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जब नेताओं और अखबारों के अतिउत्साह ने एक देश को दिया कभी ना भूलने वाला दर्द!

जब ब्राज़ील ने 1950 का वर्ल्ड कप आयोजित किया, आधे ब्राजीलियंस के पास भरपेट खाने को नहीं था. तीन में से एक ही बंदे को पढ़ना आता था. आधी जनसंख्या नंगे पैर चलने पर मजबूर थी. लेकिन नेताओं को इससे क्या करना. उन्हें तो लोगों पर भौकाल बनाना था. यूरोप से सिर्फ छह देश आए. पांच लैटिन अमेरिकी देशों के साथ अमेरिका और मेहिको (मैक्सिको) को मिलाकर कुल 13 देशों ने इस वर्ल्ड कप में भाग लिया. ये वही ऐतिहासिक वर्ल्ड कप था जिसमें हम खेल सकते थे. लेकिन AIFF ने अपनी टीम ही नहीं भेजी.

वर्ल्ड कप के देशों को देखने के बाद तय रहा कि चैंपियन तो ब्राज़ील ही बनेगा. जनता और नेता दोनों हवा में थे. टीम ने पहले ही मैच में मेहिको को 4-0 से पीट हवा और तेज कर दी. अगला मैच स्विट्जरलैंड के खिलाफ 2-2 से बराबर रहा. फिर तीसरे मैच में यूगोस्लाविया को पीटकर ब्राज़ील फाइनल राउंड में पहुंच गया. और यहां से शुरू हुई तबाही. स्वीडन 7-1 से जबकि स्पेन 6-1 से हारा. हर जीत के दौरान मैदान पर टॉफियां बरसतीं. लोगों का उत्साह चरम पर होता. अब ब्राज़ील दुनिया जीतने से एक मैच दूर था.

इस आखिरी मैच में उसके सामने था घिसटता हुआ, 20 लाख से थोड़ी ज्यादा जनसंख्या वाला उरुग्वे. ये देश स्पेन से 2-2 से ड्रॉ जबकि स्वीडन को किसी तरह लास्ट मोमेंट्स में 3-2 से हराकर यहां तक आया था. आखिरी मैच माराकाना स्टेडियम में होना था. युद्धस्तर पर काम कर खास इसी टूर्नामेंट के लिए बना, लगभग दो लाख लोगों के बैठने की क्षमता वाला विशाल स्टेडियम. 2 अगस्त 1948 को इसका निर्माण शुरू हुआ. और दस हजार से ज्यादा मजदूरों ने दिन रात काम कर इसे 1950 के वर्ल्ड कप के लिए तैयार भी कर दिया. रियो के मेयर एन्हेलो मेंडेस डे मोराइस के इस ड्रीम की बहुत आलोचना भी हुई. हालांकि उन्हें फुटबॉल प्रेमियों का सपोर्ट भी मिला.

ख़ैर, मैच पर लौटते हैं. इस मैच में हार से बचना ही ब्राज़ील को वर्ल्ड चैंपियन बना सकता था. जबकि उरुग्वे को हर हाल में जीतना ही था. मैच से पहले रियो में कार्निवाल का सिलसिला शुरू हो गया. लोग पहले ही जीत का सेलिब्रेशन करने लगे. ब्राज़ील को दुनिया का बेस्ट बनने की खुशी में लिखे गए खास गीतों से पूरा देश गूंज उठा. मजदूरों ने भी छुट्टी मारकर अपना घर बियर और मिठाई से भर लिया. जिससे उरुग्वे को हराने के बाद जश्न मनाने के लिए कुछ खोजना ना पड़े.

एक अखबार ने तो टीम की फोटो छापकर यहां तक लिख दिया,

‘यही हैं चैंपियंस ऑफ द वर्ल्ड’

मैच से पहले टीम को सोने की घड़ियां गिफ्ट की गईं. घड़ियों पर लिखा था,

‘चैंपियंस ऑफ द वर्ल्ड के लिए’

यही नहीं. रियो के मेयर ने मैच से पहले टीम, माराकाना में आए दो लाख से ज्यादा लोगों और देश को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप ब्राजीलियाई, जिन्हें मैं टूर्नामेंट के विक्टर्स मानता हूं … आपको घंटों से भी कम समय में अपने देश के लाखों लोगों द्वारा प्रशंसित किया जाएगा …आपके समान इस पूरे गोलार्ध में कोई नहीं है …आप, जो हर दूसरे प्रतियोगी से श्रेष्ठ हैं …आप, जिन्हें मैं पहले से ही विजेता के रूप में सलाम करता हूं। !!! ‘

‘You Brazilians, whome I consider Victor’s of the tournament… You players who in less than a few hours will be acclaimed by millions of your compatriots… You have no equal in the terrestrial hemisphere… You, who are superior to every other competitor… You, whom I already salute as conquerors.!!!’

इस सब तमाशे के बीच टीम के कोच फ्लावियो कोस्टा सबसे अलग सोच रहे थे. उन्हें अपनी टीम के ओवर कॉन्फिडेंस से डर लग रहा था. उन्होंने मैच से पहले कहा,

‘यह कोई प्रदर्शनी नहीं है. यह बाकी मैचों जैसा ही, लेकिन उनसे थोड़ा कठिन मैच है. मुझे डर है कि मेरे प्लेयर्स इस तरह खेलने उतरेंगे कि जैसे चैंपियनशिप शील्ड उनकी जर्सियों में पहले ही सिल दी गई हो.’

ऐसा ही हुआ. सेकेंड हाफ में अल्बिनो कार्दोसो ने ब्राज़ील को लीड दिलाई. लेकिन हुआन अल्बर्तो शिफिनो और अल्सिदेस गिड्डज़ा ने गोल मार उरुग्वे को जीत दिला दी. बताते हैं इस जीत में सबसे बड़ा रोल रियो में उरुग्वे के काउंसिल मैनुअल कबायेरो का था. कबायेरो मैच की सुबह ‘यही हैं चैंपियंस ऑफ द वर्ल्ड’ वाले अखबार की 20 कॉपियां लेकर अपनी टीम से मिलने पहुंचे थे.

Maracona Stadium
माराकोना स्टेडियम की तस्वीर.

जब मैच से पहले प्लेयर्स खाना खाने बैठे, कबायेरो ने अखबार टेबल पर फेंकते हुए कहा,

‘मेरी संवेदनाएं, तुम सब लोग हरा दिए गए हो’

यह बात सुन प्लेयर्स भड़क गए. कुछ लोगों का यह भी दावा है कि इसके बाद कैप्टन ओब्दुलियो वरेला ने सारे अखबार बटोरे. और लेकर वॉशरूम चले गए. उन्होंने अखबार वहीं फैला दिए और प्लेयर्स ने उन अखबारों के ढेर पर पेशाब किया. उरुग्वे की जीत ने पूरे ब्राज़ील को शोक में डुबो दिया. बाद में इसे ‘माराकाना की त्रासदी’ कहा गया. यह आज तक आज़ादी के बाद ब्राज़ील के लिए सबसे बुरा दिन माना जाता है.

इस हार के बाद लोगों ने स्टेडियम के बाहर लगे अखबारों के स्टॉल्स को जला दिया. स्टेडियम के बाहर लगी मेयर की मूर्ति गिरा दी गई. मूर्ति का सर काटकर बगल में बहने वाली माराकाना नदी में फेंक दिया गया. प्लेयर्स कई घंटे बाद स्टेडियम से निकल पाए. कई प्लेयर्स बहुत दिन तक बगल के Bars में छिपे रहे. पूरी टीम अपने बचे हुए जीवन भर लोगों से छिपती ही रही. ये प्लेयर्स जहां भी देखे जाते, वहीं लोग उनपर चिल्लाते. उरुग्वे के प्लेयर्स का नाम लेकर चिढ़ाते.

इसी टीम के सदस्य रहे जिजीनियो ने बाद में कहा था,

‘ब्राज़ील में दूसरे नंबर पर आने का कोई महत्व नहीं है. फाइनल से पहले हार जाना ही बेहतर है.’

Zizinho
ब्राज़ील की उस टीम के सदस्य जिज़ीनियो.

इस हार के सालों बाद तक हर 16 जुलाई को जिजीनियो के घर का फोन दिन रात बजता था. पूरे ब्राज़ील से लोग फोन करके उनसे पूछते थे,

‘हम वर्ल्ड कप क्यों हारे?’

टीम के ब्लैक प्लेयर्स के साथ और बुरा हुआ. गोलकीपर बरबोसा ने साल 1994 के वर्ल्ड कप से पहले ब्राज़ील की टीम से मिलने की इच्छा जताई. लेकिन टीम ने उन्हें अशुभ मानते हुए उनसे मिलने से ही इनकार कर दिया.

राजनेताओं और पत्रकारों के अतिउत्साह ने ना सिर्फ ब्राज़ील को उसका शोक दिया बल्कि तमाम प्लेयर्स और उनके परिवारों को हमेशा के लिए बर्बाद भी कर दिया. इस घटना को आज भी माराकानाज़ो यानी ‘माराकाना का शोक’ कहा जाता है.


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