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चूना-खैनी वाले भूतों के परिवार से लड़कर अमर हुए बली बाबू

निशांत शर्मा

निशांत शर्मा एन.आई.टी रायपुर में पढ़ते हैं. कहना तो  ना होगा कि इंजीनियरिंग करते हैं? बी.टेक का दूसरा साल चल रहा है. निशांत ने हमें किस्सा लिख भेजा.  सोनपुर के छत्तर मेले और सोनापुर के बली सिंह का. हमें पसंद आया. हमने आपके साथ साझा किया.  आपके पास भी कुछ ऐसा है जो आप हम सबों से साझा करना चाहें तो लिए बइठे न रहिए. लिख भेजिए. lallantopmail@gmail.com पर 


चूना-खैनी वाले भूत का परिवार

बिहार के सोनपुर में छत्तर का मेला लगता जिसे बहुत लोग एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला मानते हैं. हर भेरायटी की गाय, भैंस, हाथी, घोड़ा, कुत्ता. लोगों का मानना है की सबसे निपुण अरबी घोड़ा छत्तर के मेला मे ही आता है. कोसों दूर से चलकर लोग मेला माकने और देखने आते हैं. मगध, भोजपुर, तिरहुत, मिथिला. यहां तक की नेपाल से भी लोग छत्तर आते हैं.

छत्तर मेला पर इतना विश्वास की बहुत लोग तीन-चार महीना बिना गोरस-पाती के गुजार देते हैं. लोगों का आज भी मानना है की छत्तर की गाय का दूध तीन महीना और दूसरे मेला की गाय का दूध आठ महीना खाने के बराबर है. अगर घोड़ादौड़ कहीं हो रहा है और घुड़सवार को पता चल गया कि फलाने आदमी का घोड़ा छत्तर से आया है. और उसका घोड़ा ऐसे ही कालीचरन छाप मेला का है. तो वो आधी बाजी पहले ही हार जाता है.

तो चलिए मैं आपको ले चलता हूं बहुत साल पहले
सोनापुर गांव में बली सिंह नाम के एक आदमी रहते थे. शरीर से एकदम बलिष्ठ, मध्यम कद, सर के आधे बाल सफेद हो गए थे. लोगों का मानना था कि बली सिंह ग्यारह साल की उम्र से ही गांजा पी रहे हैं और धतूरे के बीज का सेवन कर रहे हैं. बली सिंह की पत्नी भी बहुत पहले ही स्वर्ग चली गईं. कोई बाल-बच्चा नही. गांजे को ही अपना जीवन मान लिए थे बली सिंह. आंखें हमेशा लाल रहती थीं. गांजे का दम लगाने के पहले वह बोला करते थे.

बम भोले कैलाशपति, भांड़ मे जाये लाखपति.
चिल्लम चढ़े धकाधक,धुंआ उठे फकाफक.

गांव के लोग भी उनको किसी काम का नही मानते थे. फालतू ही समझते थे. पर उनकी एक जगह पूछ सभी लोग करते थे. जिन्हे भी दुधारू पशु लेना है,वे बिना बली सिंह से पूछे नही लेते थे. लोगों का मानना था. एक कोस दूर से जानवर देख बली सिंह, उसके गुण-अवगुण बता देते हैं. मने, बली सिंह जानवर पसंद करने के मामले मे एकदम टेका आदमी. छत्तर मेला के समय मे बली सिंह, बली बाबू हो जाते थे.

एक बार बली सिंह अपने ही गांव के धनाढ्य आदमी धनेश्वर बाबू के लिए जर्सी गाय पसंद करने छत्तर गए. पूरा मेला का चार चक्कर मारने बाद गाय मिल गई. मेला मालिक के मुंशी से करारनामा बनवाया गया. फिर बली बाबू ने नेपाल से आये नागा साधुओं के साथ गुड़ की जलेबी के साथ नेपाली गांजे का कश लगाया.

बेर गिरने पर था. मेला से लोग चल दिए. गाय का पगहा धरे धनेश्वर सिंह का आदमी आगे बढ़ रहा था. पीछे-पीछे बली बाबू और धनेश्वर बाबू थे. करीब 5 कोस जमीन चलने के बाद एक नदी पार करना पड़ता था. अंधेरा भी हो गया था. रास्ते मे कई लोगों ने टोका भी था कि अंधेरा होने पर नदी मत पार करिएगा. लोगों का मानना था, नदी के पास जो पीपल का पेड़ है, उसपर प्रेत परिवार का वास है. जो किसी पार करने वाले को नही छोड़ता. पानी में डुबा-डुबा अधमरा कर देता है. फिर सांप के कोड़े से मार-मारकर सीधे परलोक भेज देता है. और ऐसे मरने के बाद मरने वाला भूतों के परिवार का सदस्य बन जाता है.

पर बली सिंह तो ठहरे अपने ही किस्म के आदमी. धोती को चार बित्ता ऊपर उठाए और चभ्भ से पानी मे हेल गए. पानी मे चार डेग ही आगे बढ़े की पीपल के पेड़ से चभाक-चभाक किसी के कूदने की आवाज आई.

बली सिंह अवाक रह गए. गांजे का नशा क्षण भर में फुर्र. बली बाबू चारो तरफ से घिरे हुए थे. भूतों के पैर उल्टे थे और हाथ खजूर के पेड़ की तरह. कोई भूत बली सिंह से गांजा मांगता, तो कोई रामपुरिया खैनी. अंतिम मे जाकर बात खैनी पर सलटी और बलदेव सिंह की जान बची. तब से आजतक जो भी अंधेरे में नदी पार करता है. उससे पहले वह एक किल्ली खैनी पीपल के पेड़ के नीचे रख देता है. इस तरह फालतू समझे जाने वाले बली सिंह काम आए और उनकी कहानी अमर हो गई.

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