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नेहरू ने टाटा से एयर इंडिया लिया था, मोदी सरकार अब इससे पीछा क्यों छुड़ाना चाहती है?

एयर इंडिया को नीलाम करने के लिए सरकार सालों से खरीददार ढूंढ रही है. नहीं मिल रहा था. आज सूत्रों से खबर आई कि सरकार का काम बन गया है. टाटा सन्स की तरफ से लगाई गई बोली को सरकार ने मंजूरी दे दी है. जैसे ही ये बात मीडिया में छपी, सरकार ने खबर को गलत बताने में देरी नहीं की. कहा कि ऐसा फैसला होने की खबर गलत है. जब होगा तो बता दिया जाएगा. यानी अभी आधिकारिक तौर पर टाटा एयर इंडिया का मालिक नहीं बना है. लेकिन खबरें हैं कि अंत आखिर एयर इंडिया को टाटा के पास ही जाना है. अगर ऐसा होता है तो 68 साल बाद टाटा फिर से एयर इंडिया का मालिक हो जाएगा.

1952 के नवंबर महीने की बात है. प्रधानमंत्री थे जवाहर लाल नेहरू. नेहरू के साथ एक लंच बैठक में जेआरडी टाटा मौजूद थे. जेआरडी ने नेहरू से कहा कि सरकार ने जानबूझकर टाटा के साथ बुरा व्यवहार किया है. टाटा की हवाई सेवाओं को कुचलने की सुनियोजित कोशिश है. नेहरू का जवाब था कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है. असल में जेआरडी टाटा विमानन कंपनियों के राष्ट्रीयकरण पर नेहरू से नाराज़गी जता रहे थे. लेकिन इस नाराज़गी से सरकार के इरादे नहीं बदले. 1953 में सरकार ने एयरलाइंस का राष्ट्रीयकरण किया और इस तरह से टाटा कंपनी की एयर इंडिया का पूरा मालिकाना हक आ गया भारत सरकार के पास. 68 साल तक एयर इंडिया के विमान उड़ाने के बाद सरकार अब फिर चाहती है कि टाटा जैसा कोई खरीदार मिले. एयर इंडिया को चलाना सरकार के लिए एक एक दिन मुश्किल हो रहा है. ठान कर बैठी है कि हमें बेचना ही है. लेकिन कोई सही कीमत लगाकर खरीदे तो सही.

जवाहर लाल नेहरू
जवाहर लाल नेहरू

अगस्त महीने में नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री वीके सिंह ने संसद को बताया था कि मौजूदा वित्त वर्ष खत्म होने तक एयर इंडिया की 100 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का सरकार का लक्ष्य है. एयर इंडिया का कुल घाटा 31 मार्च 2020 तक 70 हजार 820 करोड़ है. ये घाटा हर नए साल बढ़ रहा है. और बढ़ रही है सरकारी की बेचैनी, एयर इंडिया को बेचने के लिए. इसलिए सरकार ने 15 सितंबर तक एयर इंडिया की नीलामी के लिए बोली मांगी थी. बोली लगाने वालों में दो बड़ी कंपनियों के नाम आए. टाटा सन्स और स्पाइस जेट के मालिक अजय सिंह. हालांकि ये नीलामी के लिए रिजर्व कीमत क्या है, ये जानकारी नहीं है. सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने का काम वित्त मंत्रालय का इवेंस्टमेंट एंड पब्लिक ऐसेट मैनेजमेंट विभाग यानी DIPAM देखता है. इस विभाग ने सचिव तुहीन कांत पांडे ने कुछ दिनों पहले जानकारी दी थी कि एयर इंडिया के डिसइंवेस्टमेंट के लिए बोली आई हैं. और प्रक्रिया अभी आखिरी चरण में है. हालांकि बोली किसने और कितनी लगाई है. ये जानकारी नहीं दी गई.

तो कुल मिलाकर सरकार की तरफ से ये हिंट दिया गया कि नीलामी की प्रोसेस चल रही है. जल्दी मुकम्मल हो सकती है. अखबारों में सूत्रों वाली ये खबरें भी छपती हैं कि टाटा ने स्पाइसजेट के मुकाबले ऊंची बोली लगाई है. फिर 1 अक्टूबर को ब्लूमबर्ग वेबसाइट पर खबर ब्रेक होती है कि मंत्रियों के समूह ने टाटा की बोली को मंजूरी दे दी है. ये खबर कोई अप्रत्याशित जैसी भी नहीं थी. क्योंकि पहले ये चर्चा थी कि एयर इंडिया टाटा के पास जा सकती है. हालांकि वित्त मंत्रालय की तरफ से खबर का खंडन करने में देरी नहीं हुई. डिपार्टमेंट ऑफ इंवेस्टमेंट एंड पब्लिक ऐसेट मैनेजमेंट के सचिव का ट्वीट आया. लिखा कि एयर इंडिया के डिसइंवेस्टमेंट की नीलामी को सरकार की मंजूरी मिलने की खबरें गलत हैं. सरकार जब भी जैसा भी फैसला लेगी, मीडिया को बता दिया जाएगा.” यानी सरकार ने अभी एयर इंडिया की नीलामी पर आधिकारिक फैसला नहीं लिया.

तो देर-सबेर एयर इंडिया का निजीकरण होना ही है. लेकिन इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी? एक जमाने में दुनिया की बेहतरीन एयरलाइंस माने जाने वाली एयर इंडिया की इतनी दुर्गति क्यों हुई. मुनाफे से तिजोरियां भरने वाली एयर इंडिया घाटा क्यों देने लगी. ये समझने के लिए एक नज़र एयर इंडिया के पूरे सफर पर डालते हैं. कैसे ये एयरलाइंस शुरू हुई और फिर डूबने से पहले दुनिया में बड़ा नाम कमाया था.

बात आज से 88 साल पुरानी है. 1932. वो साल, जिस साल से पहले तक इंग्लैंड से हवाई डाक सिर्फ़ कराची तक ही पहुंचती थीं. उसे कराची पहुंचाती थी इंपीरियल एयरवेज़. इंपीरियल एयरवेज़ ने इस डाक को मुंबई तक पहुंचाने का ज़िम्मा दिया दो नौजवानों को. एक RAF (रॉयल एयर फ़ोर्स) का पूर्व पायलट, नेविल विंसेंट और दूसरा उसका एक करीबी पारसी दोस्त जहांगीर रतनजी दादाभाई (जेआरडी) टाटा. 28 साल का नवयुवक जेआरडी टाटा जो भारत की उस टाटा फ़ैमली से आता था, जिसे देश की पहली बिज़नेस फ़ैमिली कहा जा सकता है. जेआरडी का दूसरा परिचय ये कि, वो भारत के पहले सिविल एवीएशन पायलट थे. ब्रिटेन के रॉयल एरो क्लब ऑफ़ इंडिया एंड बर्मा से प्रशिक्षित.

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इंपीरियल एयरवेज़. 1924-1939 तक ऑपरेट किया. ये न होती तो शायद एयर इंडिया न होती. या फिर उस स्वरूप में न होती, वैसा इतिहास न होता, जैसा है. (तस्वीर: Library of Congress, Washington, D.C.)

तो जेआरडी और उसके दोस्त ने इंपीरियल एयरवेज़ का कॉन्ट्रैक्ट पूरा करने के वास्ते 2 लाख रुपए इन्वेस्ट करके ‘टाटा एयर मेल’नाम की कंपनी खोली. दो सेकेंड हैंड सिंगल इंजन एयर क्राफ़्ट ख़रीदे. स्टाफ में थे सिर्फ 11 लोग. दो पायलट, तीन इंजीनियर, चार कुली और दो चौकीदार. टाटा एयर मेल ने पहली उड़ान भरी 15 अक्टूबर 1932 को. कराची से मुंबई तक. इसे उड़ाने वाले ख़ुद जेआरडी टाटा ही थे. शुरू में विमानों से मेल को इधर से उधर ले जाया गया. लेकिन फिर यात्रियों को भी ले जाने लगे. 1938 तक कंपनी का नाम टाटा एयरलाइंस हो गया और इसी साल इसने एक अंतरराष्ट्रीय उड़ान भरी. भारत से श्रीलंका.

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जेआरडी टाटा, कॉकपिट में. (तस्वीर: रतन टाटा, FB अकाउंट)

29 जुलाई, 1946 को टाटा एयरलाइंस को पब्लिक कर दिया गया. पब्लिक करने का मतलब कंपनी में आम नागरिक भी हिस्सेदारी ख़रीद सकते थे. कंपनी पब्लिक लिमिटेड हुई तो नाम भी बदल कर एयर इंडिया रख दिया गया. मुंबई-लंडन और अन्य अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए टाटा ने सरकार के साथ मिलकर ‘एयर इंडिया इंटरनेशनल’ का गठन किया. डील के अनुसार सरकार ने टाटा की एयर इंडिया को अंतरराष्ट्रीय फ़्लाइट ऑपरेट करने की इजाज़त दी और एयर इंडिया के 49% शेयर्स भारत सरकार के पास आ गए थे.

आज़ादी मिलने तक भारत में ढेरों एयरलाइंस ऑपरेट करने लग गयीं थीं. कारण ये था कि द्वितीय विश्व युद्ध के ख़त्म होने के बाद, युद्ध में इस्तेमाल हुए ढेरों विमान भंगार के मोल बिक रहे थे. लेकिन 1952 तक आते-आते, दुनिया भर की एयरलाइन्स की हालत में गिरावट देखी गई. इस विश्वव्यापी संकट से भारतीय एयरलाइंस को बचाने के वास्ते भारत के योजना आयोग ने सभी एयरलाइन्स को एकीकृत करके उनका निगम बनाने की सिफारिश की. मार्च, 1953 में संसद ने ‘एयर कॉर्पोरेशन बिल’ पारित कर दिया. बिल के प्रावधानों के अनुसार दो निगम बने. घरेलू उड़ानों के लिए राष्ट्रीयकृत विमान सेवा का नाम रखा गया, इंडियन एयरलाइंस. इसमें 8 प्राइवेट करियर को एक साथ जोड़ दिया गया था. इसी में एयर इंडिया के डॉमेस्टिक ऑपरेशन्स भी मर्ज़ हो गए. जबकी अंतरराष्ट्रीय विमानों को ऑपरेट करने वाली राष्ट्रीयकृत संस्था का नाम पड़ा एयर इंडिया. पूरा नाम एयर इंडिया इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन.

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तस्वीर 1950 की है. एयर इंडिया का प्रीमियम विमान लॉकहेड कॉन्स्टेलेशन. (तस्वीर: oldindianphotos.in)

हमने आपको शुरू में बताया था कि नेहरू की राष्ट्रीयकरण वाली नीति से जेआरडी टाटा नाराज़ थे. नेहरू ने उनकी नाराज़गी दूर करने की कोशिश की. जेआरडी एयर इंडिया के अध्यक्ष बनाए गए और इंडियन एयरलाइंस के बोर्ड का निदेशक भी बनाया गया. एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के डे टू डे ऑपरेशंस में उनकी बड़ी भूमिका होती थी. कहा जाता है कि वो एक रुपये सैलरी पर काम करते थे. जब 1950 और 60 के दशक में भारत गरीब-भुखमरी जैसे मोर्चों पर जूझ रहा था, तब एयर इंडिया विकसित देशों के एयरलाइंस से मुकाबला कर रही थी. 1960 में, एयर इंडिया इंटरनेशनल ने अपनी फ़्लीट में पहला बोइंग 707-420 शामिल किया. इस तरह वो जेट युग में प्रवेश करने वाली पहली एशियाई एयरलाइन बनी. 11 जून, 1962 को एयर इंडिया दुनिया की पहली ‘ऑल-जेट एयरलाइन’ बन गई. मतलब उस दिन तक सिर्फ़ एयर इंडिया ही ऐसी एयरलाइंस थी, जिसकी फ़्लीट में सिर्फ़ जेट- एयरक्राफ़्ट थे.

उस दौर में एयर इंडिया की बुलंदी के किस्से और भी मिलते हैं. आज दुनिया की बेहतरीन एयरलाइंस माने जानी वाली सिंगापुर एयरलाइंस ने भी कभी एयर इंडिया को अपना रोल मॉडल माना था. जब सिंगापुर एयरलाइंस को लॉन्च किया गया था, तो उसने इन फ़्लाइट सर्विस यानी फ़्लाइट के अंदर सर्व होने वाले खाने, ड्रिंक्स, फ़्लाइट अटेंडेंट और बाकी अनुभव से लेकर कई अन्य फ़्लाइट संबंधित कॉन्सेप्ट्स एयर इंडिया से ही सीखे. तो इस तरह से 1970 के दशक तक सब बढ़िया चल रहा था. 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनी. कुछ महीनों बाद ही एयर इंडिया के मैनेजमेंट भी बदलाव हुआ. जेआरडी टाटा को हटा दिया गया. इससे वो काफी नाराज़ भी हुए. हालांकि इंदिरा गांधी की सरकार आने के बाद जेआरडी टाटा को बोर्ड का सदस्य बनाया गया. 1986 में जाकर राजीव गांधी ने रतन टाटा को एयर इंडिया का चेयरमैन बना दिया.

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अब 90 के दशक में चलते हैं. जब देश में आर्थिक उदारीकरण की नीतियां लागू हुई. कई प्राइवेट कंपनियां एयरलाइंस के बिजनेस में आईं. मुकाबला बढ़ा. एयर इंडिया घाटे में जाने लगीं. 1997- 98 में एयर इंडिया का करीब 180 करोड़ का घाटा. हालांकि इंडियन एयरलाइंस मुनाफा दे रही थी. वाजपेयी सरकार के दौरान एयर इंडिया की हालत थोड़ी बेहतर हुई. 2002-03 में एयर इंडिया का मुनाफा करीब 133 करोड़ रुपये था. मनमोहन सिंह की सरकार के शुरुआती सालों तक एयर इंडिया फायदे में थीं. लेकिन प्रफुल्ल पटेल नागरिक उड्डयन मंत्री बने और फिर एयर इंडिया ऐसी गिरी की, कि कभी उठ ही नहीं पाई. 2002-03 में 133 करोड़ मुनाफा देने वाली एयरलाइन 2006-07 में साढ़े चार सौ करोड़ के घाटे पर थी. इंडियन एयरलाइंस भी घाटे में आ गई. एयर इंडिया की बर्बादी के लिए प्रफुल्ल पटेल की नीतियों पर भी सवाल उठाए जाते हैं. कहा जाता है कि उन्होंने बिना हिसाब लगाए जरूरत से ज्यादा विमान खरीद लिए थे. इसके अलावा कई प्रॉफिट मेकिंग रूट्स से एयर इंडिया की उड़ानें बंद कर दी थी.

2007 में एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का मर्जर कर दिया गया. इसने एयर इंडिया की रही सही उम्मीद भी खत्म कर दी. उसके बाद एयर इंडिया कभी मुनाफा नहीं कमा पाई. अब एयर इंडिया को चलाने में सरकार को रोजाना करीब 20 करोड़ का घाटा आता है. सरकार एयर इंडिया से पीछा छुड़ाना चाहती है. लेकिन घाटे के सौदे में कोई प्राइवेट प्लेयर भी नहीं फंसना चाहता. अब अगर टाटा कंपनी एयर इंडिया को खरीदती है तो इसके पास भारत में तीन विमानन कंपनियां हों जाएंगी. विस्तारा और एयर एशिया में पहले से टाटा की हिस्सेदारी है. तो क्या टाटा या कोई और कंपनी एयर इंडिया को खरीदकर इसकी हालत सुधार सकती है.

अभी ये भी तय नहीं है कि सरकार कितनी फीसदी एयर इंडिया की कितनी फीसदी हिस्सेदारी बेचेगी. क्या पूरी तरह से एयर इंडिया को बेचा जाएगा या कुछ शेयर सरकार रखेगी. आज तो सरकार ने नीलामी के फैसले से इंकार कर दिया, लेकिन उम्मीद है कि जल्द इसकी खबर मिलेगी.


दी लल्लनटॉप शो: 1953 में नेहरू ने टाटा कंपनी से एयर इंडिया क्यों लिया था?

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