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कहानी 'रंग दे बसंती' वाले सिद्धार्थ की, जो फास्ट बोलर बनते-बनते एक्टर बन गए

साल 2009. वेन्यू है हैदराबाद का इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस. एक पैनल डिस्कशन चल रहा है. समाज के अलग-अलग तबकों और पेशों के एक्सपर्ट इस डिस्कशन का हिस्सा हैं. इन्हीं में से एक एक्टर भी है. उसे स्टेज पर बुलाया जाता है. स्पीच देने के लिए. अपनी स्पीच की शुरुआत किसी फॉर्मल हाई, हैलो से नहीं करता. बल्कि तंज से करता है. अपने एक्टिंग के पेशे पर कसे तंज से. उस धारणा की बात करता है जिसके तहत एक्टर्स को इतना समझदार नहीं माना जाता कि वो देश और दुनिया के मुद्दों पर अपनी राय रखें. बिना किसी लिखित स्पीच के बोलना शुरू करता है. एक गर्व के साथ. लेकिन ये गर्व अपने प्रिविलेज से जन्मी अज्ञानता की वजह से नहीं है. बल्कि, इस बात का गर्व है कि वो कैसे अपने प्रिविलेज को यूज़ कर वाकई में फ़र्क ला सकता है.

आगे दी 16 मिनट की एक कमाल स्पीच. जिसे लोग आज भी यूट्यूब पर खोजकर देखते हैं. और खोजेंगे भी क्यूं ना. उस समय से ज़्यादा अब रेलेवेंट महसूस होती है. पूरी स्पीच यहां बता पाना मुनासिब नहीं. लेकिन उस एक्टर की जागरूकता के पैमाने कहां तक फैले हैं, उस बात की एक झलक देने की लिए उसी स्पीच से कुछ खास पॉइंट्स बताते हैं. सबसे पहले अपनी स्पीच में उस एक्टर ने आपत्ति जताई. उस जनरेशन के अटेंशन स्पैन पर. और जनरेशन के दायरे में केवल किसी ख़ास उम्र के लोगों को नहीं रखा. सभी को बराबर दोषी ठहराया. हमारी निपुणता गिनाई कि कैसे हमें सिर्फ 10 सेकेंड लगते हैं, किसी भी चीज़ पर से अपना अटेंशन खोने में. थिएटर में फिल्म देख रहे हैं. किसी सीन में अगर 10 सेकेंड के लिए भी सन्नाटा हुआ तो बस हो गया निहाल. हम अपना फोन चेक करने लगेंगे. बगल वाली सीट पर बैठे दोस्त से क्रिकेट पर बात करने लगेंगे. लेकिन इस क्षीण होते अटेंशन स्पैन का नुकसान सिर्फ थिएटर्स तक ही सीमित नहीं. एक्टर के मुताबिक लोगों ने जरूरत की चीज़ों को भी अपना अटेंशन बख्शना बंद कर दिया है. व्यवस्थाएं बदले. चाहे आसपास की दुनिया बदले. लोगों को ऐसी सभी जरूरी चीज़ों से फ़र्क पड़ना बंद हो गया है.

फिर बात की लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की. यानी प्रेस की. जरूरत बताई कि जनता को तो मीडिया का कान पकड़कर उससे सवाल करने चाहिए. इस स्पीच से ठीक एक साल पहले ही मुंबई में दिल दहला देने वाला आतंकी हमला हुआ था. उस समय हमलों की रिपोर्टिंग पर मीडिया की खूब आलोचना हुई थी. एक्टर ने मीडिया को उनकी असंवेदनशील पत्रकारिता याद दिलाई. खबरें बनाने से बेहतर उन्हें खोजने की नसीहत दी. मीडिया के साथ-साथ आम आदमी से भी अपील की. कि जागरूक बनो, तभी सशक्त बन पाओगे.

समाज से सही सवाल करने वाले, मीडिया को उसकी ज़िम्मेदारी बताने वाले, अपने इको सिस्टम के प्रति जागरूकता रख उसे समझने वाले, पॉलिटिक्स को लेकर वोकल रहने वाले, ये एक्टर हैं सिद्धार्थ. यानी रंग दे बसंती के करण सिंघानिया. इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में इनके जैसे कलाकार दुर्लभ ही हैं. जो अपनी बात रखने के लिए किसी मौके का इंतज़ार नहीं करते. अपना नागरिक धर्म समझते हैं.

Speech 3
अपनी इसी स्पीच को लेकर कुछ दिन पहले सुर्खियों में भी थे सिद्धार्थ.

तो आज बात करेंगे इन्हीं सिद्धार्थ की. जानेंगे ज़बान से तमिल और दिल से दिल्ली वाले इस एक्टर की कहानी. साथ ही बात करेंगे उनके करियर की कुछ बेहतरीन परफॉरमेंसेज़ की. चलिए, शुरू करते हैं.

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# जब मच्छर भगाने का ऐड किया और 300 रुपए मिले

लाइफ में आगे क्या करना है? इस सवाल को लेकर बचपन से ही सिद्धार्थ का फंडा क्लियर था. एक्टिंग करूंगा या फास्ट बोलिंग करूंगा. घरवालों को सुनने में अटपटा लगता था. भला एक्टिंग और बोलिंग का क्या मेल. लेकिन 8-10 साल के सिद्धार्थ ने ठान लिया तो बस ठान लिया. खैर, फास्ट बोलिंग में तो बात बनी नहीं. लेकिन खुद के एक्टर बनने वाली ज़िद को ज़रूर पूरा कर लिया. फिल्मी दुनिया या कहें तो मीडिया से सिद्धार्थ का पहली बार वास्ता पड़ा 9 साल की उम्र में. 80 के दशक में मच्छर भगाने की एक क्रीम आती थी. बैनीश के नाम से. उसके ऐड में उन्हें काम करने का मौका मिला. ऐड में एक बच्चा था. जो आठ भाषाओं में एक ही बात पूछता है. कि ये क्या है? अब यूट्यूब पर ऐड खोजने मत चले जाइएगा. क्यूंकि ऐड में वो क्यूट-सा दिखने वाला बच्चा सिद्धार्थ नहीं था. बल्कि, उस बच्चे की आठ भाषाओं में सुनाई दी गई आवाज़ सिद्धार्थ की थी. इस डबिंग के लिए सिद्धार्थ को 300 रुपए का मेहनताना मिला था. अनजाने में ही सही पर इस ऐड का भी सिद्धार्थ की किस्मत के साथ एक कनेक्शन था. दरअसल, इस ऐड को डायरेक्ट किया था ऐड फिल्ममेकर जयेन्द्र ने. जिन्होंने आगे जाकर और भी बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए ऐड बनाए. इस ऐड के करीब 22 साल बाद जयेन्द्र ने अपनी पहली फीचर फिल्म बनाने का फ़ैसला लिया. फिल्म थी 2011 में आई ‘180’. लीड रोल में थे सिद्धार्थ.

Siddharth 1
फास्ट बोलर और एक्टर, बस यही बनना था बड़े होकर.

चेन्नई में पैदा हुए सिद्धार्थ का अधिकतम स्कूली सफर दिल्ली में बीता. दिल्ली यूनिवर्सिटी के ही किरोड़ीमल कॉलेज से बी कॉम किया. कॉलेज के दिनों में अपनी डिबेट सोसाइटी में लगातार एक्टिव रहते थे. इसी के चलते कई डिबेट कॉम्पिटिशन में प्राइज़ भी जीते. ऐसा नहीं था कि इस पॉइंट पर अपने एक्टिंग के पुराने प्यार को भुला चुके थे. वो इनके दिमाग के किसी कोने में घूमता ही रहता था. कॉलेज खत्म हुआ. अब सिद्धार्थ ने फिल्म इंडस्ट्री जॉइन करने की इच्छा पिता के सामने ज़ाहिर की. हालांकि, अब सिद्धार्थ सिर्फ एक्टर ही नहीं बनना चाहते थे. राइटिंग और डायरेक्शन में भी उन्हें रुचि होने लगी थी. पिता मानते थे कि फिल्म इंडस्ट्री बड़ी अस्थिर किस्म की फील्ड है. आज काम है पर कल का क्या पता. इसलिए बेटे को एडवाइस दी कि पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर लो. ताकि अगर कल को फिल्मों में बात ना भी बनी, तो कुछ और काम कर सकोगे. सिद्धार्थ को ये बात ठीक लगी. शुरू से वो पढ़ाई में अच्छे भी रहे हैं. इसलिए आगे पढ़ने में उन्हें कोई हर्ज़ नहीं हुआ. यही सोचकर अपनी एमबीए की पढ़ाई करने निकल पड़े.

Siddharth In College
अपने कॉलेज के दिनों में सिद्धार्थ.

# मणि रत्नम से काम सीखकर उन्हीं की फिल्म साइन कर डाली

मुंबई के एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से एमबीए करने के बाद सिद्धार्थ चेन्नई आ गए. सिनेमा में काम करने का सपना अभी भी बरकरार था. लेकिन कैमरे के आगे आकर नहीं. बल्कि उसके पीछे के तियां-पांचा को समझना चाहते थे. इसी उम्मीद के साथ उन्होंने अपनी पहली सिनेमा जॉब ढूंढी. तमिल डायरेक्टर मणि रत्नम के सेट पर. मणि रत्नम उस समय अपनी 2002 में आने वाली फिल्म ‘कनथिल मुदमितल’ बना रहे थे. सिद्धार्थ भी उन्हें इस फिल्म पर असिस्ट करने लगे. एक्टिंग से उन्हें उस पॉइंट पर खास मतलब नहीं था. सारा फोकस था तो बस डायरेक्शन की बारीकियां समझने पर. वो खुद चाहे एक्टिंग से कितना भी परहेज कर रहे हो. लेकिन इसी फिल्म के दौरान उन्हें अपना पहला रोल मिला था.

Siddharth Assisting Mani Ratnam
मणि रत्नम उनके करियर के पहले मेंटर साबित हुए.

दरअसल, लार्जर दैन लाइफ सिनेमा बनाने वाले डायरेक्टर एस शंकर उन दिनों एक कमिंग ऑफ एज स्टोरी बनाना चाहते थे. जिसकी कास्टिंग के लिए नए चेहरे तलाश रहे थे. ‘कनथिल मुदमितल’ के राइटर इस बात से वाकिफ थे. उन्होंने शंकर के इस प्रोजेक्ट के बारे में सिद्धार्थ को बताया. सिद्धार्थ ने बात की अपने मेंटर मणि रत्नम से. मणि रत्नम ने ये नसीहत दी कि कमर्शियल सिनेमा की समझ शंकर से बेहतर किसी और डायरेक्टर को नहीं. तुम्हें उसके साथ काम करके काफी कुछ सीखने को मिलेगा. सिद्धार्थ मान गए. ऑडिशन दिया. सिलेक्ट हो गए. फिल्म थी 2003 में आई ‘बॉयज़’. सिद्धार्थ की इस डेब्यू फिल्म को एवरेज रिव्यू मिले. लेकिन इसी फिल्म की बदौलत उन्हें करियर की दूसरी फिल्म मिली. और कहना गलत नहीं होगा कि उनके करियर की बेस्ट फिल्मों में से एक. फिल्म थी मणि रत्नम की ‘आयुदा इड़त्तु’. 2004 की ये फिल्म कहानी है तीन नौजवानों की. पहला है माइकल. मद्रास यूनिवर्सिटी का स्टूडेंट लीडर. किसी से नहीं डरता. दूसरा है अर्जुन. लाइफ में जिसका कोई सीरियस गोल नहीं. बस अमेरिका जाना है. एक लड़की से प्यार करता है, लेकिन लड़की प्यार कंफर्म नहीं कर रही. तीसरा है ईबा. एक लोकल गुंडा. आगे इन तीनों के रास्ते कैसे टकराते हैं, यही फिल्म की कहानी थी. फिल्म में सिद्धार्थ ने अर्जुन का किरदार निभाया था. रिलीज़ के वक्त फिल्म अच्छे रिव्यूज़ के साथ खुली. क्रिटिक्स ने सिद्धार्थ की परफॉरमेंस की तारीफ़ें की. उन्हें एक खोज बताया. ये वही फिल्म है जो बाद में हिंदी में ‘युवा’ के नाम से बनी. ‘युवा’ में सिद्धार्थ वाला रोल विवेक ओबेरॉय ने किया था.

Arjun In Aayuda Idattu
उनके करियर की बेस्ट फिल्मों में से एक है ‘आयुदा इड़त्तु’.

फिल्म की कामयाबी के बावजूद सिद्धार्थ ने एक एक्सपेरिमेंट करने का फ़ैसला लिया. मद्रास में अपने करियर से ब्रेक लेकर आंध्र प्रदेश जाने का. सिद्धार्थ की पहली फिल्म ‘बॉयज़’ ने भी तेलुगु भाषी जनता के बीच खूब हल्ला काटा था. सिद्धार्थ इसे भुनाना भी चाहते थे. साथ ही तेलुगु सिनेमा को एक्सप्लोर भी करना चाहते थे. डांस की दुनिया के दिग्गज प्रभुदेवा भी उस समय डायरेक्शन की दुनिया में अपना लॉन्च प्लान कर रहे थे. सिद्धार्थ ने अपने तेलुगु सिनेमा के सफर की शुरुआत प्रभुदेवा की फिल्म के साथ ही की. फिल्म थी 2005 में आई ‘नुवोस्तानानते नेनोदंतन’. यहां सिद्धार्थ ने एक एनआरआई लड़के का किरदार निभाया. सिद्धार्थ को तेलुगु नहीं आती थी. डबिंग कर मामला रफा-दफा करने की बजाय उन्होनें तेलुगु सीखने का फ़ैसला लिया. भाषा सीखी और अपने डायलॉग खुद ही डब किए. फिल्म जनवरी में रिलीज़ हुई. और बॉक्स ऑफिस पर सिद्धार्थ की चांदी कर गई. सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर ही नहीं, क्रिटिक्स ने भी सिद्धार्थ की तारीफ में लंबे-चौड़े आर्टिकल लिखे. इसी फिल्म के लिए उन्होंने अपने करियर का पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड भी जीता.

फिल्म ने ऐसे दिन दिखाए कि तमिल लड़के सिद्धार्थ ने हैदराबाद को अपना बेस बनाने का फ़ैसला लिया. एक्टिव तौर पर तेलुगु फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ने लगे.


# सिर्फ ‘रंग दे बसंती’ वाले हीरो नहीं

सिद्धार्थ का पूरा फोकस अब तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री पर था. पहली वजह तो ये कि तेलुगु इंडस्ट्री की रीच कमाल की थी. दूसरी, सिद्धार्थ को अपनी पसंद की फिल्में करने का मौका मिल रहा था. एक्सपेरिमेंट करने का मौका मिल रहा था. जैसे ‘चुक्कलो चंद्रुदु’. 2006 में आई फिल्म. जिसने सिद्धार्थ को मौका दिया पहली बार राइटिंग कैप पहनने का. फिल्म ने एवरेज बिज़नेस किया. जनता की तरफ से मिला रिस्पॉन्स पॉज़िटिव ही था. सिद्धार्थ अब तेलुगु सिनेमा में कम्फर्टेबल होते जा रहे थे. किसी और भाषा की फिल्मों से दूरी बनाना बेहतर समझा. लेकिन यहां भी किस्मत का कुछ और ही खेल था. क्यूंकि उसी दौरान उन्हें ऑफर हुई एक हिंदी फिल्म. बना रहे थे राकेश ओमप्रकाश मेहरा. शुरुआती बातचीत बेनतीजा साबित हुई. बाद में मेहरा ने बाउंड स्क्रिप्ट भिजवाई. सिद्धार्थ ने पढ़ी और झट से हां कर दिया. स्क्रिप्ट पढ़ते ही उन्हें एक बात क्लियर हो गई. कि ऐसी फिल्म उनके करियर में शायद दोबारा नहीं आने वाली. इसलिए इसे मना करना घाटे का सौदा साबित होगा. फिल्म थी ‘रंग दे बसंती’. कहानी थी कुछ कॉलेज स्टूडेंट्स की. जिन्हें पॉलिटिक्स वगैरह फ़िज़ूल की चीज़ें लगती हैं. लेकिन एक घटना के बाद उनका नज़रिया बदलता है. और ये खुद बदलाव लाने के लिए खड़े होते हैं. फिल्म में सिद्धार्थ ने करण सिंघानिया का किरदार निभाया था. फिल्म और उनके किरदार का जनता पर ऐसा इम्पैक्ट पड़ा कि हिंदी हार्टलैंड में उन्हें आज भी ‘रंग दे बसंती’ वाले हीरो के तौर पर पहचाना जाता है. हमने भी शुरू में इनका यही इंट्रो दिया था.

Karan Singhania 1
आज भी लोग सिद्धार्थ को ‘रंग दे बसंती’ वाले हीरो के तौर पर पहचानते हैं.

‘रंग दे बसंती’ को धमाकेदार रिव्यूज़ मिले. बॉक्स ऑफिस पर तगड़ा बिज़नेस भी किया. यहां तक कि फैन्स ने इसे बॉलीवुड की मॉडर्न क्लासिक तक का दर्ज़ा दे डाला. फिल्म की एक लेगसी बन चुकी थी. और सिद्धार्थ उसे खराब नहीं करना चाहते थे. फैसला किया कि कोई भी ऐरी-गैरी हिंदी फिल्म साइन नहीं करेंगे. स्क्रिप्ट का पानी जांचकर ही उसे हरी झंडी दिखाएंगे. फिर से हैदराबाद लौट आए. तेलुगु फिल्मों पर ध्यान देने लगे. हालांकि, हिंदी सिनेमा से इंतज़ार था तो बस एक अच्छी स्क्रिप्ट के आने का. चार साल लगे उन्हें अपना इंतज़ार खत्म करने में. जब 2010 में रिलीज़ हुई उनकी दूसरी हिंदी फिल्म. ‘स्ट्राइकर’. ‘स्ट्राइकर’ एक आर्थिक तौर पर कमजोर लड़के की कहानी थी. जिसका सिक्का कैरम में गज़ब चलता है. वो इसी को यूज़ कर अपने दिन बदलना चाहता है. सिद्धार्थ को फिल्म की कहानी पर भरोसा था. इतना कि अपने रोल की तैयारी के लिए मुंबई के मालवणी में शिफ्ट हो गए. दो महीने कैरम सीखा. सिद्धार्थ को उम्मीद थी कि फिल्म उनका बड़ा कमबैक बनकर निकलेगी. सोचा था कि फिल्म अगर चलेगी तो बॉम्बे शिफ्ट हो जाएंगे. इसी वजह से बांद्रा में घर ढूंढना भी शुरू कर दिया था.

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उम्मीद थी कि ‘स्ट्राइकर’ बॉलीवुड में उनका बड़ा कमबैक साबित होगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

5 फ़रवरी 2010 की तारीख. ‘स्ट्राइकर’ रिलीज़ हुई. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ऑडियंस को तरस गई. हालांकि, क्रिटिक्स ने सिद्धार्थ की परफॉरमेंस की तारीफ़ें की. लेकिन सिर्फ तारीफ़ों से थिएटर भरते तो क्या ही बात थी. फिल्म की निराशाजनक परफॉरमेंस देखकर सिद्धार्थ फिर साउथ लौट गए. हिंदी सिनेमा से दूरी बना ली. लेकिन ऐसा भी नहीं कि इसके बाद उन्होंने और कोई हिंदी फिल्म नहीं की. 2013 में आई डेविड धवन डायरेक्टोरियल ‘चश्मे बद्दूर’ उनकी अगली हिंदी फिल्म बनी. 1981 में इसी नाम से बनी कल्ट कॉमेडी के इस रीमेक को ठंडा ही रिस्पॉन्स मिला था.


# क्वालिटी ओवर क्वांटिटी वाली अप्रोच

2003 से शुरू हुए अपने फिल्मी करियर में सिद्धार्थ ने अब तक करीब 35 फिल्में की है. जितनी फिल्में सिद्धार्थ ने साइन की, उससे कई गुना ज़्यादा उन्हें ऑफर की जा चुकी हैं. लेकिन ज़्यादातर फिल्मों को मना कर दिया. वजह था सिर्फ चुनिंदा फिल्में करना. ऐसी फिल्में जिनकी कहानी में वो खुद के अलावा किसी और को इमेजिन न कर पाएं. सिद्धार्थ ने अपने एक इंटरव्यू में इसपर कहा था, “मैं 20 बुरी फिल्मों से बेहतर 10 अच्छी फिल्में करना पसंद करूंगा”. फिल्मोग्राफी में भले ही कम फिल्में हो. लेकिन सब अपने पसंद का काम. उनकी इसी फिल्मोग्राफी में से हमनें उनकी कुछ बेस्ट फिल्में चुनी हैं. उन्हीं के बारे में बात करते हैं.

#1. जिगरठंडा (2014)

कहानी खुलती है एक रियलिटी शो से. जहां कार्तिक नाम के एक असिस्टेंट डायरेक्टर की शॉर्ट फिल्म को रिजेक्ट कर दिया जाता है. हालांकि, शो के एक जज को कार्तिक का काम पसंद आता है. वो उसे सपोर्ट करने का वादा करता है. लेकिन कार्तिक के सामने एक शर्त रखता है. कि उसे एक रियल लाइफ गैंगस्टर पर फिल्म बनानी होगी. एंट्री होती है सेतु की. मदुराई का गैंगस्टर. जो कार्तिक की इस फिल्म का लीड किरदार होने वाला है. सेतु खतरनाक किस्म का आदमी है. कोई उसके बारे में लिख तक दे, ये भी उसे बर्दाश्त नहीं. और यहां तो पूरी फिल्म बनने जा रही है उसपर. पता लगने के बाद क्या करता है, यही फिल्म की कहानी है. फिल्म में कार्तिक का किरदार सिद्धार्थ ने निभाया. बताया जाता है कि फिल्म के डायरेक्टर कार्तिक सुब्बाराज ने लीड किरदार खुद पर आधारित किया था. रिलीज़ के बाद फिल्म को बम्पर रिस्पॉन्स मिला. दो नैशनल अवॉर्ड अपने नाम किए. बॉक्स ऑफिस पर भी बड़ी हिट साबित हुई.

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एक फिल्ममेकर की कहानी जिसे लोकल गुंडे पर फिल्म बनानी है.

#2. बोम्मारिलु (2006)

एक पिता और बेटे की कहानी. बेटे का कोई भी फ़ैसला उसका अपना नहीं. सारे फैसले पिता लेते हैं. जो एक पॉइंट के बाद उसे खटकने लगता है. पिता अपनी मर्ज़ी से ही बेटे का रिश्ता कर देता है. उधर बेटे को एक दूसरी लड़की से प्यार हो जाता है. पूरी लाइफ वो अपने हक के लिए अपने पिता के सामने खड़ा नहीं हो पाया. अपनी मर्ज़ी नहीं मनवा पाया. क्या अब खड़ा हो पाएगा, हालात बदल पाएगा, यही फिल्म की कहानी है. फिल्म में बेटे का किरदार निभाया था सिद्धार्थ ने. वहीं, पिता के रोल में नज़र आए थे प्रकाशराज. इस तेलुगु फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर जमकर पैसा पीटा. इतना कि उस साल की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली तेलुगु फिल्म बन गई. आगे जाकर फिल्म के बंगाली, तमिल और हिंदी भाषा में रीमेक भी बने. हिंदी में इसके रीमेक का नाम था ‘इट्स माय लाइफ’. जिसमें सिद्धार्थ वाला रोल हरमन बावेजा ने किया था.

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बॉक्स ऑफिस पर जमकर पैसा पीटने वाली फिल्म.

#3. एनाकुल ओरुवन (2015)

2013 में एक कन्नड फिल्म आई थी. नाम था ‘लूसिया’. कन्नड सिनेमा की पहली क्राउडफंडेड फिल्म. कहानी थी थिएटर में काम करने वाले एक अशर की. इनसोमनिया से परेशान है. चाहकर भी रात को नींद नहीं आती. फिर आता है कहानी में ट्विस्ट. जब उसे एक ड्रग मिलता है. अपने इनसोमनिया से निजात पाने के लिए. वो ये ड्रग लेता है और किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाता है. सपनों की दुनिया में. ऐसी दुनिया जहां उसका हर सपना हकीकत की शक्ल ले चुका है. मज़ा आने लगता है. ड्रग लेने के मौके तलाशने लगता है. सपनों की ये दुनिया उसे अपनी ही हकीकत से कितना दूर ले जाती है, यही फिल्म की कहानी थी.

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2013 की कन्नड फिल्म ‘लूसिया’ का रीमेक थी ‘एनाकुल ओरुवन’.

इसी का 2015 में तमिल रीमेक बना था. नाम था ‘एनाकुल ओरुवन’. रीमेक में अशर का रोल सिद्धार्थ ने निभाया था. ओरिजिनल की तुलना में कहानी में ज़्यादा फेर बदल नहीं किया गया. बावजूद इसके फिल्म की तारीफ हुई. सिद्धार्थ की परफॉरमेंस की तारीफ हुई.


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