Submit your post

Follow Us

ओलंपिक में देश का सिर ऊंचा करने वाली महिला हॉकी टीम की एक-एक खिलाड़ी की कहानी जानिए

एक लड़की, जिसने बांस की खप्पचियों से हॉकी खेलना शुरू किया था. एक लड़की, जो इतनी गरीब थी कि दो वक्त के खाने के लिए हॉकी खेलने को राजी हो गई. एक लड़की, जो हॉकी खेलने के लिए छोटी ड्रेस पहनकर निकलती थी, तो आस-पड़ोस के लोग ताने मारते थे. लड़कियों की ऐसी 15 कहानियों से मिलकर बनती है भारतीय महिला हॉकी टीम. वो टीम, जो अपने तमाम अभावों के बावजूद अपने संघर्ष के दम पर टोक्यो ओलंपिक के सेमीफाइनल तक पहुंची. टीम हारकर मेडल से चूक गई. लेकिन टीम का सेमीफाइनल तक पहुंचना ही बहुत बड़ी जीत रही है. ये भी जीत ही है कि पहली बार देश ने भारत की महिला हॉकी टीम से मेडल की उम्मीद लगाई. पहली बार ऐसा हुआ कि महिला हॉकी टीम की हार से हम भावुक हुए. इतनी बात हुई. मैच हारने के बाद भावुक होने की तस्वीरें तो टोक्यो से भी आईं. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हॉकी टीम से फोन पर बात की तो टीम की कई खिलाड़ी रोने लगीं.

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी हॉकी टीम से बात की.

तो कौन हैं ये लड़कियां, जिन्होंने अचानक भारतीय महिला हॉकी को इतना मान-सम्मान और पहचान दिला दी. बस ये पहचान ही अचानक मिली है, इसके पीछे का संघर्ष बहुत लंबा है. तो अब हम एक-एक खिलाड़ी की कहानी आपको बताएंगे.

1. सविता पूनिया

कई साल पहले की बात है. हरियाणा के सिरसा का गांव जोधकन. यहां के रहने वाले रंजीत पूनिया दिल्ली से लौटे और लौटते ही अपनी पोती को खोजने लगे. रंजीत इतनी जल्दी में थे कि लोग डर गए कि जाने क्या हो गया. और कुछ मिनट्स बाद जब रंजीत अपनी पोती से मिले तो सबका संशय दूर हुआ. रंजीत ने अपनी पोती सविता से कहा-

‘तू हॉकी क्यों नहीं खेलती?’

और उस दिन दादा रंजीत की इस एक लाइन ने सविता को इंडियन हॉकी का लेजेंड बना दिया. अपने किटबैग को नज़रों के सामने रखने की जिद के चलते बस की छत पर बैठ ट्रेनिंग के लिए जाने वाली सविता आज आसमान छू चुकी है. 31 बरस की इस लड़की ने भारतीय हॉकी फ़ैन्स को सपने देखने पर मज़बूर कर दिया. टोक्यो ओलंपिक्स में दुनियाभर के दिग्गजों के आगे सविता ने जैसी गोलकीपिंग की, उसे पीढ़ियों तक याद रखा जाएगा.

साल 2007 में सविता को पहली बार नेशनल कैंप का बुलावा आया. हालांकि अपने पहले मैच के लिए सविता को 2011 तक इंतजार करना पड़ा. साल 2014 में सविता की बेहतरीन गोलकीपिंग की बदौलत भारतीय महिला हॉकी टीम ने इंचिऑन एशियाड का ब्रॉन्ज़ मेडल जीता. साल 2017 की एशिया कप जीत में सविता गोलकीपर ऑफ द टूर्नामेंट रहीं. भारत ने इस टूर्नामेंट को पूरे 13 साल बाद जीता था. और अब अपने इंटरनेशनल डेब्यू के 10 साल बाद सविता ओलंपिक्स में अब तक की बेस्ट इंडियन विमिंस हॉकी टीम की स्टार गोलकीपर हैं.

Savita Punia
ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ मैच में गोल बचाने की कोशिश करतीं सविता पूनिया. (फोटो- PTI)

2. दीप ग्रेस

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले का हॉकी से बहुत पुराना नाता रहा है. कई दिग्गज खिलाड़ी यहां से निकले हैं. कहते हैं कि इस जिले के हर घर में हॉकी प्लेयर्स हैं. यहां तक कि शादी-विवाह में भी हॉकी स्टिक और गेंद जैसे उपहार मिलना एकदम नॉर्मल है. लेकिन कई साल पहले तक लड़कियों के लिए हॉकी खेलना आसान नहीं था. तभी तो पिता, चाचा, भाई को हॉकी खेलते देखकर बड़ी हुई दीप ग्रेस इक्का ने जब हॉकी उठाई तो लोगों का पहला रिएक्शन था-

‘ये तो लड़कों वाला खेल है.’

दीप के परिवार को बहुत ताने मारे गए कि वह अपनी लड़की को लड़कों वाला गेम सिखा रहे हैं. लेकिन दीप के घरवाले इन आलोचनाओं के आगे झुके नहीं. खुद दीप भी ऐसी ओलाचनाओं के आगे कमज़ोर नहीं पड़ी. हॉकी के पैशन को पालती रही. दीप को जल्दी की इसका फायदा भी मिला और उन्होंने सिर्फ 16 साल की उम्र में पहली बार सीनियर नेशल्स में खेला. और इसके बाद उन्हें इंडियन जूनियर टीम के लिए डेब्यू करने का मौका मिला. दीप जूनियर वर्ल्ड कप और 2014 के एशियन गेम्स की ब्रॉन्ज़ मेडलिस्ट इंडियन टीमों का अहम हिस्सा थीं. और अब ओलंपिक में दीप ग्रेस बेहतरीन खेल दिखाकर अपने पहचान बनाई.

3. निक्की प्रधान

झारखंड ने देश को कई हॉकी प्लेयर्स भी दिए हैं. और इन्हीं प्लेयर्स में से एक हैं निक्की प्रधान. रांची से कई साल पहले कटे खूंटी शहर में पैदा हुई निक्की बचपन से ही एथलीट थीं. इतना तेज भजती थीं कि इनको लेकर एथलेटिक्स और हॉकी के कोच आपस में भिड़ गए. दरअसल निक्की ने छोटी उम्र में ही हॉकी खेलना शुरू कर दिया था. लेकिन उनकी स्पीड देख एथलेटिक्स वाले गुरुजी उन्हें अपनी ओर लाना चाहते थे. और यहीं विवाद हो गया हॉकी वाले दशरथ महतो एथलेटिक्स वाले सरवर इमाम से लड़ गए. सरवर उस वक्त जिला खेल अधिकारी भी थे. लेकिन दशरथ नहीं माने.

बताते हैं कि इस घटना के बाद सरवर और दशरथ में 10 साल तक बातचीत नहीं हुई थी. अंततः जब निक्की हॉकी की स्टार बन गईं, तब सरवर को लगा कि दशरथ सही थे और इसके बाद दोनों के बीच के गिले-शिकवे दूर हुए. निक्की के हॉकी खेलने के पीछे भी मजेदार कहानी है. निक्की जब सिर्फ 12 साल की थीं तभी झारखंड सरकार ने कुछ महिला हॉकी प्लेयर्स का सम्मान समारोह आयोजित किया. उसी समारोह में उन प्लेयर्स ने बताया कि कैसे वह हवाई जहाज पर बैठ अमरीका गई थीं. और ये कहानी सुन निक्की ने सबके जाने के बाद कोच दशरथ से पूछा,

‘मैं दीदी लोग की तरह जहाज में नहीं बैठ सकती क्या?’

जवाब में कोच ने कहा,

‘अच्छा खेलोगी तो क्यों नहीं बैठ सकती.’

बस निक्की ने कोच की इस बात को दिल पर ले लिया और इतना अच्छा खेला कि अब जहाज क्या, वो हर भारतीय के दिलों में काफी गहरे तक बैठ चुकी हैं.

4. गुरजीत कौर

खेलों की दुनिया कमाल है. कई लोग शुरू से ही कोशिश करते-करते कभी सफल नहीं हो पाते और कई एकाएक स्पोर्ट्स में आते हैं और छा जाते हैं. हमारा अगला किरदार भी कुछ ऐसा ही है. गुरजीत कौर. ब्रॉन्ज़ मेडल मैच में भारत के लिए दो झन्नाटेदार गोल करने वाली ड्रैग फ्लिकर. ड्रैगफ्लिकर में ड्रैग माने खींचना और फ्लिक बोले तो धकेलना. यानी खींचकर धकेलने की कला को ड्रैग फ्लिक कहते हैं और यह काम आती है पेनल्टी कॉर्नर लेने में. और गुरजीत अभी विमिंस हॉकी में दुनिया की बेस्ट ड्रैग फ्लिकर्स में से एक हैं. लेकिन गुरजीत हमेशा से हॉकी नहीं खेलना चाहती थीं. अमृतसर के पास के गांव मियादी कलां में एक किसान परिवार में पैदा हुई गुरजीत शुरुआत सालों में अपने गांव में ही रहती थीं. और उन्हें पता ही नहीं था कि हॉकी क्या है. बाद के सालों में अच्छी शिक्षा के लिए गुरजीत और उनकी बहन घर से 70 किलोमीटर दूर तरनतारन जिले के कैरों में बोर्डिंग स्कूल में गईं. यहां पहली बार उनकी मुलाकात हॉकी से हुई.

दरअसल कैरों हॉकी के सबसे बड़े और सबसे पुराने सेंटर्स में से एक है. तो यहां आने पर हॉकी से मुलाकात होनी तय ही रहती है. हालांकि शुरू में उन्हें खेलना नहीं आता था. ऐसे में वह बैठकर बाकी लड़कियों को खेलते देखती थीं. और इस तरह हॉकी में गुरजीत का इंट्रेस्ट जगा और उन्होंने स्टिक उठा ही ली. और बस स्टिक उठाने की देर थी. गुरजीत बेहद तेजी से हॉकी की दुनिया में आई और साल 2017 में लगभग 21 साल की उम्र में टीम इंडिया में परमानेंट हो गईं.

5. उदिता

उदिता ने अपने पापाजी को देख स्पोर्ट्स में आने का फैसला किया. हिसार में तैनात दारोगा जसबीर सिंह को हैंडबॉल खेलना पसंद था. पापा को देख बेटी उदिता ने भी ये ही खेलने का फैसला किया. जसबीर ने भी बेटी को एक अच्छे कोच की शरण में भेज दिया. उदिता हैंडबॉल खेलने लगीं. लेकिन एक बार हैंडबॉल का कोच तीन दिन तक क्लास लेने ही नहीं आए. ये मौका था उदिता के लिए कुछ और ट्राई करने का. उदिता ने हॉकी स्टिक उठा ली. और ऐसी उठाई कि कुछ ही सालों में उनका सेलेक्शन इंडियन जूनियर हॉकी टीम में हो गया. लेकिन साल 2015 में इधर उदिता जूनियर नेशनल कैंप के लिए चुनी गईं, और उधर इसी साल उनके पिता का देहांत हो गया. उदिता का मन खेल से टूट गया, लेकिन मां ने हौंसला बढ़ाया. और फिर उदिता का करियर चल निकला. उन्होंने जूनियर टीम, अंडर-18 टीम के लिए खेलते हुए सीनियर टीम में एंट्री की. और अब वह टीम इंडिया की अहम सदस्य हैं. उन्होंने टोक्यो में चौथे नंबर पर फिनिश करने वाली टीम इंडिया के लिए बेहतरीन प्रदर्शन किया था

6. नेहा गोयल

हरियाणा के सोनीपत में एक बड़े से खुले बद्बूदार नाले के पास एक कमरे का घर. इतना छोटा कि अगर 10 छोटे कदम भी भरेंगे तो दीवार आ जाएगी. इतनी सी जगह में नेहा गोयल अपनी दो बहनों और मां के साथ रहती थीं. पिता कभी कभी आते थे. शराब पीकर. जब भी आते थे तो मां को गालियां देते थे, पीटते रहते थे. शराबी पिता के सामने ये लड़कियां सहमी सी रहती थीं. एक कमरे के घर में कहीं छिपने की जगह नहीं थी, तो जब पिता घर में आते थे तो लड़कियां लेटकर आंख बंद कर लेती थी. सोने का बहाना करती थी. ताकि पिता से सामना ना करना पड़े. दोनों वक्त के खाने का इंतजाम करने के लिए मां को मज़दूरी करने पड़ती थी. नेहा की मां को जहां भी काम मिला, कर लिया. साईकिल फैक्ट्री में काम किया, चमड़े की फैक्ट्री में काम किया. महीने के 1500-2000 रुपये कमा पाती थी. कभी कभी लड़कियां भी उनके साथ मजदूरी में जाती थी. नेहा अभी छोटी थी. लगभग 11 साल की.

एक दिन स्कूल में नेहा को किसी सहेली ने बताया कि हॉकी खेलने पर जूते मिलते हैं और ड्रेस भी. नेहा के घर से कुछ दूर ही प्रीतम सिवास की हॉकी अकेडमी थी. प्रीतम सिवास भारत की महिला टीम में रह चुकी हैं. वो सोनीपत में अकेडमी चलाती हैं. नेहा इस अकेडमी के आसपास चक्कर लगाने लगी. जब प्रीतम ने कई बार नेहा को उधर टहलते देखा तो एक बार बुला लिया. कूदने वाली रस्सी देकर नेहा का स्टेमिना मापा. प्रीतम को इस 11 साल की लड़की में पॉटेंशियल लगा. प्रीतम ने नेहा को कहा कि अगर वो हॉकी की प्रैक्टिस में लगातार आए तो दोनों वक्त का खाना मिलेगा. नेहा को और क्या चाहिए थे. अब बात थी नेहा की मां को समझाने की. कोच प्रीतम ने नेहा से कहा कि तुम मुझे अपने घर ले चलो में तुम्हारी मां को समझा दूंगी. लेकिन नेहा को शर्म आ रही थी. क्योंकि घर अच्छा नहीं था. हालांकि बाद में मां मान गई.

तो इस तरह से नेहा का हॉकी खेलना शुरू हुआ. कोच प्रीतम ने उसके कपड़े, जूतों, हॉकी जैसे खर्चे उठाए. नेहा ने भी ग्राउंड पर अपना टैलेंट दिखाया. नेहा ने 18 की उम्र में नेशनल में टीम में सलेक्शन पा लिया. और अब वो टीम इंडिया की बेस्ट मिडफिल्डर खिलाड़ी हैं. हॉकी इंडिया ने उन्हें मिडफिल्डर ऑफ द ईयर अवॉर्ड भी दिया था.

7. निशा वार्सी

हमने नेहा गोयल की कहानी में आपको बताया कि उनकी स्कूल की सहेली ने उन्हें हॉकी के बारे में बताया था. वो सहेली थी निशा वार्सी. नेहा और निशा दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थी. निशा का परिवार सोनीपत के वेस्ट रामनगर कॉलोनी में रहता है. पहले किराए के घर में रहते थे. पिता सोहराब सिलाई का काम करते थे. घर का खर्चा वहीं से निकलता था. जब सोहराब को लकवा मार गया तो निशा की मां ने फोम की फैक्ट्री में मजदूरी शुरू कर दी. निशा जब 9 साल की थी तब से ही प्रीतम सिवास की अकेडमी में हॉकी खेलने लगी थी. उनके पिता को लगा कि लड़की हॉकी खेलकर क्या करेगी. कई बार खेल बंद छुड़वाने की बात हुई, पर निशा अड़ रही. जब बड़ी हुई तो घरवाले शादी कराने पर अड़ गए. ये लाई भी निशा ने जीत ली. उसने रेलवे में नौकरी पा ली, तो परिवार की आर्थिक मदद करने लगी. साथ में हॉकी भी चलती रही. 2018 में निशा का नेशनल टीम में सलेक्शन हुआ. उसके बाद से भारतीय महिला हॉकी की सबसे दमदार मिडफिल्डर्स में निशा ने अपना नाम बनाया.

8. मोनिका मलिक

मोनिका भी हरियाणा के सोनीपत से ही हैं. मोनिका के पिता चंडीगढ़ पुलिस में हैं. पिता चाहते थे कि उनकी मोनू पहलवानी करे. लेकिन मोनिका की दिलचस्पी हॉकी में थी. शुरू में चंडीगढ़ के सरकारी स्कूल में रहकर हॉकी खेली. जब अच्छा खेलने लगी, तो आगे बढ़ती गई. नेशनल टीम में जगह बनाई. अभी वो टीम इंडिया की बेस्ट मिडफिल्डर्स में से हैं.

Monica
टीममेट के साथ सेलेब्रेट करतीं मोनिका. (फोटो- PTI)

9. सलीमा टेटे

टोक्यो में भारत-यूके का हॉकी मैच खत्म हुआ तो सोशल मीडिया पर घर की ये तस्वीरें वायरल हुई. एक आधा कच्चा-आधा पक्का सा छोटा घर. ऐसा घर होना देश में नहीं बात नहीं है. हमने पहले भी देखा ही होगा. लेकिन ये घर टोक्यो में हॉकी खेल रही सलीमा टेटे का है, ये बात हमको भावुक कर गई. सलीमा टेटे की कहानी भी वैसी ही जैसी हॉकी टीम की बाकी लड़कियों की. सलीमा झारखंड के सिमडेगा जिले के बड़कीचापर से आती हैं. नक्सल प्रभावित गांव है. गरीबी इतनी कि आज तक गांव में किसी के घर में टीवी नहीं है. अभी जब टोक्यो ओलंपिक में टीम जीतने लगी और सलीमा का नाम हुआ, तब जाकर प्रशासन को लगा गांव वालों को भी मैच तो दिखाना ही चाहिए. उसके बाद डीटीएच और जनरेटर की व्यवस्था की गई. तो ऐसे एक गांव से निकली हैं सलीमा टेटे. शुरू में बांस की खप्पचियों से हॉकी खेलना शुरू किया. फिर थोड़े पैसे हुए तो हॉकी की स्टिक खरीदी. शुरू में गांव के स्कूल में ही हॉकी खेली. अब अच्छा खेलने लगी तो आगे मौका मिलने लगा. और फिर नेशनल टीम तक पहुंची. टॉक्यो ओलंपिक के दौरान सलीमा की खूब तारीफ हुई है. वो भारत की महिला हॉकी की सबसे अच्छी खोज मानी जा रही हैं.

10. सुशीला चानू

सुशीला चानू टीम की सबसे सीनियर खिलाड़ियों में से हैं. रियो ओलंपिक में वो भारतीय हॉकी टीम की कप्तान थीं. 150 से ज्यादा मैच भारत के लिए खेले हैं. सुशीला मणिपुर से आती हैं. परिवार की गरीबी, आर्थिक तंगी वाली कहानी सुशीला चानू की भी वैसी ही रही, जैसे और खिलाड़ियों की हमने बताई. घर में पैसों की तंगी रही. पिता के पास काम नहीं था तो मां घर का खर्च चलाती थीं. इन सब के बीच भी सुशीला चानू को हॉकी खेलने से नहीं रोका. सुशीला अभी रेलवे में नौकरी भी करती हैं.

11. नवजोत कौर

हरियाणा में खेलों का चाव रहा है. कुरुक्षेत्र में मेकेनिक का काम करने वाले पिता भी अपने एक बच्चे को खेलों में लाना चाहते थे. मेकेनिक पिता ने मौका नवजोत कौर को दिया. नवजौत ने 2003 में हॉकी खेलना शुरू किया था. 2012 में उन्हें सीनियर टीम में जगह मिल गई. और उसके बाद वो रियो ओलंपिक होते हुए टॉक्यो ओलंपिक तक पहुंच गई.

12. रानी रामपाल

साल 1994. दिसंबर के महीने की चौथी तारीख. कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद के रहने वाले तांगाचालक रामपाल के घर बेटी हुई. बमुश्किल गुजारे भरका कमा पाने वाले रामपाल ने अपनी बेटी का नाम रानी रखा. परिवार की हालत इतनी खराब थी कि रानी को दूसरों के घरों में काम करना पड़ता था. जब रानी छह साल की हुईं तो हॉकी अकेडमी में बच्चों को खेलते देखा. रानी का मन भी खेलने को ललचाता. लेकिन उनके घरवालों की इतनी हैसियत नहीं थी कि उन्हें हॉकी का साजो-सामान दिला पाएं. तो रानी ने अकेडमी के बच्चों की टूटी हॉकी से खेलना शुरू किया. और ऐसे ही एक दिन वो शाहबाद हॉकी अकैडमी के कोच बलदेव सिंह की नज़र में आ गईं.

बलदेव ने रानी का ज़ुनून देख उनकी जिम्मेदारी ले ली. कोच बलदेव ने ना सिर्फ रानी को सिखाने बल्कि उनके रहने-खाने का जिम्मा भी उठाया. और बलदेव के साथ मिलकर रानी के ज़ुनून ने सिर्फ 14 साल की उम्र में रानी को इंडिया की जर्सी तक पहुंचा दिया. साल 2010 के वर्ल्ड कप में सिर्फ 15 साल की रानी टीम इंडिया की सबसे युवा प्लेयर थीं. और इस वर्ल्ड कप के बाद से उनका करियर लगातार आगे बढ़ रहा है. वह अपनी टीम को ओलंपिक्स सेमीफाइनल तक ले जाने वाली पहली और इकलौती भारतीय महिला हॉकी कैप्टन हैं.

13. ललरेमसियामी

साल 2000 के मार्च महीने में मिज़ोरम की राजधानी आइज़ॉल से 80 किलोमीटर दूर रहने वाले किसान ललथसांगा ज़ोटे के घर एक बेटी पैदा हुई. परिवार ने बेटी का नाम ललरेमसियामी रखा और 11 साल की होते-होते ललरेमसियामी मिज़ोरम सरकार की हॉकी अकैडमी जॉइन कर चुकी थी. और फिर पांच साल बाद ही वह नई दिल्ली की नेशनल हॉकी अकैडमी पहुंच गई.

लेकिन यहां की समस्या ही अगल थी. ललरेमसियामी को ना हिंदी आती थी और ना ही अंग्रेजी. वह अपने साथियों से इशारों में बात करतीं और बाकी का काम अपनी हॉकी स्टिक के भरोसे छोड़ देतीं. और इसी स्टिक के भरोसे सियामी ने बेहद तेजी से सीढ़ियां चढ़ीं और अपने 18वें बड्डे से पहले ही नेशनल टीम में पहुंच गईं. सियामी ने टीम इंडिया के साथ 2018 की एशियन चैंपियंस ट्रॉफी और इसी साल के एशियन गेम्स के सिल्वर मेडल जीते.

लेकिन उनका असली कैरेक्टर दिखा जून 2019 में. सियामी टीम के साथ जापान में थीं. FIH सीरीज फाइनल्स चल रहे थे और सेमीफाइनल से ठीक पहले सियामी को पता चला कि मिज़ोरम में उनके पिता की मौत हो गई है. कोच शोर्ड मारिन ने साफ कर दिया कि वह चाहें तो घर जा सकती हैं. लेकिन सियामी ने इतने अहम मैच से पहले अपनी टीम का साथ ना छोड़ने का फैसला किया.

दरअसल चिले के खिलाफ होने वाले सेमीफाइनल में अगर भारत हार जाता, तो टीम टोक्यो ओलंपिक्स तक ना पहुंच पाती. और इसीलिए सियामी टीम को अधर में नहीं छोड़ना चाहती थीं. वह रुकीं और उनके साथ टीम ने पहले सेमीफाइनल और फिर फाइनल जीत गोल्ड अपने नाम किया. और बेहद शान से ओलंपिक्स का टिकट कटाया. टोक्यो में टीम का अहम हिस्सा रहीं ललरेमसियामी ओलंपिक्स खेलने वाली मिज़ोरम की पहली महिला एथलीट हैं.

14. वंदना कटारिया

देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड का हरिद्वार. दिल्ली-एनसीआर वालों के इस वीकेंड गेटवे में रोशनाबाद नाम का एक गांव है. इसी गांव में साल 1992 में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड के चीफ टेक्नीशियन नाहर सिंह कटारिया के घर एक बेटी पैदा हुई. नाहर ने इस बेटी का नाम वंदना रखा. और वंदना को छोटी उम्र से ही खेलकूद में खूब मजा आता था.

खासतौर से वह हॉकी खेलने के पीछे पगलाई रहती थीं. और इसके लिए अक्सर लोग उन्हें ताना भी मारते थे. लोगों का कहना था कि एक लड़की के लिए हॉकी खेलना अशोभनीय है. और लोगों के तानों से बचने के लिए वंदना ने छिपकर, पेड़ की टहनियों से हॉकी खेलना शुरू कर दिया. अब ताना मारने वाले लोग उन्हें देख नहीं पाते थे और वंदना पूरा ध्यान तानों से हटाकर अपने खेल पर लगा पाती थीं.

लेकिन ताना मारने वालों की एक खासियत है, ये आसानी से पीछा नहीं छोड़ते. लोगों ने पता लगा ही लिया कि लड़की ने हॉकी छोड़ी नहीं है. बस फिर क्या था लोग फिर शुरू हो गए. लेकिन अब तक वंदना के पिताजी खुलकर उनके सपोर्ट में आ चुके थे. कभी खुद पहलवानी करने वाले नाहर ने वंदना से खेलना जारी रखने के लिए कहा. और खेलते-खेलते वंदना टोक्यो 2020 ओलंपिक्स तक पहुंच गईं.

हालांकि वंदना के पिताजी अपनी बेटी को ओलंपिक्स में हैटट्रिक मारने वाली पहली भारतीय बनते नहीं देख पाए. दरअसल ओलंपिक्स से तीन महीने पहले ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी. और बैंगलोर स्थित नेशनल कैंप में रहने के चलते वंदना आखिरी बार अपने पिता को देख भी नहीं पाईं. लेकिन एक बात तय है- स्वर्ग से उनके पिता जरूर अपनी बेटी को देख रहे होंगे.

15. शर्मिला देवी

‘वह एक युवा प्लेयर है और बिना डरे खेलती है. वह बहुत खुशी के साथ खेलती है.’

टोक्यो 2020 ओलंपिक्स के लिए निकलने से पहले भारतीय महिला हॉकी टीम के कोच शोर्ड मारिन ने यह बात युवा फॉरवर्ड शर्मिला देवी के लिए कही थी. हरियाणा के हिसार से आने वाली शर्मिला कुल नौ मैचों का अनुभव लेकर टोक्यो पहुंची थीं. लेकिन उन्हें खेलते देखकर एक बार भी नहीं लगा कि सिर्फ 19 साल की इस लड़की के पास बड़े स्टेज का अनुभव नहीं है. मैदान के दोनों तरफ से भागती शर्मिला को खेलते देखना बेहद मजेदार है. उन्हें इस ओलंपिक्स से मिले सबसे बड़े पॉजिटिव्स में से एक माना जा रहा है.

शर्मिला ने 2019 के FIH विमिंस ओलंपिक्स क्वॉलिफायर्स के दौरान इंटरनेशनल डेब्यू किया था. अमेरिका के खिलाफ अपने पहले ही मैच में उन्होंने कमाल का गोल दाग बड़े स्टेज पर अपने आने का ऐलान कर दिया था. टोक्यो ओलंपिक्स में उन्होंने ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ टूर्नामेंट का अपना इकलौता गोल स्कोर किया.

ये तो हुई खिलाड़ियों की बात. लड़कियों की इस कामयाबी में गुरु का रोल भी उतना ही अहम है. महिला हॉकी टीम के कोच शोर्ड मारिन. इनकी कोचिंग में भारतीय महिला हॉकी टीम ने अपना अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया. हालांकि आज के मैच के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. इनका करार ओलंपिक तक ही था.


टोक्यो ओलंपिक: महिला हॉकी टीम कैसे हारी अपना ब्रॉन्ज़ मेडल मैच?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

अली का रोल करने वाले इंडियन एक्टर अनुपम त्रिपाठी का सलमान-शाहरुख़ कनेक्शन क्या है?

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

ईमानदारी से स्कोर भी बताते जाना. हम इंतज़ार करेंगे.

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.