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इस पहलवान ने घर-घर हाथ फैलाया, मकान गिरवी रखा, तब जाकर देश को मिला पहला ओलंपिक मेडल

कुश्ती तो इनकी रगों में दौड़ती थी. 5 साल की उम्र में ही उठापटक के दांवपेच सीखने शुरू कर दिए थे. 8 साल के हुए तो अपने इलाके के सबसे धाकड़ पहलवान को महज 2 मिनट में धूल चटा दी. थोड़ा बड़े हुए और वक्त आजादी के लिए संघर्ष का आया तो सब छोड़छाड़ खुद को इसमें झोंक दिया. देश आजाद हुआ. हर ओर तिरंगा लहरा रहा था. इनके अंदर का पहलवान फिर जाग गया. प्रण लिया कि विश्व की सबसे बड़ी प्रतियोगिता यानी ओलंपिक में तिरंगा लहराऊंगा और तिरंगा लहराके ही माने. बात हो रही है देश को ओलंपिक में किसी सिंगल प्रतियोगिता में पहला मेडल दिलवाने वाले खाशाबा दादासाहेब जाधव की. लोग इन्हें के.डी जाधव के नाम से ज्यादा याद रखते हैं. बात उस पहले मेडल की, जिस पर हिंदुस्तान 44 साल इतराया. दूसरा 1996 में टेनिस में लिएंडर पेस ला सके. 15 जनवरी 1926 को जन्मे और 14 अगस्त, 1984 को दुनिया को अलविदा कहने वाले भारत के इस पॉकेट डायनैमो की कहानी बेहद खास है.

1948 में दुनिया ने देखा, कोई भारतीय पहलवान आया है

जाधव के पिता दादासाहेब जाधव जाने-माने पहलवान थे. ऐसे में बचपन से ही उनको कुश्ती का चस्का लग गया था. खूब लड़े-भिड़े भी. इस बीच देश आजाद हुआ और बारी आई विरासत में मिले हुनर को आजमाने की. हौंक के मेहनत की जाधव ने. 1948 में लंदन ओलंपिक की बारी आई तो जाधव को समझ आया कि मेहनत के साथ पैसा भी चाहिए. और पैसा था नहीं. खैर, हाथ-पैर मारे तो पैसे का इंतजाम हो गया. कुछ पैसा कोल्हापुर के महाराज ने दिया तो कुछ पैसे का इंतजाम गांव वालों ने किया. जाधव भइया ने भी इन पैसों की कीमत खूब चुकाई. 52 किलो की कैटेगरी में वो लंदन ओलंपिक में छठे नंबर पर आए. उनके देसी मगर फुर्तीले दांवपेच देखकर ही उन्हें अमेरिका के पूर्व कुश्ती विश्व चैंपियन रईस गार्डनर ने कोचिंग भी दी थी. वो लंदन से मेडल भले ना ला पाए, मगर अगली बार के लिए अपनी दावेदारी जरूर ठोक दी थी.

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टिकट कटा, फिर लगा जुगाड़ और पहुंचे ओलंपिक

लंदन ओलंपिक से लौटने के बाद तो जाधव ठान ही चुके थे कि उन्हें ओलंपिक मेडल लाना है. सो वो अगले 4 सालों तक जुटे रहे. और फिर 1952 को वो वक्त आ ही गया, जब हेलसिंकी में जाधव इतिहास रचने वाले थे. मगर इतिहास रचने के पहले जाधव को खूब पापड़ बेलने पड़े. सरकारी सेलेक्टरों ने तो उनकी नैया डुबोने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. ओलंपिक की लिस्ट से उनका नाम तक कट गया था. लेकिन जाधव ने हार नहीं मानी और पटियाला के महाराजा से इंसाफ की गुहार लगाई. महाराजा खुद खेलकूद के शौकीन थे. ऐसे में जुगाड़ लग गया और जाधव को ट्रायल में हिस्सा लेने का मौका मिल गया. जाधव जानते थे कि अभी नहीं तो कभी नहीं. फिर क्या, जो उनके सामने आया, ढेर कर दिया गया और उनकी ओलंपिक टिकट पक्की हो गई.

फिर दुनिया में छा गया पॉकेट डायनैमो

हेलसिंकी ओलंपिक जाने की सीट तो पक्की हो गई थी. मगर बात एक बार फिर अटक गई पइसे पर. जाधव एक बार फिर जुगाड़ में लग गए, मगर इस बार उन्हें पैसे के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी. उनके घरवालों ने पैसे इकट्ठा करने के लिए गांव के हर घर का दरवाजा खटखटाया. कुछ से मदद मिली भी, मगर वो नाकाफी थी. कहते हैं कि जाधव के परिवार वालों ने मुंबई के तत्कालीन मुख्यमंत्री से 4000 रुपये की मदद की गुहार लगाई थी, मगर वो इतना भी नहीं कर सके. नौबत ये आ गई कि उनको मराठा बैंक ऑफ कोल्हापुर में अपना घर तक गिरवी रखना पड़ा. यहां से जाधव को 7000 रुपये मिले. उनकी किट का इंतजाम उनके दोस्तों ने किया. इसके बाद वो ओलंपिक गए तो अपने चाहने वालों को निराश नहीं किया.

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ओलंपिक में उनका पाला विश्व भर के बड़े-बड़े सूरमाओं से पड़ने वाला था. मगर जाधव भी कम जोश में नहीं थे. इसे ऐसे समझिए कि वो लगातार पांच शुरुआती मुकाबले जीत गए थे. कोई भी पहलवान उनके आगे 5 मिनट नहीं टिक सका था. मगर इसके बाद हुआ जबराट वाला मुकाबला. सामने था जापानी रेसलर सोहाची इशी. मुकाबला 15 मिनट चला. जाधव ने उसे बराबर से हौंका, मगर 1 पॉइंट से मुकाबला हार गए. इशी फाइनल में पहुंच गया. जाधव के पास फाइनल में पहुंचने का एक और मौका था, मगर जो हुआ, वो मूड खराब करने वाला है. इस बाउट के तुरंत बाद ही उनको सोवियत यूनियन के पहलवान राशिद मम्मादबियोव से भिड़वा दिया गया. जबकि नियमों की धूल खा रही डायरी की मानें तो एक बाउट के बाद दूसरा बाउट 30 मिनट के बाद होना चाहिए. मगर इस नियम को उठाकर न्याय की मांग करने वाला कोई भारतीय अधिकारी वहां नहीं था. नतीजा लगातार 6 बाउट लड़ चुके जाधव को भयानक थके होने के बावजूद मुकाबले में उतरना पड़ा. वो ये मुकाबला हार गए और देश को कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा.

सरकार भूली पर गांव वालों ने हमेशा रखा सिर आंखों पर

15 जनवरी, 1926. इसी दिन जाधव का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक छोटे से गांव गोलेश्वर में हुआ था. गोलेश्वर के लोगों के जाधव हमेशा चहेते रहे. चाहे ओलंपिक में उनके जाने के लिए चंदा इकट्ठा करने की बात हो या उनका हौसला बढ़ाने की बात हो. जाधव जब ओलंपिक से देश के लिए एकल मुकाबले में पहला पदक लेकर लौटे तो सरकार ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी. सबकी नजरें ओलंपिक में उसी साल गोल्ड जीतकर लौटी हॉकी टीम पर थी. मगर गोलेश्वर यानी उनका गांव उन्हें नहीं भूला. ऐसा भौकाली स्वागत किया, जो जाधव कभी ना भूलने वाले थे. गांव के लोग 151 बैलगाड़ियों से जाधव का स्वागत करने पहुंचे. ढोल-नगाड़ों के साथ आए लोग नाचते-गाते हुए अपने इस लाल को स्टेशन से गांव ले गए. यादगार जश्न मनाने वाले ये गांववाले जाधव को उनके मरने के बाद भी नहीं भूले. 14 अगस्त, 1984 को उनके निधन के बाद गांववालों ने गांव में उनकी मूर्ति लगवा जाधव को अमर कर दिया. जाधव ने 30 साल महाराष्ट्र पुलिस को भी अपनी सेवाएं दीं.

पुलिस सर्विस के दौरान कई बार जाधव ने नैशनल गेम्स में खिलाड़ियों को ट्रेनिंग दी.

पुलिस सर्विस के दौरान कई बार जाधव ने नेशनल गेम्स में खिलाड़ियों को ट्रेनिंग दी.

जब जाधव का परिवार बोला, नीलाम कर देंगे मेडल

देश के हुक्मरानों ने या कहें सरकारों ने कैसे उन्हें नकारा, इसके कई किस्से ऊपर आपने पढ़े. मगर ये शर्मनाक है. आप शायद विश्वास ना करें कि जाधव इकलौते ओलंपिक पदक विजेता हैं, जिन्हें पद्म अवॉर्ड नहीं मिला है. 25 जुलाई 2017 को जाधव के बेटे रंजीत केडी जाधव ने तो पिता के जीते ब्रॉन्ज मेडल को नीलाम करने की धमकी दे डाली थी. उनकी नाराजगी सरकार के रवैये को लेकर थी. दरअसल 2009 में महाराष्ट्र सरकार ने गोलेश्वर में एक रेसलिंग एकेडमी खोलने की घोषणा की थी. इसके लिए फंड को भी मंजूर कर दिया गया था. मगर कुछ नहीं हुआ.


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