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'यार ये गांव से लोग जब शहर में आते हैं तो खुद को थोड़ा लचीला बनाकर क्यों नहीं आते?'

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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं. उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसकी 21वीं किस्त-

Shadi Laddu Motichoor - Banner


भाग 21

कल को नया समाचार होगा तो अपने आप नौकरी छोड़कर घर बैठ जाएगी‘ पूनम के मस्तिष्क पर चन्दर के ये शब्द हथौड़े की तरह वार कर रहे थे. वो छटपटा उठी. ‘क्यों पूरी दुनिया उसकी नौकरी के पीछे पड़ी है? आखिर इस नौकरी से किसका क्या बिगड़ रहा है? कौन सा कर्तव्य, कौन सी ज़िम्मेदारी मैं पूरी नही करती? घर आये मेहमानों के स्वागत में कोई कमी करती हूं या सास-ससुर के मान-सम्मान में कोई कसर रह गई? पति और घर की ज़िम्मेदारियों में पीछे रह गई या.‘ वो पूरे घर को टहल-टहल कर देखने लगी. साफ-सुथरे घर में हर चीज़ अपनी जगह पर थी. रसोई में जैसे साक्षात अन्नपूर्णा का वास था. पूजा वाले कमरे से अभी तक अगरबत्ती की खुशबू आ रही थी. वो सोचने लगी-

एक पत्नी और बहू के सारे कर्तव्य वो निभाती है. कोशिश करती है कि किसी को उससे अनजाने में भी तकलीफ न हो. फिर ये शिकायतें कैसी और क्यों? जो नौकरी बहुतों का सपना है, जिस पत्रकारिता में प्रवेश मात्र के लिए हर दिन सैकड़ों डिग्रीधारी अपने रेज़्यूमे के साथ मीडिया हॉउसेज़ के चक्कर लगाते हैं, वहां उसकी इतनी शानदार शुरुआत हुई है. कहां तो सबके लिए ये गर्व का विषय होना चाहिए. उसे पीठ पर शाबाशी की धौल मिलनी चाहिए और कहां हर तरफ उसकी नौकरी छुड़ाने के षड्यंत्र!

तव सिव तीसर नयन उघारा
चितवत कामु भयउ जरि छारा

सुबह-सवेरे बुआजी जाग चुकी थीं और स्नानादि से फ़ारिग होकर मानस की चौपाइयां ज़ोर-शोर से रट रही थी. पूनम ने नींद में डूबी पलकें बमुश्किल खोली. बीती रात इन्हीं उधेड़बुन में वह ठीक से सो नहीं पाई थी. देर लगा उसे ये समझने में कि बुआजी घर पर हैं और शिव का तीसरा नेत्र खुलने वाली चौपाई ही बार-बार दुहरा रही हैं. उसने मोबाइल देखा- ‘साढ़े चार?’ पर उठना ही था. जल्दी-जल्दी साड़ी बांधी. नाइटी में कैसे जाती बुआजी के सामने! चाय चढ़ाने के लिए रसोई में घुसने ही वाली थी कि बुआजी टोक पड़ी- ‘बिना स्नान किए रोज़ हमारे चन्दर को चाय पिलाती है क्या बहुरिया? कुछ नियम-कानून है या सब चाय में डालकर पी गए हो तुमलोग?

पूनम कुछ बोलती उसके पहले ही जमहाइयां लेता चन्दर बाहर आता बोल पड़ा- अरे बुआ, सुबह जल्दी होती है हम दोनों को. पूनम को तो और दूर जाना है. नाश्ता और लंच तैयार करने में समय लगता है. सब निपटाने के बाद ही वो नहाकर ऑफिस निकलती है.

पूनम ने राहत भरी सांस लेते हुए चन्दर को देखा पर बुआजी आपे से बाहर हो गई- ‘ब्राह्मण घर की बहू बिना स्नान-ध्यान किए रसोई में घुसेगी? अरे चन्दर तू भूल गया बाबूजी क्या कहते थे? कुक्कुर बनेगा अगले जनम में अगर ऐसा खाना खाया. बोल बहुरिया को कि सुबह जल्दी उठे और बिना नहाए रसोई में भूलकर भी प्रवेश न करे.‘ पूनम ने बहस करने से बेहतर यही सोचा कि जो बुआजी कहेंगी वही करने में समझदारी है. कम से कम जब तक बुआजी रुकेंगी यहां.

डाइनिंग टेबल से लगी कुर्सी पर पालथी मारकर बैठी बुआजी कहने को तो माला हाथ मे लिए मंत्र जाप कर रही थीं पर बटेर जैसी उनकी आंखें पूनम की एक-एक गतिविधि पर थी. बुआजी और फूफाजी की उपस्थिति के कारण रोटियां ज़्यादा बनानी थी. नहाकर आई पूनम फिर पसीने-पसीने हो उठी. सबकी रोटियां वो कैसरोल में रख ही रही थी कि बुआजी फिर धमक पड़ीं- ‘रूखी सुखी रोटियां क्यों रख रही है? घी नहीं है? घी निकालना नहीं सीख के आई पीहर से?

जी वो…ज़्यादा घी-तेल नुकसानदेह.‘ पूनम ने किसी तरह कहा. ‘अरे! तू हमारे चन्दर को बिना घी-तेल का खाना देती है? जवान आदमी रोज़ कटोरी भर घी न खाए तो शरीर के इंजन को मेहनत करने की ताकत कहां से मिले? और तू जानती नहीं कि बिना घी का खाना प्रेत का छुआ होता है? तभी तो कहें कि क्यों ऐसा सूखा छुहारा जैसा होता जा रहा है चन्दर!

बुआजी की सारी चिंताएं और उपदेश इसी वक्त जागृत हो गए. उधर बुआजी की हां में हां मिलाती पूनम के हाथ बिजली की तेजी से चल रहे थे. उसे ख्याल आया कि दोपहर में तो बुआजी-फूफाजी चावल-दाल खाएंगे! उसने पूछा- ‘बुआजी भात अभी बना दें या आप दोपहर में…

बुआजी ने व्यंग्यात्मक लहजे में तीर चलाया- ‘नहीं बहुरिया, ठंडा चावल तो हमने आजतक नहीं खाया. तू रहने दे. हम खुद बना लेंगे. बहु के रहते इस उम्र में भी खुद से खाना बनाना पड़ेगा. इतना भी नहीं होता कि छुट्टी ही कर ले! कुछ दिन आफिस नहीं जाएगी तो पता नहीं क्या बिगड़ जाएगा!

चन्दर बोल पड़ा- ‘अरे हां पूनम! तुम छुट्टी क्यों नहीं ले लेती जबतक बुआजी हैं. ये तो मुझे ख्याल ही नहीं आया! चलो अपने बॉस को फ़ोन कर दो.’

पूनम ने चन्दर की बात बीच मे ही काटते हुए कहा- ‘ऐसे एकदम से छुट्टी नहीं मिलती,आप जानते हैं न! अगर पहले पता होता कि बुआजी आने वाली हैं तो…

हां, हां. बता के आना चाहिए था. तुमलोगों के पास हमारे लिए वक़्त है या नहीं, ये पता करके आना चाहिए था. यही कहना चाहती हो न?‘ बुआजी भड़क उठीं.

अरे अरे बुआ, क्या बोल रही हो?‘ चन्दर ने तुरंत बुआजी को टोका और तरह-तरह की मसखरी कर उन्हें हंसाने की कोशिश करने लगा.

पूनम का सर घूमने लगा था. वो वहां से हटी और जल्दी-जल्दी ऑफिस जाने की तैयारी करने लगी. बाहर आकर उसने जल्दी से बुआजी के पैर छुए और बिना कुछ खाए मेट्रो की तरफ चल पड़ी. लंच में उसे कैंटीन से खाना लेना पड़ा. किरण उसे टोक पड़ी- ‘ओए पूनम, कैसी सोई-सोई आंखें हो रही हैं तेरी! तबियत ठीक नहीं क्या?’

तबियत तो ठीक है. बस वो मेहमान आए हैं तो बातें करते-करते दो बजे गए. नींद ही पूरी नहीं हुई.‘ कहते हुए पूनम ने बुआजी-फूफाजी के सरप्राइज़ विजिट के बारे में बताया. कम सुनकर भी ज़्यादा समझने वाली किरण अचानक गंभीर हो गई-

यार ये गांव-घर से आने वाले मेहमान जब मेट्रो-सिटीज़ में आते हैं तो क्यों नहीं खुद को थोड़ा लचीला बनाकर आते हैं? आखिर हम भी तो उनके अकॉर्डिंग अपना रूटीन चेंज करते हैं! ये कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि दो बजे सोने वाली एक कामकाजी महिला सुबह चार बजे उठकर नहा-धोकर, पूजापाठ करते हुए, चेहरे पर मुस्कान सजाए, एक हाथ से ऑफिस और दूसरे हाथ से घर को मैनेज करेगी, एक ही साथ? अरे यार, हम आपकी तरह रात में आठ बजे नहीं सोते. उस समय हम मेट्रो में धक्के खा रहे होते हैं. जिस समय दोपहर में आप भात-दाल खाकर बिछौने पर होते हैं उस वक़्त हम हाथ मे माइक थामे रिपोर्टिंग कर रहे होते हैं! थोड़ा तो हमें भी समझो. हम कोई सुपर वुमन नहीं हैं.

किरण की आंखें लाल हो गईं पर वो रुकी नहीं, बोलती गई-

शाम में अगर आपका बेटा आफिस से घर आता है तो आप उसके लिए हमदर्दी का सागर बन जाती हैं. पर हम आती हैं तो हमे सर से पांव तक यूँ घूरा जाता है जैसे कोई तो सबूत मिले और हम चरित्रहीन साबित किए जाएं! हद है यार!

पूनम हैरान रह गई. कितनी तकलीफें हैं हर ओर. उसने किरण के कंधे पर हाथ रखा और बस. क्या कहती? चन्दर कई दिनों से गौर कर रहा था कि पूनम उससे दूर-दूर रह रही है. दिन में तो हंसती-बोलती सारे काम निपटाती है, पर रात होते ही जैसे अपने खोल में सिमट जाती है. उसने सोचा- ‘हो सकता है, आजकल ऑफिस के साथ घर में मेहमानों की उपस्थिति के कारण काम ज़्यादा है. पूनम थक जाती होगी इसलिए परेशान है.‘ रात में ठंडा तेल हाथों में लिए वो पूनम की ओर बढ़ा- ‘मैडम, चन्दर चम्पी वाले को पता चला है कि मोहतरमा आजकल टेंशन-वेंशन में रहती हैं. इसलिए आज आपके सर की मालिश सरकार खुद करेंगे!

पूनम मुस्कुरा उठी और अपने लंबे बालों को क्लिप की कैद से आज़ाद कर दिया. चन्दर मालिश करता जा रहा था और दिन में बुआजी-फूफाजी के बीच हुए झगड़े को मनोरंजक अंदाज़ में बताता जा रहा था. पूनम ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी. इतने दिनों बाद पूनम को हंसता देख चन्दर ठिठक सा गया. मालिश करती उसकी उंगलियां पूनम के कंधों तक पहुंच गईं. बदलते दबाव को महसूस करते ही वो चिहुंक गई. इससे पहले कि चन्दर उसके सामने आकर बैठता वो पलंग से बिजली की सी तेज़ी से उतर गई. चन्दर हैरान रह गया. उसके कुछ पूछने के पहले ही पूनम ने बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर लिया. शीशे के सामने खड़ी पूनम अपने प्रतिबिंब को देख रही थी पर चेहरा चन्दर का था. उसके कानों में फिर से बुआजी से बात करते चन्दर की वही आवाज़ गूंजने लगी- ‘कल को नया समाचार होगा तो अपने आप नौकरी छोड़कर घर बैठ जाएगी.


…टू बी कंटीन्यूड!


भाग 1 दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4 सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

भाग 5 ये तो आंखें हैं किसी की… पर किसकी आंखें हैं?

भाग 6 डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!

भाग 7 घर-दुआर को डबडबाई आंखों से निहारती पूनम नए सफ़र पर जा रही थी

भाग 8 काश! उसने अम्मा की सुन ली होती

भाग 9 औरतों को मायके से मिले एक चम्मच से भी लगाव होता है

भाग 10 सजना-संवरना उसे भी पसंद था पर इतना साहस नहीं था कि होस्टल की बाउंडरी पार कर सके

भाग 11 ये पीने वाला पानी खरीद के आता है? यहां पानी बेचा जाता है?

भाग 12 जब देश में फैशन आता है तो सबसे पहले कमला नगर में माथा टेकते हुए आगे बढ़ता है

भाग 13 अगर बॉस को पता चला कि मैंने घूमने के लिए छुट्टी ली थी, तो हमेशा के लिए छुट्टी हो जाएगी

भाग 14 बचपन से उसकी एक ही तो इच्छा थी- ‘माइक हाथ में थामे धुंआधार रिपोर्टिंग करना’

भाग 15 उसे रिपोर्टर बनना था रिसेप्शनिस्ट नहीं

भाग 16 ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? जॉब नहीं मिलेगी? यही न? बिंदास जा. इंटरव्यू दे. जो होगा, देखा जाएगा

भाग 17 इंटर्नशिप मिलने के बाद भी क्यों परेशान थी पूनम?

भाग 18 क्या होता है जब एक लड़की, जिसकी नई शादी हुई है, नौकरी ढूंढने जाती है

भाग 19 क्या स्त्रियों की आज़ादी पर उसके दावे खोखले थे?

भाग 20 ‘सभी उसको लेकर फैसला ले रहे थे, सुना रहे थे, नहीं जानती थी तो सिर्फ वो’


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