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कामयाब लोगों, नाकामयाब बंदों का जीने का अधिकार तो नहीं न छीन लोगे

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ये दौर सफलताओं के महिमामंडन का है. आपको हासिल कामयाबी ही एकमात्र पैमाना है आपको परखने का. आपको मिलने वाले सम्मान की मिक़दार इस बात पर डिपेंड करती है कि आप अपने जीवन में कितने कामयाब हैं. आपका अपना व्यक्तित्व चाहे जैसा हो, आप अगर कामयाब हैं तो तमाम तरह के सम्मान आप बेहिचक क्लेम कर सकते हैं. नाकामयाबी पसंद नहीं इस बेरहम दौर को. पसंद छोड़िये नाकामयाबी के लिए कोई जगह ही नहीं इस सिस्टम में.

कभी कभी सोचता हूं वो ढेर सारे लोग कहां जाते हैं जो कामयाबी की इस थका देने वाली दौड़ में पिछड़ जाते हैं! क्या बीतती है उनके साथ? गैरों का तो कहना ही क्या, क्या अपने भी उनका साथ छोड़ देते हैं? कैसे उठा पाते होंगे वो उस विफलता का बोझ जो अनचाहे तौर पर उनका मुकद्दर बन गई! हमारा सिस्टम हमें फेल होने की लिबर्टी नहीं देता. मैं खफा हूं इस सिस्टम से. नकार देना चाहता हूं इसको.

एक अदद नौकरी, हैंडसम सैलरी, दरवाज़े पर फोर व्हीलर, साल में दो बार फॉरेन ट्रिप, हाथ में आईफोन! कितना सरलीकरण है सफलता का! इन सब को पाने के लिए किशोरवय से इस सांस फुलाने वाली रेस में दौड़ते रहो. रुकना नहीं है. क्योंकि तमाम मैनेजमेंट गुरु, टीचर्स, दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी, इसकी चाची, उसकी मौसी वगैरह-वगैरह एक लाइन ब्रह्मवाक्य की तरह हमारे सर पर पटके रहते हैं कि, अगर रुक गए तो पीछेवाला आपको कुचल कर आगे बढ़ जाएगा‘.

इसलिए रुको मत. फिर क्या है, भागे जा रहे हैं उसके पीछे जिसे पाकर खुश हो पाएंगे या नहीं इसकी भी गारंटी नहीं. कामयाबी के महिमामंडन के साथ-साथ ये दौर आर्टिफिशियल खुशियों का भी है. कितने ही लोग तमाम तरह की चीजों के बीच घिरे मुस्कुराने की कोशिशें करते हैं. ये जाने बगैर कि उनकी खुशियों का मरकज़ कहीं और ही है. कुछ भूल गए हैं और जिनको याद है वो दुनिया के दबाव में उसे भुलाने के लिए अभिशप्त हैं.

कामयाबी खुशियों की वजह बनेगी ही इसकी कोई गारंटी नहीं है, लेकिन नाकामयाबी श्राप बन के वजूद से लिपटती है इसमें कोई दो राय नहीं. इतना मानसिक दबाव है सफल होने का कि इस पर खरा न उतरने की सूरत में लोगों के वजूद के परखच्चे उड़ जाते हैं. ज़हनी सुकून काफूर हो जाता है. सेल्फ कॉन्फिडेन्स, सेल्फ रिस्पेक्ट जैसी चीजें ज़िंदगी से उड़नछू हो जाती हैं. दसवी, बारहवी में फेल होने पर आत्महत्या करने वाले बच्चों की तादाद में इजाफा हर साल हो रहा है. हर साल पहले से ज़्यादा बच्चे ज़िंदगी जैसी अनमोल चीज को त्याग रहे हैं. सिर्फ इसलिए कि वो उस पैमाने पर खरे नहीं उतर पाए जो इस सिस्टम ने डेवलप किया है.

कुछ साल पहले एक खबर पढ़ी थी. एक लड़की ने इसलिए फांसी लगा ली कि उसके पापा की उम्मीदों के अनुसार उसे बोर्ड एग्जाम में 80 प्रतिशत मार्क्स नहीं मिले थे. 77 तक ही पहुंच पाई वो. मेरा तो दिमाग सुन्न रह गया था वो पढ़कर. जाने अनजाने पिता ही अपनी औलाद का क़ातिल बना.

ऐसी-ऐसी उम्मीदों का बोझ हम अपने नौनिहालों पर डालने लगे हैं कि जिसे देख कर उनका दम घुटे न घुटे मेरी सांस उखड़ने लगती है. रेगुलर स्कूल, उसके बाद ट्यूशंस, एक्स्ट्रा होमवर्क, एक्स्ट्रा क्लासेज, ढेर सारी किताबें, एक-एक मिनट प्लान किया हुआ स्टडी शेड्यूल! तौबा! कितना ज़रुरी है ना सफल होना! फिर भले ही बचपन खो जाए, टीन एज ऐसे हाथों से फिसल जाए जैसे मुठ्ठी से महीन रेत, जवानी का पता ही ना लगे किधर गर्क हो गयी! जब तक थम के जायज़ा लेने का मौका मिलता है तब तक बालों में से सफेदी झांक रही होती है. नर्सरी के बच्चे के एडमिशन के लिए मां-बाप को बोर्ड एग्जाम की तरह तैयारी करता देखता हूं तो एक खौफ सा मेरे अंदर उतरने लगता है.

तीन साल की उम्र से हमने उसे स्केटिंग शूज पहना दिए हैं कि बेटा भागो. ज़िंदगी बाद में शुरू होती है रेस पहले. उम्मीदों का गोवर्धन पहाड़ सर पर उठाये सफ़र शुरू करने वाले तमाम नौनिहालों में से न जाने कितने आधे रास्ते में ही हांफने लगते हैं. सफल होने का अघोषित दबाव उन्हें सहज होने ही नहीं देता. और इस दबाव को जो झेल नहीं पाते वो या तो कोई एक्सट्रीम स्टेप उठा लेते हैं या फिर उनके अंदर की सहजता नष्ट हो जाती है. बचपन में प्यारे लगने वाले, समंजस से बच्चे बड़े होते-होते कुछ और ही बन जाते हैं. चिड़चिड़े से, एकांतप्रिय, फ्रस्ट्रेशन से भरे हुए. इस सिस्टम द्वारा लगातार थोपा जाने वाला कामयाबी का आग्रह बल्कि दुराग्रह कितनी अंदरूनी टूटफूट की वजह बनता है ये कौन समझेगा?

कामयाबी एक गुण है, एक अचीवमेंट है इसमें कोई शक नहीं. लेकिन नाकामयाबी को अक्षम्य श्राप ना बनाइये प्लीज. विफल होने की आज़ादी दीजिये जरा. सब कुछ तो आपके पैमाने से नहीं न आंका जाना चाहिए! सफलता-विफलता से परे भी किसी के व्यक्तित्व का आंकलन हो. ज़रूर-ज़रूर हो.

तमाम नाकाम लोगों के नाम फैज़ का ये शेर,

“दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,
लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है”


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