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एक नाकाम गायक की कहानी, जो बाद में कमीना बन गया

मेरे लिए डिबेट सेटल्ड थी. मुहम्मद रफी. कहीं कोई किशोर कुमार, मुकेश या कुमार सानू कोई नहीं ठहरता था रफी के आगे. कोई किशोर कुमार का नाम लेकर विरोध दर्शाने की कोशिश करता तो मैं गंदी-गंदी गालियां देने लगता. दूर से कोई सुनता तो कहता कि ये लड़का गाना गाता है. कई बार दूर से जानने वालों ने इस बात की तारीफ की थी कि शिवाले के पास के घर का लड़का गाना बड़ा अच्छा गाता है. कई बार लोगों ने मुझे मेरे घर की खिड़की के पास बैठकर गाते हुए देखा था. कभी-कभी किसी की नज़र भी मेरी नज़र से मिल जाती. तो वो बड़ी कृतज्ञता से देखते.

सच ये था कि कमरे की खिड़की के पास बैठा मैं रहता था. मेरे सामने मेरा बड़ा भाई खड़ा रहता था, जो कि गाना गा रहा होता था. वो बहुत अच्छा गाना गाता था. मेरा छोटा भाई भी अच्छा गाना गाता था. मेरे पापा बहुत अच्छा गाते थे. मेरी मां अच्छा गाती थीं. मेरी कई बुआएं थीं, वो सब अच्छा गाती थीं. मेरे मामा अच्छा गाते थे. मेरी ममेरी बहन अच्छा गाती थी. मेरी नानी अच्छा गाती थीं.

लेकिन जब मैं गाता था, तब लोग हंसने लगते थे.

ऐसा नहीं था कि मैंने रियाज़ नहीं किया था. हां, शुरुआत में मुझे कुछ पता नहीं था. हल्का-हल्का सा याद है, पहला गाना जो मेमोरी में आया वो था किशोर कुमार का मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू. मैंने रंगोली में ये गाना देखकर पूछा था कि कौन सी नई फिल्म आ रही है. किसी ने जवाब नहीं दिया.

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बाद में मेरे भाई ने मुझे गानों की दूसरी आवाज़ की पहचान कराई. बहुत कुशल था मैं. तुरंत ही रफी, किशोर, सहगल, लता, आशा, महेंद्र कपूर, भूपेंद्र सिंह, कुमार सानू, सोनू निगम, रूप कुमार राठौर, अभिजीत, बाला सबकी आवाज़ पहचानने लगा. भगवान ने विलक्षण याद्दाश्त दी थी. सारे गाने याद हो गए. रेडियो पर सुन-सुन के. मेरा भाई कहीं भूलता तो मैं धीरे से लाइन बता देता. पर गाना छुप-छुप के ही गाता था.

मुझे नहीं मालूम कि दुनिया ऐसी क्यों है. जब बॉडी शेमिंग के खिलाफ़ आवाज़ उठती है, जाति धर्म के भेदभाव को लेकर आवाज़ उठती है. कहने का मतलब कि हर तरह की कथित सामाजिक विसंगतियों के प्रति जनता सहानुभूति रखने लगी है तो मेरे गाने के प्रति जनता इतनी निर्मम क्यों थी? कहते हैं कि परिवार ही सब कुछ होता है. अमेरिकी राष्ट्रपति हर हॉलीवुड की फिल्म में कहते रहते हैं वी विल बी अ फैमिली. तो फिर मेरी फैमिली ने ऐसा क्यों किया मेरे साथ?

मेरे पापा को वो गाना बड़ा पसंद था. ना झटको ज़ुल्फ से पानी. एक रात मैं छत पर यही गाना गा रहा था. पापा छत पर आए और धप्प-धप्प दो लगा दिया कान के नीचे. कौन गाना गाने के लिए मार खाता है यार?

आप अच्छा वाला सुन लो.

सच बात ये है कि मुझे उस वक्त तक ये अंदाजा नहीं था कि मैं कितना बुरा गाता हूं.

पर बाहर मेरी पहचान तो अच्छे गायक की थी. तो कई लोग फैन की तरह व्यवहार करते थे. देखते ही कृतज्ञ हो जाते. मैंने इसकी काट निकाल थी. पब्लिक में मैं कभी गाता नहीं था, गुनगुनाता था. एक बार मैं बॉर्डर का गाना ‘तो चलूं तो चलूं’ गुनगुना रहा था. मेरे एक फैन ने बड़े प्यार से देखा और कहा कि ये तो वो लग रहा है न ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा.’ मैंने जवाब नहीं दिया. मुस्करा के दूसरी ओर देखने लगा. उसने तुरंत बताया कि कैसे वो गाने तुरंत पकड़ लेता है.

धीरे-धीरे ये जटिलता मेरे जीवन में प्रवेश कर गई. मेरे खास दोस्त मेरी क्षमता के बारे में जानते थे. पर स्कूल में कुछ लोग ऐसे भी थे जिनको मेरी प्रसिद्धि के बारे में पता था. छोटी जगहों पर स्कूल शुरू होने से पहले प्रार्थना और कोई फंक्शन शुरू होने के पहले स्वागत गान जरूर गवाया जाता है. ये कभी समझ नहीं आया. हम लोगों की तरफ जहां रिश्तेदार बैठते हैं तो लोग गाना गाने लगते हैं. ये क्या बात होती है. घंटों निकाल देते हैं अब तुम गाओगे. अब वो गाएगा. चाची अच्छा गाती हैं. मौसी अच्छा गाती हैं. क्या है बे.

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जब शिक्षक ने मुझे धर लिया

स्कूल में एक दिन मेरे प्रिय शिक्षक ने मुझे धर लिया. क्योंकि दो नमूने जो रोज प्रार्थना करवाते थे, वो छुट्टी पर थे. स्कूल में घुसते ही मुझे किसी अनहोनी की आशंका हुई थी. घुसने के साथ ही मैं प्रांगण में नहीं गया. परंतु अदम्य साहस का परिचय देते हुए कक्षा में बैग रखकर खिड़की से खपरैल पर चढ़ गया. क्योंकि मुख्य द्वार बंद हो चुका था. हम लोगों के यहां बच्चे कक्षा में बैग रखकर भाग भी जाते थे, इसलिए दस बजे गेट बंद हो जाता था. खपरैल पार करके ज्यों ही मैं दूसरी तरफ आया तो देखा मेरे प्रिय शिक्षक बांहें फैलाए खड़े थे कि आ जाओ बेटा. मुझे पता था. एक्चुअली सबको पता था.

जब मैं खिड़की से चढ़ रहा था तो प्रार्थना के लिए एकत्रित भीड़ ने पीछे मुड़कर देखा था. प्रिंसिपल ने मेरे प्रिय शिक्षक की तरफ ऐसे देखा था कि सब तुम्हारा चढ़ाया हुआ है. तो वो शिक्षक मुझे गोद में लेकर प्रार्थना स्थल पर आए. मैंने प्रार्थना शुरू की. वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जावें. मेरे दोस्तों ने बहुत सहयोग दिया. मैंने आवाज बहुत धीमी रखी थी. वो बहुत जोर से गाते थे. पर पहली बार ऐसा हुआ था कि प्रिंसिपल भी मुस्करा रहा था. प्रार्थना बीच में ही वो छोड़कर चला गया. उसके बाद मैं स्कूल से भाग गया. क्योंकि किसी की नजरों का सामना करने की हिम्मत नहीं थी मेरे पास. बाद में मैं जहां जाता चार-पांच लौंडे दूर से ही देख के गाने लगते ‘वह शक्ति हमें दो दयानिधे.’

आप रफी का एक असली वाला गाना सुनो.

कुछ दिनों के बाद शिक्षक महोदय ने क्लास खत्म होने के घंटे भर पहले ही मुझसे कहा कि चलो मेरे घर. चाची खोज रही थीं. बहुत पकवान बनाए हैं. मैं चला गया. खूब खाया. अंत में मैंने देखा कि चाची भी गुनगुना रही हैं वह शक्ति हमें दो दयानिधे. मैंने थाली पटक दी और हाथ उनकी बेडशीट में पोंछ दिया. फिर मास्टरजी अपनी साइकिल पर बैठा के मेरे घर छोड़ने चले. रास्ते में मैंने पेन की रिफिल निकाल ली. उसकी निब निकाली और मास्टर जी के कुर्ते पर स्याही गिरा दी. मुंह से फूंक-फूंक के.

इसमें सबसे ज्यादा फ्रॉड किया था मेरे मरहूम बाबा ने. पूरी दुनिया में मेरी सबसे ज्यादा उन्हीं से पटती थी. मैं उनसे मैथुन के बारे में भी पूछ चुका था कि क्या होता है. उन्होंने कहा था कुछ काम भी कर लिया करो. तो बाबा के पास बैठ के मैं रियाज़ करता था गाने की. वो कहते अब रफी का गाओ. अब किशोर का गाओ. अब सानू का गाओ. नया गाओ. पुराना गाओ. मेरा हौसला बढ़ता रहता था. बाद में पता चला कि वो सिर्फ इस डर से ये सज़ा बर्दाश्त कर रहे थे कि कहीं मैं नाराज होकर उनका खैनी खाना दूभर न कर दूं. मैं अपनी पर आ जाता था तो किसी को नहीं छोड़ता था. टेक्निक सिंपल थी. खूब रोओ और खूब मारो. रोने से इंसान तुरंत बलि बन जाता है. आधी शक्ति तो वहीं ले लेता था मैं किसी की.

बीच-बीच में सुंदर गाना सुन लेना चाहिए.

गाना गाना मेरी जिंदगी में किस कदर रोल निभा रहा था, ये मैं ही जानता था. मैं किसी रिश्तेदार के यहां नहीं जा सकता था. जाते ही लोग घेर लेते रात में. गाओ. किसी बर्थडे में नहीं जा सकता था. लोग जिद करने लगते कि केक नहीं काटूंगा जब तक गाओगे नहीं. स्कूल के किसी फंक्शन में नहीं जाता था. मेरे प्रिय शिक्षक हंसते रहते और धर लेते कि अब तो गाओगे ही. तमाम लालच भी दिए जाते. पर मैं दृढ़संकल्प हो चुका था. अब वो बालक नहीं रह गया था जिसको दादा बेवकूफ बना लेते थे.

फिर मेरी बहन की शादी ठीक हुई. मतलब ठीक हो गई. अब बात दिन रखने पर जा रही थी. इसमें मुझे भी ले जाया गया था. क्योंकि मेरे घर के सारे लोग ससुराल पक्ष से मिल चुके थे मुझे छोड़कर. तो इस बार मैं भी गया था. रात को ससुराल में सब लोग खाना खा के बैठे. बाकी लोग मुझे धरकर दूसरे कमरे में ले के चले गए. वहां तमाम मौसियां, चाचियां, बहनें, ननदें, जीजे, साले बैठे हुए थे. सबकी फरमाइश आई, गाओ. मुझे अब डर इस बात का लग रहा था कि कहीं मैंने गाया और शादी टूट गई तो? क्योंकि अब मुझे पता था कि मैं कितना बुरा गाता हूं. और मुझे इस बात का कोई डर नहीं रह गया था. डर तो आफ्टरइफेक्ट्स को लेकर था.

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जब मैं नौकरी में आया तो एक ट्रेनिंग हुई. ट्रेनिंग लेने आईआईटी मुंबई से एक लेडी आई थीं. कार्यक्रम समाप्त होने पर डेढ़ सौ लोगों की भीड़ में से पता नहीं उनको क्यों मैं ही नजर आया. कुछ तो देखा ही होगा. बुला के बोलीं कि गाना गाइए. पर अब मामला बदल चुका था. सदी बदल चुकी थी. सरकार बदल चुकी थी. बालक अब मर्द बन चुका था. मैंने उनकी आंखों में देखते हुए कहा, पछताएंगी. तो वो अट्टहास कर उठीं. बोलीं कि बहुत देखा है मैंने जिंदगी में. मैंने माइक लिया और गा दिया, ‘अभी मुझमें कहीं बाकी है थोड़ी सी जिंदगी.’ बाद में जब वो सबसे मिलकर जा रही थीं तो मुझसे नजरें चुरा रही थीं. वो उस कार्यक्रम का एकमात्र स्लॉट था जिसमें कहीं कोई ताली नहीं बजी थी. लोग चुप हो गए थे जैसे कोई मर गया है. मैं सीना चौड़ा करके निकला था.

क्योंकि अब मैं राग और धुन अपने मन से बनाता हूं. जब जो मन आया. बोल किसी और के रहते हैं. जब आप अपनी पर आ जाते हैं तो कुछ रहस्य नहीं रह जाता. क्यों मैं मानूं किसी और की धुन? मेरे लिए हर धुन धुंध से उठती धुन है.


ये आर्टिकल ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए ऋषभ ने लिखा है.


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