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साउथ कोरिया और नॉर्थ कोरिया क्यों एक दूसरे को मिटाना चाहते हैं?

ये बात 70 साल पुरानी है. यही जून का महीना था. तारीख़ थी, 25. समय, यही कुछ सुबह के साढ़े चार बजे होंगे. ये जिस देश की बात है, उसके दो हिस्से थे. उनमें से जो उत्तर वाला हिस्सा था, उधर से बढ़ी एक फ़ौज. अपने साथ करीब 75 हज़ार सैनिक लेकर. एक साथ चार पॉइंट्स से धावा बोलने वाली इस सेना का मकसद था, अपने दक्षिण में बसे देश को जीतना.

कौन बना मददगार?
जिस जगह पर ये युद्ध हो रहा था, वहां से करीब 11 हज़ार किलोमीटर था वॉशिंगटन डीसी. यानी, अमेरिकी सरकार का ठिकाना. वहां मुखिया थे- हैनरी एस ट्रूमैन. उन्होंने सोचा, हमको किसी भी कीमत पर दक्षिण के उस देश को बचाना है. आनन-फ़ानन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की इमरजेंसी बैठक बुलाई गई. उन्होंने प्रस्ताव पास किया. कहा, उत्तर तुरंत अपनी सेना पीछे बुलाए. मगर उत्तर नहीं माना. ऐसे में UN ने तय किया, ये युद्ध जिताने के लिए दक्षिण की हर मुमकिन मदद करेंगे हम. मदद, यानी सैन्य सहायता. UN ने राष्ट्रपति ट्रूमैन को इस युद्ध में अपना एक्जिक्यूटिव एजेंट नियुक्त किया. और ट्रूमैन ने कमांडर-इन-चीफ बनाया जनरल डगलस मैकआर्थर को. जनरल मैकआर्थर, यानी उन दिनों अमेरिकी सेना का सबसे सेलिब्रेटेड नाम. वो आदमी, जिसने दूसरे विश्व युद्ध में जापान पर अमेरिका को जीत दिलाई. क्यों कूदा था अमेरिका किसी और की लड़ाई में? क्या हित सध रहा था इस युद्ध से उसका?

Harry Trunman With Douglas Macarthur
राष्ट्रपति ट्रूमैन और कमांडर-इन-चीफ जनरल डगलस मैकआर्थर (फोटो: एएफपी)

अमेरिका सशरीर क्यों कूदा इस लड़ाई में?
इस सवाल का जवाब छुपा है, उस नाम में. जहां ये युद्ध लड़ा जा रहा था. कौन सी जगह थी ये? ये जगह थी कोरियन प्रायद्वीप की. प्रायद्वीप माने, पानी के बीच में उठा हुआ ज़मीन का हिस्सा. कोरियन या कोरिया, इस शब्द का संबंध है कोरयो नाम के एक प्राचीन साम्राज्य से. इन्होंने सन् 918 से 1392 तक यहां राज किया. कोरिया का शाब्दिक अर्थ पूछें, तो मतलब होगा- ऊंचे पहाड़ों और साफ़-चमकदार पानी के सोतों वाली ज़मीन. कहीं ऊंची पहाड़ की चोटियां. कहीं बर्फ़ीली घाटियां. इतने पहाड़ हैं यहां कि पीढ़ियों की मशक्कत के बाद जाकर कुल ज़मीन का पांचवां हिस्सा ही खेती लायक बनाया जा सका.

क्या है भूगोल?
ये कोरियन प्रायद्वीप बसा है एशिया के पूर्वी हिस्से में. इस प्रायद्वीप के पूरब में है सी ऑफ जापान. पश्चिम में है, येलो सी. नीचे, यानी दक्षिण दिशा में है ईस्ट चाइना सी. कोरियन प्रायद्वीप की सीमाएं सटती हैं चीन और रूस के साथ. यूं तो जापान भी इसका इमिडिएट पड़ोसी है, मगर उसके साथ इसकी सरहदें समंदर को छूती हैं.

North Korea And South Korea
उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया (फोटो स्क्रीनशॉट: गूगल मैप्स)

जब उत्तर और दक्षिण नहीं थे…
जिसे आप उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के नाम से जानते हैं, वो कभी एक इकट्ठा कोरियन प्रायद्वीप हुआ करता था. वहां राजशाही थी. हमने आपको कोरयो वंश के बारे में बताया. जिनका शासन रहा 1392 तक. इसके बाद वहां सत्ता में आया जोसेऑन वंश. इन्होंने करीब 500 साल तक शासन किया. 1897 में इसी वंश के एक राजा गोजोंग ने एक नए साम्राज्य की नींव रखी. इसका नाम रखा- कोरियन एम्पायर.

जापान चैप्टर
फिर आया सन् 1910. बरसों चले युद्ध के बाद इसी साल जापानी साम्राज्य ने कोरिया पर कब्ज़ा कर लिया. जापान ने कहा, आज से तुम हमारे संरक्षण में हो. जापान कहता था, उनकी संस्कृति श्रेष्ठ है. यही कहकर जापान ने जबरन कोरियाई संस्कृति को मिटाना शुरू किया. उनका जापानीकरण करना शुरू किया. कोरिया के लोगों से उनकी भाषा, उनका इतिहास, उनके जंगल, उनके पेड़-पौधे सब छीन लिए गए. लाखों की तादाद में जापान ले जाकर उन्हें बंधुआ खटाया गया. कोरियन महिलाओं को सेक्स के लिए ग़ुलाम बनाया गया. जापानी क्रूरता का ये इतिहास आज भी कोरिया के दोनों देशों के बीच का कॉमन फैक्टर है. दोनों ही देश जापान को बहुत पसंद नहीं करते.

जापान की कोरिया से छुट्टी कब हुई?
करीब 35 साल बाद, सन् 1945 में. तब, जब दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार हुई. इस हार के साथ कोरिया जापान के चंगुल से तो निकल आया. मगर एक दूसरे चंगुल में फंस गया. ये दूसरा चंगुल था, कोल्ड वॉर. इसका बैकग्राउंड बना, विश्व युद्ध की समाप्ति. जुलाई 1945 में मित्र देशों के तीन सबसे बड़े खिलाड़ियों का जुटान हुआ. ये तीनों देश थे- अमेरिका, सोवियत और ब्रिटेन. जुटान का वैन्यू था- जर्मनी का पोट्सडैम शहर. यहां कॉन्फ्रेंस में तीनों देशों ने विचारा कि आगे क्या करेंगे. कौन किस इलाके को अपने संरक्षण में लेगा, इसपर विमर्श हुआ. फिर इसी कॉन्फ्रेंस में कोरिया का भी बंटवारा हो गया. कोरिया के बीचोबीच 30 डिग्री उत्तर अक्षांश रेखा गुज़रती है. इसको बाउंड्री बनाया अमेरिका और सोवियत ने. तय हुआ कि इस रेखा के उत्तर में जापानी सैनिकों का आत्मसमर्पण स्वीकार करेगा सोवियत. और रेखा के दक्षिण में सरेंडर मंज़ूर करेगा अमेरिका. और इस तरह दोनों सुपरपावर्स ने मेज पर बैठे-बैठे एक देश की तकदीर तय कर दी.

Potsdam Germany
जर्मनी का पोट्सडैम शहर (फोटो स्क्रीनशॉट: गूगल मैप्स)

सोवियत और अमेरिका का नाज़ी कनेक्शन
वर्ल्ड वॉर में साथ मिलकर लड़े सोवियत और अमेरिका. मगर इन दोनों का कोई मेल नहीं था. कम्यूनिस्ट सोवियत और कैपिटलिस्ट अमेरिका स्वाभाविक विरोधी थे. इनके आपसी विरोध में घी डाला जर्मनी के नाज़ी जासूसों ने. वो नाज़ी जासूस, जिन्हें दर्जनों की तादाद में अमेरिकी खुफ़िया एजेंसी ने रिक्रूट किया. कब? हिटलर की मौत के बाद. क्यों? क्योंकि अमेरिका को लगता था कि इन नाज़ी जासूसों के पास सोवियत की ढेर सारी ख़बर है. नाज़ी सबसे ज़्यादा नफ़रत करते थे सोवियत से. हिटलर के बाद यही सोवियत इन नाज़ी जासूसों के अस्तित्व का सहारा बना. उन्होंने सोवियत के अमेरिका विरोध से जुड़ी कई झूठी-सच्ची कहानियां सुनाईं CIA को. ये कहानियां अमेरिका को सोवियत के खिलाफ़ भड़काने का बहुत बड़ा ज़रिया बनीं.

इस आपसी अविश्वास. इस पैरानॉइड का सबसे पहला शिकार बना कोरिया. जिसके दो हिस्से हो गए. 1948 में दोनों जगह दो सरकारें बन गईं. उत्तर कहलाया, डेमोक्रैटिक पीपल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया. इसकी राजधानी थी, प्योंगयांग. दक्षिण ने अपना नाम रखा, रिपब्लिक ऑफ कोरिया. इसकी राजधानी बनी सोल.

उत्तर: किम खानदान की ताजपोशी
उत्तर कोरिया बस अपने नाम में ही डेमोक्रैटिक रिपब्लिक था. असलियत में यहां थी राजशाही. जिसके मुखिया थे, किम इल-संग. नॉर्थ कोरिया के मौजूदा लीडर किम जोंग-उन के दादा. किम इल-संग गुरिल्ला लड़ाका थे. उन्होंने चीन के मंचूरिया में साम्राज्यवादी जापानी फ़ौज के खिलाफ छापामार युद्ध लड़ा था. नॉर्थ कोरिया की आबादी सोचती है, किम बहुत शूरवीर लड़ाका थे. जबकि असलियत में किम थे एक भगोड़े. वो जापानियों से हारकर मैदान से भाग गए थे. भागकर वो पहुंचे सोवियत. वहां से सोवियत एजेंट बनकर कोरिया आए. ताकि कोरिया में सोवियत का औज़ार बन सकें.

Kim Il Sung
नॉर्थ कोरिया के मौजूदा लीडर किम जोंग-उन के दादा किम इल-संग (फोटो: एएफपी)

दक्षिण: ऐंटी-कम्यूनिस्ट सिस्टम
ये हुई उत्तर की कहानी. अब चलते हैं दक्षिण. जहां अमेरिकियों ने सत्ता में बिठाया सिंगमैन री को. सिंगमैन अमेरिका स्थित प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करके लौटे थे. कम्यूनिस्ट सिस्टम के कट्टर विरोधी थे.

साउथ और नॉर्थ कोरिया. कोल्ड वॉर की उठापटक में इन दोनों की समानांतर कहानी चली 1945 से 1950 तक. फिर 25 जून, 1950 को सोवियत परस्त किम इल-संग की सेना ने दक्षिण कोरिया पर हमला कर दिया. किम ने कहा, वो दक्षिण को जीतकर कोरिया का एकीकरण करेंगे. हमने इसकी एक ब्रीफ कहानी एपिसोड की शुरुआत में आपको सुनाई थी. बताया था कि किस तरह अमेरिका ने दक्षिण कोरिया की मदद के लिए अपनी फौज़ भेजी. UN के झंडे तले जमा हुई इस सेना में मेजॉरिटी तो अमेरिका की थी. मगर ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा जैसे देशों ने भी अपने सैनिक भेजे थे.

भारत का क्या रोल था?
UN की इस सेना में नए-नवेले आज़ाद हुए भारत की भी हिस्सेदारी थी. भारत ने 60वीं पैराशूट फील्ड ऐम्बुलेंस नाम की अपनी आर्मी मेडिकल यूनिट भेजी थी वहां. इस यूनिट के कमांडर थे लेफ्टिनेंट कर्नल ए जी रंगराज. अभी अगले महीने, जुलाई 2020 में, लेफ्टिनेंट जनरल रंगराज की तस्वीरें पूरे साउथ कोरिया में नज़र आएंगी. साउथ कोरिया ने उन्हें जुलाई 2020 का अपना कोरियन वॉर हीरो चुना है. ये अपनी मदद करने वाले सैनिकों को थैंक्यू कहने का उसका तरीका है.

इंटेलिजेंस फेलियर
ख़ैर, इस प्रसंग के बाद वापस लौटते हैं कोरियन वॉर पर. शुरुआत में जनरल डगलस की सेना को ख़ूब बढ़त मिली. वो उत्तर कोरिया की फौज़ को पीछे धकेलते चले गए. ऐसा लगा, पूरे कोरियन प्रायद्वीप को अपने संरक्षण में लेने का सोवियत ख़्वाब कपूर हो जाएगा. मगर फिर अमेरिकी ख़ुफिया विभाग की एक नाकामी ने युद्ध की शक्ल बदल दी. क्या थी ये नाकामी? सितंबर 1947 में अमेरिका ने CIA की नींव रखी. इसका मुख्य काम था, बाहरी देशों में अमेरिका के लिए खुफिया जानकारियां जुटाना. इस लिहाज से CIA को कोरियन वॉर में इस्तेमाल किया जाना स्वाभाविक था. मगर जनरल मैकआर्थर ने ऐसा होने नहीं दिया. उन्होंने तोक्यो में अपनी ख़ास इंटेलिजेंस यूनिट बिठाई. कोरियन युद्ध से जुड़े सारे इनपुट्स लाना इसी यूनिट के माथे था.

Douglas Macarthur
कमांडर-इन-चीफ जनरल डगलस मैकआर्थर (फोटो: एएफपी)

सौ टके का सवाल था कि चीन क्या करेगा?
ये यूनिट सही काम नहीं कर रही थी. मसलन, इसने कहा कि नॉर्थ कोरिया साउथ पर हमला नहीं करेगा. फिर इसने कहा कि चीन की माओ सरकार इस युद्ध से दूर है. जबकि अंदर-ही-अंदर चीन नॉर्थ कोरिया की मदद कर रहा था. फिर किया इस यूनिट ने अपना सबसे बड़ा ब्लंडर. क्या था ये ब्लंडर? नॉर्थ कोरिया और चीन के बीच करीब हज़ार किलोमीटर लंबी सीमा है. इस सीमा की एक बड़ी बाउंड्री लाइन है युलु नदी. नदी पार की, तो आप चीन पहुंच जाएंगे. मैकआर्थर चाहते थे कि युलु नदी तक जाकर नॉर्थ को खदेड़ आएं. अब यहां एक कैच था. अमेरिकी फौज़ को अपनी सरहद पर देखकर माओ सरकार कैसे रिऐक्ट करेगी, ये पता करना ज़रूरी था. क्या चीन तब भी सीधी लड़ाई से बचेगा? अगर नहीं, तो वो कितने सैनिक भेजेगा लड़ाई में? जनरल मैकआर्थर की इंटेलिजेंस यूनिट ने यहीं पर ब्लंडर किया. उन्होंने कहा, अव्वल तो चीन आएगा नहीं. और अगर आया, तो बमुश्किल 50 हज़ार सैनिक लाएगा. इनसे तो हम निपट लेंगे.

युद्ध ख़त्म क्यों नहीं हुआ?
इस ग़लत इनपुट का नतीज़ा डिजास्ट्रस था. तीन मोर्चे खुल गए अमेरिका के खिलाफ़. नॉर्थ कोरिया. सोवियत. और, चीन. UN सेना, ख़ासकर अमेरिका की तगड़ी हार हुई. जनरल मैकआर्थर की जगह जनरल मैथ्यू रिजवे को कोरिया भेजा गया. युद्ध चलता रहा. स्टेलमेट की स्थिति बन गई. आख़िरकार जुलाई 1953 में करीब तीस से पचास लाख लोगों की मौत के बाद कोरियन युद्ध रुका. युद्ध रुका तो सही, मगर ख़त्म नहीं हुआ. क्यों? क्योंकि उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच संधि समझौता नहीं हो सका. दक्षिण कोरिया ने कहा, उसे देश का बंटवारा मंज़ूर नहीं. इसी बात पर उसने पीस ट्रीटी पर दस्तख़त नहीं किए. यानी, टेक्निकली ये जंग आज भी ख़त्म नहीं हुई.

नॉर्थ और साउथ: पोल्स अपार्ट
इस बात को सात दशक बीत चुके हैं. इस दौरान उत्तर और दक्षिण कोरिया दो बिल्कुल अलग सिस्टम बनकर उभरे. दक्षिण कोरिया बना एक मज़बूत लोकतंत्र. दुनिया की टॉप 12 इकॉनमीज़ में से एक. वहीं दुनिया से अलग-थलग नॉर्थ की गिनती होती है सबसे गरीब देशों में. साउथ कोरिया अपनी उन्नत तकनीक और आर्थिक संपन्नता जैसे कारणों से सुर्खियां बनाता है. जबकि नॉर्थ से जुड़ी ख़बरें होती हैं- मिसाइल टेस्ट. न्यूक्लियर हथियार विकसित करने की सनक. क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करने की धमकियां. दक्षिण कोरिया प्रगतिशील स्टेट है. और उत्तर कोरिया है प्रोपेगेंडा और तानाशाही स्टेट.

उम्मीद जगी, फिर मिट गई
दो साल पहले, अप्रैल 2018 में दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात हुई. दोनों ने हाथ मिलाया. तब लगा, शायद इनके आपसी रिश्ते सुधर रहे हैं. जून 2018 में जब किम शांति वार्ता के लिए सिंगापोर आए, तब भी उम्मीदें बंधी. वार्ता फेल हो जाने पर भी लगा कि सबकुछ ख़त्म नहीं हुआ. बीते दो सालों से इन दोनों कोरियाई देशों के बीच कमोबेश शांति थी. लेकिन जून 2020 में इस शांति पर भी ब्रेक लगा दिया नॉर्थ कोरिया ने. इस ब्रेक का बहाना बना, दक्षिण कोरियाई एक्टिविस्ट्स द्वारा सीमा पर उड़ाए गए गुब्बारे. इन गुब्बारों में न केवल नॉर्थ कोरियन तानाशाह की आलोचना वाली पर्चियां थीं. बल्कि लोगों ने नॉर्थ कोरियाई जनता की मदद के लिए गुब्बारों में डॉलर भी भर दिया था.

Korea Balloons
16 जून को प्योंगयांग ने सीमा पर बना एक लायसन ऑफिस उड़ा दिया. (फोटो: एपी)

दो बातें हो सकती हैं…
इसी को बहाना बनाकर 16 जून को प्योंगयांग ने सीमा पर बना एक लायसन ऑफिस उड़ा दिया. अप्रैल 2018 में हुए समझौते के बाद दोनों देशों ने आपसी संवाद के लिए सीमा पर ये ऑफिस बनाया था. इसको उड़ाकर नॉर्थ कोरिया की डिक्टेटरशिप ने एक बार फिर बातचीत के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं. इसके बाद से दोनों देशों का टेंशन बढ़ता ही जा रहा है. जानकारों का कहना है, इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं. पहला, मॉस्को और पेइचिंग. जो फिलहाल एक टीम में खेल रहे हैं. ये नॉर्थ कोरिया के बहाने अमेरिका के लिए फिर से सिरदर्दी पैदा करना चाहते हैं. दूसरी वजह हो सकती है, आंतरिक संकट. कोरोना के आगे बड़े-बड़े देशों की इकॉनमी पिट गई. ऐसे में नॉर्थ कोरिया का क्या हाल होगा, इसकी बस कल्पना की जा सकती है. मुमकिन है अपने लोगों का ध्यान बंटाने के लिए नॉर्थ कोरिया की लीडरशिप अपना पुराना जांचा-परखा फॉर्म्युला इस्तेमाल कर रही हो. ख़ुद टेंशन बढ़ाकर प्रोपेगेंडा फैला रही हो कि उनका देश ख़तरे में है.

Liaison Office
16 जून को प्योंगयांग ने सीमा पर बना एक लायसन ऑफिस उड़ा दिया. (फोटो: एपी)

खेलेंगे जी-जान से…
जो भी वजह हो, नॉर्थ कोरिया टेंशन बढ़ाने के मूड में है. इसके लिए धमकियों के अलावा वो कुछ हास्यास्पद चीजें भी कर रहा है. मसलन, 22 जून को नॉर्थ कोरिया ने ऐलान किया कि अब वो भी पर्ची-पर्ची खेलेगा. इसके लिए नॉर्थ कोरिया ने दक्षिण कोरिया को कोसते हुए करीब सवा करोड़ पर्चियां छपवाई हैं . न्यू यॉर्क टाइम्स के मुताबिक, इनकी छपाई के लिए वहां के प्रिंटिंग प्रेस से ओवरटाइम करवाया गया. आप पूछेंगे कि इतनी पर्चियों का वो करेगा क्या? इस क्या का जवाब ख़ुद नॉर्थ ने दिया है. उसने कहा है कि वो इन पर्चियों को गुब्बारों में भरकर साउथ कोरिया भेजेगा. ताकि वहां सड़कों-गलियों में हर तरफ ये पर्चियां बिखरी हों. कितने गुब्बारे, पता है? करीब तीन हज़ार गुब्बारे. और बस पर्चियां नहीं भेजी जाएंगी. साथ में जली हुई सिगरेट के बचे टुकड़े. और कूड़ा-करकट भी भेजा जाएगा.

आख़िर में. कोरियन युद्ध का इतिहास भारत के ज़िक्र बिना अधूरा है. आप जब भी इस युद्ध को डिटेल से पढ़ेंगे, तो भारत का नाम बार-बार आएगा. एक तो, भारत युद्ध के खिलाफ था. वो चीन से संवाद बनाने को कह रहा था. दूसरा, भारत ने पहले ही ब्रिटेन और अमेरिका को आगाह कर दिया था. चेताया था कि चीन जंग में कूदने की तैयारी कर रहा है. जब चाइनीज़ ट्रूप्स सरहद की तरफ रवाना हुए, तब उनके मूवमेंट की भी टाइमली ख़बर दी थी भारत ने. मगर अमेरिका ने इसे नज़रंदाज़ किया और इसका खामियाज़ा भी उठाया. उसके करीब 36 हज़ार लोग मारे गए युद्ध में. हालांकि जितनी जानें उसने लीं. जितने शहर और गांव उसने तबाह किए. उन मौतों के आगे ये संख्या बहुत कम है. अब भी साउथ कोरिया के कई हिस्सों से खुदाई में पुरानी लाशें मिलती हैं. उन लोगों की लाशें, जिनमें से कई उसी तीन साल चले युद्ध के समय ज़िंदा दफ़ना दिए गए थे.


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