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कांशीराम : जाति के आधार पर बांटे गए समाज को बहुजन की पहचान देने वाले नायक

 

 हम आपको ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए विजय मधुकर अमृतकर का लिखा पीस पढ़वा रहे हैं. Vijay Amrutkar विजय ‘पीरामल फाउंडेशन फॉर एजुकेशन लीडरशिप, चुरु’ के लिए काम कर रहे हैं और 12 साल से फुले आंदोलन से जुड़े हैं. कई प्रदेशों में बहुजनवादी चेतना से जुड़े आयोजनों में भाषण दे चुके हैं. उनका यह लेख कांशीराम की जिंदगी के कई पहलुओं को सामने लाता है.


 

भारत में कुछ नेता सरकारी हैं, तो कुछ गैर-सरकारी. जो सरकारी होते हैं, उनकी जयंती और पुण्यतिथि सिर्फ सरकारी दफ्तरों में सरकारी आदेशों द्वारा मनाई जाती है. लेकिन गैर-सरकारी नेताओं की जयंती और पुण्यतिथि लोग अपने पैसों से मनाते हैं. और लोगों के ऐसे ही नेता सही मायनों में जननायक होते है. फुले, शाहू, आंबेडकर, पेरियार जैसे जननायकों के साथ 21वीं शताब्दी का एक और नाम जुड़ता है, वह हैं बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम का. आज (15 मार्च) को उनका जन्मदिन है.

कांशीराम को अमूमन भारतीय मीडिया और शासक एक राजनेता के रूप में दिखाने की कोशिश करते हैं. लेकिन कांशीराम के व्यक्तित्व का वह सिर्फ एक पहलू है, उन्होंने भेदभाव और असमानता के आधार पर खड़े भारत की समाजव्यवस्था, संस्कृति और राजनीति को निर्णायक रूप से बदल दिया. उनका संघर्ष और कार्य भारत के सामाजिक- आर्थिक- मानसिक बदलाव के रास्ते में मील का पत्थर है.

मैं महाराष्ट्र से हूं जो सामाजिक परिवर्तन की भूमि है. ज्योतिबा-सावित्री-शाहूजी-आंबेडकर सबकी महाराष्ट्र कर्मभूमि रही है. इसके बावजूद कांशीराम और उनके आंदोलन से रूबरू होने से पहले तक ये सभी सामाजिक क्रांति के अगुवा मेरे लिए अंजान थे. महाराष्ट्र में भी यह सब लोग नवबौद्धों तक ही सीमित थे. उनके विचार सही मायनों में मुझ तक और लाखों महाराष्ट्र के लोगों तक कांशीराम की वजह से ही पहुंच पाए. सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं देश के हर कोने में आज फुले-शाहू-आंबेडकर का नाम और उनके विचार पहुंचने लगे हैं. सत्ताधीश किसी भी पार्टी या विचारधारा के हों, अगर उन्हें सत्ता में बने रहना है तो, वो बाबा साहब डॉ. आंबेडकर को नजरअंदाज नहीं कर सकते. कल तक जो लोग फुले- शाहू- आंबेडकर के खिलाफ धड़ल्ले से बोलते थे, उन्हें आज दिखावे के लिए ही सही लेकिन बाबा साहब का नाम लेना ही पड़ता है. और यह सब होने के लिए जिम्मेदार थे कांशीराम, उनका आंदोलन और उनके प्रशिक्षित कार्यकर्ता.

भारत में बाबा साहब डॉ. आंबेडकर के बाद विविध लोगों, राजनीतिक पार्टियों, संगठनों और विचारधाराओं के माध्यम से अनेक आंदोलन हुए. लेकिन कांशीरामजी का आंदोलन इन सबमें अलग और निर्णायक है, क्योंकि इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य मानसिक और सांस्कृतिक बदलाव को लाना था क्योंकि इसी वजह से हम बदलाव के स्थायित्व को सुनिश्चत कर सकते हैं.

जाति के आधार पर विभाजित किए गए समाज को बहुजनों की पहचान देना. जाति से ऊपर उठकर लोगों को न्याय के लिए खड़ा करना. जाति जिसको हम भारतीय अपने भावनाओं, पहचान और वजूद के साथ जोड़ते हैं, उसे लोगों को बाहर निकालने का लक्ष्य निर्धारित करना. जातियों के उत्थान, जातियों का उपयोग जैसी बातें तो हम सुनते हैं, लेकिन जातियों के विनाश को अपने आंदोलन का लक्ष्य और राजनीतिक एजेंडा बनाने की बात सिर्फ कांशीराम ने की. उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था से पीड़ित 85 प्रतिशत लोगों को इकठ्ठा कर बहुजन समाज की संकल्पना दी.

महाराष्ट्र के साथ साथ देश के समूचे हिंदी पट्टी में दलित ही नहीं, पिछड़े-आदिवासी और मुस्लिमों को अपने ऊपर होने वाले अन्याय के प्रति जागरूक किया. नतीजा कल तक जो राजनीतिक पार्टियां खुले आम आरक्षण के खिलाफ बात कर सकते थे, उन्हें आज आरक्षण के समर्थन में बात करनी पड़ती है. कल तक दलितों को मंदिरों में जाने से रोका जाता था, उन दलितों ने आज भगवान और मंदिरों को अपने आप में आने से रोक लिया. वो लोग बुद्ध के दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. उनके घर के युवा पूजा पाठ बंद करने पर उतारू हैं, यह सब सांस्कृतिक और मानसिक बदलाव के लिए कांशीरामजी का आंदोलन जिम्मेदार है.

इस मानसिक और सांस्कृतिक बदलाव की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है, इसलिए कांशीरामजी के योगदान को सिर्फ बहुजन समाज पार्टी के सफलता और विफलता से नहीं नापा जा सकता. बहुजन समाज पार्टी इस आंदोलन का एक हिस्सा है. फिर भी एक समय पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे समूची हिंदी पट्टी में तेजी से फैली इस पार्टी की गति आज थम क्यों गई, इस पर सोचना जरूरी है.

आज देश में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बहुजन समाज पार्टी है. लेकिन फिर भी वह एक जाति और उत्तर प्रदेश तक सिमटती नजर आ रही है. कांशीराम कहते थे, ‘जिस राजनीतिक पार्टी की गैर-राजनीतिक जड़े मजबूत होंगी, उसकी राजनीति भी मजबूत होगी.’ कल तक बहुजन समाज पार्टी के पास बामसेफ के रूप में दलित पिछड़े सरकारी अधिकारियों का एक थिंकटैंक था, जो बहुजन समाज पार्टी के विकास के लिए सांस्कृतिक और मानसिक बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार करता था. जिस समाज को ढाई हजार सालों से पढ़ाई लिखाई के लिए रोका गया हो, उस समाज में जरूरी हो जाता है कि जल्द से जल्द वो समाज अपने बुद्धिजीवियों को तैयार करें, लेकिन आज बीएसपी में यह थिंक टैंक निष्क्रिय है.

मुझे आर्यावर्त को चमारावर्त में बदलना है: कांशीराम

कांशीराम साहब के नेतृत्व में बीएसपी ने हमेशा राजनीति के क्षेत्र में नए-नए ट्रेंड सेट किए. संसाधनों के सिवा अपार संसाधनों वालें लोगों से लड़ने के लिए चाहे पेंटिंग पथक हो, सांस्कृतिक जागृति जत्था हो. बहुजन संगठक- बहुजन नायक जैसे अखबारों के रूप में अपनी मीडिया खड़ी करनी हो. या फिर लगातार कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करके बुद्धिजीवी और नए पीढ़ियों के नेताओं का निर्माण हो, वो ऐसे कई सारे नए ट्रेंड कांशीराम लाए, ताकि वह समय के साथ संसाधनों की कमी के साथ व्यवस्था ले लड़ पाएं. लेकिन जैसे ही इन सबकी अनदेखी हुई, बीएसपी का जनाधार कम होता गया और सिमटता गया. अगर बीएसपी को आगे बढ़ाना है, तो इसे चलाने वाले लोगों को बीएसपी के मूल को समझना होगा, ये महज एक राजनीतिक पार्टी नहीं एक आंदोलन है.


 

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