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41 साल बाद इतिहास रचने वाली हॉकी टीम के एक-एक सदस्य की कहानी रोंगटे खड़े कर देगी!

41 साल बाद बाद भारत हॉकी में ओलंपिक से एक पदक लेकर लौट रहा है. टीम ने उस जिंक्स को तोड़ा है, जिसके चलते कहा जाता था कि हॉकी में भारत का सुनहरा दौर अब चला गया. 41 साल से चला आ रहा मेडल का सूखा हॉकी की टीम ने खत्म कर दिया है. सेमीफाइनल में बेल्जियम से हारने के बाद ब्रॉन्ज़ के लिए मैच में हमने जर्मनी को 5-4 से हराया. आज के मैच में वाकई हम चैंपियन्स की तरफ खेले. शुरू में एक-तीन से पिछड़ गए थे. लगा कि जर्मनी हम पर भारी पड़ रहा है. मेडल हाथ से जा रहा था. लेकिन हमारे लड़के आक्रामक खेले. वापसी की. जर्मनी के खिलाफ 5 गोल दागे. जब मैच खत्म होने में 7 सेकेंड बाकी थे और स्कोर 5-4 पर था तो जर्मनी को पेनाल्टी कॉर्नर मिला. सांसें थम गई थी कि कहीं अब जर्मनी गोल ना कर दे. लेकिन हमारे गोलकीपर श्रीजेश जर्मनी के सामने ग्रेट वॉल साबित हुए. भारतीय टीम के लिए सिमरनप्रीत ने मैच में दो गोल किए. उनके अलावा रुपिंदर पाल सिंह, हरमनप्रीत सिंह और हार्दिक सिंह ने एक-एक गोल किया. और इन पांच गोल से हमने ब्रॉन्ज़ पक्का किया.

हम उस पूरी हॉकी टीम और उसके संघर्ष से आपको रूबरू कराएंगे, जिसने 41 साल बाद देश को गर्व करने का मौका दिया. हॉकी में खिलाड़ियों को उनके खेलने की पोजिशन के हिसाब से बांटा जाता है. जैसे डिफेंडर्स, मिडफिल्डर्स, फॉर्वर्ड और गोलकीपर. हम एक-एक कर सबकी बात करेंगे.

गोलकीपर श्रीजेश

सबसे पहले बात करते हैं गोलकीपर श्रीजेश की. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से अगर आप राप्तीसागर एक्सप्रेस में बैठें तो उरई होते हुए 50 घंटे में एर्णाकुलम पहुंचेंगे. केरल का बहुत खूबसूरत शहर है एर्णाकुलम. एर्णाकुलम में ही 8 मई 1988 को किसान पीवी रवींद्रन के घर लल्ला पैदा होता है. नाम रखा गया परात्तु रवींद्रन श्रीजेश. श्रीजेश बचपन में कई सारे खेल खेलते थे. लेकिन आगे के लिए श्रीजेश ने मन बनाकर हॉकी खेलने का फैसला किया. डिफेंस में खेलने वाले श्रीजेश बहुत आलसी थे. हालांकि उनके रिफलेक्सेज बचपन से ही तेज थे और इसी की आड़ में उनका आलस छिप जाता था. लेकिन एक दिन जयकुमार नाम के एक हॉकी कोच ने ये बात पकड़ ली. और उन्हें डिफेंस से उठाकर गोल में डाल दिया. बाकी बच्चों की तरह श्रीजेश ने भी शुरुआत में गोलकीपिंग से मना किया लेकिन फिर धीरे-धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लगा.

और बढ़ते-बढ़ते ये मजा यहां तक पहुंच गया कि श्रीजेश ने टोक्यो ओलंपिक्स में भारत को ब्रॉन्ज़ मेडल ही जिता दिया. जर्मनी के खिलाफ ब्रॉन्ज़ मेडल मैच में श्रीजेश ने हमेशा की तरह कई कमाल के बचाव किए. और इनके ही दम पर भारत ने 41 साल बाद अपना पहला ओलंपिक्स मेडल जीत लिया.

Sreejesh
जीत के बाद गोलपोस्ट के ऊपर बैठकर सेलेब्रेट करते श्रीजेश. (फोटो- PTI)

कप्तान साब

अब बात भारतीय हॉकी टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह की. साल 2011 की बात है. धोनी का मशहूर छक्का लग चुका था. इंडियन क्रिकेट टीम दोबारा से वर्ल्ड कप जीत चुकी थी. और दूसरी ओर हॉकी का बुरा हाल जारी था. एक और कोच की विदाई हो चुकी थी. स्पैनिश कोच होजे ब्रासा की जगह मिली पूर्व भारतीय हॉकी प्लेयर हरेंद्र सिंह को. और हरेंद्र सिंह को पहली सलाह मिली जुगराज सिंह से. जुगराज ने हरेंद्र से कहा, ‘वो कोरियन लड़का बहुत अच्छा है.’ और जुगराज की बात मान हरेंद्र ने उस कोरियन लड़के को इंडिया की जर्सी पहना दी. और इस जर्सी को पहनने के 10 साल बाद उसी कोरियन लड़के की कप्तानी में टीम इंडिया ने टोक्यो में कमाल कर दिया है. जी हां, हम बात कर रहे इंडियन हॉकी टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह की. मनप्रीत, जिन्हें साथी कोरियन कहते हैं. क्योंकि वह बचपन से ही काफी चपल और चंचल स्वभाव के हैं. और उनकी गतिविधियां भी वैसी ही हैं. 7-8 साल की उम्र में ही मनप्रीत अपने गांव की टीम के स्टार बन गए थे.

और जालंधर से शुरू हुआ उनका ये सफर परवान चढ़ा साल 2016-17 में. 2016 के सुल्तान अज़लान शाह कप के दौरान मनप्रीत के पिता की मौत हो गई. मनप्रीत उनके अंतिम संस्कार के लिए मलेशिया से वापस घर लौट आए. लेकिन यहां उनकी मां ने अगले मैच से पहले उन्हें वापस भेज दिया. मनप्रीत की वापसी के बाद भारत ने कनाडा और पाकिस्तान को हराकर फाइनल में एंट्री की. 2016 ओलंपिक्स के बाद मनप्रीत को पहली बार टीम इंडिया का कप्तान बनाया गया. और सरदार सिंह के रिटायरमेंट के बाद से वह टीम की धड़कन बने हुए हैं.

डिफेंडर्स

अब बात करते हैं टीम इंडिया के डिफेंडर्स की. पहला नाम हरमन प्रीत सिंह. हॉकी प्रेमी कहते हैं कि हॉकी में गोल करने से ज्यादा दिमाग पेनल्टी कॉर्नर हासिल करने में लगता है. और ये मिल जाए तो इससे ज्यादा दिमाग इसे गोल में बदलने में लगता है. पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलने वाले कलाकार को ड्रैगफ्लिकर कहते हैं. ड्रैग माने घसीटना और फ्लिक माने धकेल देना. मतलब गेंद को घसीटकर धकेलने की कला. और टोक्यो 2020 ओलंपिक्स में हमारे सबसे कर्रे ड्रैगफ्लिकर का नाम है हरमनप्रीत सिंह.

वो हरमनप्रीत, जो डिफेंस में डीप भी खेल सकता है और साथ ही मैदान के दोनों तरफ से अटैक भी कर सकता है. और आप शायद यकीन ना मानें लेकिन इस ड्रैगफ्लिकर को काफी बाद में पता चला कि ड्रैगफ्लिक इत्ती जरूरी चीज है. वो तो भला हो सुरजीत हॉकी अकैडमी जालंधर का, जहां हरमनप्रीत ने ये कला निखारी और टोक्यो में छह गोल्स दाग दिए. अपने गोल्स के जरिए भारत को ब्रॉन्ज़ मेडल तक पहुंचाने वाले हरमनप्रीत साल 2016 में वर्ल्ड चैंपियन बनी भारतीय जूनियर हॉकी टीम में भी थे.

हरमनप्रीत का मानना है कि बचपन में खेतों में काम करने के चलते वह इत्ती सही हॉकी खेल लेते हैं. और उनकी ड्रैगफ्लिक की स्पीड का राज तो उनकी ट्रैक्टर ड्राइविंग में ही छिपा है. सिर्फ 10 साल की उम्र में ट्रैक्टर की स्टेयरिंग थामने वाले हरमनप्रीत शुरू में ट्रैक्टर के गियर नहीं बदल पाते थे. लेकिन वक्त के साथ उन्होंने ना सिर्फ ट्रैक्टर का गियर बदलना सीखा, बल्कि ड्रैगफ्लिक में तूफानी ताकत लाना भी सीख ही लिया. और पूरी दुनिया की गोलचौकियां इस बात की गवाह हैं.

डिफेंडर्स में दूसरा नाम रुपिंदर पाल सिंह. 30 साल की उम्र बहुत ज्यादा नहीं होती. लेकिन जब आप हॉकी जैसे फिजिकल गेम में हों, अक्सर चोटिल होते रहते हों तो 30 की उम्र भी रिटायरमेंट जैसी लगने लगती है. खासतौर से उनको जो बाहर से बैठे आपको देख रहे हों. ऐसा ही कुछ हाल रुपिंदर पाल सिंह का है. 6 फीट से ज्यादा लंबे रुपिंदर के करियर में उपलब्धियां और चोटें एक-दूसरे को कड़ी टक्कर देती हैं.

इसीलिए तो जब उन्हें टोक्यो की टीम में शामिल किया गया तो कई लोगों को आश्चर्य हुआ. लेकिन रुपिंदर ने टोक्यो में अपने प्रदर्शन से इन सभी लोगों को शांत कर दिया. टोक्यो में ना सिर्फ उन्होंने टीम इंडिया के लिए गोल बचाए बल्कि अपनी ड्रैगफ्लिक के जरिए कई पेनल्टीज को गोल में भी बदला. स्पोर्ट्स की दुकान चलाने वाले सरदारजी के घर जन्मे रुपिंदर के पिता की दुकान बहुत दिन तक परिवार का साथ नहीं दे पाई. जिसके चलते उन्होंने सालों तक एक कमरे के मकान में गुजारा किया.

रुपिंदर के बड़े भाई भी हॉकी खेलते थे. लेकिन परिवार की हालत के चलते उन्होंने स्टिक छोड़ छोटी-मोटी नौकरी करनी शुरू कर दी. रुपिंदर के परिवार के लिए उनकी शुरुआती ट्रेनिंग को अफोर्ड कर पाना आसान नहीं था. जिसके चलते उनकी मां सुखविंदर कौर ने रोज 100-150 कमाने के लिए कपड़े सीने शुरू कर दिए. और रुपिंदर ने अपने परिवार की इन क़ुर्बानियों का कर्ज़ तमाम इंटरनेशनल मेडल्स के बाद अब ओलंपिक्स ब्रॉन्ज़ लाकर चुकाया.

डिफेंडर्स में तीसरा नाम है सुरेंद्र कुमार का. ये उन दिनों की बात है जब सचिन, सहवाग, गांगुली वाली भारतीय क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप के फाइनल तक पहुंची थी. ये देश खेल के नाम पर सिर्फ क्रिकेट पर बात करना चाहता था. लड़के अखबारों से फेवरेट क्रिकेटरों की रंगीन फोटो काटकर कमरे की दीवारों पर चिपकाया करते थे. उस दौर में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में किसान परिवार का छठी क्लास में पढ़ने वाला लड़का अपने पापा से हॉकी की स्टिक मांगता है. ये अजीब-सी डिमांड थी. जब अड़ोस-पड़ोस के बच्चे मां-बाप से सचिन के जैसा बल्ला मांग रहे थे, तब ये लड़का हॉकी के लिए कह रहा था. पापा ने हॉकी स्टिक दिलाने से मना कर दिया. लेकिन लड़के ने ज़िद पकड़ ली थी कि उसे हॉकी ही खेलना है. मां फिर समझाती है कि हॉकी खेलकर क्या करोगे, हॉकी में कुछ नहीं कर पाओगे. लड़का नहीं माना. अड़ गया.

घर में बात नहीं बनी तो पड़ोस के पुरुषोत्तम चाचा को हॉकी स्टिक दिलाने के लिए राज़ी कर लिया. पड़ोसी ने 500 रुपये में लड़के को हॉकी की स्टिक लाकर ले दी. यहां से लड़के का खेल शुरू हो गया. लेकिन अब भी घर वालों को लग रहा था कि लड़का गलत राह पर निकल गया है. फिर कुछ ही दिनों में घरवालों के पास वो खबरें आने लगी कि उनका लड़का बहुत बढ़िया हॉकी खेलता है. स्थानीय कोच गुरविंदर ने उसके मां-बाप को समझाया कि वो हॉकी में बढ़िया करेगा. अब मां-बाप को भी बेटे की पंसद जंचने लगी थी. किसान परिवार था. आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी. फिर भी जितना बन पाया, पूरा सपोर्ट दिया. 2010 में ये लड़का हरियाणा की हॉकी टीम में शामिल होता है. और 11 साल बाद 2021 में उस टीम का हिस्सा बनता है जो ओलंपिक में मेडल जीतकर लाई है. ये कहानी है सुरेंद्र कुमार की. भारतीय हॉकी टीम के वन ऑफ दे बेस्ट डिफेंडर्स. आज सुरेंद्र कुमार पूरे देश को जश्न मनाने का मौका दिया है. जश्न कुरुक्षेत्र में उनके घर पर भी मन रहा है.

डिफेंडर्स में चौथा नाम है अमित रोहिदास का. ओडिशा का सुंदरगढ़ जिला. भारतीय हॉकी के लेजेंड दिलीप तिर्की का अपना जिला. सालों तक टीम इंडिया के डिफेंस की जान रहे तिर्की को देख सुंदरगढ़ के जाने कितने बच्चों ने हॉकी स्टिक उठाई. लेकिन जरूरी थोड़े है कि हॉकी स्टिक उठाने वाला हर बच्चा इंडिया की मुख्य टीम में खेले? इंडिया खेलने के लिए तो अलग ही लेवल का जिगरा चाहिए. और हमारा अगला प्लेयर इसी जिगरे के साथ तिर्की के ही गांव में पैदा हुआ था. नाम अमित रोहिदास. काम 150-160 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से आती गेंद के आगे दौड़ जाना.

टोक्यो 2020 ओलंपिक्स में भारत को ब्रॉन्ज़ मेडल जिताने वाले सबसे बड़े कारणों में से एक अमित भी हैं. सामने वाली टीम को मिलने वाले हर पेनल्टी कॉर्नर पर लगे शॉट के आगे दौड़ते अमित को देखकर लगता ही नहीं कि ये इतना खतरनाक काम है. क्योंकि अमित ने खुद को इसमें साध लिया है. इस तरह साधा है कि लोग उन्हें टीम इंडिया का दूसरा गोलकीपर बुलाते हैं. बचपन से ही अपनी स्पीड और फुर्ती के लिए फेमस अमित को सबसे पहले पहचाना लगातार दो बार के ओलंपिक्स चैंपियन मॉरित्ज़ फुस्ते ने.

अमित ने 2016-17 की हॉकी इंडिया लीग में जर्मन हॉकी प्लेयर फुस्ते की कप्तानी में खेला था. और फुस्ते ने उस वक्त कलिंगा लांसर्स के लिए खेलने वाले अमित को दुनिया का बेस्ट फर्स्ट-रशर यानी पेनल्टी कॉर्नर बचाने के लिए भागने वाला सबसे पहला प्लेयर करार दिया था. बेहद गरीब घर में पैदा हुए रोहिदास का मानना है कि दिलीप टिर्की के चलते ही वह हॉकी खेल रहे हैं. बचपन में टिर्की को खेलते देखकर ही अमित ने हॉकी उठाई थी. और बचपन में उठी हॉकी का ये सफर ओलंपिक्स ब्रॉन्ज़ तक पहुंच गया है. अमित रोहिदास इस ओलंपिक्स में भारत के बेस्ट प्लेयर्स में से एक रहे हैं,

पांचवें डिफेंडर हैं बीरेंद्र लाकड़ा. ये भी ओडिशा के सुंदरगढ़ ज़िले से हैं. बीरेंद्र लाकड़ा की तो परवरिश ही हॉकी के बीच हुई है. इनके बड़े भैया बिमल लाकड़ा भी भारतीय हॉकी टीम में रह चुके हैं. मिड फिल्डर थे. इनकी बहन असुंता लाकड़ा भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रह चुकी हैं. बीरेंद्र लाकड़ा अभी भारतीय टीम के उपकप्तान भी हैं. बतौर डिफेंडर खेलते हैं.

मिडफील्डर्स

ये हुई डिफेंडर्स की बात. अब आते हैं मिडफिल्डर्स पर. मिडफिल्डर्स में एक तो खुद कप्तान मनप्रीत सिंह हैं. दूसरा नाम है गुरजंत सिंह. साल 2016 का जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप कमाल का इवेंट था. हरेंद्र सिंह की कोचिंग वाली टीम ने ना सिर्फ दुनिया जीती, बल्कि उसके पांच साल बाद उस टीम के प्लेयर्स ने ओलंपिक्स में भी गदर काट दिया. और इन्हीं प्लेयर्स में से एक हैं गुरजंत सिंह. इस वर्ल्ड कप की जीत के बाद के साल उनके लिए मुश्किल रहे. गुरजंत का ज्यादा वक्त चोट से जूझने में चला गया. इस दौरान उनके कई साथी नेशनल टीम में सेट हो गए, लेकिन गुरजंत अपनी फिटनेस से ही जूझते रहे.

लेकिन ओलंपिक्स के वक्त किस्मत ने उनका साथ दिया. और गुरजंत को एकदम नए अटैक वाली टीम इंडिया में चुन लिया गया. बचपन में अपने नानी गांव में पहली बार बच्चों को हॉकी खेलते देखने वाले गुरजंत ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया. और टोक्यो ओलंपिक्स में टीम इंडिया के अटैक में बेहतरीन रोल प्ले किया. चंडीगढ़ हॉकी एंड फुटबॉल अकैडमी से निकले गुरजंत ने टोक्यो ओलंपिक्स में तीन बेहद अहम गोल दागे.

गुरजंत के भाई भी हॉकी खेलते थे. और अपने भाई को देखकर ही गुरजंत ने नानी गांव से हॉकी खेलना शुरू किया. हमेशा गोल मारने की कोशिश करने वाले गुरजंत की एक और खासियत है- वह टीम से बाहर होने पर निराश नहीं होते. आमिर खान के फैन गुरजंत ने अपने अब तक के करियर में बड़े स्टेज पर हमेशा परफॉर्म किया है. उम्मीद है उनका यह कमाल आगे भी जारी रहेगा.

अगला नाम हार्दिक सिंह. पंजाब के जालंधर के पास खुसरोपुर गांव है. गांव के प्रीतम सिंह नेवी में रहते हॉकी खेलते थे. नेवी से रिटायर हुए तो गांव में हॉकी की ट्रेनिंग देने लगे. दादा की उंगली पकड़कर उनका चार साल का पोता हार्दिक सिंह भी मैदान तक आ जाया करता था. हार्दिक सिंह नाम का बच्चा अपने दादाजी को हॉकी सिखाते देखकर बड़ा हुआ, अपने पिता वरिंदरप्रीत सिंह को हॉकी खेलते देखकर बड़ा हुआ. और फिर खुद भी हॉकी की स्टिक पकड़ ली. हार्दिक के दादाजी और पिताजी का जो सपना अधूरा था वो हार्दिक सिंह ने पूरा किया. भारत के लिए हॉकी खेलने का सपना और देश के लिए ओलंपिक से मेडल जीतने का सपना. ब्रॉन्ज़ जीतने तक टोक्यो ओलंपिक के हर मैच में हार्दिक की भूमिका अहम रही. क्वार्टरफाइनल में ब्रिटेन के खिलाफ हार्दिक सिंह का लाजवाब गोल. वो गोल तो बार बार देखने लायक है. आज जर्मनी के खिलाफ मुकाबले में भी हार्दिक सिंह के नाम एक गोल है. 27वें मिनट भारत के लिए दूसरा गोल हार्दिक ने किया. और इस तरह मेडल जीतने तक टीम में हार्दिक सिंह का अहम रोल रहा है. जीत के बाद उनके परिवार का रिएक्शन भी देख लीजिए.

अगला नाम है विवेक सागर का. जब आज सुबह जापान में हॉकी मैच खत्म होने की सीटी बजी तो मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के चांदौन गांव में जश्न शुरू हो गया. टीम इंडिया का मिड फिल्डर विवेक सागर चांदौन गांव का ही है. मैच के बाद विवेक के घर भीड़ बढ़ने लगी. वैसे आप विवेक का घर देखिए. बिल्कुल सामान्य सा. अगर विवेक हॉकी की जगह, इंडियन क्रिकेट टीम में होता, तो क्या घर ऐसा ही होता. ये ही फर्क है हॉकी और क्रिकेट का. बिना सुविधाओं के विवेक ने गांव से ही हॉकी की शुरुआत की. हॉकी खेलनी है, छोड़ना है वाले कंफ्यूज़नों के बाद भोपाल की हॉकी अकादमी में आकर ट्रेनिंग शुरू की. खुद को मेहनत से तपाया. नेशनल टीम में शामिल हुए. बेहतरीन मिल फिल्डर्स के तौर पर उभरे. और अब भारत को ओलंपिक में गोल्ड दिलाया. उनके हॉकी में सफर पर परिवार ने क्या कहा- सुनिए.

इसके बाद आते हैं नीलकांत शर्मा. मणिपुर के रहने वाले हैं. मणिपुर समेत उत्तर-पूर्वी राज्यों में फुटबॉल की लोकप्रियता है, लड़के – लड़कियां बॉक्सिंग, वेट लिफ्टिंग जैसे स्पोर्ट्स में जाते हैं. ऐसे माहौल में हॉकी खेलने का चुनाव करना आसान नहीं था. लेकिन नीलकांत की पसंद तो हॉकी ही थी. फुटबॉल के मैदान जब खाली रहते थे तो वो हॉकी की प्रैक्टिस करते थे. पिता पंडित थे, घर की आर्थिक हालत कोई बहुत अच्छी नहीं थी. जब नीलकांत 16 साल के हुए तो मणिपुर से बाहर ट्रेनिंग के लिए भेजा गया. 2017 में नेशनल टीम में सलेक्शन हुआ. टूर ऑफ यूरोप के लिए नीलकांत भारत टीम का हिस्सा बने. और उसके बाद तो नीलकांत ने जगह पक्की कर ली. नीलकांत अभी भारत रेलवे में टिकट क्लेक्टर भी हैं.

फॉरवर्ड्स

फॉरवर्ड में पहला नाम शमशेर सिंह. अमृतसर का अटारी गांव. भारत- पाकिस्तान के वाघा-अटारी बॉर्डर के लिहाज से अटारी को कभी पहचान का संकट नहीं रहा. लेकिन इस पहचान से अटारी गांव के लोगों के जीवरस्तर में कोई बहुत बदलाव नहीं आया. अटारी का 9 साल का बच्चा शमशेर गांव के बड़े लड़कों को हॉकी खेलते देखता था. शमशेर का भी हॉकी खेलने का मन करता था. लेकिन पापा हॉकी की स्टिक नहीं दिलवा रहे थे. फिर एक सस्ती सी हॉकी स्टिक दिलवाई. जिसमें कहीं क्रैक आ जाता था तो टेप लगा दी जाती थी. कीलें लगाकर सही की जाती थी. शमशेर जब 11 साल के हुए तो जालंधर की सुरजीत हॉकी अकेडमी में दाखिला करवाया गया. जालंधर की सुरजीत हॉकी अकेडमी का खूब नाम है. यहीं से फिर सुरजीत का राज्य और फिर नेशनल टीम में चयन हुआ.

अगला नाम है दिलप्रीत सिंह. शमशेर सिंह की तरह ही अमृतसर से दिलप्रीत सिंह भी आते हैं. दिलप्रीत सिंह के पिता भी हॉकी के खिलाड़ी थे. भारतीय सेना में रहे हैं. तो हॉकी दिलप्रीत को विरासत में मिली है. दिलप्रीत की ट्रेनिंग भी सुरजीत अकेडमी में ही हुई है.

मनदीप सिंह. भारत के स्ट्राइकर मनदीप सिंह भी पंजाब की सुरजीत अकेडमी से ही आते हैं. मनदीप रहने वाले भी जालंधर के ही हैं. इन खिलाड़ियों के अलावा भारत भारत हॉकी टीम के साथ एक्सट्रा गोलकीपर के तौर पर कृष्णा पाठक गए थे. सिमरनजीत सिंह और वरुण कुमार भी टीम का हिस्सा थे.

ये तो हुई खिलाड़ियों की बात. अब इनके गुरु की बात करते हैं. जीत में कोच ग्राहम रीड की भूमिका भी उतनी ही बड़ी है. भारतीय हॉकी टीम के कोच हैं ग्राहम रीड. ग्राहम रीड ऑस्ट्रेलिया के हैं. 80 और 90 के दशक में ऑस्ट्रेलिया की हॉकी टीम में मिडफिल्डर रहे हैं. ज्यादा सटीक बताऊं तो ओलंपिक में मेडल जीतने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम में रहे हैं. अप्रैल 2019 में भारत के लड़कों को ट्रेनिंग देना शुरू किया था. हॉकी के जानकार ऐसा मानते हैं कि ग्राहम रीड के आने के बाद इंडियन टीम की डिफेंस टेक्नीक मजबूत हुई हैं. खिलाड़ियों की मनोवैज्ञानिक ट्रेनिंग पर भी है. और कोच और सारी खिलाड़ियों की साझा मेहनत से टीम ओलपिंक में मेडल जीत पाई. टीम को बहुत बधाई.


ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीत पुरुष हॉकी टीम ने इतिहास रच दिया है

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