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'साम्राज्यों की कब्रगाह' अफगानिस्तान में लौट रहे तालिबानी राज की पूरी कहानी ये है!

सदियों पुरानी एक कहानी है. सिकंदर महान की. जिसे दुनिया विश्व-विजेता का तमगा पहनाती है. जब सिकंदर ने अपने अभियान की शुरुआत की, उसके रास्ते में पड़ने वाले साम्राज्य एक-एक कर नतमस्तक होते चले गए. एक साल के भीतर उसने अंटोलिया, मेसोपोटामिया और पर्शिया पर क़ब्ज़ा कर लिया था. आगे अफ़ग़ानिस्तान था. सिकंदर को लगा, ये तो कुछ दिनों की बात है. लेकिन वहां पहुंचने पर उसका गणित उल्टा पड़ गया. वहां अंतहीन जंग शुरू हुई. छोटे-छोटे अफ़ग़ान कबीलों ने सिकंदर की सुसज्जित सेना को हांफने पर मजबूर कर दिया. होते-होते तीन बरस बीत गए.

फिर एक दिन सिकंदर के नाम एक चिट्ठी आई. उसकी मां ने तंज कसते हुए पूछा था,

‘तुम कैसे योद्धा हो, जो तीन बरस में उस छोटी-सी जगह पर अटके हुए हो? क्या कभी आगे बढ़ पाओगे?’

सिकंदर ने चिट्ठी पढ़ी. उसने एक थैली में अपने आस-पास की मिट्टी भरी. साथ में एक संदेश भेजा,

‘मां, इस मिट्टी को अपने घर के अहाते में बिखेर देना.’

सिकंदर की मां ने वैसा ही किया. अगले ही दिन से मेसीडोनिया के कुलीन लोग आपस में लड़ने लगे. वहां भयानक मार-काट मच गई.

उसी समय से एक कुख्यात लोकोक्ति चली आ रही है, ‘अफ़ग़ानिस्तान इज द ग्रेवयार्ड ऑफ़ एम्पायर्स’. अफ़ग़ानिस्तान, साम्राज्यों की क़ब्रगाह है.

सिकंदर ने बाद में अफ़ग़ानिस्तान को जीता भी. लेकिन बहुत लंबे समय तक उसका राज नहीं चला. जितने भी समय शासन रहा, वहां ख़ून-खराबा होता रहा. 19वीं सदी में यही हाल ब्रिटिश राज का हुआ. दुनिया के तमाम हिस्सों पर क़ब्ज़ा करने वाले अंग्रेज़ अफ़ग़ानिस्तान पर कभी तसल्ली से शासन नहीं कर पाए.

हालिया इतिहास की बात करें तो हमारे सामने दो ताज़ातरीन उदाहरण हैं. दुनिया की दो महाशक्तियां. सोवियत संघ और अमेरिका. दोनों अफ़ग़ानिस्तान में बड़े-बड़े अरमान लिए आए थे. उन्हें हासिल क्या हुआ? बेहिसाब बर्बादी और निराशा. सोवियत संघ का क़ोटा तो 80 के दशक में ही पूरा हो गया था. बचा अमेरिका. वो दो दशक के बाद अपना बोरिया-बिस्तर लेकर निकल रहा है. अगस्त 2021 में घर-वापसी का अमेरिकी प्लान पूरा हो जाएगा.

अमेरिका जा तो रहा है, लेकिन उसने जो ज़मीन तैयार कर दी है. उस पर तालिबान महल खड़े करने के लिए तैयार है. और, बहुत ही तेज़ रफ़्तार से कर रहा है. पिछले छह दिनों में उसने अफ़ग़ानिस्तान की दस प्रांतीय राजधानियों को जीत लिया है. बाकी जगहों पर उसकी बढ़त बनी हुई है. तमाम संसाधनों के बावजूद अफ़ग़ान सेना कमतर साबित हो रही है. राजधानी काबुल अफ़ग़ान सरकार का अंतिम गढ़ है. अब वो तालिबान से दूर नहीं है. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि तीन महीनों के अंदर काबुल पर तालिबान का झंडा लहरा रहा होगा.

12 अगस्त की दोपहर अफ़ग़ान सरकार ने तालिबान को एक ऑफ़र दिया है. क्या? उन्होंने कहा है कि तालिबान को सत्ता में शामिल किया जाएगा. यानी उसके साथ पॉवर शेयरिंग की जाएगी. बशर्ते वो हमले बंद कर दें. अभी तक सरकार, तालिबान से लोहा लेने का दम भर रही थी. इस ऑफ़र से साफ़ जाहिर है कि अफ़ग़ान सरकार को अपनी ज़मीन खिसकती हुई दिख रही है.

अफ़ग़ानिस्तान ने ये ऑफ़र क़तर के जरिए तालिबान को भेजा है. क़तर, अफ़ग़ान शांति वार्ता की मेज़बानी कर रहा है. बहुत कम संभावना है कि तालिबान इस ऑफ़र को स्वीकार करेगा. जब वो अकेले दम पर सत्ता हासिल करने की काबिलियत रखता है तो वो शेयर क्यों करे.

दोनों ही सूरत में अफ़ग़ानिस्तान पर ‘तालिबान राज’ की वापसी तय है. इससे पहले तालिबान ने 1996 से 2001 तक देश पर शासन किया था.

बहुत सारे लोगों के मन में ये सवाल उठ रहा होगा कि तालिबान के नाम का इतना हौव्वा क्यों है? तालिबान से आख़िर लोग इतना डर क्यों रहे हैं? और, तालिबान के शासन में अफ़ग़ानिस्तान में क्या बदल जाएगा? सब विस्तार से बताएंगे.

Alexender
सिकंदर महान.

पृष्ठभूमि कहां से तैयार हुई?

कुछ बातें हम पहले भी बता चुके हैं. मसलन, कम्युनिस्ट शासन की स्थापना के लिए अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ का आक्रमण. अमेरिका और पाकिस्तान का मुजाहिदीनों को सपोर्ट करना. 1988 का जेनेवा अकॉर्ड और फिर सोवियत संघ की वापसी. सोवियत संघ जब निकल रहा था, उस समय अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति थे मोहम्मद नजीबुल्लाह. उन्होंने देश में कुछ सुधार लाने की कोशिश की. कम्युनिस्ट होने के बावजूद उन्होंने मल्टी-पार्टी सिस्टम लागू किया. निर्वासन में रह रहे उद्योगपतियों को वापस बुलाया. उन्होंने हिंसा की बजाय शांति पर जोर दिया. बातचीत के दरवाज़े खोले.

उधर, मुजाहिदीनों की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी. कुछ तो अपने काम-धंधे में वापस लौट गए थे, लेकिन बाकियों की नज़र काबुल पर थी. कुर्सी एक, दावेदार कई. संघर्ष होना ही था. हुआ भी. मुजाहिदीनों के अलग-अलग गुट बन गए. इन्हीं में से एक गुट आगे चलकर तालिबान के नाम से जाना गया.

भले ही सोवियत संघ ने अपने सैनिकों को निकाल लिया था, लेकिन वो नजीबुल्लाह को लगातार सपोर्ट कर रहा था. हर तरह की मदद भी मुहैया करा रहा था. मगर ये सहारा ज़्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सका. दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया. गोर्बाचोव के दिन फिर चुके थे. सोवियत संघ अब रूस बन चुका था. पहले राष्ट्रपति बने, बोरिस येल्तसिन. उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान को दी जा रही मदद अचानक से बंद कर दी. नजीबुल्लाह अकेले पड़ गए. उनके साथियों ने भी एक-एक कर हाथ खड़े कर दिए.

Soviet Afghan War
सोवियत अफगान युद्ध की तस्वीर.

चौराहे पर खंभे से टंगी लाश

अप्रैल 1992 में नजीबुल्लाह ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. मुजाहिदीनों को मौका मिल गया. उनका रास्ता साफ़ हो चुका था.

नजीबुल्लाह, मुजाहिदीनों के लिए दुश्मन की तरह थे. उनको सज़ा देकर उदाहरण पेश करना ज़रूरी हो गया था. नजीबुल्लाह को इसका अंदेशा हो गया था. उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान से बाहर शरण लेने की बहुत कोशिशें की. लेकिन वो असफ़ल रहे. आख़िर में उन्हें काबुल स्थित यूएन हेडक़्वार्टर में जगह मिली. सितंबर 1994 में कंधार में तालिबान की स्थापना हुई. मुल्ला ओमर के नेतृत्व में इस्लामिक अमीरात बनाने का लक्ष्य तय किया गया. तालिबान ने ज़ल्दी ही कंधार से बाहर पांव पसारना शुरू कर दिया था. सितंबर 1996 तक वे राजधानी काबुल पहुंच चुके थे. तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ रहे अफ़ग़ान सैनिक पस्त हो चुके थे. उन्होंने मोर्चा खाली कर दिया.

27 सितंबर 1996 को तालिबान के लड़ाके यूएन के हेडक़्वार्टर में घुसते हैं. जहां नजीबुल्लाह और उनके भाई ने शरण ले रखी थी. अगले दिन दोनों की लाश चौराहे पर एक खंभे से टंगी मिली. दोनों को बुरी तरह पीटा गया था. उनके चेहरों को कुचल दिया गया था. और तो और, नजीबुल्लाह और उनके भाई के गुप्तांगों को चाकू से काट दिया गया था.

ये तालिबानी शासन की पहली बानगी थी. नजीबुल्लाह की हत्या के साथ ही अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का शासन आ चुका था. ये अगले पांच साल तक चला.

इस दौरान क्या-क्या हुआ?

तालिबान ने पूरे देश में शरिया कानून लागू कर दिया. उनका पहला शिकार थीं, महिलाएं. धार्मिक पुलिस सड़कों पर कोड़े लेकर खड़ी होती थी. जो भी महिलाएं सड़क पर अकेले या बिना पर्दे के दिख जातीं, उन्हें बुरी तरह पीटा जाता था. आदेश ज़ारी हुआ कि महिलाएं काम नहीं कर सकतीं, उन्हें अपने घरों में रहना होगा. अगर कोई महिला बाहर निकलना चाहती है तो उसे घर के पुरूष के साथ पर्देदारी में निकलना होगा. बच्चियों के स्कूल जाने पर रोक रहेगी. अगर आदेश का पालन नहीं हुआ तो सज़ा मिलेगी. कैसी? पिटाई से लेकर पत्थर मारकर हत्या तक की सज़ा.

पुरूषों के लिए नमाज पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया. उनके दाढ़ी कटाने पर रोक लगा दी गई. सरकारी दफ़्तरों में तालिबान ने अपने लोगों को नियुक्त किया. उनका काम होता था, कर्मचारियों से नमाज पढ़वाना. संगीत पर बैन लगा दिया गया. सिनेमाघरों में तालेबंदी हो गई. यहां तक हुआ कि बच्चों के पतंग उड़ाने या कबूतर पालने तक पर रोक थी.

समलैंगिकों और दूसरे अपराधियों को एक श्रेणी में रखा गया. हर शुक्रवार को उन्हें रस्सी में बांधकर शहर में घुमाया जाता था और फिर किसी चौराहे पर उन्हें सज़ा दी जाती थी.

जिन भी लोगों ने किसी तरह से तालिबान का विरोध किया था, उनकी दिनदहाड़े हत्या होने लगी. वहां कानून का कोई नामलेवा नहीं था.

तालिबान का हुक़्म मतलब ख़ुदा का हुक़्म था. वहां शिकायत की कोई गुंज़ाइश नहीं थी. जिन महिलाओं के पति जंग में मारे गए थे, उन्होंने गुहार लगाई कि उन्हें काम करने दिया जाए. ताकि वे अपना और अपने बच्चों का पेट पाल सकें. तालिबान ने उन्हें पीटने का आदेश दिया. और, बोले- अल्लाह सबका ख़याल रखेगा, तुम्हें काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है.

तालिबान ने आतंकियों को पनाह दी

इन सबके अलावा, तालिबान ने दुनियाभर के आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह दी. उज़्बेकिस्तान से लेकर चेचेन्या तक के आतंकी अफ़ग़ानिस्तान में ट्रेनिंग कर दूसरे देशों में बेगुनाहों की हत्या करते थे. ये सब तब तक चला, जब तक अल-क़ायदा ने अमेरिका पर 9/11 का हमला नहीं किया था.

अमेरिका ने बदला लेने की नीयत से अफ़ग़ानिस्तान पर हमला कर दिया. उसके साथ नाटो भी आया. तीन महीने में ही तालिबान को काबुल से खदेड़ दिया गया.

अमेरिका को लगा, अफ़ग़ानिस्तान से तालिबान को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है. उसने और सेना उतारी. खर्च और बढ़ाया. लेकिन बीतते-बीतते बीस बरस हो गए. तालिबान खत्म नहीं हुआ. वो सुदूर इलाकों में जड़ें जमाकर बैठा रहा. और, जब अमेरिका थकने लगा, उसने ज़बरदस्त वापसी की. ऐसी कि अब अमेरिका को अपनी सारी क़ुर्बानी ज़ाया होती दिख रही है. इसके बावजूद वो रूककर उसका जायजा नहीं लेना चाहता.

फ़रवरी 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता हो गया. तालिबान ने वादा किया था कि वो विदेशी सैनिकों पर हमला नहीं करेगा. और, अफ़ग़ान जनता के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करेगा.

क्या तालिबान बदल गया है?

क्या तालिबान का हृदय-परिवर्तन हो गया है? इसका जवाब होगा, नहीं. वो सब एक छलावा था.

तालिबान वापस अपने असली रंग में आ चुका है. उसने पूरे अफ़ग़ानिस्तान में शरिया कानून लगाने का वादा किया है. तालिबान ने कहा था कि वो स्कूलों पर हमले नहीं करेगा. ये बात भी झूठी साबित हुई. मई 2021 में तालिबान ने लड़कियों के स्कूल को बम से उड़ा दिया था. उस वक़्त स्कूल में छुट्टी हो रही थी. इस घटना में 90 से अधिक बच्चियों की मौत हो गई थी.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अपने क़ब्ज़े वाले इलाकों में तालिबान हर घर से कम-से-कम एक लड़की की शादी अपने लड़ाकों से करने का आदेश दिया है. महिलाओं की जो कुछ आज़ादी बची हुई थी, वो खत्म होने वाली है. तालिबान ने साफ़ कहा है कि शरिया कानून पर किसी तरह का समझौता नहीं होगा. यानी जैसा दो दशक पहले चला था, वैसा ही चलेगा.

यहां पर ग्लोबल पॉलिटिक्स से जुड़ी एक ख़बर का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है. जर्मनी हर साल अफ़ग़ानिस्तान को लगभग साढ़े तीन हज़ार करोड़ रुपये की मदद देता है. उसने कहा है कि अगर अफ़ग़ानिस्तान में शरिया लॉ लागू होता है तो वो एक पैसे की भी मदद नहीं करेगा. यानी अगर तालिबान सत्ता में आया तो वो सपोर्ट खींच लेगा. पश्चिम के बाकी देश भी इसी लाइन पर चल सकते हैं.

क्या इससे तालिबान को कोई डर है? क्या तालिबान कमज़ोर पड़ जाएगा? कतई नहीं. इतने बरसों से तालिबान को वेस्ट की मदद नहीं मिल रही थी, फिर भी उसने अपना वज़ूद बचाए रखा है. या यूं कहें कि वो पहले से अधिक मज़बूत ही हुआ है.

कैसे? एक तो है अफ़ीम की खेती. जिन इलाकों में तालिबान का राज था, वहां वे अफ़ीम उपजाते और यूरोप के बाज़ार में बेचते थे. उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा ड्रग्स की तस्करी से ही आता है. इसके अलावा, जैसा कि अमेरिका और काबुल आरोप लगाते हैं कि तालिबान को रूस, ईरान और पाकिस्तान मदद दे रहे हैं. हाल ही में तालिबान ने चीन के साथ हाथ मिलाया है. चीन को वैसे भी मानवाधिकार उल्लंघन की कोई फ़िक्र नहीं है. उन दोनों की दोस्ती ख़ूब जमेगी. जिस भी देश को अफ़ग़ानिस्तान में हित दिखेगा, वो पैसे की पेटी लेकर वहां दाखिल होगा. उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा कि काबुल की कुर्सी पर तालिबान बैठा है या लोकतंत्र. वहां एक ही लाइन गूंजेगी, लेट द प्रॉफ़िट रेन.

इन सबमें पिसते रहेंगे, अफ़ग़ानिस्तान के आम नागरिक. जो अभी चल रही लड़ाई के कारण दहशत में जीने के लिए मजबूर हो चुके हैं. उनकी चर्चा फ़ाइल के आख़िरी पन्ने में दर्ज़ होती है. और, जब तक उनका नंबर आता है, अधिकतर लोग ऊंघने लगते हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के आने से निश्चित तौर पर अंधकार-युग की वापसी होगी. अब कोई चमत्कार ही इस अनहोनी से बचा सकता है. जिसकी संभावना दिनोंदिन क्षीण होती जा रही है.

अंत में अफ़ग़ानिस्तान में मचे भगदड़ के ताज़ा हालात जान लेते हैं –

# तालिबान ने 34 में से 10 प्रांतीय राजधानियों को जीत लिया है. वो भी पांच दिन के अंदर. 12 अगस्त को तालिबान ने ग़ज़नी पर क़ब्ज़ा कर लिया. शहर छोड़कर भाग रहे ग़ज़नी के गवर्नर को अफ़ग़ान सेना ने गिरफ़्तार कर लिया है.

# अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने अपना आर्मी चीफ़ बदल दिया है. जनरल वली मोहम्मद अहमदज़ई जून से इस पद पर थे. उनके नेतृत्व में सेना तालिबान को रोकने में नाकाम रही है. अब सरकार नए आर्मी चीफ़ पर दांव लगा रही है.

# 11 अगस्त को अफ़ग़ानिस्तान के कार्यवाहक वित्त मंत्री खालिद पेयेंदा ने इस्तीफ़ा दे दिया. इस्तीफ़ा देने के बाद वो देश छोड़कर भाग गए.


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