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पुरी रथयात्रा शुरू होने से चंद घंटे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इजाज़त दी, लेकिन बड़ी शर्त के साथ

देश के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन में से एक पुरी रथयात्रा इस साल भी निकाली जाएगी. तय दिन यानी 23 जून को ही. सुप्रीम कोर्ट ने कोविड-19 के चलते यात्रा पर रोक लगाई थी. इस रोक को अब कोर्ट ने ही हटा दिया है. वो भी यात्रा शुरू होने से करीब 12 घंटे से भी कम समय पहले. यानी 22 जून की शाम को.

इस मामले की सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) एसए बोबडे ने तीन जजों की बेंच गठित की थी. बेंच में सीजेआई एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी शामिल रहे. इसी बेंच ने रोक हटाने के लिए लगी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यात्रा को अनुमति दे दी, लेकिन कुछ शर्तों के साथ. इनमें सबसे बड़ी शर्त है कि यात्रा में आम भक्त शामिल नहीं होंगे, पब्लिक शामिल नहीं होगी.

चलिए फिर, इस अदालती मैटर से लेकर पुरी रथयात्रा की अहमियत तक सारी बातें जानते हैं.

मामला कोर्ट क्यों पहुंचा?

दरअसल रथयात्रा का धार्मिक आयोजन हर साल होता है. बड़ी भीड़ जुटती है. इस साल जब कोविड की वजह से सभी तरह की मास गैदरिंग बैन है, तो सुप्रीम कोर्ट ने 18 जून को एक फैसले में यात्रा पर भी रोक लगा दी. इसी रोक को हटाने के लिए 16 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुईं. कहा गया कि पुरी रथयात्रा 1737 से लगातार हर साल निकाली जा रही है. यानी 284 साल से लगातार. इस साल भी कुछ व्यवस्थाएं करके इस परंपरा को टूटने से बचाया जाना चाहिए. इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई हुई और अब कोर्ट ने फैसला बदल दिया है.

पुरी रथयात्रा है क्या?

ओडिशा का शहर पुरी. हिंदू मान्यताओं में ख़ास स्थान रखने वाले चार धामों में से एक है. यहां के जगन्नाथ मंदिर से हर साल रथयात्रा निकलती है. हिंदी तिथि के मुताबिक, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को. अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से जून अंत में. रथयात्रा में भगवान कृष्ण, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा को तीन अलग-अलग रथों पर बैठाकर जगन्नाथ मंदिर से गुंडिच्चा मंदिर ले जाया जाता है.

लकड़ी के बने बेहद विशाल और भव्य रथों को भक्त ही खींचते हैं. करीब 10 लाख लोग हर साल पुरी रथयात्रा का हिस्सा बनने के लिए जुटते हैं. देश से और विदेश से भी.

किस पौराणिक मान्यता से यात्रा निकाली जाती है?

रथयात्रा के पीछे के कारण को लेकर तमाम मान्यताएं हैं. इनमें से दो जो सबसे ज़्यादा कही-सुनी जाती हैं, उनका ज़िक्र करते हैं.

पहली मान्यता – ऐसा माना जाता है कि गुंडिच्चा मंदिर कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की मौसी का घर है. साल में एक बार जैसे हम-आप छुट्टियां मनाने के लिए नानी-मौसी के घर जाते हैं, वैसे ही भगवान भी. रथयात्रा वही मौका होता है, जब तीनों अपने घर से मौसी के घर जाते हैं.

दूसरी मान्यता – भगवान कृष्ण और बलराम के मामा कंस ने उन्हें मथुरा आमंत्रित किया. कंस के इरादे ग़लत थे और वे कृष्ण को मारना चाहते थे. कंस ने अक्रूर को रथ के साथ गोकुल भेजा. भगवान कृष्ण और बलराम रथ पर बैठे और मथुरा के लिए रवाना हो गए. प्रस्थान के इसी दिन को पुरी के भक्त रथ यात्रा के रूप में मनाते हैं.

भाई-बहन की साथ में मूर्ति क्यों?

एक बार कृष्ण की पत्नियों ने मां रोहिणी से ज़िद कर ली कि कृष्ण की रासलीला के किस्से सुनाइए. किस्से शुरू हुए. सुभद्रा से कहा गया कि दरवाजे पर पहरा दें, ताकि कोई और न सुन ले. तभी कृष्ण और बलराम वहां आ गए. सुभद्रा ने उन्हें दरवाजे पर ही रोक लिया. तीनों साथ खड़े ही थे कि नारद मुनि वहां आ गए. उन्हें तीनों भाई-बहन का यूं साथ खड़े होना इतना आकर्षक लगा कि उन्हें यूं ही देखने का आशीर्वाद मांग लिया. तबसे दर्शन के लिए तीनों भाई-बहन यूं ही जगन्नाथ मंदिर में स्थापित हैं.

कोर्ट में रथ यात्रा को लेकर क्या-क्या बात हुई?

# सबसे बड़ी बात – No Public participation. कोर्ट ने फैसले में यही कहा है. यानी यात्रा में आम भक्तों की शिरकत बैन रहेगी. मंदिर कमेटी के लोग, पुजारी और व्यवस्था में लगे लोग ही रहेंगे.

# सिर्फ वही सेवायत और पंडा रथ यात्रा में हिस्सा लेंगे, जो कोविड नेगेटिव हों.

# केंद्र और ओडिशा सरकार रथ यात्रा कराने के ही पक्ष में थी. हालांकि दोनों ने ही भक्तों की शिरकत के बिना यात्रा की वकालत की.

# केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि लोगों की आस्था का सवाल है. यात्रा सैकड़ों साल से जारी है. अगर भगवान इस बार घर से नहीं निकले, तो मान्यता के मुताबिक वे 12 साल घर से नहीं निकल पाएंगे.

जब कोर्ट ने अपने पिछले फैसले में यात्रा पर रोक लगाई थी, तो कहा था कि अगर इस माहौल (कोविड) में भी यात्रा की अनुमति दी, तो भगवान जगन्नाथ क्षमा नहीं करेंगे. अब अनुमति दे दी गई है. इस भरोसे के साथ कि भक्त संयम रखेंगे. भगवान को मौसी के घर छोड़कर आएंगे..लेकिन दो गज दूरी के साथ.


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