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पालवंकर बालू : 'लगान' फिल्म की तरह ही इनको लेकर भी टीम में दो गुट बन गए थे

बात तब की है जब भारत पर अंग्रेजों का राज था. मंगल पांडे को फांसी हुए 18 साल हो चुके थे. अंग्रेजों की टुच्चई के साथ एक और खेल देश में चल रहा था. क्रिकेट. जेंटलमेन्स गेम. अंग्रेज, जो भारत के लिए उतने जेंटल नहीं थे. लेकिन हां, कुछ मायनों में हमें उनकी ही वजह से फ़ायदा भी हुआ. रेलगाड़ी, बिजली के खम्बे, टेलीफोन के अलावा भी कुछ फायदे थे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण थे पालवंकर बालू. 19 मार्च 1875 को पैदा हुए. ‘नीची जाति’ का होने के कारण जिसे क्रिकेट खेलने को नहीं मिल सकता था. तब ऐसी ही व्यवस्था थी. मगर अंग्रेजों ने इन्हें अपने साथ खेलाया. मज़ेदार कहानी.

उत्तरी गोवा के कोंकण तट पर पाया जाने वाला पालवन गांव. मछली और अल्फ़ान्सो आम के लिए मशहूर. पालवंकर बालू का जन्म स्थान. पालवंकर ने ‘चमार’ जाति के परिवार में जन्म लिया. देश में अंग्रेजों के आ जाने के बाद से एक अच्छी बात हुई थी. अछूत समझे जाने वाले ‘नीची जाति’ के लोगों का जाति के आधार पर पहले से ही दिए गए कामों को छोड़कर और काम करने का जुगाड़ बन गया था.

पालवंकर बालू का एक छोटा भाई भी था. शिवराम. पूना में ही इन दोनों ने अंग्रेजों की ख़राब समझकर छोड़ दी गयी किट से क्रिकेट खेलना सीखा. बालू की एक क्रिकेट क्लब में नौकरी भी लग गयी. ये क्लब पारसी चलाते थे. इसमें कभी-कभी बालू को प्रैक्टिस कर रहे खिलाड़ियों के लिए बॉल फेंकने का भी मौका मिल जाता था. क्लब में बालू को तीन रुपये महीना मिल रहा था.

1892 के आस-पास बालू पूना के यूरोपीय क्रिकेट क्लब पहुंचे. अब वेतन 4 रूपए महीना हो गया था. पिच की मरम्मत, नेट लगाना और ज़रूरत के हिसाब से टेनिस कोर्ट पे निशान लगाना उनके काम में शामिल हो गया. साथ ही प्रमोशन के तौर पे खिलाड़ियों को बॉलिंग करने को भी मिल जाता था. वहां एक अंग्रेज हुआ करता था. मिस्टर ट्रॉस. बालू को उसी ने पहचाना. बालू से ही गेंद फिंकवाते. उन्हीं की गेंद पर प्रैक्टिस करते.


बालू की बातें होने लगीं. ये कोई छोटी बात नहीं थी. सचिन तेंदुलकर जब न्यूज़ीलैंड टूर पे गए थे तो अपने साथ एक लड़का ले गए थे. न्यूज़ीलैंड की तेज़ पिच पर खेलने की प्रैक्टिस के लिए वो लड़का उन्हें एक जगह खड़े होकर गेंद फेंकता था. सहवाग भी एक मेटल के फट्टे पर गेंदें फिंकवाते थे. इससे गेंद स्किड होकर बल्ले पर तेज़ आती थी. पेस अडजस्ट करने का यही तरीका था. इसलिए प्लेयर्स किसकी गेंदों पर प्रैक्टिस कर रहे हैं, ये हमेशा से मायने रखता आया है. बालू का आलम ये हो गया था कि बड़े-बड़े नाम उनकी गेंदों को खेलना चाहते थे. इसी क्रम में पूना के अंग्रेज क्रिकेट कैप्टन जे जे ग्रेग भी अब प्रैक्टिस में बालू की गेंदें खेलते. कभी अगर बालू उन्हें आउट कर लेते तो उन्हें आठ आने मिलते. इस लिहाज़ से अगर वो एक हफ़्ते में एक बार उन्हें आउट कर ले जाते तो उनकी तनख्वाह दोगुनी हो जाती थी.


प्रैक्टिस कराते-कराते बालू की भी प्रैक्टिस हो रही थी. लाइन और लेंथ दुरुस्त होती चली गयी. अब हुआ ये कि उनकी बातें और भी ज़्यादा इधर-उधर होने लगीं. गेंद में उछाल और धारदार स्पिन वाला बॉलर. इस नाम से जाने जाने लगे बालू.

पूना में ही एक हिंदू क्लब था. बालू चूंकि जाति से ‘चमार’ थे, हिंदू क्लब में उन्हें शामिल किया जाना मुश्किल में था. क्लब के लोग इस बात पर दो गुटों में बंट गए. कुछ उन्हें शामिल करना चाहते थे, कुछ नहीं. वजह – उनकी जाति. इस लड़ाई में अहम रोल निभाया कप्तान ग्रेग ने. वैसा ही रोल जैसा कचरा के लिए लगान मूवी में भुवन ने निभाया था.

उन्होंने कहा कि हिंदू क्लब अगर बालू को शामिल नहीं करेगा तो अपनी मूर्खता का परिचय देगा. ग्रेग का ये मास्टर स्ट्रोक था. दरअसल उन्हें बालू के जीवन से कुछ ख़ास लगाव नहीं था. वो बस मैच में उन्हें फ़ेस करना चाहते थे. ग्रेग को चैलेन्ज पसंद था. अंत में बालू को हिंदू क्लब में शामिल कर लिया गया.

अब तस्वीर पलट चुकी थी. वो हो रहा था जो कभी नहीं हुआ था. लगान याद है? आमिर खान वाली. कचरा को टीम में लाने के लिए भुवन ने गदर काट दिया था. “फिर काहे पूजते हो राम जी को? जिनने सबरी के जूठे बेर खाए. जो भगवान सबकी नइय्या पार करावत हैं, ऊकी नइय्या एक छोटी जाती के नाविक ने पार लगाई. ई सब जानने के बाद भी छूत-अछूत की बात करे हौ?” अब मैच के दौरान होता ये था कि बालू की छुई हुई गेंद को पूना हिंदूज़ के ‘ऊंची जाति’ के लोग छू रहे थे.

मगर एक समस्या अब भी दिख रही थी.  लंच ब्रेक या नाश्ते के दौरान बालू को पत्तल में खाना और कुल्हड़ में चाय मिलती. बाकी सभी को चीनी-मिट्टी के बर्तनों में परोसा जाता. लेकिन इसका बदला बालू मैदान में लेते थे. मैदान पर आते ही बालू सबके ऊपर पहुंच जाते थे. उनके विकेट सभी से ज़्यादा रहते थे. पूना हिंदूज़ की सफ़लता में पालवंकर बालू का एक बहुत बड़ा योगदान था.


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