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सिल्क स्मिता की वो कहानी जो विद्या बालन भी नहीं बता पाईं

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‘सदमा’ फिल्म में सोनी का किरदार याद है आपको?

तीन फिल्मफेयर जीतने वाली ये फिल्म श्रीदेवी और कमल हसन के करियर में मील का पत्थर कही जाती है. फिल्म देखने वाले लोगों को सोमू और रेश्मी के किरदार याद हैं, हो सकता है हरिप्रसाद भी याद हो. 80 के दशक में जब बालु महेंद्रा ‘सदमा’ जैसी फिल्म बनाते हैं तो श्रीदेवी और कमल हसन को अभिव्यक्ति का पूरा आकाश देने के बाद भी, सिल्क स्मिता के लिए क्षितिज पर एक कोना ढूंढ ही लेते हैं. वो कोना जिसमें सिल्क की मांसल जांघेंं, उन्नत वक्ष और अलग से उभरती हुई गहरी क्लीवेज है. सोनी बनी सिल्क एक किरदार के तौर पर इस फिल्म की कहानी में कुछ भी जोड़ती घटाती नहीं हैं. भले दिल वाले हीरो को सिड्यूस करने की ‘फूहड़’ कोशिशें करती हैं. गंभीर सी कहानी के बीच में तमाम पुरुषों की दबी हुई फैंटेसी को पूरा करने में वही करती हैं जो उनसे करने की उम्मीद की जाती है. 1983 में जब ‘सदमा’ रिलीज़ हुई थी तो सिल्क 4 साल में 200 फिल्मों के साथ अपने करियर के टॉप पर थीं.

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सदमा के रिलीज के समय सिल्क करियर के टॉप पर थीं.

200 में से, न जाने कितनी फिल्मों को बंद डिब्बों में ‘सिल्क’ की फुटेज लगाकर बेच दिया गया. वे फिल्में जिन्हें भारतीय सिनेमा (सिर्फ हिंदी नहीं) की वर्ण व्यवस्था में B और C ग्रेड की जातियों में बांट दिया गया. जिस ग्रेड के तय होते ही तय हो जाता था कि समाज का कौन सा वर्ग इन्हें देखेगा और सराहेगा. रिक्शेवालों की फिल्में, ट्रकवालों के गाने, लफंगों का हेयर कट, न जाने ऐसे कितने स्टीरियोटाइप बने और बनाए गए. जिन स्टीरियोटाइप्स को पूरा करने में कभी सिल्क स्मिता कभी हेलेन कभी ममता कुलकर्णी तो कभी जॉनी लीवर अलग-अलग से टाइप्ड होते रहे.

सिल्क पर फिल्म बनती है. विद्या बालन अपने करियर के सबसे रेशमी किरदार को निभाते-निभाते एक डायलॉग बोलती हैं, “फिल्में सिर्फ तीन चीजों से चलती हैं – एंटरटेनमेंट! एंटरटेनमेंट! एंटरटेनमेंट! और मैं एंटरटेनमेंट हूं.” इस डायलॉग को पूरी शिद्दत से बोलने के लिए विद्या की भरपूर तारीफ होती है, होनी भी चाहिए. मगर सिल्क, जिसने इस एंटरटेनमेंट को मौत तक जिया उसका क्या? जो न जाने कितनों की फैंटेसी की ट्यूनिंग करते-करते खुद अपनी ज़िंदगी से मिसट्यून हो गई. सिल्क के किरदार को निभाकर विद्या का क्लास बढ़ गया मगर सिल्क की पहचान आज भी वे ही किरदार हैं जो बिंबो हैं, आइटम हैं, फूहड़ हास्य पैदा करने वाले हैं.

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सिल्क पर फ़िल्म बनी ‘डर्टी पिक्चर’.

सिल्क की उत्तराधिकारी कही जाने वाली ‘B ग्रेड सॉफ्टकोर’ हिरोइन शकीला ने अपनी आत्मकथा में लिखा है (आप शकीला के आत्मकथा लिखने पर अब तक मन ही मन शक ज़ाहिर कर चुके होंगे) कि पहले स्क्रीन टेस्ट के समय स्कर्ट की लंबाई देखकर वो रोईं थी. स्टॉकिंग मांगे, ये भी तस्दीक की कहीं स्कर्ट गलत तो नहीं. मगर जल्द ही खुद को समझा लिया कि ये गलत स्कर्ट ही शकीला और सिल्क जैसों की किस्मत है. शकीला ने स्मिता को अपने सामने की सबसे बेहतरीन एक्टर कहा है. वो हो भी सकती हैं क्योंकि जिस किरदार और अदाकार में दुनिया फर्क न कर पाए उसकी अदायगी में कुछ तो खास होगा ही.

क्या दोष था पता नहीं

सिल्क की पैदाइश कब हुई, कब उसने दुनिया छोड़ दी इसको जानने में आपको अगर दिलचस्पी हो तो आप पता कर ही लेंगे. मगर आपको ये बताते-बताते इसे यहां बताना गैर-ज़रूरी समझने लगा हूं, मेरे दिमाग में ख्याल आ रहा है, सिल्क गोरी चमड़ीवाले किसी फिरंगी मुल्क से आई होतीं तो शायद कम एक्टिंग के बावजूद किसी न किसी परिवार में ‘सेटल’ हो जातीं.

पता नहीं दोष उन माध्यमों को दिया जाए जो किसी विजयलक्ष्मी वदलापति को सिल्क स्मिता बनाकर एंटरटेनमेंट देते हैं या उन उपभोक्ताओं को जो अंग्रेज़ी शब्दों के साथ छपी कपूर सरनेम वाली लड़की की ब्रा-लेस फोटो को प्रोग्रेसिव मानते हैं और गांव या मिडिल क्लास से सीधे उठकर आई किसी के क्लीवेज को वल्गर. ऐसी तमाम सिल्क आती रहेंगी और जाती भी रहेंगी. हो सके तो अगली बार किसी सिल्क के बारे में जब राय बनानी हो तो ध्यान रहे कि वो सब एक किरदार निभा रहे हैं. वो किरदार जो आपको या हमें भी निभाना पड़ सकता था.


ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए अनिमेष ने की थी.


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