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देश की पहली महिला ग्रेजुएट जिसे लोग वेश्या कहते थे

आजादी के तकरीबन 50 साल पहले फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने अपनी एक सहेली को एक चिट्ठी लिखकर कहा;


‘तुम मुझे मिसेज गांगुली के बारे में कुछ बता सकती हो? या कोई नसीहत दे सकती हो? उसने मेडिसिन और सर्जरी की पहली परीक्षा अभी से ही पास कर ली है और मार्च में फाइनल एग्जाम देने जा रही है. मिसेज गांगुली शादी के बाद पढ़ाई कर रही हैं! और उनके दो नहीं तो कम से कम एक बच्चा तो है ही! इसके बावजूद वो कॉलेज से 13 दिनों के लिए एब्सेंट रहीं! और जहां तक मैं जानती हूं, मैंने कोई भी लेक्चर मिस नहीं किया है!’


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इंडिया की पहली फीमेल ग्रेजुएट

जिस मिसेज गांगुली ने फ्लोरेंस नाइटिंगेल को शॉक दिया था, वो असल में इंडिया में ग्रेजुएट होने वाली पहली औरत थीं. सिर्फ उतना ही नहीं, इंडिया की पहली महिला डॉक्टर भी थीं. ब्रिटिश राज में. ये थीं कादम्बिनी गांगुली, जो 1861 में पैदा हुई थीं और आज उनकी बरसी है. कादम्बिनी उस दौर की महिला हैं, जब समाज लड़कियों की शिक्षा के लिए राजी नहीं था. बहुत अड़ंगे लगाता था, लेकिन कादम्बिनी एक शुरुआत थीं. वो न होतीं, तो शायद हमारा समाज और देर से जागता.

कादम्बिनी के पिता बृजकिशोर बसु ब्रह्मो सुधारक थे. ये समाज राजा राममोहन राय ने स्थापित किया था. भागलपुर में हेडमास्टर की नौकरी करने वाले बृजकिशोर ने 1863 में भागलपुर महिला समिति बनाई थी, जो भारत का पहला महिला संगठन था. 1878 में कादम्बिनी कलकत्ता यूनिवर्सिटी का एंट्रेस एग्जाम पास करने वाली पहली लड़की बन गई थीं. उनके इस सफर में देश की पहली महिला ग्रेजुएट होने का माइलस्टोन भी शामिल है.

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हमें अपनी बच्चियों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं. इमोशनल ऐड बनाने पड़ते हैं, लोगों को दलिया, पैसे और बस्ते का लालच देना पड़ता है और ये सब 2016 में हो रहा है. सोचिए 19वीं शताब्दी में क्या हाल रहा होगा. फिर भी कादम्बिनी हायर एजुकेशन के लिए सात समंदर पार यूरोप गईं. जब लौटीं तो उनके हाथ में मेडिसिन और सर्जरी की तीन अडवांस डिग्रियां थीं. वो उस समय की सबसे पढ़ी-लिखी महिला थीं. कई पुरुषों से भी ज्यादा.

इंडिया की पहली वर्किंग मॉम

और सिर्फ एजुकेशन की ही बात क्यों हो. न जाने कितनी शादीशुदा लड़कियां दिनभर घर में चादर पर बने फूल गिनने और ‘सिमर का ससुराल’ देखने को मजबूर हैं, लेकिन ननद और भाभी के कॉम्पिटीशन की वजह से जॉब नहीं कर पातीं. कादम्बिनी इंडिया की पहली वर्किंग मॉम थीं. मां, डॉक्टर और सोशल एक्टिविस्ट का रोल एक साथ निभाना उनके लिए भी आसान नहीं था, लेकिन वो कोई आम महिला नहीं, कादम्बिनी गांगुली थीं. वो, जो किसी भी महिला के अंदर जान लगाने का जज्बा फूंक दें.

21 की उम्र में कादम्बिनी की शादी 39 साल के विधुर द्वारकानाथ गांगुली से हुई थी. द्वारकानाथ भी ब्रह्मो समाज के एक्टिविस्ट थे. पिछली पत्नी से उनके पांच बच्चे थे और कादम्बिनी तीन बच्चों की मां बनीं. उन्होंने आठ बच्चे पाले. उनके बारे में लिखने वाले बताते हैं कि उनकी शादीशुदा जिंदगी बड़ी खुशहाल थी. शादी के बाद कादम्बिनी जल्दी ही मेडिकल कॉलेज चली गईं. लेडी डफरिन हॉस्पिटल में कुछ दिनों तक काम करने के बाद उन्होंने प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू कर दी थी.

पत्रिका में इनडायरेक्टली लिखते थे वेश्या

वैसे मजे की बात पता है क्या है. उस समय भी कुछ ऐसे ‘महापुरुष’ थे, जिन्हें कादम्बिनी से दिक्कत थी. एक कट्टरपंथी हिंदू ग्रुप ने तो उन्हें बदमान करने का कैंपेन चला दिया था. एक रूढ़िवादी मैगजीन बंगाबासी तो उन्हें इनडायरेक्टली वेश्या कहती थी. ये 1891 था और कादम्बिनी ने मैगजीन के एडिटर मोहेश चंद्र पाल के खिलाफ केस कर दिया था. मोहेश पर 100 रुपए जुर्माना लगाया गया था और 6 महीने के लिए जेल भेज दिया गया था.

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