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नांदेड़ के हज़ूर साहिब गुरुद्वारे की कहानी, जहां से कई लोग कोरोना पॉजिटिव निकले

साल 1707. मुग़लिया हुकूमत कमज़ोर पड़ने लगी. औरंगज़ेब मर चुका. उसने सल्तनत को खूब फैलाया, लेकिन अब हर तरफ से मुग़ल साम्राज्य को चुनौतियां मिल रही थीं. मराठे, सिख, राजपूत, विद्रोह कर रहे हैं. औरंगज़ेब के उत्तराधिकार के लिए बेटों में कटाजुद्ध मचा है. बड़े बेटे मोहम्मद आज़म शाह ने ख़ुद को बादशाह घोषित कर दिया. बाद में बहादुरशाह I उर्फ शाह आलम I ने उसे युद्ध में हराया और गद्दी पर बैठ गया. मुग़ल साम्राज्य का 7वां शासक. बहादुर शाह. सिर्फ पांच साल गद्दी पर रहा, लेकिन उसका एक सिरा जुड़ता है सिखों के दसवें और अंतिम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह से और गुरु गोबिंद सिंह का एक सिरा जुड़ता है नांदेड़ से.

नांदेड़, जो पिछले कुछ दिनों से चर्चा में है.

ये जगह महाराष्ट्र में पड़ती है. यहां का तख्त हज़ूर साहिब गुरुद्वारा. होली के आस-पास करीब 10-12 हज़ार लोग यहां आए थे. होला मोहल्ला त्योहार के लिए. बहुत से लौट गए. कुछ फंस गए. करीब 3700 लोग. अब इनमें से कई लोग बसों से पंजाब लौटे.

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक ख़बर कहती है कि इन लौटने वालों में अब तक करीब 183 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं. पंजाब में कुल 542 कोरोना संक्रमण के मामले सामने आ चुके हैं और 20 लोगों की मौत हुई है. नांदेड़ का मामला सामने आने के बाद इसे तबलीगी जमात जैसी स्थिति से जोड़ा जा रहा है. दिल्ली में तबलीगी जमात की सभा के बाद देश भर में कोरोना पॉजिटिव लोगों के मामले बढ़ गए थे. वो भी एक धार्मिक जमावड़ा था. ये भी है.

 पंजाब सरकार ने 26 अप्रैल को 80 बसें भेजी थीं. ये बसें नांदेड़ आईं. बसों में बैठने से पहले सभी यात्रियों की जांच की गई थी. लेकिन इनमें कोई लक्षण नहीं दिखे थे. फोटो: विकीमीडिया
पंजाब सरकार ने 26 अप्रैल को 80 बसें भेजी थीं. ये बसें नांदेड़ आईं. बसों में बैठने से पहले सभी यात्रियों की जांच की गई थी. लेकिन इनमें कोई लक्षण नहीं दिखे थे. फोटो: विकीमीडिया

लेकिन इस बीच नांदेड़, हज़ूर साहिब गुरुद्वारा और यहां से गुरु गोबिंद सिंह के कनेक्शन की कहानी बाकी है. क्यों ये जगह सिखों के लिए इतनी महत्वपूर्ण है? इस जगह का इतिहास क्या है?

थोड़ा सा नांदेड़ का बैकग्राउंड

नांदेड़ महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में है. गोदावरी नदी के किनारे, दक्कन के पठारों पर बसा हुआ. तेलंगाना-कर्नाटक पड़ोसी हैं. ये मुंबई से कम, तेलंगाना में हैदराबाद के ज़्यादा करीब पड़ता है. इसका इतिहास में भी खासा महत्व है. खासकर दक्कन का इतिहास. अशोक के मौर्य साम्राज्य का ये हिस्सा रहा. चौथी और पांचवीं शताब्दी में यहां नंद वंश का भी शासन रहा. 1636 से शाहजहां के पीरियड में ये निज़ाम शासन (वर्तमान तेलंगाना, कर्नाटक) का केंद्र था. 1725 में हैदराबाद स्टेट का हिस्सा बना. 1948 तक हैदराबाद के निज़ाम के अधीन रहा. 1947 में देश आज़ाद होने के बाद जब आर्मी की मदद से हैदराबाद को भारत में मिलाया गया तो ये नए हैदराबाद राज्य का हिस्सा बन गया. 1956 तक ये हैदराबाद में रहा. फिर इसे बॉम्बे प्रेसिडेंसी के तहत लाया गया. 1 मई, 1960 को भाषा के आधार पर महाराष्ट्र नया राज्य बना, तो मराठी बाहुल्य नांदेड़ महाराष्ट्र की सीमा के अंदर आ गया.

मैप में नांदेड़ की लोकशन. फोटो: विकीमीडिया
मैप में नांदेड़ की लोकशन. फोटो: विकीमीडिया

मुग़ल सल्तनत और गुरु गोबिंद सिंह

औरंगज़ेब के समय से ही मुग़लों से कुछ सिख लड़ाके जूझ रहे थे. सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर सिंह ने औरंगज़ेब के सामने घुटने टेकने से मना कर दिया. इस्लाम नहीं कबूला. दूसरों के धर्म परिवर्तन का विरोध किया. औरंगज़ेब ने उन्हें मरवा दिया. दिल्ली में सबके सामने सिर धड़ से अलग कर दिया गया. 24 नवंबर, 1675 को. गुरु तेग बहादुर और माता गुजरी के बेटे गोबिंद राय को सिखों ने अपना दसवां गुरु चुना. गोबिंद राय, जिन्होंने 1699 में खालसा पंथ की शुरुआत की. पंज प्यारे चुने. खालसाओं को ‘सिंह’ की उपाधि दी. गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह कहलाए. जिन्हें संत सिपाही, कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले कहा गया. जिन्होंने कहा कि मेरे बाद अब ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को ही गुरु माना जाए. उनके शब्द हैं,

आज्ञा भई अकाल की तभी, चलायो पंथ

सब सीखन को हुकम है गुरु मान्यो ग्रन्थ.

औरंगज़ेब मुग़ल साम्राज्य का 6वां शासक था और उसे क्रूर माना जाता है. 1658 से 1707 के बीच उसने शासन किया. फोटो: विकीमीडिया
औरंगज़ेब मुग़ल साम्राज्य का 6वां शासक था और उसे क्रूर माना जाता है. 1658 से 1707 के बीच उसने शासन किया. फोटो: विकीमीडिया

बहादुरशाह ने नरम रुख अपनाया, वज़ीर खान को पसंद नहीं आया

जब औरंगज़ेब के बाद बहादुर शाह I बादशाह बना, तो उसने लीक से हटकर सिखों के साथ नरम रुख अपनाया. गुरु गोबिंद सिंह से दोस्ताना व्यवहार दिखाया. उन्हें हिंद का पीर और भारत का संत कहा. बहादुर शाह ने सुलह-समझौते के लिए गुरु गोबिंद को बुलाया, लेकिन बातचीत को टालता रहा. बहादुरशाह ने अपना ठिकाना हैदराबाद के गोलकुंडा में बनाया था.

मुग़ल साम्राज्य में सरहिंद का नवाब और कमांडर वज़ीर खान उर्फ़ मिर्ज़ा असकरी सिखों से लड़ाई लड़ रहा था. गुरु गोबिंद सिंह के साथ भी उसने कई युद्ध लड़े थे. गुरु गोबिंद सिंह के बेटों साहिबज़ादे फतेह सिंह और साहिबज़ादे ज़ोरावर सिंह को वज़ीर खान ने दीवार में चुनवा दिया था. दो बेटे युद्ध में मारे गए. वज़ीर खान को ये बात खटकती थी कि बहादुर शाह गुरु गोबिंद से दोस्ती करे. वज़ीर खान ने अपने आदमी लगाए. दो अफगान. जमशेद खान और वसील बेग. ताकि जब गुरु गोबिंद सिंह बहादुरशाह से मिलने आएं, तो उनका पीछा किया जाए और हत्या कर दी जाए.

गुरू गोबिंद सिंह ने मुग़लसों के साथ कई युद्ध लड़े. 26 दिसंबर, 1666 को उनका जन्म बिहार के पटना में हुआ था. उनके जन्मस्थान पर तख्त पटना साहिब है. फोटो: विकीमीडिया
गुरू गोबिंद सिंह ने मुग़लसों के साथ कई युद्ध लड़े. 26 दिसंबर, 1666 को उनका जन्म बिहार के पटना में हुआ था. उनके जन्मस्थान पर तख्त पटना साहिब है. फोटो: विकीमीडिया

नांदेड़ में गुरु गोबिंद सिंह ने अंतिम सांस ली

गुरू गोबिंद सिंह नांदेड़ आए. गोदावरी नदी के किनारे सिखों के कैंप में पहुंचे. जमशेद खान ने उनका पीछा किया. एक रोज़ गुरु गोबिंद सिंह अपने कैंप में आराम कर रहे थे, तभी जमशेद ने उन पर हमला कर दिया. सीने के नीचे घाव हो गया. 18वीं सदी के लेखक श्री गुर सोभा ने कहा कि गुरु गोबिंद भी हत्यारे से लड़े और पलटवार करते हुए उसे तलवार से मार दिया. जमशेद का दूसरा साथी भागते हुए पकड़ा गया और गुरु गोबिंद के साथियों ने उसे मार डाला.

कहा जाता है कि घाव होने के बाद बहादुर शाह ने यूरोपियन डॉक्टर गुरु गोबिंद के पास भेजा. उनके घाव सिल दिए गए, लेकिन कुछ दिनों बाद धनुष चढ़ाते हुए उनका घाव फिर उभर आया और खून बहने लगा. इसके बाद ही उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु मानने का संदेश दिया. कहा- वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरुजी की फतेह.  7 अक्टूबर, 1708 को 42 साल की उम्र में वो नहीं रहे. सिखों और मुग़लों के बीच कड़वाहट बढ़ गई. युद्ध जारी रहे. पंजाब में बांदा बहादुर सिंह, बाज सिंह, बिनोद सिंह जैसे लोगों ने खालसा विद्रोह का नेतृत्व किया.

मुग़ल साम्राज्य का सातवां बादशाह कमज़ोर बादशाह साबित हुआ. उसके बाद मुगल साम्राज्य के पतन की नींव पड़ी. फोटो: विकीमीडिया
मुग़ल साम्राज्य के सातवें बादशाह बहादुरशाह के दौर में कई विद्रोह हुए. उसके बाद मुगल साम्राज्य के पतन की नींव पड़ी. फोटो: विकीमीडिया

सिखों के पांच तख्त, उनमें से एक नांदेड़ में

नांदेड़ का सिख धर्म में प्रचलित नाम अबचलनगर है. विचलित न होने वाला. ये नाम भी गुरु गोबिंद ने दिया था. 1830 के शुरुआती दशक में शेर-ए-पंजाब कहे जाने वाले महाराजा रणजीत ने नांदेड़ में गुरुद्वारा बनावाया. पंजाब से इस गुरुद्वारे को बनाने के लिए कारीगर भेजे. इसी दौरान हैदराबाद के निज़ाम ने यहां उत्तरी हिस्से के सिखों की एक टुकड़ी खड़ी की. ज़्यादातर यहीं बस गए. तमाम हिंदू भी यहां गुरु गोबिंद सिंह और गुरुद्वारे में आस्था रखते हैं. इस गुरुद्वारे को सचखंड यानी सत्य का क्षेत्र कहते हैं. ये उसी जगह बना है, जहां गुरु गोबिंद सिंह का अंतिम संस्कार किया गया था. इसीलिए गुरुद्वारे के अंदर के चैंबर को ‘अंगीठा साहिब’ कहा जाता है.

महाराजा रणजीत सिंह ने 1832 से 1837 के बीच में तख्त हज़ूर साहिब गुरुद्वारा बनवाया. फोटो: विकीमीडिया
महाराजा रणजीत सिंह ने 1832 से 1837 के बीच में तख्त हज़ूर साहिब गुरुद्वारा बनवाया. फोटो: विकीमीडिया

इस गुरुद्वारे को हज़ूर साहिब या तख्त हुज़ूरी साहिब सचखंड भी कहा जाता है. ये सिख धर्म के पांच  तख्तों में एक है. तख्त का मतलब एक तरह की अथॉरिटी. ये पांच तख्त हैं:

1. अकाल तख्त, अमृतसर (पंजाब)

2. तख्त केशगढ़ साहिब, आनंदपुर (पंजाब)

3. तख्त दमदमा साहिब, तलवंडी (पंजाब)

4. तख्त पटना साहिब, पटना (बिहार)

5. तख्त हज़ूर साहिब, नांदेड़ (महाराष्ट्र)

तख्त हज़ूर साहिब सचखंड के अंदर का हिस्सा. फोटो: विकीमीडिया
तख्त हज़ूर साहिब सचखंड के अंदर का हिस्सा. फोटो: विकीमीडिया

1956 में हैदराबाद विधानसभा में एक कानून बना. तखत साहिब और दूसरे गुरुद्वारों का मैनेजमेंट 17 सदस्यीय गुरुद्वारा बोर्ड और पांच सदस्यों की मैनेजिंग कमेटी के अधीन कर दिया गया. यहां गुरुग्रंथ साहिब और गुरु गोबिंद सिंह का श्री दसम ग्रंथ, दोनों रखे हैं. यहां तमाम वो मान्यताएं भी की जाती हैं, जो गुरु गोबिंद सिंह के समय प्रचलित थीं. जैसे माथे पर चंदन का टीका लगाना. गुरु गोबिंद से संबंधित उनकी व्यक्तिगत चीजें भी रखी हुई हैं लेकिन वहां मुख्य जत्थेदार के अलावा कोई नहीं जा सकता. बाबा बांदा सिंह बहादुर ने भी नांदेड़ में आश्रम बनाया था. अक्टूबर, 2008 में गुरु गोबिंद सिंह की 300वीं पुण्यतिथि पर यहां बड़ा कार्यक्रम हुआ. तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी आए थे. जागृति यात्रा भी निकाली गई थी.


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