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इस कुत्ते ने अपने मालिक से इतना प्यार किया, जितना दो प्रेमी भी एक-दूसरे से नहीं करते

मेरा एक दोस्त है. दिल्ली में काम करता है. आप सोच रहे होंगे कि मैं दोस्त के बारे में क्यों बात कर रही हूं. तो ऐसा है कि मेरा वो दोस्त भयंकर वाला ‘पेट लवर’ है. जब उसकी जॉब दिल्ली में लगी तो वो बिहार से अपना कुत्ता भी दिल्ली ले आया. क्योंकि उसे लगता था कि उसके मम्मी-पापा उसका अच्छे से ख्याल नहीं रखेंगे. यहां वो दिन भर ऑफिस में रहता है और अपने कुत्ते की देखभाल के लिए मेड लगा ली है. जो दिनभर उसकी देखभाल करती है. दुनिया भर में ‘पेट लवर’ की कमी नहीं है. जानवरों को लेकर लोगों की दीवानगी के बहुत किस्से सुने होंगे आपने. आज हम आपको जापान के एक ऐसे कुत्ते के बारे में बताएंगे, जिसकी वफादारी की दुनिया मिसाल देती है.

प्रोफेसर और हचीको की कहानी

 

हचीको
हचीको

ये कहानी 1924 की है. ईज़बूरो ईनो टोक्यो यूनिवर्सिटी में एग्रीकल्चर साइंस के प्रोफेसर थे. बहुत दिनों से वो अकीटा ब्रीड के डॉग को ढूंढ रहे थे. उनकी खोज ओडेट शहर में खत्म हुई. जहां उन्हें एक प्यारा सा पपी मिला. जो अकीटा ब्रीड का था. उस कुत्ते का नाम हचीको था. प्रोफेसर ईनो उसे प्यार से हची बुलाते थे. धीरे-धीरे प्रोफेसर और हचीको में गहरी दोस्ती हो गई. प्रोफेसर ईनो हचीको को अपने बेटे की तरह प्यार करने लगे. हचीको प्रोफेसर को हर रोज सेंट्रल टोक्यो के शिबूया रेलवे स्टेशन तक छोड़ने जाता.

प्रोफेसर के जाने के बाद हचीको स्टेशन पर ही घंटों इंतजार करता. जब प्रोफेसर काम से वापस लौटते तो हचीको उन्हें लेकर घर आता. इन दोनों के लिए ये एक डेली रुटीन बन गया. 21 मई 1925 को हर दिन की तरह हचीको प्रोफेसर को छोड़ने गया और स्टेशन पर बैठ कर इंतजार करने लगा. प्रोफेसर ईनो सेरेब्रल हैमरेज की दिक्कत से जूझ रहे थे. यूनिवर्सिटी में लेक्चर के दौरान ब्रेन हैमरेज से उनकी मौत हो गई.

लगभग 10 साल तक हचीको स्टेशन पर प्रोफेसर का इंतजार करता रहा

 

रेलवे स्टेशन पर प्रोफेसर ईनो का इंतजार करता हचीको
रेलवे स्टेशन पर प्रोफेसर ईनो का इंतजार करता हचीको

प्रोफेसर के जाने के बाद उनके गॉर्डनर ने हचीको को गोद ले लिया. लेकिन प्रोफेसर के लिए उसका प्यार कम नहीं हुआ. उस दिन के बाद से वो हर रोज प्रोफेसर ईनो का स्टेशन पर इंतजार करता. सुबह-शाम जब भी प्रोफेसर की ट्रेन आती वो देखने जाता फिर वापस चला आता. हचीको ने ये काम 9 साल, 9 महीने और 15 दिन तक लगातार किया. धीरे-धीरे स्टेशन पर आने वाले लोगों ने हचीको को नोटिस करना शुरू किया. जापान के एक बड़े न्यूजपेपर ने हचीको के ऊपर स्टोरी की. इसके बाद वो देश भर में पॉपुलर हो गया. लोगों ने उसे प्यार से  ‘Chuken-Hachiko’ बुलाना शुरू कर दिया. इसका मतलब ‘फेथफुल डॉग’ होता है. हचीको देश भर में वफादारी का मिसाल बन गया.

जब हचीको को वफादारी के लिए मिला सम्मान

 

यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो में लगी हचीको और प्रोफेसर ईनो की मूर्ति
यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो में लगी हचीको और प्रोफेसर ईनो की मूर्ति

इस वफादारी को देखते हुए 1934 में शिबूया रेलवे स्टेशन पर हचीको की पीतल की मूर्ति लगाई गई. हचीको इस फंक्शन में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुआ था. दूसरे विश्व युद्ध के समय जब सेना को पीतल की जरूरत पड़ी तो हचीको की मूर्ति को गलाकर इस्तेमाल कर लिया गया. लेकिन 1948 में फिर से हचीको की मूर्ति बनवाई गई. पहली बार जिस आर्टिस्ट ने हचीको की मूर्ति बनाई थी, उसी के बेटे ने दोबारा उसकी मूर्ति बनाई. तब से लेकर आज तक वो मूर्ति वैसी ही है. हचीको की ये मूर्ति रेलवे स्टेशन के एंट्रेंस के पास लगी है. स्टैच्यू का नाम “Hachikō-guchi” है. जिसका मतलब होता है हचीको एंट्रेंस/ एग्जिट. ये शिबूया रेलवे स्टेशन के 5 एग्जिट में से एक है.

2015 में टोक्यो यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ एग्रीकल्चर में प्रोफेसर ईनो और हचीको की मूर्ति लगाई गई है. इस मूर्ति में ये दिखाने की कोशिश की गई है कि प्रोफेसर हचीको से मिलने वापस आए हैं.

जब प्रोफेसर की राह देखते-देखते हचीको मर गया

18 मार्च 1935 को हचीको की टर्मिनल कैंसर की वजह से मौत हो गई. मौत के समय भी हचीको रेलवे स्टेशन के आस-पास ही था. हालांकि हचीको की मौत टर्मिनल कैंसर की वजह से हुई है, ये बात 2011 में पता चली. हचीको की समाधि प्रोफेसर ईनो की समाधि के बगल में ही बनाई गई है.

हचीको की वफादारी पर फिल्में भी बनी हैं

1987 में जापान में इसके ऊपर फिल्म भी बनी. जिसका नाम “Hatchiko Monogatari” है. 2009 में हॉलीवुड ने भी हचीको के ऊपर फिल्म बनाई . जिसका नाम  “Hachiko–A Dog`s Tale” था. जिसमें रिचर्ड गेर ने काम किया था. दोनों ही फिल्मों को लोगों ने काफी पसंद किया था. इंडिया में भी हचीको के ऊपर फिल्म बन चुकी है. उस फिल्म का नाम टॉमी था, जो तेलुगू में बनी थी.


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