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कहानी हक़्क़ानी नेटवर्क की, जो अमेरिका की नज़र में एक वक्त 'फ्रीडम फाइटर' था

आज बात करेंगे तीन तारीख़ों की.

पहली तारीख़, 27 अप्रैल 2008. अफ़ग़ानिस्तान में कम्युनिस्ट शासन खत्म होने की 16वीं सालगिरह. इस मौके पर राजधानी काबुल में एक मिलिटरी परेड का आयोजन रखा गया. उस समय अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई मुख्य अतिथि की हैसियत से आए थे. उनके साथ अमेरिकी राजदूत और बाकी बड़े नेता भी वहां मौजूद थे. परेड शुरू ही हुई कि वहां जोर का बम धमाका हुआ. इसके बाद गोलियों की बरसात होने लगी. सिक्योरिटी एजेंट्स ने करज़ई को किसी तरह सुरक्षित निकाल लिया. इस हमले में एक सांसद समेत तीन लोग मारे गए. हामिद करज़ई पर ये चौथा बड़ा हमला था. लेकिन राजधानी में पहली बार उनके ऊपर इस तरह का हमला हुआ था.

दूसरी तारीख़, 07 जुलाई 2008. काबुल स्थित भारतीय दूतावास. ये इमारत अफ़ग़ानिस्तान के गृह मंत्रालय के पास थी. काबुल के सबसे सुरक्षित इलाकों में से एक. लेकिन उस दिन इसमें सेंध लग गई. सुबह का वक़्त था. ऑफ़िस में चहल-पहल शुरू हुई ही थी. तभी वहां एक कार में विस्फ़ोट हुआ. इस हमले में छह भारतीय नागरिकों समेत 58 लोगों की मौत हो गई.

तीसरी तारीख़, 10 नवंबर 2008. न्यू यॉर्क टाइम्स के पत्रकार डेविड रोड अफ़ग़ानिस्तान के लोगार प्रांत में घूम रहे थे. उनका तालिबानी कमांडर अबू तैयब से मिलने का प्लान था. इस मीटिंग को अफ़ग़ान पत्रकार ताहिर लुदिन ने फ़िक्स किया था. वो पहले भी दो पत्रकारों को अबू तैयब से मिलवा चुके थे. लेकिन इस बार गड़बड़ हो गई. रोड और उनके साथियों को लेने आए लोगों ने उन्हें किडनैप कर लिया. रोड, लुदिन और उनके ड्राइवर को लाकर पाकिस्तान के वज़ीरिस्तान में रखा गया. रोड की रिहाई के एवज में लगभग एक अरब रुपये की फिरौती मांगी गई. जब तक समझौता हो पाता, डेविड रोड और ताहिर लुदिन वहां से भाग निकले. वे लोग नौ महीने तक आतंकियों की क़ैद में थे.

इन तीनों तारीख़ों में एक चीज़ कॉमन थी. तीनों घटनाओं में बतौर आरोपी एक ही नाम आया था. हक़्क़ानी नेटवर्क. हमने जिन तीन घटनाओं का ज़िक्र किया है, हक़्क़ानी नेटवर्क वहीं तक सीमित नहीं है. ये तो बस उदाहरण भर हैं. उसके खाते में ऐसे कई और भी वीभत्स हमले हैं.

हक़्क़ानी नेटवर्क का ज़िक्र क्यों?

दरअसल, काबुल पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद ये नाम एक बार फिर से चर्चा में आ गया है. 19 अगस्त को यूएन सिक्योरिटी काउंसिल की मीटिंग थी. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी शासन के आगमन को लेकर. इस मीटिंग में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आतंकवाद के बढ़े ख़तरे को लेकर अपनी चिंता प्रकट की. उन्होंने जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा के अलावा हक़्क़ानी नेटवर्क का नाम भी लिया. एस. जयशंकर ने कहा कि सिक्योरिटी काउंसिल को इस नए ख़तरे बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए.

अब सवाल उठता है कि ये हक़्क़ानी नेटवर्क आख़िर है क्या? ये कब और क्यों बना था? अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े में इसकी क्या भूमिका है? और, इसको लेकर इतनी चिंता क्यों व्यक्त जी रही है? सब विस्तार से बताएंगे.

Jaishankar
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हक़्क़ानी नेटवर्क को बड़ा ख़तरा बताया है.

हक़्क़ानी का इतिहास

पहले इतिहास की बात. ये कहानी भी सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध के समय शुरू हुई थी. अमेरिका और पाकिस्तान के सपोर्ट से मुजाहिदीन सोवियत संघ को बाहर निकालने में जुटे थे. इन्हीं मुजाहिदीनों में पकतिया प्रांत से आया एक शख़्स भी था. उसका नाम था, जलालुद्दीन हक़्क़ानी. जल्दी ही वो सीआईए की नज़र में आ गया. जब तक सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ाई चली, तब तक वो अमेरिका की आंखों का तारा बना रहा. सीआईए के एक अधिकारी ने बताया था कि उसने कई बार जलालुद्दीन हक़्क़ानी को पैसों से भरा सूटकेस सौंपा था. तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से एक बार मुलाक़ात भी हुई थी. रीगन ने जलालुद्दीन हक़्क़ानी और बाकी मुजाहिदीन लीडर्स को ‘फ़्रीडम फ़ाइटर’ कहकर संबोधित किया था.

मुजाहिदीनों ने सोवियत संघ को हराने में कामयाबी हासिल कर ली. जैसे ही युद्ध खत्म हुआ, मुजाहिदीन नजीबुल्लाह सरकार को गिराने में जुट गए. इसमें हक़्क़ानी नेटवर्क भी शामिल था. नजीबुल्लाह के इस्तीफ़ा देने के बाद इस्लामिक स्टेट ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान का गठन हुआ. इस सरकार में जलालुद्दीन हक़्क़ानी को न्याय मंत्री बनाया गया.

फिर 1994 में तालिबान बना. हक़्क़ानी को अंदाज़ा हो गया था कि ये लोग सत्ता में आ सकते हैं. उसने अपने गुट को तालिबान के साथ मिला लिया. जब सितंबर 1996 में तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा किया तो उनके साथ हक़्क़ानी नेटवर्क के लड़ाके भी आए थे. तालिबान की सरकार में जलालुद्दीन को एक मंत्रालय मिला और साथ में पकतिया प्रांत की गवर्नरी भी.

Soviet Afghan
सोवियत-अफगान युद्ध.

9/11 से बदले हालात

सब ठीक तब तक चला, जब तक कि 9/11 का हमला नहीं हुआ. अमेरिका को ओसामा बिन लादेन की तलाश थी. ऐसा कहा जाता है कि सोवियत युद्ध के दौरान लादेन, जलालुद्दीन हक़्क़ानी की निगरानी में लड़ा था. दोनों एक-दूसरे को अच्छा-खासा सम्मान देते थे. अमेरिका ने जलालुद्दीन के साथ डील करने की कोशिश की. तालिबान के ख़िलाफ़ विद्रोह करने के लिए. जलालुद्दीन हक़्क़ानी ने साफ़ मना कर दिया. इसके बदले उसने अल-क़ायदा और तालिबान के साथ मिलकर लड़ना चुना. अमेरिका की नज़र में एक समय का फ़्रीडम फ़ाइटर अब मोस्ट-वॉन्टेड आतंकवादी बन चुका था.

9/11 के हमले के बाद अमेरिका, अफ़ग़ानिस्तान में घुसा. दिसंबर 2001 तक तालिबान को काबुल की गद्दी से उतार दिया गया था. हक़्क़ानी नेटवर्क को भी काबुल छोड़कर भागना पड़ा. उन्हें शरण मिली, पाकिस्तान के उत्तरी वज़ीरिस्तान प्रांत में. इस दौरान नेटवर्क को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का फ़ुल सपोर्ट मिल रहा था. हालांकि, आईएसआई इस आरोप से इनकार करती है.

काबुल से भागने के कुछ समय बाद तक तालिबान चुप बैठा रहा. उसने ख़ुद को मज़बूत करने पर ध्यान दिया. हक़्क़ानी नेटवर्क भी मौके के इंतज़ार में था. उस समय तक जलालुद्दीन हक़्क़ानी की तबियत बिगड़ने लगी थी. तब नेटवर्क की कमान उसके बड़े बेटे सिराजुद्दीन हक़्क़ानी ने संभाली. वो अपने बाप के मुक़ाबले कहीं अधिक हिंसक और कट्टर था.

जब फिर उठा हक़्क़ानी

2003 तक अमेरिका तालिबान को लेकर निश्चिंत हो चुका था. उसे भरोसा हो गया था कि अब अफ़ग़ानिस्तान में ख़तरे की कोई बात नहीं. लेकिन कुछ समय बाद ही ये भरोसा चकनाचूर होने लगा. अफ़ग़ानिस्तान के अलग-अलग इलाकों में हमले होने लगे. नाटो सेनाओं के काफ़िले पर. विदेशी दूतावासों पर. इसके अलावा, विदेशी नागरिकों की किडनैपिंग भी अचानक से बढ़ने लगी. इनमें से अधिकतर घटनाओं में ‘हक़्क़ानी नेटवर्क’ का नाम सामने आ रहा था. कहा गया कि अगर अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका को किसी से डरना चाहिए तो वो तालिबान या अल-क़ायदा नहीं, बल्कि हक़्क़ानी नेटवर्क है.

इस आकलन के पीछे कई वाजिब कारण भी थे.

– पहला, नेटवर्क की आर्थिक क्षमता.

अफ़ग़ान-सोवियत युद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका ने मुजाहिदीनों को दी जा रही मदद अचानक से बंद कर दी. लेकिन लड़ाई पूरी तरह खत्म तो हुई नहीं थी. उस समय जलालुद्दीन हक़्क़ानी अरब देशों की यात्रा पर गया. सोवियत युद्ध में उसकी पहचान वॉर हीरो के तौर पर बनी थी. साथ ही, उसकी एक बीवी अरब थी. उसने इस कनेक्शन का फ़ायदा उठाया. अरब देशों ने हक़्क़ानी नेटवर्क को हर तरह से मदद की. पैसे मस्जिद या मदरसा बनाने के नाम पर भेजे जाते थे. बाद में इनका इस्तेमाल हथियारों की खरीद के लिए किया जाता था.

इसके अलावा, फिरौती, प्रोटेक्शन मनी और कई तरह के अवैध धंधों से भी पैसे आते हैं. जलालुद्दीन का एक बेटा बदरूद्दीन हक़्क़ानी किडनैपिंग बिजनेस संभालता था. वो 2012 में अमेरिका के हमले में मारा गया.

– दूसरा कारण है पाकिस्तान का फ़ुल सपोर्ट.

भले ही पाकिस्तान इस बात से इनकार करे, लेकिन रिपोर्ट्स इस दावे की पुष्टि करते हैं. हक़्क़ानी नेटवर्क का मुख्यालय आज भी उत्तरी वज़ीरिस्तान में है. यहीं नए रिक्रूट्स की ट्रेनिंग भी होती है. 2011 में दूतावास पर हमले के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को कहा था कि वो हक़्क़ानी नेटवर्क को मदद और संरक्षण देना बंद करे. पाकिस्तान ने एक कान से सुना, दूसरे से निकाल दिया. उसने अमेरिका को साफ़ मना कर दिया था.

जब कभी अमेरिका नेटवर्क के ठिकानों पर ड्रोन से हमला करता, आका वहां से फरार हो चुके होते थे. उन्हें हमलों की जानकारी पहले ही मिल जाती थी. पाकिस्तान में हक़्क़ानी नेटवर्क के प्रभुत्व की एक दिलचस्प कहानी सुन लीजिए.

एक बार जलालुद्दीन हक़्क़ानी का काफ़िला इस्लामाबाद की तरफ जा रहा था. शहर के बॉर्डर पर एक सब-इंस्पेक्टर ने काफ़िले को रोक दिया. उसने पूछताछ शुरू कर दी. तब जलालुद्दीन ने अपनी गाड़ी का शीशा नीचे किया और बोला,

तुम्हें पता है, मैं कौन हूं? 

मैं जलालुद्दीन हक़्क़ानी हूं.

इंस्पेक्ट कुछ बोल पाता, उससे पहले ही उसके पास फ़ोन आ गया. ऊपर से ऑर्डर था कि गाड़ियों को बिना जांच के जाने दिया जाए.

पाकिस्तान इस नेटवर्क को सपोर्ट क्यों करता है? पाकिस्तान को ये अनुमान पहले से था कि विदेशी सैनिकों के जाने के बाद उसे अफ़ग़ानिस्तान में किसी वफ़ादार मोहरे की ज़रूरत पड़ेगी. जानकारों का कहना है कि सीधे तालिबान को काबू में करना थोड़ा महंगा और मुश्किल वाला काम था. हक़्क़ानी नेटवर्क उनके लिए मुफीद था.

हक़्क़ानी नेटवर्क ने अफ़ग़ानिस्तान में भारत के दूतावास और दूसरे प्रोजेक्ट्स पर भी कई हमले किए थे. भारत के हित को नुकसान पहुंचाने में पाकिस्तान का फायदा जुड़ा था. इसलिए भी, उसने नेटवर्क को शह दी.

– तीसरा कारण, नुकसान पहुंचाने की क्षमता.

एक अनुमान है कि पिछले 20 सालों में अफ़ग़ानिस्तान में जितने विदेशी सैनिक मारे गए, उनमें से 20 फीसदी हक़्क़ानी नेटवर्क के हमलों का शिकार बने.

जब अमेरिका ने हक़्क़ानी नेटवर्क के ठिकानों पर हमले शुरू किए, तब महीने में 150 से 200 लड़ाके मारे जाते थे. इसके बावजूद नेटवर्क के संख्या बल में कभी कमी नहीं आई. नए रिक्रूट्स हमेशा खाली जगह को भरने के लिए तैयार रहते थे.

क्यों निकला हक़्क़ानी नेटवर्क का जिन्न?

काबुल पर एक बार फिर से तालिबान का क़ब्ज़ा है. एक बार फिर हक़्क़ानी नेटवर्क भी साथ में है. नेटवर्क के कम-से-कम छह हज़ार लड़ाके काबुल में मौजूद हैं. जलालुद्दीन हक़्क़ानी के दो बेटे तालिबान सरकार में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

पहला नाम है, सिराजुद्दीन हक़्क़ानी का. जलालुद्दीन की मौत के बाद से वो हक़्क़ानी नेटवर्क का मुखिया है. सिराजुद्दीन पिछले दो दशक में अफ़ग़ानिस्तान में हुए कई बड़े हमलों का मास्टरमाइंड रहा है. 2008 में काबुल में सेरेना होटल पर हुए आतंकी हमले में एक अमेरिकी नागरिक मारा गया था.

एफ़बीआई की वेबसाइट पर आज भी उसका नाम ‘ग्लोबल टेररिस्ट’ की लिस्ट में है. उसके ऊपर 37 करोड़ रुपये का ईनाम है. तालिबान की लीडरशिप में वो दूसरे नंबर पर है. फिलहाल, वो क़्वेटा से अपने नेटवर्क को निर्देश दे रहा है.

दूसरा नाम अनस हक़्क़ानी का है. पिछले कुछ दिनों में अनस हक़्क़ानी ने अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई, काबुल के कसाई कहे जाने वाले गुलबदीन हेकमेतयार और अशरफ़ ग़नी सरकार में सहयोगी अब्दुल्लाह अब्दुल्ला से मुलाक़ात की है. कहा जा रहा है कि ये मुलाक़ातें सत्ता के ट्रांसफ़र का ड्रामा रचने के लिए की जा रही है.

अनस हक़्क़ानी को 2014 अमेरिका ने बहरीन में गिरफ़्तार किया था. फिर उसे अफ़ग़ानिस्तान की बगराम जेल में रखा गया. वहां दो बार उसे मौत की सज़ा भी सुनाई गई. हक़्क़ानी नेटवर्क ने धमकी भरे लहजे में कहा था कि अगर अनस को सज़ा दी गई तो बहुत बुरे परिणाम भुगतने होंगे.अनस हक़्क़ानी को सज़ा नहीं दी गई. बल्कि नवंबर 2019 में उसे रिहा कर दिया गया. बदले में तालिबान ने दो अमेरिकी प्रोफ़ेसर्स को छोड़ा था. अनस हक़्क़ानी बाद में दोहा में आयोजित अफ़ग़ान शांति वार्ता में भी शामिल हुआ. अब वो अफ़ग़ानिस्तान में सरकार बनाने की कवायद में जुटा है. इतना तो तय है कि तालिबान सरकार में हक़्क़ानी नेटवर्क की भूमिका काफी अहम होने वाली है. कई बार ये भ्रम होता है कि हक़्क़ानी नेटवर्क, तालिबान का ही हिस्सा है. लेकिन ये नेटवर्क तालिबान से कहीं ज़्यादा कट्टर और हिंसक है. काम करने का उसका अपना तरीका है. उसके अल-क़ायदा और दूसरे आतंकी संगठनों से नजदीकियां है. हक़्क़ानी नेटवर्क इन आतंकी संगठनों को हर तरह की मदद मुहैया कराता है. अब वो अफ़ग़ानिस्तान में सरकार चला रहा है. यानी उसके पास अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करने के लिए एक पूरा देश है. जहां उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं है. ज़ाहिराना तौर पर ये भारत और बाकी दुनिया के लिए ख़तरे की घंटी है.


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