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वो 6 उप-राष्ट्रपति, जो राष्ट्रपति पद तक नहीं पहुंच पाए

शुरुआत में हमारे मुल्क में ये रवायत रही कि उप-राष्ट्रपति के पद को 1 रायसीना हिल्स तक पहुंचने की सीढ़ी के तौर पर देखा जाता था. वीवी गिरि तक ये रवायत बदस्तूर जारी रही. इसके बाद 1974 में फखरुद्दीन अली अहमद को राष्ट्रपति बनाकर इंदिरा गांधी ने ये परंपरा तोड़ दी. 1992 में शंकर दयाल शर्मा के समय एक बार फिर उप-राष्ट्रपतियों को राष्ट्रपति बनाने का चलन शुरू हुआ. ये उनके अगले वारिस के.आर. नारायणन तक ही चल पाया.

वेंकैया को छोड़ दें, तो अब तक उप-राष्ट्रपति बने 12 में से 6 नेता ऐसे रहे, जो राष्ट्रपति नहीं बने. राष्ट्रपति बनने वाले नेताओं के बारे में हम आपको दी लल्लनटॉप के पॉलिटिकल किस्सों की खास सीरीज ‘महामहिम’ में बता चुके हैं. अगर आप अभी तक इनसे रू-ब-रू नहीं हुए हैं, तो यहां क्लिक करके देख सकते हैं. लेकिन पहले जानिए उन 6 नेताओं के बारे में, जो उप-राष्ट्रपति बने, लेकिन राष्ट्रपति की कुर्सी तक नहीं पहुंचे.

#1. बसप्पा दनप्पा जत्ती

बीडी जत्ती
बीडी जत्ती

कर्नाटक के बीडी जत्ती फरवरी 1974 में भारत के उप-राष्ट्रपति बने. कुछ ही महीनों में आपातकाल लग गया. 1977 में चुनाव हुए और इंदिरा गांधी बुरी तरफ परास्त हुईं. इस बीच फरवरी 1977 में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का निधन हो गया. जत्ती का कार्यकाल जारी था, इसलिए वो राष्ट्रपति पद की दौड़ से बाहर रहे. वैसे भी उस समय राष्ट्रपति पद की चाबी जनता पार्टी के पास थी और जत्ती ने अपनी पूरी जिंदगी कांग्रेस में बिताई थी.

फखरुद्दीन अली अहमद के बाद जो राष्ट्रपति बने, उन्होंने भी अपनी जिंदगी कांग्रेस में ही बिताई थी. नाम था नीलम संजीव रेड्डी. लेकिन उन्होंने आपातकाल से पहले ही अपनी वफादारी बदल ली थी. वो आपातकाल के दौरान जनता पार्टी के नेता के तौर पर जेल में गए. एक और दिलचस्प बात है. जत्ती खुद राष्ट्रपति बनने की दौड़ में नहीं थे, लेकिन उन्होंने एक आदमी को दौड़ से बाहर निकालने का काम किया.

जत्ती (दाएं)
जत्ती (दाएं)

दरअसल एक और कांग्रेस नेता था, जिन्होंने आपातकाल से कुछ साल पहले ही अपनी वफादारी बदल ली थी. नाम था निजलिंगप्पा. निजलिंगप्पा 1969 में कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे. उसके कार्यकाल के दौरान कांग्रेस दो टुकड़ों में बंट गई थी. निजलिंगप्पा 1977 में जनता पार्टी सरकार का हिस्सा थे. उनकी नजर भी 1 रायसीना हिल्स पर थी. लेकिन बीडी जत्ती और निजलिंगप्पा एक ही राज्य कर्नाटक और ही बिरादरी लिंगायत से आते थे. ऐसे में निजलिंगप्पा की उम्मीवारी ख़ारिज कर दी गई.

#2. मोहम्मद हिदायतुल्ला

mohammad-hidayatullah

हिदायतुल्ला भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे थे. जाकिर हुसैन के आकस्मिक निधन के बाद जब वीवी गिरि ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफ़ा दे दिया था, उस समय 20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त 1969 तक वो कार्यकारी राष्ट्रपति रहे थे. इस एक मौके अलावा कभी राष्ट्रपति भवन नहीं पहुंच पाए थे.

जत्ती का कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्हें जनता पार्टी सरकार ने देश का उप-राष्ट्रपति बनाया था. लेकिन उनका कार्यकाल पूरा होने तक सियासी हालात बदल गए थे. 1980 के चुनाव में हाथ के निशान के साथ इंदिरा गांधी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटीं. पंजाब में उग्रवाद ने तेजी पकड़नी शुरू कर दी थी. इंदिरा गांधी सकारात्मक संदेश देने के लिए ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति के पद पर बिठा दिया.

#3. कृष्णकांत

krishna
कृष्णकांत

कृष्णकांत अपने दौर की तीन बड़ी पार्टियों के भाग रहे. संजय गांधी के दौर में वो कांग्रेस की दूसरी पीढ़ी के नेता के तौर ‘यंग टर्क’ का हिस्सा रहे. 1975 में आपातकाल का विरोध करने के कारण कांग्रेस से निकाले गए. फिर जनता पार्टी में आए. राजीव गांधी के खिलाफ जनता दल का हिस्सा रहे. वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें आंध्र प्रदेश का गवर्नर बनाया गया.

1997 तक आंध्र प्रदेश के गवर्नर रहे. इस बीच केंद्र में दो सरकार बदल चुकी थी. नरसिम्हा राव की सरकार बनी और चली गई. संयुक्त मोर्चे की सरकार बनी और कृष्णकांत की सम्मानजनक विदाई की व्यवस्था की गई. 1997 में देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार ने उन्हें उपराष्ट्रपति बनाया. 2002 में अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले हृदयघात के चलते उनका निधन हो गया. वो कार्यकाल के दौरान मरने वाले पहले और एकमात्र उपराष्ट्रपति बन गए.

#4. भैरव सिंह शेखावत

भैरव सिंह शेखावत (दाएं) और अमित शाह (बाएं)
भैरव सिंह शेखावत (दाएं) और अमित शाह (बाएं)

भारतीय लोकतंत्र की बड़ी आलोचना ये है कि हमारे यहां लोकतांत्रिक सामंत पैदा हो गए हैं. ऐसे में अगर पुलिस कांस्टेबल पहले विधायक, फिर मुख्यमंत्री और बाद में देश का उप-राष्ट्रपति बनता है, तो यह इस लोकतंत्र के सीने पर चमकता तमगा है. राजस्थान के बाबो सा उर्फ़ भैरो सिंह शेखावत की कहानी किसी फ़साने से कम नहीं है.

जब 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो उन्हें याद आई अपने अजीज दोस्त भैरो सिंह शेखावत की. 2002 में उन्हें देश का उप-राष्ट्रपति बनाया. 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई. भैरो सिंह शेखावत जनसंघ और बाद में जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से रहे. ऐसे में उनका पत्ता कटना तय था. 2007 के राष्ट्रपति चुनाव में वो बीजेपी के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़े और चुनाव हार गए.

#5. हामिद अंसारी

नरेंद्र मोदी और हामिद अंसारी
नरेंद्र मोदी और हामिद अंसारी

प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को महिला होने के नाम पर देश राष्ट्रपति बनाया गया. कांग्रेस एक अल्पसंख्यक को उप-राष्ट्रपति के पद पर बिठाकर अल्पसंख्यकों के बीच सकरात्मक संदेश देना चाह रही थी. इन सियासी समीकरणों के चलते हामिद अंसारी इस पद पर पहुंचे.

2007 में प्रतिभा पाटिल का नाम सुझाने से पहले वाम दलों की तरफ से प्रणब मुखर्जी का नाम उछाला गया था. तब सोनिया गांधी अपने सबसे भरोसेमंद सिपहसालार को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुई. 2012 में स्थितियां बदल गई थीं. कांग्रेस के कई नेताओं को इस बात का अहसास हो गया था कि 2014 का जनादेश उनके खिलाफ जाने वाला है. इस वजह से सोनिया गांधी चाहती थीं कि राष्ट्रपति पद पर वो आदमी पहुंचे, जिस पर आंख बंद करके भरोसा किया जा सके. ऐसे में प्रणब मुखर्जी को शीर्ष पद पर पहुंचाया गया. हालांकि, हामिद अंसारी को उप-राष्ट्रपति पद एक और कार्यकाल दे दिया गया.

hamid

2014 में वही हुआ, जिसका अंदेशा सोनिया गांधी को 2012 में हो गया था. कांग्रेस इतिहास में सबसे कम 44 सीट लेकर विपक्ष में बैठी थी. ऐसे में हामिद अंसारी को राष्ट्रपति बनाए जाने का कोई सवाल ही नहीं उठता है. ख़ास तौर पर जब उनके नई सरकार के साथ कोई खास ताल्लुक नहीं रहे.

#6. गोपाल स्वरूप पाठक

गोपाल स्वरूप
गोपाल स्वरूप

गोपाल स्वरूप पाठक आजादी से पहले 1945-46 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज हुआ करते थे. इलाहाबाद के थे और अदालत से वास्ता था, तो जाहिर है कि नेहरू परिवार से अच्छे संबंध भी रहे होंगे. 1960 में राज्यसभा के सदस्य बने. इसी दौरान इंदिरा गांधी पहली मर्तबा प्रधानमंत्री बनीं. 1966 में इंदिरा ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में कानून मंत्री बनाया. 1967 में जब इंदिरा चुनाव जीत कर आईं, तो उन्हें मैसूर का राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया.

1969 में वीवी गिरि इंदिरा के इशारे पर उप-राष्ट्रपति के पद से इस्तीफ़ा देकर राष्ट्रपति चुनाव के मैदान में उतर गए. उप-राष्ट्रपति का पद खाली हो गया था. इंदिरा को याद आई अपने पारिवारिक मित्र गोपाल स्वरूप पाठक की. उन्हें मैसूर से दिल्ली बुलाया गया. अगस्त 1969 में उप-राष्ट्रपति पद के चुनाव होने थे. कांग्रेस टूटने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, लेकिन इसके साथ पर आने में अभी देरी थी. ऐसे में इंदिरा ने पार्टी के भीतर अपने असर का इस्तेमाल करते हुए पाठक को उप-राष्ट्रपति पद तक पहुंचा दिया.

1974 का राष्ट्रपति चुनाव. इंदिरा के सदन में इतना बहुमत था कि वो अपने मर्जी का राष्ट्रपति चुनवा सकें. उन्होंने इस मौके को अल्पसंख्यक वोटो पर पकड़ बनाने के मौके के तौर पर लिया. उन्हें याद आए एक और पारिवारिक मित्र फखरुद्दीन अली अहमद. ऐसे में गोपाल स्वरूप पाठक राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ से बाहर हो गए.


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