनकम टैक्स रिटर्न पर विचार न करके गलती की है. यह इनकम टैक्स रिटर्न मृतक ने मरने से पहले दाखिल किया था और उसमें आमदनी तकरीबन एक लाख रुपये सालाना बताई गई थी. हाई कोर्ट ने फैसला देते वक्त उससे पहले के तीन आईटी रिटर्न का औसत 52,635 रुपये को आधार बनाते हुए मृतक की सालाना इनकम को गिना था. वहीं निचली अदालत ने भी आखिरी आईटी रिटर्न 2006-07 की आमदनी 98,500 रुपये को माना, लेकिन निचली अदालत ने भविष्य की आमदनी को उसमें नहीं जोड़ा था.

कोर्ट बोला- मुआवजा बढ़ाने से ही असली न्याय मिलेगा

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अगुवाई वाली बेंच ने फैसले सुनाते हुए कहा कि एक्सिडेंट में हरीश की मौत 18 जून, 2007 को हुई थी, उस वक्त वह 35 साल का था. उसकी पत्नी, बच्चे और पैरेंट्स उस पर निर्भर थे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने सालाना तकरीबन एक लाख रुपये आमदनी के हिसाब से आकलन कर कुल मुआवजा 12 लाख 55 हजार तय किया, जिसमें भविष्य की आमदनी का जिक्र नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसा संवैधानिक बेंच के जजमेंट में जरूरी है कि मौजूदा आमदनी में भविष्य की संभावित आमदनी भी जोड़ा जाएगा. इस तरह मौजूदा सालाना आमदनी एक लाख में हम 40 फीसदी संभावित भविष्य की आमदनी जोड़ते हैं. चूंकि पांच लोग मृतक पर आश्रित थे, इस तरह उसकी आमदनी का एक-चौथाई उसके खुद पर खर्च मानते हैं और 16 साल तक की आमदनी का आकलन करते हुए यह रकम 16,80000 रुपये आता है. इसमें दूसरे खर्चे जोड़ने पर कुल मुआवजे की रकम 17 लाख 50 हजार होती है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम अनुच्छेद-142 के तहत मिले विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए इंश्योरेंस कंपनी को निर्देश देते हैं कि वह मृतक के परिजनों को 12 हफ्ते में 17 लाख 50 हजार रुपये मुआवजे का भुगतान करें और अर्जी दाखिल करने की तारीख से लेकर भुगतान की तारीख का साढ़े सात फीसदी ब्याज का भी भुगतान करें. अदालत ने कहा कि विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए मुआवजा बढ़ाना जरूरी है, तभी संपूर्ण न्याय सुनिश्चित होगा. साल 2017 में भी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की संविधान पीठ ने ऐसी ही व्यवस्था दी थी.

आगे मिलने वाले मुआवजों पर भी पड़ेगा अच्छा असर

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता का कहना है कि यह फैसला स्वागत योग्य है और इससे पीड़ितों में बड़ी इंश्योरेंश कंपनियों के खिलाफ खड़े होने का हौसला बढे़गा. लेकिन कोर्ट को उन इंश्योरेंश कंपनियों पर पेनाल्टी का भी प्रावधान करना चाहिए, जो क्लेम लटकाए रखने के लिए बरसों कानूनी पैंतरेबाजी करती हैं.

दिल्ली हाईकोर्ट के वकील नवीन शर्मा का कहना है कि इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. अब तक इंश्योरेंस कंपनियां छोटा-मोटा मुआवजा देकर बच निकलती थीं, लेकिन इस फैसले के बाद बड़े क्लेम मिलने का रास्ता खुल जाएगा.

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