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दुनिया की सबसे खौफनाक जेल में से एक 'बगराम' की कहानी सुनकर सिहर जाएंगे

1972 में कराची के एक मध्यमवर्गीय परिवार में एक बच्ची पैदा हुई. उसका नाम आफ़िया सिद्दीक़ी रखा गया. पिता डॉक्टर थे और मां रसूख़दार लोगों के संपर्क में रहती थीं. उस परिवार ने आफ़िया को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. आफ़िया ने भी उनके सपनों को जीना जारी रखा. 1990 में उसका दाखिला मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलजी (MIT) में हुआ. पांच साल बाद उसने कराची के एक डॉक्टर से शादी कर ली. 1996 में उसका पहला बेटा पैदा हुआ. निजी ज़िंदगी में व्यस्त होने के बावजूद आफ़िया ने दो ज़रूरी कामों को नहीं छोड़ा था. पहला, ब्रेन्डे यूनिवर्सिटी से न्यूरोसाइंस में पीएचडी की डिग्री. और दूसरा, दुनियाभर में मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में हिस्सा लेना, उनकी मदद के लिए फ़ंड इकट्ठा करना और मस्जिदों में भाषण देना.

ये सब चल ही रहा था कि अमेरिका पर 9/11 का हमला हो गया. 9/11 की तारीख़ ने अमेरिका ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में लाखों लोगों की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदलकर रख दी थी. इनमें से एक नाम आफ़िया सिद्दीक़ी का भी होने वाला था. मई 2002 में FBI ने पहली बार उसकी ज़िंदगी में दखल दिया. दरअसल, कुछ खरीदारियों को लेकर FBI को शक था. इसके कुछ महीने बाद पति-पत्नी पाकिस्तान लौटे. वहां उनका तलाक हो गया.

दिसंबर 2002 में आफ़िया फिर से अमेरिका गई. इस बार वो अकेले आई थी. फ़ैमिली का कहना है कि वो नौकरी की तलाश में दोबारा अमेरिका पहुंची थी. जबकि जांच एजेंसियों का दावा है कि आफ़िया अल-क़ायदा के एक आतंकी की मदद के मकसद से आई थी.

फिर आया साल 2003. एक मार्च को रावलपिंडी में ख़ालिद शेख़ मोहम्मद अरेस्ट हो गया. 9/11 कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार, वो अमेरिका पर हमले का मुख्य साज़िशकर्ता था. शुरुआती पूछताछ में ख़ालिद ने आफ़िया सिद्दीक़ी का नाम लिया. FBI ने फौरन आफ़िया और उसके पति के ख़िलाफ़ ग्लोबल वॉरंट रिलीज़ कर दिया. वॉरंट रिलीज़ होने के कुछ दिनों बाद आफ़िया अपने तीन बच्चों के साथ कराची एयरपोर्ट के लिए निकली और अचानक गायब हो गई.

Afia
आफ़िया के समर्थन में तमाम जगह प्रदर्शन हुए थे.

5 साल बाद दिखी आफ़िया

इसके बाद आफ़िया सीधे पांच साल बाद ग़ज़नी में नज़र आई. अफ़ग़ान पुलिस की गिरफ़्त में. तब तक अमेरिका ने उसे ‘मोस्ट वॉन्टेड आतंकियों’ की लिस्ट में डाल दिया था. आफ़िया इस लिस्ट में शामिल होने वाली दुनिया की पहली और इकलौती महिला है. जब FBI और US आर्मी की एक टीम उससे पूछताछ करने ग़ज़नी पहुंची, तो वहां एक अजीबोगरीब वाकया घटा. एजेंसियों का दावा है कि आफ़िया ने जांच करने गई टीम पर गोलियां चलाईं. जवाबी कार्रवाई में एक गोली आफ़िया को भी लगी. हालांकि, उनके पास इस बात का जवाब नहीं है कि पुलिस की हिरासत में बंद एक महिला गोली चलाने में कामयाब कैसे हुई?

खैर, घायल आफ़िया का इलाज किया गया. फिर उसे अमेरिका ले जाया गया. वहां उसने ट्रायल के ख़िलाफ़ अपील करने से मना कर दिया. फ़रवरी 2010 में अदालत ने आफ़िया सिद्दीक़ी को 86 साल की जेल की सज़ा सुनाई. वो अभी टेक्सस की एक जेल में बंद है. आफ़िया की कहानी सुनाने की एक वजह है. हमने बताया कि आफ़िया सिद्दीक़ी 2003 से 2008 के बीच गायब हो गई थी. इस बीच में वो कहां थी? इसके दो वर्ज़न मिलते हैं. पहला, अमेरिका कहता है कि 2008 से पहले उन्होंने आफ़िया को देखा तक नहीं. दूसरा वर्ज़न अफ़ग़ानिस्तान की एक जेल के कुछ पूर्व क़ैदियों का है. वो क्या कहते हैं?

क्या कहते हैं अफगानिस्तान के पूर्व कैदी

उस जेल में एक महिला भी बंद थी. वो रात को ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती थी. उसकी आवाज़ सुनकर हम कांप जाते थे. हमने उसे कभी देखा तो नहीं, लेकिन उसकी पीड़ा ने हमारी नींद उड़ा दी थी. हालात यहां तक ख़राब हुए कि 2005 में कुछ क़ैदी छह दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठ गए थे.

आरोप ये भी हैं कि अमेरिकी अधिकारियों ने आफ़िया को उसी जेल में बंद रखा. और, पांच सालों तक उसका शारीरिक और मानसिक टॉर्चर किया गया. हो सकता है कि सच इन दो वर्ज़नों के बीच फंसा हो. या, इस कहानी का तीसरा पहलू भी सामने आ सकता है. लेकिन, एक बात सौ फीसदी खरी है. वो ये कि जिस जेल में आफ़िया को बंद रखने के आरोप लगते हैं, वो दुनिया की सबसे बदनाम जेलों में से एक है. इतनी बदनाम कि इसे ‘अफ़ग़ानिस्तान का ग्वांतनामो’ कहा जाता है. कहते तो ये भी हैं कि इसी जेल ने तालिबान की वापसी का आधार तैयार किया.

ये कहानी अफ़ग़ानिस्तान के बगराम जेल की है. इस जेल का पूरा तिया-पांचा क्या है? अमेरिका पर किस तरह के आरोप लगते हैं? और, तालिबान के क़ब्जे़ के बाद बगराम किस हालत में है? सब विस्तार से बताएंगे.

बात 1950 से शुरू होती है

1950 के दशक में कोल्ड वॉर की गर्माहट दुनिया पर हावी होने लगी थी. अफ़ग़ानिस्तान भी इससे अछूता नहीं था. सोवियत संघ और अफ़ग़ानिस्तान की पुरानी दोस्ती थी. सोवियत संघ ने वहां एयरबेस बनाने का फ़ैसला किया. ताकि ज़रूरत पड़ने पर इसे इस्तेमाल में लाया जा सके. इसके लिए परवान प्रांत के बगराम शहर को चुना गया. अतीत में ये शहर सिल्क रूट का अहम पड़ाव हुआ करता था. बगराम, राजधानी काबुल के पास था. यहां से अफ़ग़ानिस्तान के दूसरे बड़े शहरों तक आसानी से पहुंचा जा सकता था. इस लिहाज से बगराम एयरबेस की अहमियत काफी ज़्यादा थी.

सोवियत संघ की सोच दूरदर्शी साबित हुई. 1979 में उसने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया और कठपुतली सरकार बिठा दी. एकाधिकार वाली सत्ता बनाए रखने के लिए विरोधियों पर लगाम की ज़रूरत होती है. सोवियत संघ वही कर रहा था. अफ़ग़ानिस्तान में उसकी दुश्मनी मुजाहिदीनों से थी. इस लड़ाई में उसने बगराम एयरबेस का भरपूर इस्तेमाल किया. ये जगह सोवियत हमलों का लॉन्च-पैड बन चुकी थी.

हालांकि, सोवियत संघ लड़ाई हार गया. उसके जाने के बाद एयरबेस पर क़ब्ज़े का लंबा संघर्ष चला. नजीबुल्लाह के तख़्तापलट के बाद मुजाहिदीन सरकार ने बगराम पर नियंत्रण किया. सितंबर 1996 में काबुल पर तालिबान का क़ब्ज़ा हो गया. उसके बाद एयरबेस के लिए नॉर्दर्न अलायंस और तालिबान में लड़ाई हुई. कोई भी पक्ष कभी भी पूरे एयरबेस को जीतने का दावा नहीं कर पाया.

Bagram (1)
बगराम लंबे समय तक अमेरिकी सेना का बेस रहा.

9/11 से अमेरिका की एंट्री

9/11 के हमले के बाद इस सीन में अमेरिका की एंट्री हुई. कुछ ही हफ़्तों में तालिबान को काबुल से खदेड़ दिया गया. ये अमेरिका के वॉर ऑन टेरर की शुरुआत थी. अफ़ग़ानिस्तान में इस लड़ाई का केंद्र बगराम एयरबेस को बनाया गया. जब तक लड़ाई खत्म नहीं हुई, तब तक बगराम अमेरिका का कंट्रोल एंड कमांड सेंटर बना रहा. समझ लीजिए कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की पूरी शक्ति इसी एयरबेस में केंद्रित थी.

वॉर ऑन टेरर के दौरान अमेरिका ने अपनी एजेंसियों को पूरी छूट दे रखी थी. राष्ट्रपति बुश ने सरेआम ऐलान कर दिया था कि जो भी देश इस लड़ाई में हमारे साथ नहीं है, वो हमारे ख़िलाफ़ है. अमेरिकी जांच एजेंसियों ने हमले से किसी भी तरह का संबंध रखने वालों को अरेस्ट करना शुरू किया. पूछताछ के लिए हर संभव उपाय अपनाने की छूट मिली हुई थी. अमेरिका नहीं चाहता था कि संदिग्धों को सीधे अमेरिकी धरती पर लाया जाए. इससे होता ये कि उनके ऊपर अमेरिकी कानून लागू होते. और, ना चाहते हुए भी पूरा ट्रायल पब्लिक स्क्रूटनी में आ जाता. इससे बचने के लिए अमेरिका ने अलग-अलग जगहों पर अस्थायी जेलें शुरू कीं. जैसे, क्यूबा के ग्वांतनामो बे, मॉरीशस के चागोस और अफ़ग़ानिस्तान के बगराम एयरबेस में.

साल 2001 में बगराम जेल शुरू हो गई. पहले तो इसमें अस्थायी तौर पर संदिग्धों को रखा जाता था. ताकि पूछताछ के बाद मुकदमा चलाने के लिए दूसरी जगहों पर ट्रांसफ़र किया जा सके. लेकिन, धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ता चला गया. यहां क़ैदियों की संख्या लगातार बढ़ रही थी. अधिकांश क़ैदी ट्रायल के इंतज़ार में रह गए.

अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हमेशा ग्वांतनामो बे की चर्चा होती रही. बगराम जेल को एक तरह से भुला दिया गया. जबकि एक तथ्य तो ये है कि ग्वांतनामो बे में क़ैदियों की संख्या लगातार कम होती गई. इस समय वहां सिर्फ़ 39 क़ैदी हैं. इसके उलट, बगराम में क़ैदियों की संख्या कई गुणा बढ़ी. हाल में जब तालिबान ने बगराम एयरबेस पर क़ब्ज़ा किया, उस समय वहां की जेल में लगभग पांच हज़ार लोग बंद थे.

बगराम जेल के किस्से

बगराम को सिर्फ़ इस संख्या ही नहीं, बल्कि यहां होने वाली बर्बरता और उसके दुष्परिणामों के लिए भी याद किया जाना चाहिए. इस बर्बरता की शुरुआत जेल बनने के बाद ही हो चुकी थी. दबी आवाज़ों में इसकी चर्चा भी होने लगी थी. लेकिन इसका सबूत उपलब्ध नहीं था.

ये बाहर आया, अक्टूबर 2004 में. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, बगराम जेल में दो अफ़ग़ान नागरिकों की हत्या में 28 अमेरिकी सैनिकों को आरोपी बनाया गया था. ये हत्याएं दिसंबर 2002 में हुई थी. मरनेवालों के नाम थे, हबीबुल्लाह और दिलावर. हबीबुल्लाह एक पूर्व तालिबानी कमांडर का भाई था. जबकि दिलावर एक टैक्सी ड्राइवर था. बगराम एयरबेस पर रॉकेट अटैक के समय वो उसी रास्ते से गुज़र रहा था. दोनों को शक के आधार पर हिरासत में लिया गया था. बाद में अमेरिका ने माना कि हबीबुल्लाह और दिलावर बेगुनाह थे.

जब मई 2005 में जांच की पूरी रिपोर्ट बाहर आई तो हंगामा मच गया. इसमें सब कुछ डिटेल में दर्ज़ था. पता चला कि दोनों को बेरहमी से टॉर्चर किया गया था. उनको छत से टांगकर उनके पैरों पर मारा जाता था. टॉर्चर के कई घंटे बाद डॉक्टर्स को बुलाया गया. डॉक्टरों ने उन्हें देखते ही मृत घोषित कर दिया था. इस मामले में एक दर्जन से अधिक से अमेरिकी सैनिकों पर मुकदमा चला. कुछ को सज़ा हुई और कईयों को डिमोट कर दिया गया.

जेल बंद करने की मांग

इस घटना के बाहर आने के बाद बगराम जेल को बंद किए जाने की मांग उठने लगी. अमेरिका ने इस बारे में ज़रूरी कदम उठाने की बात की. हालांकि, जेल का काम-काज पहले की तरह ही चलता रहा. बगराम जेल में टॉर्चर में कोई कमी नहीं आई. बस ये हुआ कि अंदर से आने वाली रिपोर्ट्स कम होने लगीं. तालिबान के क़ब्ज़े के बाद कुछ पूर्व क़ैदियों ने अपने अनुभव साझा किए. अगर उन अनुभवों को विस्तार दिया जाए तो मन भन्ना उठेगा.

मसलन, वहां क़ैदियों को ठीक से सोने नहीं दिया जाता था. आधी रात को गार्ड्स जेल की छतों और दरवाज़ों को ज़ोर-ज़ोर से पीटने लगते थे. इसके अलावा, हाथ-पैर बांधकर नाज़ुक अंगों पर बिजली के झटके दिए जाते थे. बगराम के अंदर एक ‘ब्लैक जेल’ भी थी. इस जेल में किसी तरह की रौशनी नहीं होती थी. सिर्फ़ घुप्प अंधेरा. इसका इस्तेमाल एनहांस्ड इंटेरोगेशन के लिए किया जाता था. अमेरिका इस तरह की जेल के अस्तित्व से इनकार करता है. कहा जाता है कि जो कोई ब्लैक जेल में रहकर आया, उसकी मानसिक स्थिति हमेशा के लिए खराब हो गई.

अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, बगराम जेल के दरवाज़े पर अगस्त 1949 के जेनेवा कन्वेंशन की एक पंक्ति लिखी हुई है. इसमें दर्ज़ है कि क़ैदियों के साथ किस तरह के व्यवहार पर प्रतिबंध रहेगा. जैसे, जान-माल की क्षति, किसी भी तरह की हत्या, अंगों को विकृत करना, निर्दयी बर्ताव और टॉर्चर. ये आज तक दीवार पर कायम है, लेकिन किसी ने इस पर अमल करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई.

अमेरिका की नाकामी का उदाहरण- बगराम

बगराम जेल में टॉर्चर्स को झेलने वाले अधिकतर लोग आम नागरिक थे. वे शिक्षक थे, सामाजिक कार्यकर्ता थे या महज मदद करने वाले वॉलंटियर्स थे. उनका तालिबान या किसी दूसरे आतंकी संगठन से कोई वास्ता नहीं था. लेकिन, शक के आधार पर उन्हें वो सब झेलना पड़ा, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी.

इसका नतीजा ये हुआ कि अमेरिका के ख़िलाफ़ उनका गुस्सा बढ़ा. तालिबान को और ज़मीन मिली. उनका सपोर्ट सिस्टम मज़बूत होता गया. अमेरिका, अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को आतंकवाद से आज़ादी दिलाने का वादा लेकर आया था. वो उल्टा आम नागरिकों को आतंकी साबित करने लगा. नतीजा ये हुआ कि, जो लोग पहले तालिबान से दूर भागते थे, वे उसकी शरण में जाने लगे. उन्हें तालिबान में अपना तारणहार दिखने लगा था. तालिबान ने ऐसे लोगों की कहानियों को उदाहरण बनाकर पेश किया. इसने ग्रामीण इलाकों में तालिबान की पैठ को मज़बूत बनाया.

फिर जुलाई महीने में एक सुबह अमेरिका ने अचानक बगराम एयरबेस को खाली कर दिया. उन्होंने अफ़ग़ान सरकार को इसकी जानकारी भी नहीं दी थी. बगराम पूरी तरह से अफ़ग़ान सैनिकों के हवाले हो गया. अफ़ग़ान सैनिक तालिबान को चुनौती देने में पूरी तरह नाकाम रहे. कुछ क़ैदी तो अमेरिकी सैनिकों के निकलने के बाद ही जेल से भाग चुके थे. बाकी को तालिबान ने आज़ाद कर दिया. इनमें से कुछ अल-क़ायदा आतंकी थे और कई बड़े हमलों में उनका नाम आया था.

फिलहाल बगराम जेल की हालत क्या है? अभी ये अमेरिका की नाकामी का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है. कभी अमेरिका की सैन्य ताक़त का नमूना रहा बगराम एयरबेस सुनसान शहर में तब्दील हो गया है. हर तरफ़ तबाही पसरी हुई है. जेल के कमरों में क़ैदियों के निशान अभी भी हैं. जो लोग एक समय ख़ूंख़ार आतंकी होने के संदेह में जेल में बंद थे, वही अब उसी जेल की निगरानी कर रहे हैं. यही 20 साल के अफ़ग़ानिस्तान युद्ध का हासिल है.


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