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हॉन्ग कॉन्ग के इस बैंड में ऐसा क्या है, जो ये वहां के लोगों की उम्मीद बन गया है?

My music fights against the system that teaches us to Live and Die.

मेरा संगीत उस व्यवस्था से लड़ता है,जो सिर्फ़ मौत का इंतज़ार करना सिखाती है.

महान संगीतकार बॉब मार्ले की कही इस पंक्ति के ना जाने कितने मकसद निकलते हैं. जैसे – विरोध, उत्साह, बेचैनी, नए की तलाश, बड़ी लकीरों का निर्माण आदि-इत्यादि. ये सारी चीज़ें हॉन्ग कॉन्ग में साकार हो रहीं है. संगीत की जानिब से. 12 नौजवानों का एक म्युजिक बैंड है. मिरर. इसकी पैदाइश ढाई साल पहले हुई थी. एक टैलेंट शो के जरिए. इस बैंड ने हॉन्ग कॉन्ग में तहलका मचा रखा है. उनके गीत सर्वविद्यमान हैं. सड़क से लेकर अदालत और जेलों तक.

कहानी हॉन्ग कॉन्ग की

जैसा कि आपको पता है, चीन, हॉन्ग कॉन्ग में अपना सिस्टम थोप रहा है. हॉन्ग कॉन्ग लगभग दो हज़ार सालों तक चीन का हिस्सा रहा. 1839 में ब्रिटेन के साथ पहला अफीम युद्ध शुरू हुआ. चीन ये लड़ाई हार गया. नतीजतन, उसे हॉन्ग कॉन्ग को ब्रिटेन के हवाले करना पड़ा. ब्रिटेन का लालच बड़ा था. उसे कुछ और इलाकों पर अधिकार करना था. चीन उनका मुक़ाबला नहीं कर पाया. 1898 में दोनों देशों के बीच एक और संधि हुई. इसके तहत, चीन ने हॉन्ग कॉन्ग को 99 सालों के लिए लीज पर दे दिया. ये लीज खत्म होनी थी साल 1997 में.

ब्रिटेन ने हॉन्ग कॉन्ग में वेस्ट वाली व्यवस्था लागू की. भले ही हॉन्ग कॉन्ग एक ब्रिटिश कॉलोनी था. लेकिन वहां के आम नागरिकों को कहीं बेहतर बुनियादी अधिकार मिले हुए थे. माओ की क्रांति के बाद ये खाई और बढ़ गई. हॉन्ग कॉन्ग में पूंजीवादी व्यवस्था लागू हुई. लोगों को फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच मिली. विरोध करने का अधिकार मिला. जबकि चीन में इन सारी चीजों की कोई गुंज़ाइश नहीं थी.

लेकिन, ब्रिटेन का जाना तो तय था. इस बाबत 1984 में समझौता हुआ. तय ये हुआ कि ब्रिटेन के जाने के बाद भी हॉन्ग कॉन्ग में पुरानी वाली व्यवस्था चलती रहेगी. यानी जो अधिकार लोगों को मिले हुए हैं, उसके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी. कब तक? ब्रिटेन के निकलने के पचास साल बाद तक. यानी 1997 प्लस 50, साल 2047 तक. ये थी ‘वन कंट्री, टू सिस्टम्स’ वाली व्यवस्था.

चीन ने इसका ख़ूब प्रचार किया. ऐसा दिखाया गया मानो हॉन्ग कॉन्ग को आज़ादी मिल गई हो. चीनी पोस्टर्स में वहां के लोग खुशहाल दिखाए जाते. चीन के नाम का जयकारा लगाते दिखते.

पर सच क्या था?

सच दिखा कुछ बरस बाद. जब चीन ने वादाख़िलाफ़ी शुरू की. इसके विरोध में आंदोलन हुए. चीन ने वही नीति अपनाई, जो वो अपने यहां करता आया था. दमनं शरणम् गच्छामि. लोकतंत्र के समर्थकों को एक-एक कर अरेस्ट किया जाने लगा. उन्हें झूठे आरोपों में फंसाकर जेल भेजा जाने लगा. इंटरनेट पर ऐसी अनेकों मीडिया रिपोर्ट्स मिल जाएंगी.

एक ताज़ा उदाहरण बताता हूं. आपको तियानमेन स्क़्वायर में हुए नरसंहार की घटना याद है? जब चीन सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर टैंक चलवा दिए थे. तारीख़, 04 जून 1989. हॉन्ग कॉन्ग में हर साल उस घटना की बरसी मनाई जाती है. बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं. शहीदों को याद करते हैं. और, लोकतंत्र के पक्ष में शपथ खाते हैं. इस साल क्या हुआ? जैसे ही 04 जून की तारीख़ आई, उससे पहले ही पुलिस ने आयोजक को हिरासत में ले लिया.

समय के साथ चीन की प्रताड़ना का स्तर बढ़ रहा है. वो हॉन्ग कॉन्ग को अपने सांचे में ढालने के लिए बेताब है. इसलिए, आज के समय में हॉन्ग कॉन्ग के लिए एक नाम ख़ूब चर्चा में है. ‘अ सिटी अंडर क्रैकडाउन’. दमन के साये में ज़िंदा शहर.

उम्मीद बना मिरर

कई लोगों का मानना है कि हॉन्ग कॉन्ग का भविष्य अंधकारमय हो चुका है. उसका नसीब तय है. अब कोई भी शक्ति उसे बचा नहीं सकती. ऐसे समय में ‘मिरर’ के गाने उम्मीद बनकर उभरे हैं. उन्होंने हॉन्ग कॉन्ग में नई आशा का संचार कर दिया है. मिरर का एक गाना है, वॉरियर. गाने की एक पंक्ति है,

कभी हौसला न छोड़ना

कभी मुख न मोड़ना

तुम्हारे दिल में एक योद्धा बसा है.

जीनेथ हो पत्रकार हैं. उन्होंने प्रोटेस्ट की एक घटना को लाइव दिखाया था. इसके बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. उनके ऊपर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुकदमा लाद दिया गया. जेल में जब उन्होंने पहली बार ये गाना सुना. उनके आंखों से आंसू निकल आए. हो ने कहा,

अब मुझे कोई नहीं मिटा सकता, मैं कभी पीछे नहीं हटूंगी.

अगर हो पर लगे दोष साबित हुए तो हो को उम्रक़ैद की सज़ा हो सकती है. फिर भी उनका हौसला टूटा नहीं है. मिरर ने इस जज़्बे को विस्तार दिया है. हॉन्ग कॉन्ग की राइटर एवलिन शार के शब्दों में कहें तो,

‘हमारे भीतर की मुस्कुराहट, हमारे अंदर का बचपना और अपनापन अभी ज़िंदा है. सबसे बुरे दिनों में भी उम्मीद की लौ जल रही है. मिरर, हॉन्ग कॉन्ग के लोगों की सहनशक्ति का प्रतीक बन चुका है.’

जब बात यहां तक आ पहुंची है तो हम भी इसे विस्तार दिए देते हैं. अतीत के पिटारे से निकालते हैं कुछ कहानियां. उन गीतों की जिन्होंने तानाशाहों के बर्बर शासन को अंगूठा दिखाया. इन गीतों ने लोगों में हौसला भरा और कहा कि कभी झुकना मत. आपको ‘बेला चाओ’ याद है? मनी हाइस्ट वाला गाना. हिंदी में बाबा सहगल की पैरोडी तो सुनी ही होगी. बेला चाओ का हिंदी में मतलब है, अलविदा साथी. असलियत में, ये विरोध का गीत है. पॉपुलर कल्चर में एक कहानी है. इसमें कुछ सच भी है, कुछ किंवदंती भी.

बेला चाओ 

ये 40 के दशक की बात है. इटली में बेनिटो मुसोलिनी का क्रूर शासन चल रहा था. मुसोलिनी ने हिटलर के साथ मिलकर तबाही मचा रखी थी. इटली में ही मुसोलिनी का विरोध भी हो रहा था. एक नौजवान, विद्रोही गुट की गुरिल्ला सेना के साथ मिलकर लड़ने की तैयारी करता है. उसकी प्रेमिका निवेदन करते हुए कहती है,

‘तुम्हारे बिना मैं यहां क्या करूंगी? मुझे भी अपने साथ ले चलो.’

नौजवान जवाब में गाना गाता है.

अगर मैं लड़ते हुए मारा गया

मुझे ऊंचे पहाड़ों पर दफ़ना देना

किसी सुंदर फूल की छांव में

कोई देखे तो याद करे

और कहे,

आज़ादी की शमां में एक परवाना जल गया.

नौजवान बेला चाओ गाकर अपनी प्रेमिका से विदा लेता है. उसे इस बात का अनुमान हो चुका था कि दुश्मन नजदीक आ चुका है. मौत का दीदार कभी भी हो सकता है. वो शायद उनकी आख़िरी मुलाक़ात हो. फ़ासिस्ट इटली में बेला चाओ विरोध का सिंबल चुका था. अप्रैल 1945 में हिटलर और मुसोलिनी की हार हुई तो ये गीत आम जनमानस के जश्न का प्रतीक बन गया. हर साल 25 अप्रैल को इटली में आयोजन होते हैं. लोग एक जगह पर जमा होकर एक साथ बेला चाओ गाते हैं. ये परंपरा आज भी कायम है.

Bella Chao
इटली का बेला चाओ प्रोटेस्ट.

भले ही बेला चाओ को पहचान फ़ासिस्ट इटली में मिली. लेकिन इसकी शुरुआत दशकों पहले हो चुकी थी. पूर्वोत्तर इटली के पो वैली में. इसे शुरू किया था, धान के खेतों में काम करने वाली महिलाओं ने. उस समय उन्हें पूरे दिन खेतों में काम करना होता था. पूरे दिन की मेहनत के बाद भी उन्हें ढंग की मज़ूरी नहीं मिलती थी. महिलाएं खेतों में बेला चाओ गाकर अपना दुखड़ा बयान करतीं थी. वे प्रार्थना करती थीं कि काम के घंटे ज़ल्दी पूरे हो जाएं.

चिली का गीत

अब चलते हैं चिली. 11 सितंबर 1973. कम्युनिस्ट राष्ट्रपति फ़्रांस्वा अलांदे की सरकार गिरा दी गई. जनरल अगस्तो पिनोशे ने अमेरिका के सपोर्ट से तानाशाही राज स्थापित किया. तख़्तापलट के अगले दिन राजधानी सेंटियागो में प्रोटेस्ट हुआ. पिनोशे का विरोध करने के लिए हज़ारों की भीड़ इकट्ठा हुई थी. इस भीड़ में विक्टर हारा भी थे. हारा शानदार लिखते थे, जोश में गाते थे और उनके भाषणों से क्रांति टपकती थी. कहते हैं कि अगर बॉब डिलन और मार्टिन लूथर किंग ‘जूनियर’ को एक शरीर में बंद किया जाए तो वो विक्टर हारा होंगे. हारा हमेशा से कट्टरपंथियों के निशाने पर थे.

वही हुआ भी. जब भीड़ आर्मी बैरिकेड के पास पहुंची. लोगों को गिरफ़्तार किया जाने लगा. गिरफ़्तार करने के बाद सबको नेशनल स्टेडियम में ले जाया गया. विक्टर हारा पॉपुलर थे. उन्हें आसानी से पहचाना जा सकता था. सैनिकों ने उन्हें भीड़ से अलग रखा. एक सैनिक ने उनके पास जली सिगरेट फेंक दी और झुककर उठाने का हुक़्म दिया. जब हारा झुके, उन्हें बुरी तरह से पीटा गया. 16 सितंबर को पिनोशे के आदेश पर उनकी हत्या कर दी गई. हत्या के बाद हारा की लाश को स्टेडियम की छत से टांग दिया गया था.

उनकी मौत के बाद उनका एक पुराना गीत ख़ूब पॉपुलर हुआ. इतना कि वो पिनोशे सरकार के ख़िलाफ़ लोगों की क्रांति का मकसद बन गया. विक्टर हारा ने ये गीत वियतनाम के महान क्रांतिकारी नेता हो ची मिन्ह के नाम लिखा था. 1971 में.

इस गाने की कुछ पंक्तियों का हिंदी अनुवाद सुनिए.

जीने का अधिकार

ओ हो ची मिन्ह

जिसने दुनिया को दी नसीहत

कोई बारूद नहीं मिटा सकती

हमारे खेतों में उगे हल के निशान

नहीं छीन सकता है कोई

हमारे शांतिमय जीवन का अभिमान.

ये गीत चिली के लोगों ने आत्मसात कर लिया. उन्होंने उस गीत को पिनोशे के अंत तक अभिमान के साथ गाया. आज भी जब चिली में कोई प्रोटेस्ट होता है, विक्टर हारा का ये गीत हवाओं में घुलकर बहने लगता है.

गाने और भी हैं. कहानियां और भी हैं. फिर किसी वक़्त में फुर्सत से सुनाएंगे.


कौन हैं जिमी लाई, जिन्हें चीन ने हॉन्ग कॉन्ग में गिरफ्तार किया?

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