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दिल्ली के गांवों की कहानी: लोग मुआवज़े लेकर गांव छोड़ते गए

Pravin kumarप्रवीण कुमार ने हिन्दू कॉलेज, दिल्ली से पढ़ाई की है. ‘छबीला रंगबाज का शहर’ और ‘एक राजा था जो सीताफल से डरता था’ जैसे चर्चित किताबें लिख चुके हैं. मौजूदा वक्त में प्रवीण दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के सहायक प्रोफ़ेसर हैं. प्रवीण से rangbaazmail@gamail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

प्रवीण ने दिल्ली के गांवों को लेकर कुछ विशेष लिखा है. उनकी इज़ाज़त से आपको पढ़वा रहे हैं.


चौराहे से वह लौटे तो ठीक ही थे पर अब एहसास हुआ कि गलत टर्न ले लिया था उन्होंने. वहां से बाएं मुड़कर बड़े जौहड़ की ओर जाना था उन्हें. उनकी थोड़ी-सी जमीन थी उधर. उस जमीन को पहले वह भी खेत ही कहते थे जिसके किनारे पर एक झड़बेरी का घना पेड़ है. वह भी अब सूखने जैसा हो रखा है. पर सोचने वाली बात यह थी कि उन्होंने गलत टर्न कैसे ले लिया! जब से ये अपार्टमेन्ट बने हैं न, ख़ासकर ये डी.डी.ए वाले पार्क तब से सब कुछ एक जैसा ही हो गया है इधर. अपार्टमेंटों की नक्काशियों और रंगों को ध्यान में ना रखा होता तो लगभग गुम ही हो गए थे वह. नाम भी तो याद रखने होते हैं इनके! पर पार्क तो सब एक जैसे ही हैं सुसुरे! ज़रूर इन्हीं की वजह से दिशा-भ्रम हुआ है. अब सुबह-सुबह कोई पार्क और हरियाली का आनंद ले कि नाम पढ़ता चले? हरियाली तो कम ही हो गई है पर जब कोयलें बोलती हैं तो बॉर्डर की याद आ जाती है उन्हें.

वैसे भी अपने गांव में गुम होकर जाएंगे कहां? कुछ-कुछ ऐसा ही सोचते हुए वे गुम होते चले गए. पार्क के बाद पार्क, अपार्टमेंट-दर-अपार्टमेंट पार करते चले गए. वह और आगे बढ़े तो एक खुला मैदान मिला. बहुत बड़ा. मैदान को कई जगहों से टूटी हुई चारदिवारियों ने अपने घेरे में ले रखा था. वहां बहुत सारे बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे. बच्चों को निहारते हुए उन्होंने महसूस किया कि आज कुछ ज्यादा ही चल लिए वह. इस एहसास ने उनकी थकान और बढ़ा दी. बच्चों को खेलते देखते हुए चारदिवारी से लगकर सुस्ताने लगे. यह उम्र सुस्ताने की ही थी. वह जहां सुस्ता रहे थे वहां झड़बेरी की घनी छाया पड़ रही थी. उनका पोता कुछ बड़ा हो जाए तो यही इन बच्चों के बीच लाकर उसे छोड़ देंगे और उसका खेलना देखेंगे. कुछ ही देर बाद एक उड़ती हुई गेंद ठीक उनके पैरों के पास गिरी और बच्चे उन्हें पुकारने लगे ‘अंकल जी बॉल फेंक दो’. अभी उनका सुस्ताना पूरा नहीं हुआ था फिर भी बॉल को घुमाकर बच्चों की ओर फेंक दिया. बच्चे उन्हें अचरज से निहारने लगे. बॉल सीधे उनकी गिल्लियों से टकराई थी .

गिल्ली उड़ाकर उन्होंने लंबी सांस ली और चारदिवारी से वैसे ही देह टिकाए रहे. बॉल उठाते-फेंकते जो मिट्टी हाथ में आ गई थी उसे झाड़ा भी. वह सर्र से सरक गई. बिना रुके. मिट्टी की इस हरकत से या ना जाने क्यों वह कुछ सोचते हुए घुटनों के बल झुके. जैसे पृथ्वी का मुआयना करना हो. उन्होंने धरती को ध्यान से देखना शुरू किया और माथे पर शिकन डालते हुए एक मुट्ठी धूल उठा ली. जैसे-जैसे धूल को उन्होंने अपनी दोनों हथेलियों के बीच मलना शुरू किया वैसे-वैसे उनके माथे की शिकन गहरी होती चली गई. मिट्टी कुछ-कुछ रेतनुमा थी. फिर जैसे मिट्टी से ही उन्होंने सवाल किया “रै तू तो बांगर सै? तू कद तै यहां आगी?”

मिट्टी इससे पहले कि अपने खादर से बांगर होने का जवाब देती बुजुर्ग ने जवाब का इंतजार किए बगैर उसे झट से अपनी जेब में डाल लिया और बिलकुल वैसे ही लौट गए. खोए-खोए से. कुछ गुम कुछ गुमसुम से. उधर बच्चों का खेलना जारी रहा.


दबाव ना बनाओ तो यहां काम नहीं होता. बहुत हो-हल्ला हुआ. मेट्रो-रेल ने तब जाकर गांव का नाम जोड़ा. नहीं तो ये क्या नाम हुआ भला? ई.एस.आई हॉस्पिटल? मेट्रो स्टेशन का नाम अब सही लग रहा है- बसई दारापुर ई.एस.आई मेट्रो स्टेशन. जिस गांव की जमीन उसका नाम. जमीन ना देते तो बन जाना था स्टेशन?

“और के? तू किस भैम मै है? सरकार नै कौण रोक सकैगा भाई?”

दुकानवाले का यह प्रतिवाद लड़के को बिलकुल ही अच्छा नहीं लगा. उसके मन में आया कि साले प्रतिवादी को अभी पटक कर धूल चटा दे पर उसे थोड़ी जल्दी थी. अखाड़े में गुरु जी ने दस बजे का टाइम दे रखा था. वह दुकान से उठा और दौड़ते हुए एक बस में कूद गया. यहां की सारी बसें अखाड़ा-सड़क होकर ही जाती थीं. किसी भी बस में कूद जाओ. लड़के को उछलकर बस में चढ़ते हुए दुकान में बैठे सभी लोगो ने देखा. दुकान तो मिठाइयों की थी पर दूध,लस्सी और छाछ के अलावा कुछ भी नहीं बिकता था. यह बसई-दारापुर की सबसे पुरानी दुकान थी. यही से गांव शुरू होता था. दुकान की दूसरी तरफ के मेट्रो स्टेशन से एक खद्दरधारी दुकान की ओर लपका और दुकानदार से पूछा “रे यो जो लौंडा बस मा चढ्या सै. यो तै खेत्तरपाल का लौंडा सै न, जगवीर?”

“हां चौधरी, जगवीर ए सै यौ”

“अर्रै यार…इसै नै तो ढूंढूं सूं कद तै !”

दुकानदार हंसा और हंसते हुए ही बोला “ज्जमीन बिक्कन तै रही चौधरी. सूबेदार खेत्तरपाल मर जोवेगा पर ज्जमीन ना बेच्चेगा कदे”.

“के बात कर दी तन्ने सुरेश? इब गांव के गांव बिक गए, यो खेत्तरपाल चीज के सै?” कहकर खद्दरधारी ने आंख मारी और हंस पड़ा. दुकान में बैठे सभी ने एक साथ ठहाके लगाए. दुआ-सलाम करके खद्दरधारी दुकान में बैठ गया. वह बैठा तो इसलिए भी था क्योंकि उन ठहाकों के बीच एक जन ऐसा भी था जिसे हंसी नहीं आई थी चौधरी की बात पर. ना हंसने वाला अधेड़ था और अखबार में डूबा हुआ था. खद्दरधारी ने उसको संकेत करते हुए सुरेश को संबोधित किया “सूबेदार खेत्तरपाल मिला था आज. बड़े जौहड़ की ओर अपनी जमीन कै पास. जैसे उसका कुछ गुम-सा हो गया हो. मैंने राम-राम कही और अपनी स्कूटी से उसके घर छोड़ आया .भला आदमी है पर कुछ बावला-सा हो रखा है. अपनी जेब में मिट्टी भर रखी थी उनने. लगता है जिवेगा नहीं ज्यादा दिन बेचारा .”

“क्या बात कर दी चौधरी? मिलिट्री का रिटायर है. इब्बे तो लम्बी पारी खेल्लेगा” सुरेश ने फिर जवाब दिया.

पर खद्दरधारी जैसे सूबेदार की उम्र नाप कर बैठा था. तपाक से बोला आर्रे..रिटायर हुए भी तो दस-बारह साल हो गए भाई .”

अख़बार पढ़ रहा वह अधेड़ अब हरकत में आया. उसने अख़बार को पटका और दो बीड़ियां इकट्ठे सुलगाई. एक सुरेश को दी और दूसरी ख़ुद फूंकने लगा . उसने धुंए को कुछ इस तरह साध कर फेंका कि खद्दरधारी की पूरी देह धुंए से भर गई. खद्दरवाले ने उसको टोका “यौ के बत्तमीजी है भाई?” पर बीड़ी वाले पर कोई असर नहीं हुआ. उसने बीड़ी पीते हुए फिर उसी तरह साधकर धुंए को खद्दरवाले की देह पर फेंका. अब चौधरी को बर्दास्त नहीं हुआ. उसने दांत पीसकर चेतावनी दी “रे सोलंकी, इब ज्यादा ना कर तू”. पर बीड़ी फूंकनेवाला कुछ तय करके ही बैठा था. वह उठा और खद्दरवाले के चेहरे से अपना चेहरा लगा दिया- “देख भाई चौधरी. राजनीति और ब्योपार ने एक साथ ना मिला. सूबेदार खेत्तरपाल की जमीन पर मेरी नज़र है. उस जमीन ना इब तू भूल ही जा.” यह कहकर सोलंकी ने एक बार फिर बीड़ी का जोरदार कश लिया और धुंआ फेंका .इस बार भी चौधरी पर ही. चौधरी कुर्सी पर वैसे ही धंसा रहा. पर चौधरी में भी डर का कोई नामोनिशान नहीं था. वह अपलक सोलंकी को घूरे जा रहा था. उसने सोलंकी को तब तक घूरा जब तक सोलंकी ने बीड़ी का अंतिम कश ना ले लिया और उसे फेंककर अपनी ऑडी में बैठ कर चला ना गया.

सोलंकी के जाने के बाद सुरेश कुर्सी पर धंसे चौधरी के पास आया “यौ खेत्तरपाल के छोरे जगवीर का विजटिंग-कारड सै.” कार्ड देते वक़्त इस बार सुरेश ने चौधरी को आंख मारी और कहा “योअर नयु कम्पैटीटर”.

चौधरी ने बड़ी दिलचस्पी से कार्ड लिया और उलटने-पलटने लगा . फिर ऊंची आवाज में उसे पढ़ना शुरू किया. सबसे ऊपर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था “जय खाटू जी महाराज.” फिर उससे कुछ छोटे अक्षरों में लाल रंग से लिखा था “यहां पिछवाड़े में हाथ डालकर काम कराया जाता है.” सबसे बाद में लिखा था “दुकान, मकान, कोठी या जमीन. कब्जा लेना या खाली करवाना हो. संपर्क करें. काम ना हो तो पैसे वापस. भरोसा हो तभी आएं. जगवीर चौधरी .बसई-दारापुर वाले.”

चौधरी आंखें बंद कर अब कुछ सोचने लगा .


पत्ते खेलते और हुक्का गुड़गुड़ाते दोपहर के तीन बज गए थे. घर की मालकिन निम्मों की नाराज़गी भांपकर धीरे-धीरे चौधरियों का सारा कुनबा खिसकने लगा था. अब दो ही चौधरी बच गए. सूबेदार खेत्तरपाल और बलवान. हमउम्र और बचपन के साथी. बात बलवान ने ही छेड़ी “ओमवीर आता है न?”

“हां, इतवार कै इतवार “.

“देख सूबेदा ! मैं तो ख़ुद ही हालात का मारा हूं .मैं क्या सलाह दूंगा? पर ओमवीर दस दफा फोन कर चुका कि बापू ने समझाओ. अब बांट दे. कब तक रोकेगा. निबट ले इब. जगवीर भी ब्याहने को आया. कोई काम धंधा शुरू करा दे. एक बार और मदद कर खड़ा कर दे.”

“मदद तो की थी सुसुरे की. पहले ख़ुद की बेचो फिर दूसरों की बिकवा दो. यही धंधा उसे भाया?”

“इब पूरी दिल्ली ही ख़रीदी-बेकी जा रही है. वो अजूबा है? जिधर दुनिया उधर वह भी”. बलवान ने सफाई दी .

“हां जी, बड़ा वाला गया ना दुनिया के साथ कि छोटे वाले को भी जाने दूं!” सूबेदार ने तंजिया बयान दिया. फिर ठहर कर कहा “तू निम्मों से जरा पूछ ले बलवान. पोते के लिए छह-छह दिन मचलती है तब सातवें दिन कलेजा ठंडा होता है उसका. दो किलोमीटर की भी दूरी ना है गांव से गोल्डन अपार्टमेंट की. कौन सा कल्चर सुधारेगा ओमवीर इब पोते का?” सूबेदार की आंखें कुछ सुर्ख हो आईं .

“सभी जा रहे हैं. इसी दो किलोमीटर में गांव और शहर का अंतर है. पोता पढ़-लिखकर अच्छा ही करेगा आगे.” बलवान ने सूबेदार का मनोबल बढ़ाया पर सूबेदार की आंखें भर आईं “तब हम ना होंगे बलवान. तब हम ना होंगे.”

निम्मों दो थाली लेकर आ गई. बलवान ने मना किया पर निम्मों की ज़िद के आगे सूबेदार की नहीं चलती तो बलवान क्या थे. खाने के दौरान किसी ने किसी से बात नहीं की. दोनों जब जीम लिए और हुक्का गुड़गुड़ाने लगे तो निम्मों सूबेदार के लिए दोपहर की दवाइयां लेकर आई और सूबेदार की हथेली पर रखकर बगल में बैठ गई. चुप्पियों के बीच निम्मो ने बात उछाली “बलवान भाई साहब, मैं कहन लाग री सी कै आप सुबह-सुबह सूबेदार के साथ ही टहलने जाओ.” सूबेदार ने पत्नी को सफ़ेद भौंहों से घूरा. पर कोई फायदा नहीं था. निम्मों डटी रही. “आज टहलते हुए गुम हो गए थे तुम्हारे सूबेदार.”

सूबेदार कुछ उखड़े “गुम नहीं हुआ था. टहलते हुए दूर निकल गया था.”

“नहीं बलवान भाई जी. सूबेदार बुढ़ापे में अब झूठ भी बोलने लगा है. भूपिंदर चौधरी अपनी स्कूटी से छोड़ गया आज.” निम्मों ने बेधड़क सारा हाल सुना दिया. सूबेदार सुर्ख होते गए पर निम्मों की उम्र डांट खाने या घुड़की सहने की नहीं थी. सचाई यह थी कि यहां शिकायत करने वाला, शिकायत सुनने वाला और जिसकी शिकायत हो रही थी वह सब के सब सत्तर पार के थे. बूढ़े, थके और बेहद उदास.

तभी जगवीर अखाड़े से लौटा. कुछ ख़ुश जान पड़ रहा था. पर वह आया तो एक तेज गंध भी लेकर आया था. सब कुछ जानते हुए भी सब चुप रहे. निम्मों ने खाना दिया. उसने डटकर खाया और छत पर सोने चला गया. इस बीच बिलकुल सन्नाटा रहा. बीच-बीच में गुड़गुड़ की आवाज आती और थम जाती.

“देख रहे हो बलवान?” सूबेदार ने रंज में कहा. पर बलवान को अब क्या देखना-सुनना था. बलवान क्या नहीं जानते. निम्मों चौके में घुस गई. बर्तनों की खड़बड़-खड़बड़ शुरू हुई तो सूबेदार ने टोका “काम वाली आती ही होगी. क्यों मरी जा रही है?” निम्मों ने भीतर से उसी अंदाज में जवाब दिया “आज नहीं आना उसे. दस दिन के लिए अपने गांव गई.” बर्तनों के मांजने-धोने की आवाज वैसी ही बनी रही. बलवान ने इजाज़त चाही “सूबेदार, सोच ले . ऐसे कब तक चलेगा? बेंच-बांटकर छुट्टी पा.” सूबेदार कुछ नहीं बोला. बलवान लाठी ठोकते चला गया. इधर बर्तनों की आवाज थम गई. सन्नाटे ने एक बार फिर बुजुर्ग दम्पति को घेर लिया. सांझ होने वाली थी .

निम्मों ने अपनी खाट बरामदे में डाल दी और मटर छीलने बैठ गई. सूबेदार का हुक्का गुड़गुडाना जारी रहा. पत्नी कभी मटर छिलती तो कभी सूबेदार को कनखियों से देखती. सूबेदार भांप गए पर कुछ बोले नहीं .

“कुर्ते की जेब में इतनी मिट्टी कहां से आ गई?” निम्मों ने मुस्कुराकर ही पूछा .

सूबेदार का मूड आज सुधरने वाला नहीं था. उसी उदासी से जवाब दिया “दिल्ली की मिट्टी बदल रही है निम्मों. यौ अपशकुन सै.”

निम्मों जवाब सुनकर चुप हो गई. शायद कुछ कहना चाह रही हो पर कहा कुछ नहीं. बस कांपती हुई उंगलियों से मटर अलग-थलग करती रही. एकदम चुपचाप. फिर जरा रूककर सूबेदार से पूछा “आज तो बुधवार हो लिया?” सूबेदार ने वैसे ही हुक्का गुडगुडाते हुए जवाब दिया “हां”. निम्मों को अब तक लगता था कि सूबेदार सुबह-सुबह टहलते हुए बड़े बेटे ओमवीर के अपार्टमेन्ट की ओर जानबूझकर जाता है. शायद एक नज़र देख ले पोते को. शुरू-शुरू में तो रोज ही देख-सुन आता था. सूबेदार की वजह से पोते की कई बार स्कूल-बस छूट जाती. पर हालात बदलते चले गए. अब तो इतवार ही सहारा था. वैसे भी इस उम्र में चार किलोमीटर की रोज की दौड़ होती भी नहीं सूबेदार से. बेटे-बहु और पोते के यूं चले जाने से सूबेदार से ज्यादा निम्मों पर असर हो रहा था. सबकुछ तो ठीक ही था अब तक. किसी चीज की कमी ना थी पर देखते ही देखते डोर ही उलझ गई. पर कैसे, यह कोई नहीं समझ पा रहा था.

हां जगवीर को कद्र थी. वह उस डोर का खयाल रखना जानता था. सेब-संतरे, केले और नारियल पानी से घर को भरकर रखता था. निम्मों और सूबेदार की रूटीन जांच करवाता और बढ़िया से बढ़िया डाक्टरों की सलाह लेता. बड़े भाई ने जब से परिवार का साथ छोड़ा है तब से वह और ज्यादा खयाल रखने लगा है.

बड़ा भाई होस्टलों में रहा और ऊंची पढ़ाई की. पर जगवीर कहीं नहीं गया. सूबेदार और निम्मों के साथ-साथ ही रहा. सूबेदार का ट्रांसफ़र जहां-जहां हुआ वह उनके साथ ही रहा. अंतिम के चार साल तो मेरठ कैंट में ही रहे तीनों. तब तक ओमवीर की नौकर लग गई बढ़िया कंपनी में. सूबेदार का तो ख़ुशी का ठिकाना ही ना रहा. रिटायर सूबेदार ने अपने गांव में नई पारी की शुरुआत की. पर गांव, गांव नहीं रह गया था अब. यह दिल्ली के बीचो-बीच था और दिल्ली इसके बहुत भीतर घुस चुकी थी. सूबेदार जब पूरी तरह लौटे तो कई चीजें जमीन से उखड़ चुकी थी. सबसे पहले चौपाल गायब हुए. फिर सैंकड़ों आम और नीम के पेड़ . झड़बेरियों का एक पूरा जंगल हुआ करता था पास में . उसे तो मेट्रो ही निगल गई. जोहड़ो को भरकर अपार्टमेंट बनाए जा चुके थे. लोग जमीन के मुआवजे लेकर गांव छोड़ते गए. बहुत कुछ तो प्राइवेट बिल्डरों ने ख़रीदा. इस बदलाव का असर इतना तेज रहा कि दो साल पहले ओमवीर भी बीवी-बच्चे के साथ उधर शिफ्ट हो गया. बसई-दारापुर गांव उसे खलता था.

ऐसा नहीं था कि बदलती हुई दिल्ली की सूबेदार को भनक ना थी. रिटायरमेंट के पहले भी जब वह छुट्टियों में आते थे तो इस बदलाव को देखते रहते थे. पर चीजें अब ज्यादा समझ में आने लगी थी. वह गांव खोजते रहे और इसी बीच गांव के गांव शहर होते गए. एक दिन बलवान और सूबेदार रिश्तेदारी घुमने तिहाड़ गांव जा रहे थे. बस पर चढ़ते ही कंडक्टर ने पूछा “कहां की टिकट फाड़ दूं ताऊ.” बलवान ने बहुत सहज ही कहा “तिहाड़ की भाई.” कंडक्टर को हंसी आ गई “इस उमर में तिहाड़ जाओगे ताऊ?” बस की कुछ सवारियां भी हंसने लगीं तब सूबेदार को समझ आया कि कंडक्टर तिहाड़ गांव की नहीं तिहाड़ जेल की बात कर रहा है. सूबेदार के माथे की नसें एकदम से फूल गईं “के मतबल है तेरा…तू हंसा क्यों ?” कंडक्टर हक्का-बक्का रह गया. तब तक बलवान ने उसकी गिरेबान पकड़ ली “साले… तिहाड़ गांव पहले बसा कि तिहाड़ जेल? बता! बता तू? गांव की इज्ज़त होती है कि नहीं ? उसके नाम पर जेल बना कर उसकी इज्ज़त खा गए और हंसते हो तुम लोग?” सवाल सुनकर कुछ मुसाफिर चौंके तो कुछ सन्न हो गए. गांव की ठेठी बोली ने मुसाफिरों के प्राण सुखा दिए. कंडक्टर की धड़कन रुक रही थी. वह जानता था कि गांव उतर जाए तो दिल्ली हांफने लगती है. वह गिड़गिड़ाने लगा “ताऊ गलती हो गई. मैंने बात मजाक में कही थी”. पर बलवान नाम का शख्स चोटिल हो चुका था. कंडक्टर को एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया और उसकी कॉलर छोड़ने से पहले अपने भीतर के संचित लावे को भभाके से निकाला बलवान ने “साढ़े सात सौ गांव खा गई तेरी ये दिल्ली. बहत्तर पंचायतें. दस हजार कुएं और हज़ारों जौहड़. लाखों पेड़. तब बनी है तेरी यह डायन दिल्ली. समझा सुसुरे. हमें खाकर बनी है आज की दिल्ली.” बलवान को रक्तचाप की शिकायत थी. वह हांफने लगे. रक्तचाप की शिकायत तो सूबेदार को भी थी. बल्कि बावन से ज्यादा थी पर उन्होंने भनक ना लगने दी और उल्टे बलवान को शांत करने की कोशिश करने लगे. दोनों बुजुर्ग की सांस तेज हो कर फिर सामान्य होने लगी. थोड़ी देर बाद सूबेदार बस की खिड़की से बाहर देखने लगे. जाम लगा पड़ा था. शायद कोई ओवर-ब्रिज़ बन रहा था. उन्हें याद आया कि बचपन में इसी इलाक़े के आसपास मेला लगता था. एक बहुत बड़ा जौहड़ भी था यहां. वाह री दिल्ली! तू तो ख़ूब बदली!! एकदम अजनबी ही हो गई. ज़िंदगी भर जिस देश की रक्षा करते रहे, वह भीतर से इतना बदल जाएगा कभी सोचा ही नहीं था सूबेदार ने. बस में तब तक सन्नाटा पसरा रहा जब तक तिहाड़ का बस स्टॉप ना आ गया. दोनों बुजुर्ग उतर गए.


बसई-दारापुर की ज़िंदगी यहां के लड़कों से गुलजार रहती है. पढ़ाई-लिखाई तो अपनी जगह है ही पर उनके लिए यहाँ आकर्षण का बड़ा केंद्र बजरंग-अखाड़ा ही था. अखाड़ा पहलवान बनाने की एकमात्र फैक्ट्री थी इस इलाक़े में. जब कुछ समझ में ना आता तो लड़के अखाड़े की शरण लेते थे. कुछ चतुर लोगों ने जिम भी खोली है पर गांववाले वहां जाने वालों पर हंसते ही हैं. उनकी मान्यता है कि जिम देह फुलाने की मशीन है जबकि अखाड़ा जिगरा पैदा करता है. अखाड़े का बढ़िया कनेक्शन दिल्ली और आसपास के होटलों और नाईट-क्लबों से था. होटलों-क्लबों के लिए यह अखाड़ा पहलवानों की सप्लाई करता रहता था. आजकल इन पहलवानों को नए नाम से जाना जाता है- बाउंसर. जगवीर की नज़र इधर के कई सालों से इन्हीं पहलवानों पर थी. खासकर उन पहलवानों पर जो गरीब घरों के थे और जिनकी खुराक उनका घर नहीं संभाल सकता था. शोर था कि सारे शूरमा धरे के धरे रह गए और जगवीर अखाड़े के गुरु जी को पचास-पचास की पार्टनरशीप पर सेट कर ले गया था. खलबली मची हुई थी इलाक़े के डीलरों में. कुछ पहलवान तो जगवीर के आगे-पीछे भी चलने को तैयार थे. पर जगवीर ने ही रोक रखा था.

इतवार के दिन सूबेदार का घर गुलजार रहता है. इस इतवार भी ओमवीर अपनी पत्नी और पांच साल के बेटे के साथ आ गया था . निम्मों पोते को कलेजे से लगाए घूम रही थी. उसकी देह थक जाती पर रूह नहीं. पोते का नाम पुचू था. पुचू भी दादी से चिपटा रहता. ओमवीर ने नयी गाड़ी ली थी क़िस्तों पर. लेकिन हालात ठीक ना थे उसके. गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा क़िस्तें निगल रही थीं और पुचू का स्कूल-ख़र्च उम्र के साथ-साथ बढ़ता ही जा रहा था. आज उसने बलवान ताऊ को भी बुला रखा है. बात तो करनी ही होगी. कब तक ऐसे चलेगा? जगवीर अपने बड़े भाई के सारे पैतरे समझता था पर उसने ओमवीर से बात करनी कब की छोड़ रखी थी. दो साल तो हो ही गए थे. वैसे जगवीर किसी को टोकता भी तो किस मुंह से? सात लाख का झटका वह पहले ही दे चुका था पिता को. वह अब ख़ुद भी चाहता था कि हो ही जाए अब जो होना है.

बलवान दो बजे दोपहर को आकर जम गए. थोड़े चिंतित थे. सूबेदार ने भांप लिया “इब बोलेगा भी कुछ?” सूबेदार को लग रहा था कि ओमवीर का ही मामला है पर यहां बात तो कुछ और ही निकली.

“खेती करने से तो कोई रहा सूबेदार. ज़मीन भी वैसी नहीं रही.” बलवान ने लम्बी सांस खींचकर यह बात कही.

जवाब में सूबेदार ने बस “हूं” कहा. बलवान चुप हो गए. हुक्का गुड़गुड़ाते सूबेदार को बलवान की चुप्पी चुभ रही थी “इब आगे भी बोल्लेगा.”

“बोला उसे जाता है जो जानता ना हो, समझे सूबेदार खेत्तरपाल?” बलवान अब मूड में आ रहे थे. बहुत ढिठाई से उन्होंने यह बात कही. सूबेदार हैरत से बलवान को देखने लगे.

सूबेदार की तीख़ी नजरों से बचते हुए बलवान ने बात बदली” एक और समस्या सै, पर मैं पहले सुमेर को बुला लाता हूं, फिर बात होगी.”

सुमेर नाम सुनते ही निम्मों वहां चली आई. “आखिर बात क्या है?”

सुमेर गांव का ही लड़का था. दिल्ली पुलिस का कांस्टेबल. किसी को मामला समझ में नहीं आ रहा था. बलवान ने बार-बार इतना ही कहा कि “सुमेर को आ जाने दो पहले” और फोन किया उसे “हां भई सुमेर! चल आ जा भाग के पांच मिनट में.” सुमेर जैसे इसी ताक में था. बुलेट भड़भड़ाते हुए आ धमका. उसके साथ खद्दरधारी भूपिंदर चौधरी भी था. आते ही उन दोनों ने बलवान, सूबेदार और निम्मों के पांव छुए. सुमेर ख़ाकी वर्दी में ही आया था. भूपिंदर खाट पर बैठा और सुमेर कुर्सी पर.

कुछ देर के लिए कोई चीज हरकत में ना थी. जो जहां था वहीं चुप था. सन्नाटे को तोड़ते हुए सुमेर ने अपनी शर्ट की अगली जेब से एक विजटिंग कार्ड निकाला और ओमवीर को दिया “भाई जी, जरा पढ़ना इसे. ज़ोर से पढ़ना”. ओमवीर ने पहले अपना चश्मा ढूंढना चाहा पर चश्मा तो अपार्टमेन्ट में ही छूट गया था. बिना चश्मे के उसने कार्ड के बड़े अक्षरों को पढ़ने की कोशिश की. सबसे ऊपर लिखा था “जय खाटू जी महाराज”. फिर उसके नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा पढ़ने लगा ओमवीर. पढ़ते वक़्त उसकी आवाज ऊंची थी पर एक-एक अक्षर को सावधानी से और चबा-चबाकर पढ़ता गया – “यहां पिछवाड़े में हाथ डालकर काम कराया जाता है.” सबने सुना. सूबेदार ने शायद ठीक से नहीं सुना. उन्होंने फिर पढ़ने को कहा. ओमवीर ने उसी तरह फिर पढ़ा. पर आगे का लिखा नहीं पढ़ पाया. अक्षर छोटे थे और चश्मा था नहीं. भूपिंदर ने वह कार्ड अपने हाथ में लिया “लाओ ओम भाई मैं पढ़ देता हूं पूरा.” उसने शुरू से पढ़ना शुरू किया “जय खाटू जी महाराज”. और फिर पूरा का पूरा पढ़ गया ‘जगवीर चौधरी बसई-दारापुर वाले’ तक.

सूबेदार की बूढ़ी देह कांपने लगी. और फिर कांपते हुए बहुत ज़ोर से आवाज मारी “जगवीर. ओ जगवीर”. जगवीर छत पर पड़ा था. दौड़ते हुए नीचे आया. सुमेर और भूपिंदर को देखकर उसे हैरानी तो हुई पर संभल गया “क्या बात हो गई?” सूबेदार ने बलवान की लाठी उठा ली और किसी के भी रोकने-संभालने से पहले दो मजबूत लाठी जगवीर के बाएं कंधे पर दे मारी “इब तू माफ़िया भी बणेगा!” लाठी की चोट से जगवीर वहीं का वहीं नाचकर बैठ गया. चोट बहुत तेज पड़ी थी उसे . एक साथ सब लड़खड़ा गए.

“राम राम. यो के सूबेदार?” कहते हुए बलवान ने अपनी लाठी छीन ली. निम्मों बिलखकर जगवीर से लिपट गई. “यो बुड्ढा पागल हो लिया. मार डालेगा मेरे बेट्टे ने”. निम्मों की दहाड़ सुनकर उधर पुचू भी रोने लगा.

भूपिंदर कुछ संजीदा हो गया. पर सुमेर को तो काठ मार गया था. वह तो बस समझाने आया था एस.एच.ओ के आदेश पर. जांच-पड़ताल कर मामूली रिपोर्ट ही देनी थी. ऐसे विजटिंग-कार्ड तो आए दिन छपते रहते हैं. किसी छुपे क्षोभ से सुमेर ने जैसे हवा को संबोधित करके सफाई दी “गांव-घर का मामला था इसलिए आ गया. एस.एच.ओ की नज़र थी . मुझे भी तो नौकरी करनी होती है.”

बूढी निम्मों का बिलखना ख़त्म नहीं हो रहा था. जगवीर के अपराध पर निम्मों के आंसू भारी पड़ते जा रहे थे और सूबेदार उस भार से दबते चले गए. सुमेर अपनी बात कह चुका था. वह उठा और अपनी बुलेट को किक मारनी चाही तो जगवीर खड़ा हो गया. जैसे उसे किसी की परवाह नहीं थी अब. उसने बड़ो की उपस्थिति को नजरअंदाज करके ऊंची आवाज में सुमेर को संबोधित किया “ओ सुमेर…एस.एच.ओ ने कहिए कि हिस्सा बराबर पहुंचता रहेगा. चिंता ना करिए.”

सबने देखा कि सुमेर का चेहरा कुछ खिला. शायद वह यही सुनने आया था. बुलेट को किक मारते हुए सुमेर ने जवाब दिया “ठीक है भाई जी.”

बलवान को काटो खून नहीं. वह तो भलमनसाहत में सुमेर को ले आया था कि सूबेदार का बेटा कहीं फंस-फंसा ना जाए. बलवान को यह सलाह भूपिंदर ने ही दी थी. पर भूपिंदर की नेतागिरी भी धरी की धरी रह गई. एक डील हो चुकी थी सबके सामने!! भूपिंदर तक को यह उम्मीद ना थी. देखते ही देखते एक ठुल्ला आंख से काजल चुरा ले गया. दिल्ली-पुलिस को समझना इतना भी आसान नहीं .

सूबेदार एकदम भौचक थे पर निम्मों अब भी सिसिक रही थी. पुचू की मां पुचू को लेकर भीतर जा चुकी थी. ओमवीर को तो कुछ ठीक से समझ में नहीं आ रहा था. यहां जगवीर का नये तरह का मजबूत व्यापार हर पुरानी चीज को हिला-खिसकाकर रख देने पर आमादा था. जगवीर अपने बाएं कंधे को अब बिना कुछ बोले लगातार सहला रहा था. मार खाकर जगवीर रोया नहीं और ना ही पिता पर क्रुद्ध हुआ. ज़िंदगीभर वह सूबेदार के साथ रहा है. वह बाप की पसंद-नापसंद ख़ूब समझता है. उसकी हर हरकत पर उसके बाप की क्या प्रतिक्रिया होनी है उसे वह अपने माथे पर बहुत पहले दर्ज कर लेता था. उसे पता था कि विजटिंग-कार्ड छपवाने के बाद कुछ ऐसा ही होगा. पर बात थोड़ी पहले खुल गई. बिना प्लानिंग के. उसके ऐलान से ठीक पहले ही. फिर भी गनीमत थी कि उसके कंधे टूटे ना थे. वैसे उसने इससे ज्यादा की उम्मीद की थी. उसे अपने पिता के बुढ़ापे और कमज़ोर हो रहे शरीर पर बहुत दुःख भी हो रहा था. पिता की देह में ताक़त होती तो कंधे टूट चुके होते.

इधर शांत हो चुके सूबेदार ख़ुद को नए तरह के बॉर्डर पर पा रहे थे. एकदम अलग-थलग और अकेले. जैसे कोई सिपाही ठंडे अंधेरे में चुपचाप बॉर्डर पर खड़ा हो और धुंध की वजह से अचानक उसका दिशा-बोध लड़खड़ा जा; वह तय ही ना कर पाए कि देश किधर है? अब वह किस चीज की रक्षा कर रहा है?

माहौल थोड़ा और ठंडा हुआ तो भूपिंदर चलने को हुआ . पर लोमड़ी की खोपड़ी ने चलने से पहले निम्मों और बलवान के पैर छुए. फिर सूबेदार के पैर छूकर एक बात कह दी “जमीन बेचकर सबको बचा लो ताऊ.” जैसे भूपिंदर ने सबके मन की बात कह दी हो. सबने सुना. सबने. और सब चुप भी रहे. सूबेदार को भूपिंदर से ज्यादा गुस्सा वहां मौजूद अपनों की चुप्पी पर आया. जैसे लोहा अपने आप ही लाल हो जाए और वह भी बिना वक़्त लिए. ठीक वैसे ही सूबेदार का चेहरा पलक झपकते लाल हो गया. रक्ताभ. तमतमाए सूबेदार का गुस्सा एक विष्फोट के साथ फूटा “किस नै भूपिंदर किस नै? किस नै? बता मन्ने किस नै?” सूबेदार की बूढी और थकी देह पीपल के पत्ते की तरह कांपने लगी. उनकी “किस नै किस नै” की आवाज ऊपर और ऊपर गूंजती चली गई. लगा कि चेहरा लाल होकर फट जाएगा. वह भी अभी के अभी. सब के सब उन्हें संभालने दौड़ पड़े. एक साथ.


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