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देश की आन-बान-शान है तिरंगा, क्या आप जानते हैं इससे जुड़ी ये बातें

तमाम लोगों की तरह इस बार सचिन तेंदुलकर का जन्मदिन भी लॉकडाउन की पाबंदियों में मना. 24 अप्रैल को जब उनसे एक अखबार ने पूछा कि अब कोरोना काल में तो क्रिकेट न हो पाएगा? और होगा भी तो लाइव देखने वाले तो स्टेडियम में नहीं होंगे? तो जानते हैं सचिन का जवाब क्या था? उन्होंने कहा कि फिर तो खेलने में दिल ही नहीं लगेगा. बिना शोर मचाते फैन्स के भला कोई मैच होता है. सचिन ही नहीं, कोई भी हिंदुस्तानी खिलाड़ी जब भी जोश से लबरेज फैन्स को हाथों में तिरंगा लहराते हुए देखता होगा तो उनका उत्साह भी दोगुना हो जाता होगा. यह खिलाड़ी ही नहीं, देश के हर व्यक्ति के मनोबल को ऊंचा कर सकता है. उसके सीने में विश्वास भर सकता है. मौका है स्वतंत्रता दिवस का. इसलिए आज हम बात करेंगे अपने तिरंगे की. इसका इतिहास, इसे ससम्मान फहराने के नियम-कायदों की. आसान भाषा में.

सबसे पहले जान लीजिए, इसे बनाया किसने था?

भारत के लिए झंडा बनाने की कोशिशें हालांकि पहले भी हो चुकी थीं लेकिन आजकल दिखने वाले तिरंगे की परिकल्पना आंध्र प्रदेश के पिंगली वैंकैया ने की थी। उनकी चर्चा महात्मा गांधी ने 1931 में अपने अखबार यंग इंडिया में की है. वैंकया भी बहुत रोचक शख्स थे. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ने के बाद वह सरकारी कर्मचारी बने लेकिन गांधी जी के संपर्क में आने के बाद उनके विचार बदल गए. उन्हें झंडों में बहुत रुचि थी. गांधी जी ने उनसे भारत के लिए एक झंडा बनाने को कहा. वैंकेया ने 1916 से 1921 तक 30 देशों के झंडों पर रिसर्च की. आखिर में एक झंडा डिजाइन किया. 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पिंगली वैंकया महात्मा गांधी से मिले और उन्हें अपना डिज़ाइन किया लाल और हरे दो रंगों से बनाया हुआ झंडा दिखाया. गांधी जी उनसे काफी प्रभावित हुए. इसके बाद देश में कांग्रेस पार्टी के सारे अधिवेशनों में दो रंगों वाले झंडे का इस्तेमाल होने लगा. लेकिन उस समय इस झंडे को कांग्रेस की ओर से अधिकारिक तौर पर स्वीकृति नहीं मिली थी. इस बीच, जालंधर के लाला हंसराज ने झंडे में चक्र चिन्ह बनाने का सुझाव दिया. ये वही लाला हंसराज थे, जिन्होंने पूरे पंजाब में आर्य समाज के प्रचार-प्रसार का काम किया था. इन्होंने पंजाब में कई डीएवी स्कूलों की स्थापना करवाई. दिल्ली यूनिवर्सिटी का हंसराज कॉलेज भी इन्हीं के नाम पर स्थापित किया गया है. इस चक्र को प्रगति और आम आदमी के प्रतीक के रूप में देखा गया. बाद में, गांधी जी के सुझाव पर पिंगली वेंकैया ने शांति के प्रतीक सफेद रंग को भी राष्ट्रीय ध्वज में शामिल किया. हमारा तिरंगा धीरे-धीरे अपना स्वरूप लेने लगा था. 1931 में कांग्रेस ने कराची के अखिल भारतीय सम्मेलन में केसरिया, सफ़ेद और हरे तीन रंगों से बने झंडे को स्वीकार किया. हालांकि तब झंडे के बीच में अशोक चक्र नहीं बल्कि चरखा था.

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पिंगली वैंकैया ने पहली बार झंडे का आधुनिक डिजाइन तैयार किया.

कैसे बना तिरंगा देश का झंडा?

कुछ साल बाद तिरंगे के बीच में चरखे की जगह अशोक चक्र ने ले ली. इस झंडे को भारत की आजादी की घोषणा के 24 दिन पहले 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया. इसे सभी सरकारी इमारतों पर फहराए जाने की व्यवस्था तब से ही रही है. झंडे को इस्तेमाल करने और फहराने के लिए The Emblems and Names (Prevention of Improper Use) Act, 1950 बनाया गया.

अब जानिए झंडे की बारीकियों के बारे में.

तिरंगे के बारे में पूरी जानकारी भारतीय ध्वज संहिता यानि फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002 से मिलती है. इसके तीन भाग हैं. पहला भाग, झंडे के बारे में सामान्य जानकारी देता है. जैसे किस रंग का होना चाहिए, साइज क्या होना चाहिए आदि. दूसरे भाग में झंडे को आम जनता, प्राइवेट संस्थान और स्कूल आदि कैसे इस्तेमाल करेंगे, इसके बारे में जानकारी है. तीसरा भाग सरकारों और उनसे जुड़ी एजेंसियों द्वारा झंडे के इस्तेमाल के नियम कायदे बताता है.

जैसा कि आप देखते ही हैं कि हमारे तिरंगे में तीन रंग की वर्टिकल यानी क्षैतिज पट्टियां हैं. सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद और नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी है. ये तीनों एक बराबर होती हैं. झंडे की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है. मतलब चौड़ाई 2 फुट और लंबाई 3 फुट होगी. साइज के अनुपात में यह इसी हिसाब से बढ़ता जाता है. जैसे अगर झंडा 4 फुट चौड़ा है तो उसकी लंबाई 6 फुट होगी. सफेद पट्टी के बीच में गहरे नीले रंग का एक चक्र है. यह चक्र सम्राट अशोक की राजधानी रही सारनाथ के स्तंभ पर बना हुआ है. इसमें 24 तीलियां हैं. वैसे तो अब तिरंगा हर साइज में और हर सड़क-चौराहे पर नजर आ जाएंगे, लेकिन इसे बनाने के नियम-कायदे फिक्स हैं.

1951 में पहली बार भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने राष्ट्रीय झंडे के लिए कुछ नियम तय किए थे. 1968 में आधिकारिक तौर पर तिरंगा बनाने के भी मानक तय किए गए. ये नियम काफी सख्त हैं. एक नजर डालिए-

# केवल खादी या हाथ से काते गए कपड़े से ही झंडा बनाया जा सकता है.

# कपड़ा बुनने से लेकर झंडा बनने तक इसकी कई बार टेस्टिंग की जाती है. झंडा बनाने के लिए दो तरह की खादी का इस्तेमाल होता है. एक वह खादी, जिससे कपड़ा बनता है और दूसरा खादी-टाट यानी मोटी वाली खादी.

# झंडे के लिए बनाए गए खादी की बुनाई भी सामान्य बुनाई से अलग होती है.

# कर्नाटक के धारवाण जिले के पास गदग और कर्नाटक के बागलकोट में ही खादी की ऐसी आधिकारिक बुनाई की जाती है. हुबली में एकमात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान है, जहां पर झंडा बनाया जाता है.

# बुनाई से लेकर बाजार में पहुंचने तक कई बार बीआईएस यानी ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड की प्रयोगशालाओं में इसका परीक्षण होता है.

# बुनाई के बाद सामग्री को परीक्षण के लिए भेजा जाता है. कड़े गुणवत्ता परीक्षण के बाद उसे वापस कारखाने भेजा जाता है.

# इसके बाद उसे तीन रंगों में रंगा जाता है. केंद्र में अशोक चक्र काढ़ा जाता है.

# उसके बाद इसे फिर परीक्षण के लिए भेजा जाता है. बीआईएस झंडे की जांच करता है, इसके बाद ही इसे फहराया जा सकता है.

तिरंगे के अपमान पर सजा कितनी है?

प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टु नैशनल ऑनर ऐक्ट 1971 के तहत राष्ट्रीय झंडे और संविधान का अपमान करना दंडनीय अपराध है. ऐसा करने वाले को 3 साल तक की जेल या फिर जुर्माना या फिर दोनों की सजा हो सकती है. इसी तरह, राष्ट्रगान को जानबूझकर रोकने या फिर राष्ट्रगान गाने के लिए जमा हुए लोगों के लिए बाधा खड़ी करने पर अधिकतम 3 साल की सजा दी जा सकती है. इसके साथ जुर्माना भरने का भी आदेश दिया जा सकता है.

तिरंगा फहराने का सही तरीका क्या है?

राष्ट्रीय ध्वज फहराने को लेकर फ्लैग कोड ऑफ इंडिया में बहुत तफ्सील से नियम बताए गए हैं लेकिन हम यहां पर आपको कुछ सामान्य नियम बता रहे हैं, जिससे आप तिरंगे को कायदे से फहरा सकें.

# यदि खुले में झंडा फहराया जा रहा है तो हमेशा सूरज उगने पर फहराया जाना चाहिए और सूरज ढलने से पहले पर उतार देना चाहिए.

# झंडे को झुका हुआ नहीं होना चाहिए.

# झंडे का रंग-रूप नहीं बदला जा सकता, न ही इसे उल्टा लगाया या फहराया जा सकता है.

# झंडे पर कुछ लिखा भी नहीं जा सकता.

# संहिता में यह भी बताया गया है कि इसे लंबे रूप में लटकाया नहीं जा सकता। झंडे को 90 डिग्री में घुमाया भी नहीं जा सकता.

# झंडे को बुरी और गंदी स्थिति में न फहराया जाए। यही नियम झंडे के खंभे और रस्सियों पर भी लागू होता है.

# जान-बूझकर झंडे को जमीन छूने देना या पानी में सराबोर होने देना भी दंडनीय अपराध माना जाता है.

पहले सबको नहीं थी तिरंगा फहराने की आजादी

सन 2002 से पहले, भारत की आम जनता सिर्फ गिने-चुने राष्ट्रीय त्योहारों पर ही झंडा फहरा सकती थी. इसके विधि-विधान की चर्चा The Emblems and Names (Prevention of Improper Use) Act, 1950 और Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 (No. 69 of 1971) में तफ्सील से की गई थी. लेकिन 2002 में इसमें बड़ा बदलाव किया गया. पूर्व सांसद और बिजनेसमैन नवीन जिंदल ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस प्रतिबंध को हटाने के लिए जनहित याचिका दायर की. जिंदल ने जानबूझ कर झंडा संहिता का उल्लंघन किया और अपने ऑफिस की इमारत पर झंडा फहराया. झंडे को जब्त कर लिया गया और उन पर मुकदमा चलाने की चेतावनी भी दी गई. जिंदल ने इस पर बहस की. एक नागरिक के तौर पर मर्यादा और सम्मान के साथ झंडा फहराने के अधिकार को देश प्रेम व्यक्त करने का तरीका बताया. इस पर तत्कालीन सरकार का भी ध्यान गया और केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय झंडा संहिता में 26 जनवरी 2002 को संशोधन किए. इसके जरिए आम जनता को साल के सभी दिनों में झंडा फहराने की अनुमति दी गयी.

कब, कहां फहराया जा सकता है?

पहले झंडा सिर्फ सरकारी इमारतों पर ही फहराया जा सकता था लेकिन 26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्वज संहिता में संशोधन किया गया. देश के आजाद होने के 55 साल बाद देश की आम जनता को भी अपने घरों, ऑफिसों, फैक्ट्रियों और दूसरी जगहों पर इस फहराने की छूट दी गई. अब कोई भी भारतीय नागरिक राष्ट्रीय झंडे को फहरा सकता है. बशर्ते वह तिरंगे को फहराने के नियम-कायदों का पालन करे और झंडे के सम्मान में कोई कमी न आने दे.
तो इस स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा जरूर फहराएं और इसकी आन, बान और शान का पूरा ध्यान रखें.


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