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पैरालिम्पिक्स में मेडल लाने वाले एथलीट्स के साहस और संघर्ष की कहानियां

अवनि लेखरा, निषाद कुमार, सुमित एंटील, भाविना ये नाम हम में से ज़्यादातर ने शायद इन तीन-चार दिनों में ही सुने होंगे. शारीरिक अक्षमता वाले लोगों के बारे में हमारे समाज में एक राय बना ली जाती है. उन्हें कमज़ोर समझा जाता है, सहानुभूति दिखाई जाती है, असंवेदनशीलता भी. लेकिन अवनि, निषाद, सुमित इन सब की कहानी दिखाती है शारीरिक अक्षमता कहीं से भी आदमी को कमज़ोर नहीं बनाती है, अगर सुविधाएं मिलें तो ये भी मेडल ला सकते हैं. तो आज पैरालिम्पिक्स में मेडल लाने वाले एथलीट्स की कहानियों पर बात करते हैं.

अवनि लेखरा-

19 साल की लड़की. दोनों पैर काम नहीं करते, पैरों पर खड़ी तक नहीं हो सकती. 9 साल से व्हीलचेयर पर है. व्हीलचेयर पर ही प्रैक्टिस की. और टोक्यो में व्हीलचेयर से ही गोल्ड पर निशाना लगाकर पूरे भारत को गर्व करने का मौका दिया है. इस बार टोक्यो पैरालिम्पिक्स में भारत के लिए पहला गोल्ड मेडल जीता है निशानेबाज़ अवनि लेखरा ने. और ये गोल्ड इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि इससे पहले भारत की कोई महिला पैरालिम्पिक्स में गोल्ड नहीं जीत पाई थी, अवनि ने इसकी शुरुआत की है. पुरुषों को भी शामिल कर लें तो ये पैरालिम्पिक्स से गोल्ड जीतने वाली अवनि चौथी भारतीय हैं. बाकी तीन खिलाड़ी कौन हैं- 1972 के पैरालिम्पिक्स में तैराकी में मुरलीकांत पेटकर सोना लाए. जैवलिन थ्रो में देवेंद्र झाझरिया ने 2004 और 2016 में दो बार गोल्ड जीता. और 2016 में हाई जम्प में भारत के मरियप्पन थंगवेलु ने गोल्ड जीता. और अब इस लिस्ट में चौथा नाम जुड़ गया अवनि लेखरा का.

अवनि ने 10 मीटर एयर राइफल की SH1 कैटेगरी में गोल्ड हासिल किया है. पैरालिम्पिक्स में SH1 या SH2 कैटेगरी डिसएबिलिटी के आधार पर बनी होती हैं. SH1 कैटेगरी उनके लिए होती है जिनके शरीर का निचला हिस्सा काम नहीं करता है. तो इसी कैटेगरी में अवनि ने फाइनल में 249.6 अंक स्कोर कर चीन की निशानेबाज़ को हराया. चीन की झांग कुइपिंग ने 248.9 अंकों के साथ सिल्वर जीता.

9 साल पहले वो तारीख आई थी जब परिवार पर दुख का पहाड़ सा टूट पड़ा था. 2012 में जयपुर में ही एक कार हादसे में अवनि बुरी तरह जख्मी हो गई थी. जान तो बच गई लेकिन रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी. और इस वजह से कमर के नीचे वाला हिस्सा सुन्न हो गया था. पैरों ने काम करना बंद कर दिया. डॉक्टर्स ने कह दिया कि अब ये कभी अपने पैरों पर खड़ी होकर चल-फिर नहीं पाएगी. एक हंसती-खेलती 11 साल की बच्ची के अचानक इस हालत में पहुंच जाना, क्या बीती होगी अवनि पर और उसके परिवार पर, हम सिर्फ इसका अनुमान ही लगा सकते हैं. अवनि को अब पूरी ज़िंदगी व्हीलचेयर पर गुज़ारनी थी. इनके पिता प्रणीण लखेरा RAS हैं, यानी राजस्थान प्रशासनिक सेवा में हैं. इन्होंने मीडिया से बातचीत में बताया है कि एक्सिडेंट के बाद अवनि पूरी तरह से टूट चुकी थी. चुप रहने लगी थी, डिप्रेशन में चली गई थी. इतनी कमज़ोर हो गई थी कि कुछ नहीं कर पाती थी.

पिता चाहते थे कि वो किसी स्पोर्ट्स में इंवॉल्व हो, ताकि उसका कहीं तो मन लगे. तीरंदाज़ी के लिए अवनि को लेकर गए लेकिन वो प्रत्यंचा भी नहीं खींच पाती थी. और फिर 2015 में पिता अवनि को शूटिंग रेंज लेकर गए. ये अवनि को जम गया. और फिर 2015 में अवनि स्टेट शूटिंग चैंपियन रहीं, अगले साल फिर नेशनल चैंपियन बनीं. 2017 और 2019 आईपीसी पैरा शूटिंग वर्ल्डकप में सिल्वर मेडल जीता. और ये सफर फिर 2021 में टोक्यो पैरालिम्पिक्स में पॉडियम पर खड़े होकर राष्ट्रगान बजवाने तक पहुंचा. अभी अवनि के तीन और कॉम्पिटिशन बचे हैं, मेडल और लाने की उम्मीदें हैं.

सुमित एंटील-

टोक्यो पैरालिम्पिक्स में भारत को दूसरा गोल्ड दिलाया है सुमित एंटील ने. समझिए कि ये पैरालिम्पिक्स के नीरज चोपड़ा हैं. भाला फेंक स्पर्धा में सुमित ने गोल्ड जीता है. सुमित ने जैवलीन थ्रो के F64 इवेंट में 68.55 मीटर दूर भाला फेंका है. ये ना सिर्फ उनका अब तक का बेस्ट है, बल्कि वर्ल्ड रिकॉर्ड भी है. 22 साल के सुमित हरियाणा में सोनीपत के खैवरा गांव के रहने वाले हैं.

हरियाणा में कुश्ती का खूब क्रेज़ है, तो बचपन में ही आसपास के लड़कों के साथ कुश्ती खेलना शुरू कर दिया था. पहलवानी और एक अच्छी सरकारी नौकरी, उनका सपना था. लेकिन जनवरी 2015 की एक शाम को सुमित की सारी प्लानिंग चकनाचूर हो गई. वो ट्यूशन पढ़कर बाइक से गांव लौट रहे थे. सामने से आ रहे ट्रैक्टर की बाइक से टक्कर हो गई. भिड़ंत जोरदार थी. सुमित के बाएं पैर को ज्यादा चोट आई थी. अस्पताल ले जाने पर डॉक्टर्स को सुमित का बायां पैर काटना पड़ा. लगभग दो महीने बाद वो अस्पताल से बाहर आए. लेकिन अब उनके लिए सब बदल चुका था. उनका एक पैर जा चुका था.

सुमित कहते हैं कि उन्होंने साउथ अफ्रीका के मशहूर एथलीट ऑस्कर पिस्टोरियस के खूब वीडियो देखे. वहां से स्पोर्ट्स में रहने का मोटिवेशन मिला. फिर पुणे जाकर प्रोस्थेटिक लेग लगवाया. और भाला फेंकने में जी जान से जुट गए. हालांकि यहां भी आसानी नहीं रही. दौड़ने से प्रोस्थेटिक लेग से लगा उनके पैर का हिस्सा छिल जाया करता था. लेकिन इन दुश्वारियों को हराते हुए वो अपने मिशन में जुटे रहे. और उसी का नतीजा है आज पूरा भारत टोक्यो में उनकी उपलब्धि पर तालियां बजा रहा है. प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति समेत तमाम गणमान्य बधाई दे रहे हैं.

भाविना पटेल-

पैरालिम्पिक्स के टेबल टेनिस मुकाबलों में मेडल जीतने वाली भारत की पहली खिलाड़ी. भाविना पटेल भी गोल्ड जीतने के करीब थीं. लेकिन फाइनल मुकाबले में चीन की खिलाड़ी झाउ यिंग से हार गईं तो सिल्वर मेडल मिला. भाविना भी देश के उन लाखों बच्चों में से रही हैं जिन्हें हमारा समाज सहानुभूति की नज़र से देखता है, कमज़ोर समझता है. और अगर ये बच्चे गांव में पैदा हुए हों तो इनके लिए जीवन की दुश्वारियां और बढ़ जाती हैं. भाविना 6 नवंबर 1986 को गुजरात में मेहसाणा के वडनगर में जन्मी थीं. वडनगर से ही प्रधानमंत्री मोदी भी आते हैं.

तो भाविना जब सालभर की थीं तब पोलियो हो गया. भारत में तब दो बूंद ज़िंदगी की वाला पोलियो टीकाकरण अभियान शुरू नहीं हुआ था. और अमुमन हर गांव में पोलियोग्रसित बच्चे मिल जाते थे. पोलिया के बाद भाविना चल फिर नहीं पाती थी. पिता कोई छोटी-मोटी दुकान चलाते थे. इतने पैसे नहीं थे कि इलाज करवा सकें. जब भाविना चौथी कक्षा में थीं तो उसकी सर्जरी करवाई गई. लेकिन सर्जरी के बाद ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया, फॉलो अप नहीं हुआ. तो भाविना पूरी तरह ठीक नहीं हुई. अब आगे की ज़िंदगी उसे व्हीलचेयर पर ही गुज़ारनी थी.

भाविना ने 12वीं तक की पढ़ाई अपने गांव में ही की. और स्कूल में ही शौक के तौर पर टेबल टेनिस खेलना शुरू कर दिया. उस दौर की एक तस्वीर भी है जिसमें भाविना और बाकी दिव्यांग बच्चों के साथ नरेंद्र मोदी हैं. तब वो गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. खैर, स्कूल के बाद भावना ने पढ़ाई तो डिस्टेंस लर्निंग से ही की. लेकिन टेबल टेनिस में उसकी दिलचस्पी थी. परिवार को भी लगा कि वो इस खेल में अच्छा नाम करेगी.

इसलिए 2014 में भाविना के पिता उसे अहमदाबाद ले जाए. वहां उसकी ट्रेनिंग हुई. इस बीच भाविना मेडल भी जीतने लगीं थीं. तो आगे बढ़ने का हौंसला मिलता रहा. लेकिन ट्रेनिंग करने में समस्याएं आ रही थीं. ये दिक्कत दूर करने के लिए भावना ने 2018 में एक सेकेंड हैंड रोबोट खरीद लिया, और उसके साथ ही अपने ट्रेनिंग जारी रखी. और इसी मेहनत के बल पर भाविना ने टोक्यो ओलंपिक में मेडल जीतकर नाम कमाया.

निषाद कुमार-

किसानों के घरों में चारा काटने के लिए एक मशीन होती है. जिसमें गोल घेरा होता है, इसके बीच में ब्लेड लगी होती हैं. ब्लेड्स लगा चक्का घूमता है ताकि चारे को छोटे टुकड़ों में काटा जा सके. इस मशीन में सावधानी ये रखनी पड़ती है कि चारे को ब्लेड्स की तरफ धकेलते वक्त हाथ में बीच में ना आ जाए. लेकिन कई बार इसमें हादसे भी हो जाते हैं. एक हादसा हुआ हिमाचल प्रदेश के उना ज़िले में. किसान परिवार में 8 साल का बच्चा चारा काटने वाली मशीन में हाथ देकर दाहिना हाथ कटवा बैठता है. इस बच्चे का नाम- निषाद कुमार. निषाद का कलाई से आगे का पूरा हाथ कट गया. अब उसके भविष्य पर अंधेरा सा छा गया था. लेकिन जल्दी ही अपनी कमज़ोरी में ताकत खोल जी. ऊंची कूद को अपना पैशन बनाया. और फिर ये रास्ता टोक्यो पैरालिम्पिक्स में सिल्वर मेडल जीतने तक पहुंचा.

हाथ कटने के बाद जिस लड़के का गांव वालों को कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा था. आज गांव में उसकी कामयाबी पर जश्न मन रहा है. ऊंची कूद में भारत के लिए निषाद ने सिल्वर जीता है. पुरुषों के T47 ऊंची कूद वर्ग में एशियन रिकॉर्ड बनाते हुए 2.06 मीटर की कूद लगाई. टी47 वर्ग की स्पर्धा उन एथलीट के लिए होती है जिनके हाथ के ऊपरी हिस्से में विकार होता है. तो इस वर्ग में निषाद कुमार 10 खिलाड़ियों के साथ फाइनल में मेडल की रेस में थे.

अपने पहले प्रयास में उन्होंने 1.89 मीटर ऊंची कूद लगाई. लेकिन फाइनल में शामिल बाकी एथलीट्स ज्यादा ऊंची कूद लगा रहे थे. 2.02 मीटर की ऊंचाई में निषाद को चीन के चेन होंगिजे से कड़ी टक्कर मिली. इसके बाद अमेरिका के रॉड्रिक टाउनसेंड और डल्लास वाइज ने 2.06 मीटर की ऊंची कूद लगाकर निषाद को चुनौती दी. जबकि चीन के होंगिजे 2.06 मीटर की ऊंचाई पार करने में नाकाम रहे.

अंत में निषाद ने 2.06 मीटर की ऊंची कूद लगाई. ये उनका अब तक सबसे ऊंचा जंप है. निषाद से ज्यादा 2.15 मीटर की ऊंची कूद के साथ अमेरिका के रॉड्रिक टाउनसेंड ने इस मुकाबले में गोल्ड जीता. दूसरे नंबर पर निषाद के साथ संयुक्त रूप से अमेरिका के डल्लास वाइज रहे जिन्होंने 2.06 मीटर की कूद लगाई. दोनों को संयुक्त रूप से सिल्वर मेडल मिला है.

योगेश कथुनिया-

इन्होंने डिस्कस थ्रो में देश के लिए सिल्वर मेडल जीता है. फाइनल में 44.38 मीटर थ्रो के साथ दूसरे नंबर पर रहे. योगेश की भी टोक्यो तक पहुंचने की कहानी काफी संघर्ष वाली रही है. मार्च 1997 को जन्मे योगेश जब 8 साल के थे, तो उन्हें लकवा मार दिया. उनके हाथ और पैरों ने काम करना बंद कर दिया था. इलाज के बाद उनके हाथ तो ठीक हो गए, लेकिन पैरों का लकवा गया नहीं. रास्ता बचता था व्हीलचेयर का. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक योगेश की मां ने फिजियोथैरेपी सीखी, ताकि वो बेटे को दोबारा पैरों पर खड़ा कर सकें.

मां की ये मेहनत काम भी आई. तीन साल की फिजियोथैरेपी के बाद योगेश पैरों पर खड़ा होने लगा. हांलाकि पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ. योगेश जब 20 साल के हुआ तब खेलना शुरू किया. 2018 में उन्होंने पहली बार हरियाणा के पंचकुला में हुए वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता. फिर दुबई में वर्ल्ड चैंपियनशिप में ब्रॉन्च तक पहुंचे. वो लगातार अपने रेंज बढ़ाते रहे. और सतत मेहनत का नतीजा आज हमारे सामने है.

देवेंद्र झाझड़िया-

ये नाम 16 साल से जीके की किताबों में छपता रहा है. भारत के लिए जैवलिन में पहला गोल्ड लाने वाले. 2004 और 2016 के पैरालिम्पिक्स में भालाफेंक में इन्होंने गोल्ड जीता था. इस बार जैवलिन थ्रो की F46 कैटेगरी में सिल्वर मेडल जीता है. इस कैटगरी उन एथलीट्स की होती है जिनके हाथ का हिस्सा काम नहीं करता हो. देवेंद्र का दायां हाथ आधा कटा हुआ है. देवेंद्र ने 64.35 मीटर भाला फेंका है.

इस कैटेगरी में गोल्ड जीतने वाले श्रीलंका के एथलीट ने 67.37 मीटर फेंका था. तो तीन मीटर से देवेंद्र गोल्ड से चूक गए. दूसरे नंबर पर रहे. लेकिन एक और पैरालिम्पिक्स मेडल उनके खाते में जुड़ गया. देवेंद्र झाझड़िया राजस्थान के चुरू ज़िले के रहने वाले हैं. जब वो करीब 8 साल के थे तब पेड़ पर चढ़ते वक्त बिजली के तार से उनका हाथ छू गया था. और इस हादसे में बायां हाथ का एक हिस्सा गंवा दिया था.

सुंदर सिंह गुर्जर-

ये भी जैवलिन थ्रो की देवेंद्र झाझड़िया वाली कैटेगरी में ही थे. देवेंद्र ने सिल्वर जीता तो ब्रॉन्च सुंदर सिंह के खाते में आया. इन्होंने 64.01 मीटर भाला फेंका और तीसरे नंबर पर रहे. सुंदर जयपुर के रहने वाले हैं. 2015 में एक हादसे में इन्होंने अपना बांया हाथ गंवा दिया था.

विनोद कुमार-

विनोद कुमार ने डिस्कस थ्रो में ब्रॉन्ज जीता है. F52 डिस्कस थ्रो के फाइनल में विनोद का बेस्ट थ्रो 19.91 मीटर का रहा. और ये एशिया का रिकॉर्ड है. हालांकि दिव्यांगता की कैटगरी पर विवाद हुआ. इसलिए अभी उनका मेडल वापस हो गया. ये विवाद अभी चल ही रहा है.

तो ये थे पैरालिम्पिक्स में तिरंगे का मान बढ़ाने वाले खिलाड़ी. पैरालिम्पिक्स के मेडल का भी उतना ही मान है जितना ओलंपिक का है. हम सभी खिलाड़ियों को बधाई देते हैं. जो मेडल ला नहीं पाए, वो अच्छा खेले हैं, उन्हें भी बधाई. उम्मीद है अभी सिलसिला जारी रहेगा, और देश के खाते में कुछ और मेडल्स भी आएंगे.


वीडियो- तीसरा पैरालंपिक पदक जीतने वाले देवेंद्र झाझरिया ने सफलता का राज बताया

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