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टहलते-टहलते एक कुत्ते ने 17,000 साल पुराना बेशकीमती खजाना खोज लिया

कहानी लास्कॉ केव्स की.

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ये दूसरे विश्व युद्ध के दौर का फ्रांस था. 1940 का साल. जून की 14 तारीख को जर्मनी की फौज राजधानी पैरिस के अंदर घुस आई थी. उस पर जर्मनी का कब्जा हो चुका था. फिर 22 जून को फ्रांस के दो टुकड़े हो गए. एक जर्मनी की मुट्ठी में. दूसरा, खुद के हिस्से में. इसी साल के सितंबर की बात है. फ्रांस के नक्शे में दक्षिण की तरफ एक दोरदोन्ये नाम की एक जगह है. यहां एक 18 साल का लड़का रहता था. नाम था, मर्सेल राविदा. मर्सेल का कुत्ता था- रोबॉट. मर्सेल के घर के पास घने जंगल थे. 12 सितंबर की उस तारीख को ये दोनों टहलने निकले. इसी दिन इन दोनों ने मिलकर एक गुफा खोजी. तकरीबन 17,000 साल पुरानी गुफा, जिसके अंदर ढेर सारी खूबसूरत पेटिंग्स बनी हुई थीं. आज की तारीख में ये लास्कॉ केव्स यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट है. और ये सब हुआ रोबॉट की बदौलत. वो ही इस गुफा के खोजे जाने का जरिया बना.

मर्सेल जब तक जिंदा रहा, इस गुफा का अनऑफिशल गार्डियन रहा.
1948 के जुलाई महीने में इस गुफा को आम लोगों के लिए खोला गया. मर्सेल जब तक जिंदा रहा, इस गुफा का अनऑफिशल गार्डियन रहा. 

मर्सेल ने सुना था, वहीं कहीं कोई गुप्त सुरंग छुपी है
मर्सेल और उसके दोस्त वैसे ही थे, जैसे इस उम्र के लड़के-लड़कियां होते हैं. उनके पास भी कई कहानियां थीं. उन्होंने लोगों से सुना था कि वहीं कहीं आस-पास एक गुप्त सुरंग है. ऐसी सुरंग जो वहां से होते हुए विज़ेर नदी के नीचे से गुजरती आगे बढ़ जाती है. उन दिनों जंग की वजह से कुछ नॉर्मल तो बचा नहीं था. लड़कों के पास खूब सारा वक्त था. वो अक्सर जंगल में इधर-उधर उस गुप्त सुरंग को तलाशने की कोशिश करते. इस बैकड्रॉप से होते हुए अब फिर 12 सितंबर की उस तारीख पर चलते हैं. टहलने के दौरान रोबॉट को एक पेड़ दिखा. पेड़ जमीन से उखड़ गया था. जहां से वो उखड़ा था, वहां एक छेद सा बन गया था. रोबॉट उसी छेद में मुंह घुसाकर तफ्तीश कर रहा था, जब मर्सेल की नजर उस पर पड़ी. मर्सेल ने पास में पड़े पत्थर उठाकर छेद के नीचे फेंके. वहां अंदर से ऐसी आवाज आई, जैसी किसी खोखली जगह से आती है. और पत्थरों के गिरने की आवाज ऐसी थी, मानो बहुत गहराई में जाकर गिरे हों. मर्सेल को लगा, ये वही गुप्त सुरंग है.

लोग असली केव्स में गए बिना उसे देखने का अनुभव ले सकें, इसके लिए फ्रांस सरकार ने इसकी 3डी व्यूइंग का भी इंतजाम किया है.
लोग असली केव्स में गए बिना उसे देखने का अनुभव ले सकें, इसके लिए फ्रांस सरकार ने इसकी 3डी व्यूइंग का भी इंतजाम किया है.

गुफा में अब लोग नहीं जाने दिए जाते
मर्सेल भागा-भागा गया और अपने कुछ दोस्तों को बुलाकर लाया. वो अपने साथ लैंप वगैरह भी लाए, ताकि रोशनी हो सके. उस छेद के अंदर नीचे एक गुफा मिली. गुफा की दीवारों पर, छत पर बड़े-बड़े जानवर बने थे. सींगों वाला एक विशालकाय बैल. घोड़ा. हिरण. कई तरह के जानवर. मर्सेल और उसके दोस्तों ने शुरुआत में कुछ ही लोगों को गुफा के बारे में बताया. वहीं शहर में एक हिस्ट्री के टीचर थे. ये लड़के उन्हें लेकर आए, ताकि पता लगाया जा सके कि गुफा और उसमें बनी पेंटिंग्स कितनी पुरानी हैं. टीचर ने देखा, समझा और बताया. कहा, किसी को भी पेंटिंग्स छूने मत देना. किसी को भी इन्हें खराब मत करने देना. मर्सेल ने जैसे कोई जिम्मेदारी समझी. वो वहीं गुफा के बाहर टेंट लगाकर बैठ गया. ताकि रखवाली कर सके. जल्द ही इस गुफा की खबर पुरातत्वविदों तक पहुंची. उन्होंने देखकर बताया कि ये स्टोन एज के समय की पेंटिंग्स हैं. फिर तो सरकार ने उसका कंट्रोल ले लिया. 1948 में प्रॉपर इंतजाम करने के बाद इस गुफा को आम लोगों के लिए खोला गया. इतने सारे लोगों के आने, उनकी सांस से निकले कार्बन डाई ऑक्साइड, रोशनी वगैरह से पेंटिंग्स को नुकसान पहुंचने लगा. इसी वजह से 1963 में इसे पब्लिक के लिए बंद कर दिया गया. पास ही में सरकार ने एक डुप्लिकेट गुफा बनवाई. जो देखने में हूबहू इसी गुफा सी लगती थी. ताकि लोग इसे देखकर असली गुफा वाली फीलिंग ले सकें.

रोबॉट और मर्सेल भी अब हिस्ट्री का हिस्सा हैं
1989 में मर्सेल की मौत हो गई. रोबॉट तो बहुत पहले ही मर चुका था. कैसा संयोग था कि जानवरों की पेंटिंग्स से भरी एक प्रागैतिहासिक गुफा को खोजने वाला भी एक जानवर ही था. यहां आने वाले लोग या फिर इस गुफा के बारे में जानने वाले लोग रोबॉट और मर्सेल की कहानी जानते हैं. उस गुफा की ही तरह रोबॉट और मर्सेल भी अब हिस्ट्री का ही हिस्सा हैं.


ये लड़की आगे चलकर ज़रूर जिमनास्ट बनेगी!

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