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पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री को फांसी देकर उसके प्राइवेट पार्ट की तस्वीर क्यूं खींची?

आज 18 मार्च है और आज की तारीख़ का संबंध है, पाकिस्तान की एक हाई-कोर्ट के एक अजीब से फ़ैसले से. फ़ैसला जो इतना विवादास्पद रहा था कि बाद में पत्रकार, जानकार, इतिहासकार और लॉ के तटस्थ एक्सपर्ट इस फ़ैसले को ‘बनाना कोर्ट’ का फ़ैसला या ‘मॉक ट्रायल’ कहने लगे.


5 जनवरी, 1928. फज्र की नमाज के वक्त शाहनवाज भुट्टो के घर में लड़का पैदा हुआ. लड़के का नाम रखा गया: जुल्फिकार. मुसलमानों के चौथे खलीफा हजरत अली की तलवार के नाम पर. सब जुल्फी पुकारते.

जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ उनके पिता शहनवाज भुट्टो जूनागढ़ के राजा महब्बत खान रसूल अल खानजी के दीवान बन गए. सितंबर 1947 में जुल्फी बंबई से अमेरिका के लिए रवाना हुए. नवंबर 1953 में पढ़ाई-लिखाई खत्म करके पाकिस्तान पहुंचे. मगर तब भी वो भारत के ही नागरिक थे. 1957 में जब इस्कंदर मिर्जा ने जुल्फी को अपने कैबिनेट में लिया, उसके कुछ दिनों पहले तक भी जुल्फी ने भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी थी.

तस्वीर में: बंटवारे की त्रासदी. शरणार्थी कैंप. (AFP)
तस्वीर में: बंटवारे की त्रासदी. शरणार्थी कैंप. (AFP)

ख़ैर, इसके बाद वो पॉलिटिक्स की सीढ़ियां चढ़ते रहे और अंत में प्रधानमंत्री बन गए. उनकी सरकार, अपने शुरुआती दिनों में आवाम की सरकार थी. लोग उनको कायद-ए-आवाम कहते. उनका नारा था- रोटी, कपड़ा और मकान. पॉलिसी थी- इस्लामिक समाजवाद.

उनकी सरकार कृषि क्षेत्र में पैसा खर्च कर रही थी. मजदूरों के भी अधिकार बढ़ा रही थी. भुट्टो खुद जमींदार परिवार के थे, फिर भी उन्होंने वादा किया कि सामंतों की मुट्ठी से जमीनें लेकर आम लोगों में बांटेंगे. अपने ऐसे ही फैसलों और वादों की वजह से भुट्टो आम लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय थे. गरीबों, भूमिहीनों, मजदूरों, छात्रों और औरतों के बीच. 14 अगस्त, 1973 को भुट्टो ने पाकिस्तान को उसका नया संविधान दिया. वही संविधान, जो आज भी वहां चल रहा है.

तस्वीर ज़ुल्फ़िकार के एक भाषण की है. उनकी पॉप्युलरटी बढ़ती जा रही. थी. (AFP)
तस्वीर ज़ुल्फ़िकार के एक भाषण की है. उनकी पॉप्युलरटी बढ़ती जा रही. थी. (AFP)

दूसरा पहलू.

ये सब आपको तारीख़ के ‘जूलियस सीज़र’ वाले एपिसोड में भी पढ़ने को मिला होगा, जिसमें जूलियस ग़रीबों के हितैषी बनकर पावरफुल होते चले गए. इतने कि उनकी शक्तियों से डरकर सिनेटर्स ने उनका क़त्ल कर डाला. ये रही वो स्टोरी-

पढ़ें: जब 29 बार चाकू मारकर जूलियस सीज़र की हत्या हुई और कालजयी मुहावरे का जन्म हुआ

तो, ऐसा ही कुछ मिस्टर भुट्टो के साथ भी होने लगा. हुआ क्या कि धीरे-धीरे भुट्टो में तानाशाह की झलकियां दिखाई देने लगी थीं. विरोधियों की न सुनना. कोई विरोध करे, तो पूरे जोर से उसे दबा देना. आलोचनाओं पर दुश्मनी निकालना. अब भुट्टो के सारे विरोधी उनके खिलाफ एकजुट होने लगे थे. पहले 9 विरोधी पार्टियां एकजुट हुईं, उनके ख़िलाफ़ गठबंधन बनाया. नाम रखा गया- पाकिस्तान नैशनल अलायंस. PNA. 7 मार्च, 1977 को चुनाव हुए. नतीजा आया तो, भुट्टो की पार्टी PPP, यानी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को मिलीं 155 सीटें. PNA को बस 36 सीटें हासिल हुईं. विरोधियों ने इल्जाम लगाया कि चुनाव में धांधली हुई है. उन्होंने भुट्टो के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए.

तस्वीर में: भुट्टो के ख़िलाफ़ PNA के हिंसक प्रदर्शन. (AFP)
तस्वीर में: भुट्टो के ख़िलाफ़ PNA के हिंसक प्रदर्शन. (AFP)

भुट्टो की तमाम कोशिशों के बावजूद उनके खिलाफ विरोध बढ़ता गया. यहां तक कि उनके पास अमेरिका का भी सपोर्ट नहीं था. अमेरिका को लगता, वो भुट्टो को कंट्रोल नहीं कर पा रहा है.

उन्होंने खुद को इस्लामिक दिखाने की भी पूरी कोशिश की. शराब पर बैन लगा दिया. नाइट क्लब्स बंद करवा दिए. इतवार की जगह शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश घोषित कर दिया. मगर इन सबका असर नहीं हुआ. भुट्टो के खिलाफ विरोध बढ़ता ही गया. ये विरोध हिंसक भी हो चला था. इसे दबाने के लिए भुट्टो ने एक चालाकी दिखाने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान, ईरान और भारत, तीनों मिलकर पाकिस्तान पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं. मगर भुट्टो की ये तरकीब काम नहीं आई.

और एक दिन 4 और 5 जुलाई, 1977 की दरम्यानी रात को भुट्टो का तख्तापलट हो गया. जिस जिया-उल-हक को भुट्टो ने अपना आर्मी चीफ बनाया था, उसने ही भुट्टो की गद्दी छीन ली. भुट्टो को जेल भी भेज दिया गया.

फिर आई आज की तारीख़ यानी 18 मार्च. साल था, 1978.

इस दिन लाहौर की हाई कोर्ट ने भुट्टो को अहमद रज़ा कसूरी की हत्या करवाने के प्रयास का और कसूरी के पिता, की हत्या करवाने का दोषी पाया गया. उन्हें मृत्युदंड दे दिया गया.

अहमद रज़ा कसूरी एक ‘आदर्शवादी’ नज़रिए के राजनेता थे. पहले भुट्टो के साथ ही थे लेकिन बाद में धुर विरोधी हो गया थे. अहमद रज़ा ने ये भी दावा किया था कि भुट्टो दरअसल उन्हें ही मारना चाहते थे. और उनके हत्या के 15 प्रयास किए जा चुके थे.

तस्वीर में: लाहौर का हाई कोर्ट. (AFP)
तस्वीर में: लाहौर का हाई कोर्ट. (AFP)

हालांकि कई विदेशी पत्रकारों और इतिहासकारों का आज भी मानना है कि ये पूरा केस झूठ की बुनियाद पर खड़ा था. और इसके बाद कि अपीलें भी.

भुट्टो को लगता था कि उन्हें फाँसी की सज़ा का फ़रमान तो दिया जा सकता है पर उन्हें फाँसी देने की हिम्मत किसी में नहीं. वो अंत-अंत तक यही मानते रहे. लेकिन, उनकी उम्मीद से उलट 4 अप्रैल, 1979 को रात के दो बजे उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया. BBC के लिए शुमैला जाफ़री के लिखे एक आर्टिकल के अनुसार-

जब गार्ड आए तो वह गहरी नींद में थे. उन्होंने उनको उठने और फांसी के लिए चलने को कहा लेकिन वो उठ नहीं पाए. फिर उन्हें स्ट्रेचर पर रखा गया. जो गार्ड उन्हें लेने गए थे, उनमें जेल सुपरिटेंडेंट भी थे. उन्होंने उनसे कहा कि इस वक़्त आपको ख़ुद से उठ जाना चाहिए. उन्होंने अपना सिर थोड़ा सा उठाया लेकिन वह फिर दोबारा सो गए. जब उन्हें फांसी के तख़्त तक ले जाया गया तो जेल सुपरिटेंडेंट ने उनसे फिर कहा कि लोग आपको देख रहे हैं. आपको सिर उठाकर इसका सामना करना चाहिए. इसके बाद उनके अंदर जुंबिश हुई और वे उठ खड़े हुए पर वे सहारा लेकर ही खड़े हो सके.

फांसी के कुछ समय बाद, भुट्टो के शव को उनके गांव ले जाया गया और उनकी पैतृक ज़मीन में दफना दिया गया. इस दौरान वहां उनकी बेटी, बेनज़ीर भुट्टो और उनकी पत्नी बेग़म नुसरत भुट्टो को वहां उपस्थित होने की इजाज़त नहीं दी गई.

यहीं दफ़नाया गया था ज़ुल्फ़ी का शव. (विकिपीडिया/पब्लिक डोमेन)
यहीं दफ़नाया गया था ज़ुल्फ़ी का शव. (विकिपीडिया/पब्लिक डोमेन)

कुछ सालों बाद बेनज़ीर भुट्टो भी पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं थीं, लेकिन उनका हश्र भी अपने पिता से कम बुरा नहीं हुआ था. उनकी भी हत्या कर दी गई थी. ज़ुल्फ़िकार और उनकी बेटी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए आप हमारे इन लिंक्स पर जा सकते हैं:

पढ़ें: वो PM जिसे फांसी देने के बाद नंगा करके तस्वीर ली गई, ताकि पता चले खतना हुआ था कि नहीं

पढ़ें: पहले बाप. फिर दोनों भाई. और फिर दो बार PM रह चुकी उस औरत को मार डाला गया

अंत में एक बात और.

भुट्टो पर ‘सच्चा मुसलमान’ न होने का भी इल्जाम था. उनकी मां शादी के पहले तक हिंदू थीं. नाचने-गाने के पेशे से थीं. विरोधी कहते कि भुट्टो में इस्लामिक तहजीब नहीं है. कि वो पक्के मुसलमान नहीं हैं. वो नमाज पढ़ते हैं या नहीं, या फिर उन्हें नमाज पढ़नी आती भी है या नहीं, इस बात पर भी लोग शक जताते थे.

ज़ुल्फ़ी की बेटी बेनज़ीर भुट्टो की होर्डिंग. (AFP)
ज़ुल्फ़ी की बेटी बेनज़ीर भुट्टो की होर्डिंग. (AFP)

ये सब कितना ज्यादा था, इसे समझने के लिए हमें कर्नल रफीउद्दीन की किताब ‘भुट्टो के आखिरी 323 दिन’ का एक किस्सा जानना चाहिए. जब भुट्टो रावलपिंडी जेल में बंद थे, तब कर्नल रफीउद्दीन वहां के सिक्यॉरिटी इन-चार्ज थे. उन्होंने लिखा है-

जब भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया, तो खुफिया एजेंसी ने एक फोटोग्रफर को भुट्टो की तस्वीर लेने भेजा. उसे ब्रीफ दिया गया था कि वो भुट्टो के प्राइवेट पार्ट की तस्वीर खींचकर लाए. वे लोग देखना चाहते थे कि भुट्टो एक ‘सच्चे मुसलमान’ थे कि नहीं?

‘भुट्टो के आखिरी 323 दिन’ के दो एडिशन. (AFP)
‘भुट्टो के आखिरी 323 दिन’ के दो एडिशन. (AFP)

पता चला कि भुट्टो, कम से कम इस ख़ुफ़िया एजेंसी के मानकों के हिसाब से, एक ‘सच्चे मुसलमान’ थे.


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