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राजद्रोह पर सुप्रीम कोर्ट ने महात्मा गांधी और तिलक का नाम लेकर मोदी सरकार से क्या पूछ लिया?

एक बढ़ई को लकड़ी का आइटम बनाने के लिए आरी दी गई. लेकिन आरी से उसने एक पेड़ काटने के बजाय पूरे जंगल को साफ कर दिया. यहां आरी का मतलब राजद्रोह वाला कानून समझिए. और बढ़ई का मतलब वो सरकारें जिन्होंने इतिहास में राजद्रोह कानून का इस्तेमाल आरी की तरह किया. राजद्रोह वाले कानून पर बढ़ई और आरी वाली ये टिप्पणी आज सुप्रीम कोर्ट से आई है. एक बार फिर कोर्ट में राजद्रोह वाले कानून की ज़रूरत और इस्तेमाल पर सवाल उठे. एक बार फिर सरकार से पूछा गया कि आप ये कानून खत्म क्यों नहीं कर देते.

जब सुप्रीम कोर्ट राजद्रोह कानून पर इस तरह की टिप्पणियां हो रही थी, तभी एक खबर हरियाणा से भी आई. हरियाणा में पुलिस ने 100 किसानों पर राजद्रोह का मुकदमा लगा दिया है. क्योंकि उन्होंने बीजेपी नेता रणबीर गंगवा की कार का घेराव किया था, उसमें तोड़फोड़ की थी. ये घटना 11 जुलाई की है. उसी दिन राजद्रोह वाला केस भी लगा दिया था. खबर आज बाहर आई. अब ये समझ नहीं आता कि बीजेपी या किसी भी और पार्टी के नेता पर हमला राजद्रोह या देशद्रोह कैसे हो सकता है. किसी नेता की गाड़ी में तोड़फोड़ करना, हिंसा करना कानूनी जुर्म तो हो सकता है, लेकिन क्या इसे राजद्रोह की श्रेणी में गिना जा सकता है, इस पर सवाल हैं.

Farmers Protest
किसान आंदोलन की एक तस्वीर. (फोटो- PTI)

हमें कितने ही ऐसे मामले मिल जाएंगे जिनमें सरकारों के विरोध को भी देशद्रोह बता दिया जाता है. किसान कानूनों के विरोध करने वालों पर राजद्रोह लगा दिया जाता है. सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों पर राजद्रोह कानून लगा दिया जाता है. हर महीने-दो महीने से हमें राजद्रोह के कानून के तहत किसी को जेल भेजने की खबरें सुनने को मिलती हैं. आंदोलन तो आंदोलन, सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट तक को लेकर सिडिशन का चार्ज लगाया गया है. और बस लगाके छोड़ दिया जाता है, क्योंकि ज्यादातर मामले कोर्ट में साबित ही नहीं हो पाते हैं. माने धारा लगाने वाली एजेंसी और सरकार के पास अपने दावे के लिए कानूनी आधार नहीं होते.

फिर भी नियमित रूप से समाचार देखने-सुनने वाले जानते हैं कि हफ्ते-दो हफ्ते के भीतर कहीं न कहीं से खबर आती है कि अदालत ने राजद्रोह का मुकदमा लगाने को पुलिस को फटकार लगाई. और पुलिस को फटकार से कितना फर्क पड़ता है, इसपर अलग से टिप्पणी की कोई ज़रूरत नहीं है. ये आपने खूब सुना होगा कि बीते 6-7 सालों में राजद्रोह के मामले बढ़े हैं. अमूमन इस बात को एक धारणा बताकर खारिज कर दिया जाता है. इसीलिए हमने सरकार द्वारा जारी आंकड़ों का रुख किया.

आंकड़े क्या कहते हैं?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़ों के हिसाब से 2014 में राजद्रोह के 47 मामले थे. लेकिन 2019 में ये आंकड़ा 96 पर पहुंच जाता है. आंकड़ों के हिसाब से 2016 से 2019 के बीच राजद्रोह वाले मुकदमों में 160 फीसदी की बढ़ोतरी दिखती है. लेकिन कन्विक्शन रेट में भारी गिरावट है. यानी पुलिस राजद्रोह का केस दर्ज कर लेती है, लेकिन कोर्ट में जुर्म साबित नहीं कर पाती है. NCRB के लेटेस्ट डेटा के मुताबिक सिर्फ 3.3 फीसदी मामलों में ही कन्विक्शन हो पाता है. यानी हज़ार लोगों पर केस दर्ज होता है तो सिर्फ 33 लोग ही दोषी साबित होते हैं, बाकी के 967 लोग बरी हो जाते हैं. ऐसे में ये सवाल तो पूछा ही जाएगा कि क्या सरकारें इस कानून का जानबूझकर गैरवाजिब इस्तेमाल कर रही हैं. सौ में से तीन छोड़कर सारे मामलों में पुलिस की किरकिरी होती है, सरकार की नीयत पर सवाल उठते हैं. लेकिन धारा से मोह छूटता नहीं है. क्योंकि इस धारा में कुछ प्रावधान ही ऐसे हैं. कि सरकारों का दिल ललचाता है.

NCRB का लोगो और प्रोटेस्ट की प्रतीकात्मत तस्वीर.
NCRB का लोगो और प्रोटेस्ट की प्रतीकात्मत तस्वीर.

राजद्रोह या सिडिशन यानी इंडियन पीनल कोड की धारा 124A के तहत दर्ज होने वाले मामले. और धारा 124 A क्या है. इसमें लिखा है कि- जो भी लिखित या फिर मौखिक शब्‍दों, या फिर चिह्नों या फिर प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से नफरत फैलाने या फिर विधि संगत बनी सरकार के खिलाफ असंतोष को बढ़ावा देता है या इसकी कोशिश करता है, उसे 3 साल से उम्रकैद तक की सजा दी जा सकती है, और जुर्माना भी लगाया जा सकता है.’

सरकार का मतलब देश नहीं होता

धारा 124 A सरकार के खिलाफ अंसतोष भड़काने के बारे में है. और सरकार का मतलब देश नहीं होता. IPC में ये धारा तब शामिल हुई थी जब संविधान नहीं था, अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार नहीं था. एक औपनिवेशिक सरकार थी जो अपने खिलाफ कोई विरोध नहीं देखना चाहती थी. जब 1860 में इंडियन पीनल कोड अंग्रेजों ने भारत में लागू किया तो धारा 124 A नहीं थी. 10 साल बाद 1870 में इसे जोड़ा गया. क्योंकि अंग्रेज़ हुकूमत का विरोध बढ़ रहा था और उसे दबाने के लिए अंग्रेज़ों को कानूनी हथियार की ज़रूरत थी. तिलक, गांधी – भगतसिंह – आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले हर नेता पर राजद्रोह का मुकदमा लगाया गया. तिलक ने अपना अखबार शुरू किया तो उन पर राजद्रोह लगा दिया गया. महात्मा गांधी ने यंग इंडिया अखबार में एक आर्टिकल लिखा तो उस मामले में भी राजद्रोह लगा दिया गया. और गांधी का राजद्रोह के बारे में एक कथन भी मिलता है. उन्होंने कहा था कि

“धारा 124A,उन सभी कानूनों में सबसे हास्यास्पद और डरावना कानून है, जो हमारे स्वतंत्रता आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए बनाये गए हैं. अगर किसी को सरकार की किसी बात से परेशानी है, तो उसे यह आज़ादी होनी चाहिए कि वो अपनी परेशानी व्यक्त कर सके. उसे यह आज़ादी तब तक होनी चाहिए, जब तक वह अपनी किसी बात से नफ़रत या हिंसा नहीं भड़काता.”

गांधी जैसे कुशल विचारक अगर किसी कानून को एक ही सांस में हास्यास्पद और डरावना कहें तो समाज के कान खडे़ हो जाने चाहिए.

महात्मा गांधी और बाकी नेता इस बात के लिए लड़ रहे थे कि जब आज़ादी मिलेगी तो धारा 124 A जैसी चीज़ें भी नहीं रहेंगी, जो सरकार के खिलाफ अंसतोष जाहिर करने को भी जुर्म बना देती है. लेकिन संविधान लागू होने और अभिव्यक्ति की आज़ादी मिलने के बावजूद IPC की धारा 124 A नहीं हट पाई. अंग्रेज़ों की तरह ही ये राजद्रोह वाली धारा लोकतांत्रिक भारत में सरकारों के काम आने लगी. और इसमें किसी एक पार्टी की बात नहीं है. अमूमन हर राज्य में हर पार्टी की सरकारों में धारा 124 A का फायदा लिया गया. आपको याद होगा 2012 में भी मुंबई में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को राजद्रोह के कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन के दौरान असीम त्रिवेदी ने कार्टून बनाया था. और कार्टून पर ही देशद्रोह का मुकदमा लाद दिया गया था. फिर आप 2021 में आते हैं तो दिशा रवि का नाम याद आता है, जिनपर किसान आंदोलन को लेकर टूलकिट बनाने के मामले में राजद्रोह लगाया जाता है. असीम त्रिवेदी और दिशा रवि की अभिव्यक्ति किसी को परेशान करे, तो उसे कानूनी राहत का हक है. लेकिन ये सवाल बिलकुल अलग है कि इनपर राजद्रोह का मामला बनता है तो कैसे और क्यों.

असीम त्रिवेदी
असीम त्रिवेदी

सुप्रीम कोर्ट ने क्या टिप्पणी की है?

इसलिए फिर बात 124 A की प्रासांगिकता पर आती है और कोर्ट में सरकार से सवाल पूछे जाते हैं. इसी क्रम में आज सुप्रीम कोर्ट ने धारा 124 A पर कई तल्ख टिप्पणियां की हैं. सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना की बेंच ने आज सिडिशन वाले कानून पर दायर याचिका पर सुनवाई की. याचिका दायर की थी सेना के रिटार्यड मेजर जनरल एसजी वोमबाटकेरे ने. याचिका में दलील दी गई थी कि ये कानून अस्पष्ट है और अभिव्यक्ति की आज़ादी को रोकता है.

Supreme Court (2)
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो- PTI)

याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि ये औपनिवेशिक कानून है, आज़ादी के आंदोलन को दबाने के लिए बना गया था. ये वही कानून है जो गांधी, तिलक को चुप कराने के लिए इस्तेमाल हुआ था. सीजेआई ने पूछा कि क्या ऐसे कानून की आजादी के 75 साल बाद अब भी जरूरत है. ‘ सीजेआई ने कहा कि वो किसी राज्य या सरकार को इसके मिसयूज के लिए दोष नहीं दे रहे. दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि इस कानून को एक्सिक्यूट करने वाली संस्थाएं इसका गलत इस्तेमाल करती है. उन्होंने कहा कि सेक्शन 124A के तहत इतनी ज्यादा शक्तियां हैं कि अगर किसी पुलिस अधिकारी को जुआ खेलने वाले को भी ठीक करना हो तो उस पर ये धारा लगा सकता है. सीजेआई ने कहा कि उनकी चिंता कानून के गलत इस्तेमाल को लेकर है. आगे उन्होंने कहा कि स्थिति इतनी गंभीर है कि कोई राज्य या कोई एक पार्टी अगर विरोध की आवाज़ नहीं सुनना चाहते तो वो उन लोगों के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल करेंगे.”

इस टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि जब कई पुराने कानून सरकार खत्म करती है तो इस पर क्यों विचार नहीं करती. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब केंद्र सरकार को नोटिस देकर जवाब मांगा है. अभी अगली सुनवाई की तारीख तय नहीं हुई है. सुप्रीम कोर्ट में धारा 124A को लेकर ही एक और मामला चल रहा है जिसकी सुनवाई जस्टिस यू यू ललित की बेंच कर रही है.

इससे पहले भी अनेकों बार सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में 124 A के इस्तेमाल पर सवाल उठे हैं. पूर्व में विधि आयोग ने भी इस धारा में संशोधन करने की सिफारिश की थी. लेकिन सरकार के स्तर पर बात आगे बढ़ नहीं पाती है. अब देखने की बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार इस कानून पर क्या जवाब दाखिल करती है. अभी के लिए सरकार का पक्ष ये है कि कानून को खत्म करने की ज़रूरत नहीं है और इसके इस्तेमाल के लिए पैरामीटर गढ़े जा सकते हैं.


सेडिशन लॉ पर सुप्रीम कोर्ट ने महात्मा गांधी का नाम लेकर मोदी सरकार से क्या पूछ लिया?

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