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स्क्विड गेम ने दक्षिण कोरिया का कौन सा सच बाहर ला दिया है?

Life is like a game, there are many players. If you don’t play with them, they’ll play with you.

ये डायलॉग स्क्विड गेम से लिया गया है. महीने भर पहले नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ हुआ ये शो पूरी दुनिया में धमाल मचा रहा है. इसकी मशहूरी का आलम कुछ ऐसा है कि कई जगहों पर लोग इसकी नकल करने में जुटे हैं. कहीं-कहीं पर पुलिस को चेतावनी भी जारी करनी पड़ी है. चीन में सेंसर बोर्ड ने अभी तक इस शो को पास नहीं किया है. इसके बावजूद लोग अवैध तरीके से न सिर्फ़ इसे देख रहे हैं, बल्कि दीवाने भी हो रहे हैं.

स्क्विड गेम सिर्फ़ मनोरंजन तक सीमित नहीं है. इसमें जीवन की कुछ बारीक सच्चाईयां भी छिपी हुईं है. यही कारण है कि लोग इसके किरदारों से ख़ुद को रिलेट करने लगे हैं. इसका एक नज़ारा 20 अक्टूबर को साउथ कोरिया में दिखा. जहां 13 शहरों में 80 हज़ार से अधिक कामगारों ने एक साथ प्रदर्शन किया. वे जॉब सिक्योरिटी और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे. राजधानी सियोल में कुछ प्रदर्शनकारी स्क्विड गेम वाली ड्रेस पहनकर आए थे.  उनका कहना था कि स्क्विड गेम के किरदारों की तरह वे भी असल ज़िंदगी में परेशान चल रहे हैं. वे किरदार पीछे छूट गए साथियों की याद दिलाते हैं. स्क्विड गेम की थीम पर आयोजित प्रोटेस्ट की पूरी कहानी क्या है? कामगारों की मांगें क्या हैं और सरकार उन पर ध्यान क्यों नहीं दे रही है? समझने की कोशिश करते हैं.

क्यों हो रहा प्रोटेस्ट?

साल 2008 में दुनियाभर के देश आर्थिक मंदी का सामना कर रहे थे. साउथ कोरिया इससे अछूता नहीं रह सका. सेंगयुंग नाम की एक ऑटो कंपनी को भारी नुकसान हुआ. नुकसान की भरपाई के लिए उसने अपने यहां सालों से काम कर रहे कर्मचारियों को निकाल दिया. इससे नाराज़ वर्कर्स ने ख़ुद को फ़ैक्ट्री के अंदर बंद कर लिया. वे नौकरी पर बहाल करने की मांग कर रहे थे. लेकिन उनकी मांग पर कोई सुनवाई नहीं हुई. 77 दिनों के बाद पुलिस ने बलप्रयोग कर फ़ैक्ट्री को खाली करा लिया.

स्क्विड गेम के मुख्य किरदार की कहानी भी कुछ-कुछ वैसी ही है. वो सालों से ऑटोवर्कर के तौर पर काम कर रहा है. फिर एक दिन अचानक से उसकी कंपनी बंद हो जाती है. उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है. उसके ऊपर भारी कर्ज़ है. परिवार बिखर चुका है. कर्ज़ देने वाले उसके पीछे लग जाते हैं. तभी उसे एक ऑफ़र मिलता है. गेम खेलने का. सर्वाइवल का गेम. इस खेल में वो अकेला नहीं है. उसके जैसे सैकड़ों लोग हैं, जो वैसे ही हालात का सामना कर रहे होते हैं. उन्हें बच्चों वाले गेम खेलने के लिए कहा जाता है. हारने की सज़ा मौत. ज़िंदा बच जाने वाला अंतिम खिलाड़ी विजेता बनता है. अब कौन विजेता बनता है और किसे मौत की सज़ा मिलती है? ये तो पूरी सीरीज़ देखने के बाद ही पता चलेगा. ये काम आपके ज़िम्मे.

सिनेमा नहीं हकीकत

ये तो हुई पर्दे की बात. हम चलते हैं असलियत की तरफ़. कोरियन वॉर के बाद साउथ कोरिया और नॉर्थ कोरिया अलग-अलग दिशाओं में चले गए. जहां नॉर्थ कोरिया ने बंद मार्केट और तानाशाही वाली व्यवस्था चुनी. वहीं साउथ कोरिया पूंजीवाद और लोकतंत्र के रास्ते पर आगे बढ़ा. इसका नतीजा साफ़ है. आज साउथ कोरिया एशिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है. वहां सैमसंग जैसी दिग्गज कंपनियां हैं. साउथ कोरिया ऑटो और टेक की रेस में आगे है. वहां का सिनेमा दुनियाभर में सराहा जाता है.

 साउथ कोरिया के पास चमक-दमक का पूरा साजो-सामान मौजूद है. लेकिन इस चकाचौंध के पीछे एक ऐसी दुनिया भी है, जो अक्सर आंखों से ओझल रहती है. उसके ऊपर किसी का ध्यान नहीं रहता. साउथ कोरिया में ऐसा ही हुआ है. लाखों की आबादी ग़रीबी, बेरोज़गारी, शोषण, असमानता, महंगाई जैसी समस्याएं आम हैं. हो सकता है कि स्क्विड गेम की कहानी आपको मज़ेदार लगे, लेकिन ये एक हक़ीक़त है. जिसका सामना साउथ कोरिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हर रोज़ करता है.

5 लाख कर्मचारी गए हड़ताल पर

इन्हीं मसलों पर सरकार को जगाने के लिए कोरियन कंफ़ेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स (KCTU) ने 20 अक्टूबर को प्रोटेस्ट बुलाया था. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसमें 13 शहरों में 80 हज़ार से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया. देशभर में पांच लाख से अधिक कर्मचारी हड़ताल पर भी गए. इसका असर स्कूलों में भी देखने को मिला. स्कूलों में कैन्टीन्स बंद पड़ गई. एक हज़ार से अधिक डेलिवरी वर्कर्स ने पूरे दिन कोई ऑर्डर नहीं लिया.

राजधानी सियोल में 80 से अधिक प्रदर्शनकारी स्क्विड गेम की ड्रेस में आए थे. वे ‘भेदभाव से आज़ादी’ के नारे लगा रहे थे. उन्होंने समान और सुरक्षित रोजगार के अवसर देने की मांग भी की. इससे पहले KCTU ने अपने यूट्यूब चैनल पर ‘स्क्विड गेम’ की थीम पर बेस्ड एक प्रोमो वीडियो भी जारी किया था. इसके जरिए लोगों से प्रोटेस्ट में जुड़ने की अपील की गई थी. साउथ कोरिया के लेबर लॉ में अनियमति कर्मचारियों को पूरी सुविधाएं नहीं मिलती. अगस्त 2020 के आंकड़ों के अनुसार, ऐसे लोगों की संख्या लगभग 36 फीसदी है. इनमें कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स और टेम्पररी वर्कर्स भी शामिल हैं.

KCTU साउथ कोरिया के दो सबसे बड़े लेबर यूनियन्स में से एक है. उसमें लगभग 11 लाख कर्मचारी रजिस्टर्ड हैं. KCTU का कहना है कि कोरोना महामारी के चलते इन वर्कर्स की स्थिति और ख़राब हुई है. सरकार उनकी समस्याओं का समाधान करने की बजाय टाल-मटोल में व्यस्त है.

जारी रह सकता है प्रदर्शन

साउथ कोरिया में कोरोना को लेकर भीड़ इकट्ठा करने की इजाज़त नहीं है. राजधानी में एक से अधिक लोगों के साथ प्रदर्शन करने पर पाबंदी है. 20 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन में सियोल में कम-से-कम 27 हज़ार लोगों ने हिस्सा लिया. इसको लेकर KCTU के सदस्यों पर रिपोर्ट लिखवाई गई है. KCTU ने कहा है कि ये प्रतिबंध उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. साउथ कोरिया में अगले साल राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना है. मांगों पर ध्यान नहीं दिए जाने की स्थिति में KCTU अपना प्रोटेस्ट जारी रखेगी.

बदलाव की बुनियाद रखने वाली फिल्में और डॉक्यूमेंट्रीज

स्क्विड गेम की सफ़लता के अपने आंकड़े हो सकते हैं. मसलन, इतने की कमाई हुई, इतने लोगों ने देखा, इतने अवार्ड्स मिले आदि. लेकिन इसकी असली सफ़लता इस बात से तय होगी कि सरकार और ज़िम्मेदार संस्थाएं वर्कर्स के अधिकारों को लेकर कितनी उदार बनतीं है. अब हम आपको बताते हैं उन फिल्मों और डॉक्यूमेंट्रीज़ के बारे में जिनका असर असली ज़िंदगी में भी देखने को मिला.

1. अ गर्ल इन दी रिवर: द प्राइस ऑफ़ फ़ॉरगिवनेस

ये पाकिस्तान में होने वाली ऑनर किलिंग्स पर बेस्ड डॉक्यूमेंट्री है. इसे बनाया था पाकिस्तानी मूल की पत्रकार और फ़िल्ममेकर शरमीन ओबैद-चिनॉय ने. 2016 के ऑस्कर में इसे सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का अवॉर्ड भी मिला था. इस डॉक्यूमेंट्री में पाकिस्तान के गुजरांवाला में रहने वाली सबा को दूसरी जाति के एक लड़के क़ैसर से प्यार हो जाता है. लेकिन सबा के घरवाले इस रिश्ते को मानने के लिए तैयार नहीं होते. सबा चुपके से क़ैसर के साथ शादी कर लेती है. इससे उसके घरवाले बेहद नाराज़ हो जाते हैं. निक़ाह के बाद सबा के पिता और चाचा उसके ससुराल आते हैं. वहां वे क़ुरान पर सबा की सुरक्षा की कसमें खाते हैं. सबा को लगता है कि उसके घरवालों का मन बदल गया है. लेकिन ऐसा नहीं था.

डॉक्यूमेंट्री का पोस्टर (सोर्स- विकीपीडिया)
डॉक्यूमेंट्री ‘ए गर्ल इन द रिवर: द प्राइस ऑफ फॉरगिवनेस’ का पोस्टर (सोर्स- विकीपीडिया)

 जब सबा उनके साथ घर लौट रही होती है, तब वे लोग उसे एक नदी के पास ले जाकर गोली मार देते हैं. फिर उसे नदी में फेंककर वापस आ जाते हैं. उन्हें लगता है कि सबा की मौत हो गई होगी. लेकिन वो किसी तरह से ज़िंदा बच जाती है. इस मामले में उसके पिता और चाचा को गिरफ़्तार कर लिया जाता है. उनके ऊपर मुकदमा चलाने की तैयारी हो रही होती है. इस बीच में आस-पड़ोस वाले सबा पर दबाव डालते हैं कि वो उन्हें माफ़ कर दे. इस दबाव में आकर वो उन्हें माफ़ कर देती है. पाकिस्तान में ऑनर किलिंग को लेकर ये कानून था कि अगर पीड़ित के घरवाले माफ़ी दे दें तो आरोपी छूटकर बाहर आ जाएगा.

सबा की हत्या की कोशिश करने वाले भी छूट जाते हैं. लेकिन उन्हें इस बात का तनिक भी दुख नहीं होता. डॉक्यूमेंट्री में सबा के पिता कहते हैं कि अगर उनकी दूसरी बेटियों ने प्यार किया या भागने की कोशिश की तो वे दोबारा वही करेंगे, जो उन्होंने सबा के साथ किया था. फरवरी 2016 में इस डॉक्यूमेंट्री को ऑस्कर मिला. नवाज़ शरीफ़ उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे. मार्च में उन्हें भी ये डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई. देखने के बाद उन्होंने ऑनर किलिंग के ख़िलाफ़ कानून बनाने का वादा किया. अक्टूबर 2016 में पाकिस्तान की संसद ने बिल पास कर दिया. इसमें हत्या के दोषियों के लिए अधिकतम 25 साल की सज़ा का प्रावधान रखा गया. इसमें ये भी जोड़ा गया कि अगर पीड़ित का परिवार माफ़ी दे दे, फिर भी दोषी छूट नहीं सकता. उसके ऊपर मुकदमा जारी रहेगा.

2. द ब्रेवहार्ट

ये फ़िल्म 1995 में रिलीज़ हुई थी. द ब्रेवहार्ट की कहानी एक स्कॉटिश लड़ाके सर विलियम वॉलेस की है. 1296 ईस्वी में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड प्रथम ने स्कॉटलैंड पर क़ब्ज़ा कर लिया. कुछ ही समय में पूरे स्कॉटलैंड में विद्रोह शुरू हो गया. वॉलेस ने कुछ अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या कर दी. उसकी बहादुरी के क़िस्से सुनकर लोग उसके साथ जुड़ने लगे. शुरुआती सफ़लताओं के बाद वॉलेस की सेना ने इंग्लैंड में घुसकर हमला शुरू किया. इसके जवाब में इंग्लैंड और बड़ी सेना के साथ आया. स्कॉटलैंड के पास उनका सामना करने लायक संसाधन नहीं थे. इसलिए, विलियम वॉलेस मदद मांगने के लिए फ़्रांस गया. जब वो वापस लौटा तो पता चला कि उसके साथियों ने अंग्रेज़ों से समझौता कर लिया है.

इंग्लैंड ने विलियम वॉलेस को ज़िंदा या मुर्दा पकड़ने पर भारी ईनाम घोषित कर दिया. अगस्त 1305 में उसे ग्लास्गो में गिरफ़्तार कर लिया गया. वॉलेस पर राजद्रोह का मुकदमा चला. उसने इंग्लैंड के सामने सिर झुकाने से मना कर दिया. 23 अगस्त 1305 को वॉलेस को फांसी पर चढ़ा दिया गया. इसके बाद उसके सिर को लंदन ब्रिज़, जबकि शरीर के बाकी हिस्सों की अलग-अलग शहरों में प्रदर्शनी आयोजित की गई.

 

The Braveheart (source- wikipedia)
The Braveheart (source- wikipedia)

स्कॉटलैंड इस समय भी यूनाइटेड किंगडम का हिस्सा है. 2014 में जब ब्रिटेन से अलग होने को लेकर जनमत संग्रह हो रहे थे, तब आज़ादी के समर्थक ब्रेवहार्ट फ़िल्म के विलियम वॉलेस की तरह ड्रेस पहनकर प्रचार कर रहे थे. उनका इरादा ये था कि लोग आज़ादी का मतलब समझें और अपने नायक से प्रेरणा लें. हालांकि, जब जनमत-संग्रह का नतीजा आया, तब बहुमत ने ब्रिटेन के साथ बने रहने का फ़ैसला किया था.

3. हंगर गेम्स

इस फ़िल्म की कहानी एक काल्पनिक देश के बारे में है. वहां हर साल कुछ युवा चुने जाते हैं. उन्हें मौत की हद तक लड़ने के लिए विवश किया जाता है. इस लड़ाई का सीधा प्रसारण नेशनल टीवी पर किया जाता है. तब नायिका लोगों को सरकार के ख़िलाफ़ क्रांति के लिए तैयार करती है. उसका थ्री-फ़िंगर सैल्यूट क्रांति की पहचान बन जाता है. इस काल्पनिक कहानी का असर हुआ थाईलैंड में. मई 2014 में आर्मी ने तख़्तापलट कर दिया. सैन्य सरकार ने सभी तरह के प्रोटेस्ट और लोगों के जमा होने पर पाबंदी लगा दी. आलोचकों को जेल में बंद कर दिया गया. प्रेस पर सेंशरशिप लगा दी गई.

 The Hunger games (source- wikipedia)
The Hunger games (source- wikipedia)

उस समय छात्रों ने सैन्य तानाशाही के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. हंगर गेम्स का थ्री-फ़िंगर सैल्यूट थाईलैंड के आंदोलन की पहचान बन गया था. प्रदर्शनकारियों ने फ़िल्म की लेटेस्ट किस्त की टिकटें भी मुफ़्त में बांटी थी. प्रदर्शनकारी थ्री-फ़िंगर सैल्यूट के जरिए तीन मांगें रख रहे थे. पहली, तख़्तापलट पर बैन. दूसरी, आज़ादी. और, तीसरी, लोकतंत्र की स्थापना. फरवरी 2021 में सैन्य तख़्तापलट का जिन्न म्यांमार में बाहर निकला. वहां सेना ने लोकतांत्रिक सरकार को जेल में बंद कर दिया और देश में आपातकाल का ऐलान कर दिया था.

 इसके ख़िलाफ़ म्यांमार के लोगों ने प्रोटेस्ट किया. 8 फरवरी 2021 को पहली बार मेडिकल स्टूडेंट्स ने थ्री-फ़िंगर सैल्यूट के जरिए अपना विरोध प्रकट किया. धीरे-धीरे ये पूरे शांतिपूर्ण प्रदर्शन का सिंबल बन गया. म्यांमार में सेना का दमन अभी भी जारी है और साथ में लोगों का विरोध भी.

आगे नाम और भी हैं. जैसे, बैटल ऑफ़ अल्जीयर्स, द थीन ब्लू लाइन, ट्राएम्फ़ ऑफ़ दी विल, वी फ़ॉर वेनडेटा, अवतार आदि. उनकी चर्चा फिर कभी की जाएगी. आप भी देखिए और ज़रूरी बदलावों की बुनियाद रखते रहिए.


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