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सिमलीपाल जंगल की आग 10 दिन से नहीं बुझी, सरकार ने अब जाकर सुध ली

ओडिशा के सिमलीपाल टाइगर रिजर्व में पिछले 10 दिनों से आग लगी हुई है. इस आग ने करीब एक तिहाई पार्क को अपनी चपेट में ले लिया है. आग पार्क के कुल 21 रेंजों में से 8 को अपनी चपेट में ले चुकी है. आजतक के मोहम्मद सुफियान की खबर के मुताबिक, आग लगने के कई दिनों बाद अब सरकार हरकत में आई है और इसे बुझाने का काम चल रहा है. स्थिति पर नियंत्रण करने और जांच के लिए ओडिशा सरकार ने एक उच्च स्तरीय दल भेजा है. राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री बी के अरूखा ने कहा है कि उच्च स्तरीय दल की अगुवाई प्रधान वन मुख्य संरक्षक (वन्यजीव) करेंगे. मंत्री ने कहा,

मैंने पीसीसीएफ (वन्यजीव) को आग के कारणों का पता लगाने, उस पर काबू पाने और मामले की पड़ताल करने का आदेश दिया है.

मीडिया से बातचीत में एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि आग बुझाने के काम में 250 वन रक्षक और स्थानीय वॉलेंटियर के साथ एक हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया है. इसके अलावा, 240 ब्लोअर और फायर टेंडर समेत 40 दमकल की गाड़ियों को ऑपरेशन में इस्तेमाल किया जा रहा है.

आग की लपटें एक जगह से दूसरी जगह लगातार फैल रही हैं. 2,750 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बसे इस राष्ट्रीय उद्यान में लगी आग पहले ही बेटानोटी, रसगोविंदपुर और मोरादा क्षेत्र में फैल चुकी है। इससे बाघों समेत वन्यजीवों की जिंदगी खतरे में आ गई है और बड़ी संख्या में औषधीय वृक्ष और अन्य पेड़-पौधे जल चुके हैं.

Simlipal Forest Fire
सिमलीपाल के जंगलों में लगी आग का नजारा.

केंद्रीय वन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने मंगलवार 2 मार्च को अधिकारियों को निर्देश दिए कि वो आग बुझाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करें और जल्द से जल्द आग पर काबू पाया जाए. लेकिन केंद्रीय मंत्री की तरफ से ये निर्देश आग लगने के करीब 9 दिनों के बाद जारी किए गए. तब तक कई एकड़ जंगल आग की चपेट में आ चुका था.

शिकायत पर तुरंत कार्रवाई नहीं हुई

सिमलीपाल नेशनल पार्क ओडिशा के मयूरभंज इलाके में आता है. यहां आग लगने के बाद कई लोगों ने प्रशासन से इसकी शिकायत की थी, लेकिन तुरंत कोई कार्रवाई नहीं हुई. जब मयूरभंज के शाही परिवार की राजकुमारी अक्षिता भंजदेव ने इसे लेकर ट्वीट किया तो प्रशासन और सरकार हरकत में आई.अक्षिता ने नेशनल मीडिया पर भी गुस्सा उतारा और कहा कि एशिया के दूसरे सबसे बड़े बायोस्फेयर रिजर्व में आग लगी है और कोई भी नेशनल मीडिया इसे कवर नहीं कर रहा है.

अक्षिता ने ट्वीट किया,

मयूरभंज के जंगलों में पिछले एक हफ्ते से ज्यादा समय से भीषण आग लगी हुई है. एक हफ्ते पहले यहां के जंगलों में 50 किलो हाथी दांत बरामद हुए थे. उससे पहले एक स्थानीय युवक ने यहां चल रहे खनन और लकड़ी माफियाओं के गैंग के बारे में पर्दाफाश किया था. राज्य के कुछ चैनलों को छोड़ दें तो कोई भी नेशनल मीडिया एशिया के दूसरे सबसे बड़े बायोस्फेयर में लगी आग को कवर नहीं कर रहा है.

अक्षिता के ट्वीट के बाद केंद्र सरकार ऐक्शन मोड में आई. पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने ट्वीट किया,

सिमलीपाल के जंगलों में लगी आग के बारे में जानकर हैरान हूं. मैं केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से अपील करता हूं कि वे इस ओर तुरंत ध्यान दें.

धर्मेंद्र प्रधान के ट्वीट पर जावड़ेकर ने अधिकारियों को जांच करने और रिपोर्ट देने का निर्देश दिया.

वहीं, नवभारत टाइम्स से बातचीत में शाही परिवार की राजकुमारी अक्षिता भंजदेव ने कहा,

शाही परिवार से होने के नाते यह मेरा मेरे लोगों के लिए कर्तव्य और जिम्मेदारी है कि ऐसी आपदा के समय मैं उनके साथ खड़ी रहूं. सिमलीपाल ऐतिहासिक रूप से भंज वंश का एक गढ़ रहा है और हमने यहां मुगलों, मराठों और अंग्रेजों से बचकर शरण ली थी, इसीलिए मैं आज भी जिंदा हूं. ओडिशा हमारी ओर से दी जाने वाली खनन रॉयल्टी के साथ अवैध खनन का जोखिम नहीं उठा सकता है. अवैध खनन, अवैध शिकार और वनों की कटाई रोकना हर राजनीतिक पार्टी की प्राथमिकता होनी चाहिए.

जंगल में आग क्यों लगी?

अधिकारियों का कहना है कि जल्दी गर्मी के आने से अप्रत्याशित सूखा आग लगने की वजह बना. आमतौर पर ग्रीष्मकाल की शुरुआत और शरद ऋतु के अंत में वन क्षेत्रों में आग लगने की संभावना बनी रहती है. ये एक स्वाभाविक घटना है. इस दौरान गिरी हुई पत्तियां आग पकड़ने के लिए अधिक संवेदनशील होती हैं और उसे पूरे वन क्षेत्र में फैलने की सुविधा देती हैं. बढ़ता तापमान भी कभी-कभी इस आग का कारण बनता है.

लेकिन वन अधिकारियों और पर्यावरण के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि अधिकतर बार आग मानव निर्मित होती है. ओडिशा के वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट विश्वजीत मोहंती ने लल्लनटॉप से बातचीत में कहा,

ज्यादातर मामलों में शिकारी आग लगाते हैं. आग लगाने से जानवर बाहर निकल आते हैं और उन्हें शिकार करने में आसानी होती है. जो महुआ का फूल है उसके पेड़ के नीचे जो पत्ता गिरता है, उसमें आग लगा देते हैं. जिससे जमीन साफ हो जाए और उन्हें महुआ चुनने में आसानी हो. तेंदू पत्ता जिससे बीड़ी बनती है. उसके पौधों में भी लोग आग लगा देते हैं जिससे नया पत्ता निकल आए. जंगल में आग के ये सबसे बड़े कारणों में से हैं.

इन कारणों के अलावा इस साल आई गर्मी की वजह से भी जंगलों में आग लग रही है. हालांकि बारिश के बाद ये स्थिति नियंत्रण में आ जाती है. पिछली बार 2015 में जंगल की आग की आखिरी बड़ी घटना सामने आई थी.

DownToEarth की एक रिपोर्ट के अनुसार, 22 फरवरी से 1 मार्च के बीच ओडिशा के जंगलों में आग लगने की 5,291 घटनाएं दर्ज हुई हैं. फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक ये आंकड़ा देश में सबसे ज्यादा है.

क्या और कितना बड़ा नुकसान?.

वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट विश्वजीत मोहंती ने लल्लनटॉप को बताया,

इस तरह की आग में छोटे-छोटे जीव जो हैं जैसे खरगोश या अन्य जानवर जलकर राख हो जाते हैं. ये किसी को दिखाई नहीं देता है. कई छोटे-छोटे जंगली पेड़-पौधे जल जाते हैं. पड़े पेड़ों को उतना नुकसान नहीं होता. इससे जंगल घट जाता है. जंगल का जिस तेजी से फैलाव होना चाहिए उस तेजी से नहीं होता. सरकार ने इस आग को बुझाने में देरी की. जब नेशनल इश्यू बना तब राज्य सरकार ने कदम उठाया. जितना जलना था 12 दिन के अंदर जल चुका है. 

सिमलीपाल नेशनल पार्क इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

सिमलीपाल. इसका नाम सिमुल (रेशम कपास) के पेड़ से लिया गया है. सिमलीपाल नेशनल पार्क 5569 वर्ग किलोमीटर में फैला है. इस नेशनल पार्क में ऐलिफैंट रिजर्व और टाइगर रिजर्व जैसे संरक्षित क्षेत्र हैं. सिमलीपाल नेशनल पार्क में बंगाल टाइगर, एशियन ऐलीफेंट, गौर और चौसिंगा बड़ी संख्या में पाए जाते हैं. 2009 में यूनेस्को ने सिमलीपाल को वर्ल्ड नेटवर्क ऑफ बायोस्फियर रिजर्व्स की लिस्ट में शामिल किया था. उससे पहले 22 जून 1994 को भारत सरकार ने इसे बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया था.

Simlipal Forest Fire2
10 दिनों से जंगल जलता रहा. राज्य सरकार पर आग बुझाने में देरी के आरोप लग रहे हैं.

जैव विविधता की दृष्टि से ओडिशा का सिमलीपाल नेशनल पार्क बहुत समृद्ध है. यह देश का तीसरा सबसे बड़ा जैवमंडल रिजर्व है. जहां वन्यजीव और विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों की भरमार है. सिमलीपाल में पौधों की कुल 1076 प्रजातियां हैं. इसके अलावा स्तनधारी, सरीसृप और विभिन्न प्रजाति के पक्षी इस नेशनल पार्क में हैं, जो कि पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र के लिए बेहद जरूरी है.


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