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आजिज़ साहब कहते थे, भइया बड़ा आदमी वही है जिसके साथ बैठकर छोटा महसूस न हो

abhishek
अभिषेक शुक्ला

हिन्दी-उर्दू के तमाम चाहने वालों से मेरी गुज़ारिश है कि पंडित आजिज़ मातवी के बारे में लिखा गया अभिषेक शुक्ला का ये मज़मून ज़रूर पढ़ें. अभिषेक उर्दू शाइरी की नई नस्ल के नुमाइंदा शाइरों में से एक हैं. उनके शेरों की दुनिया भर में बेपनाह पज़ीराई हुई है. फ़िलहाल जहान-ए-शेर-ओ-अदब में लखनऊ के दावे की उम्मीद-ओ-आबरू का नाम अभिषेक शुक्ला है. मगर इस नोट में अभिषेक शुक्ला एक गज़लगो की हैसियत से नहीं बल्कि एक बाकमाल नस्र-निगार के तौर पर आपसे रूबरू होंगे. संस्कृत में एक सूक्ति है-गद्यम कवीनाम निकष: वदन्ति यानी गद्य कवियों की कसौटी होता है. इस मज़मून को पढ़कर पता चलता है कि अभिषेक न सिर्फ उम्दा नस्रनिगारी की सभी कसौटियों पर खरे उतरते हैं बल्कि नस्र और शाइरी दोनों पर यकसां उबूर रखते हैं. अभिषेक के इस मज़मून को पंडित आजिज़ मातवी को जानने के लिए भी पढ़ना चाहिए. आजिज़ मातवी को जानना दरअस्ल एक पूरी तहज़ीब के करीब होना है. वो तहज़ीब जो अब दुनिया से उठती जा रही है. अलमिया है कि आजिज़ साहब जैसी बड़ी शख़्सियत के जाने के बाद उन पर जितना लिखा जाना चाहिए, उतना नहीं लिखा गया. दूसरों की क्या कहूं, जब ख़ुद मैंने ही उन पर कुछ नहीं लिखा. मगर आज अभिषेक का ये यादगार मज़मून पढ़के एक बार फिर आजिज़ साहब को नमन करने और अभिषेक को गले लगाने का मन हो रहा है. एक बार फिर आप सबसे गुज़ारिश है कि पढ़ें और शेयर करें.– हिमांशु वाजपेयी


2006 की गर्मियां थीं. मैं अपनी पहली मोहब्बत के आख़िरी पड़ाव पर था ग़ालिबन और शाइरी अभी “चस्के” की हद तक ही लगी थी जान को. मैं शेर-वेर कहने लगा था या यूं समझिए कि वेर ही कह रहा था उन दिनों, और हर साल लखनऊ महोत्सव में आयोजित होने वाले युवा महोत्सव में अपनी शाइरी सुनाने पहुंच जाया करता था. अच्छा वो लोग मुझे सुनाने भी देते थे कि मोहब्बत थी उन्हें मुझसे. मगर इस बार मामला कुछ अलग था. जब मैं शेर सुना रहा था तो सामईन में से एक आवाज़ आई. ग़ालिबन डॉ. निर्मल दर्शन की आवाज़ कि ‘अभिषेक, तुम्हारी ख़ुशनसीबी है कि पंडित आजिज़ मातवी के सामने शेर सुना रहे हो.’

ख़ुशनसीबी पर इतना इसरार था उनका कि मैंने वाक़ई ख़ुशनसीबी महसूस करना शुरू कर दिया. हालांकि पंडित लफ़्ज़ सुनते ही ज़हन उस वक़्त तक की तरबियत और माइक पर होने की घबराहट में मिलकर पंडित नेहरू तक चला गया होगा, मुझे यक़ीन है, मगर मैंने नमन करके शेर सुनाना जारी रखा और फिर जैसा कि हर शाइर की नियति होती है, सुनाना शुरू किया है तो ख़त्म भी करना पड़ता है, सो मैंने भी ख़त्म किया.

मुशायरा भी इसी क्रूर नियति का शिकार हुआ करता है, सो वो भी ख़त्म हुआ और मैं डॉ. निर्मल दर्शन की तरफ लपका. उन्होंने एक मुख़्तलिफ़ुल बहर सूट पहन रखा था और आजिज़ साहब धोती-कुर्ता और सदरी में थे. मैंने बहुत हिम्मत जुटाई. इतनी हिम्मत कि उन दोनों के पैर छू लिए. निर्मल दद्दा ने बेहद आत्मीयता के साथ परिचय कराया कि ये अभिषेक हैं. हालांकि उनकी आत्मीयता और शीरीनी भी आज तक मुझे इस बात का जवाब नहीं दे सके हैं कि हाड़ा-हाड़ा कउआ रे जैसी रचना का सस्वर पाठ करने की हिम्मत उनमें कहां से आ जाती थी जबकि वही “पहले दिल को जलाया गया” भी सुनाते थे. ख़ैर वो आजिज़ साहब से मेरी पहली मुलाकात थी.

दूसरी मुलाकात नसीम अख़्तर सिद्दीक़ी साहब के इंतक़ाल के वक़्त हुई. उस वक़्त भी मैंने बहुत हिम्मत जुटाई और उनके पांव छू लिए. फिर कुछ दिनों बाद कृष्ण मुरारी यादव मरहूम के घर एक निशस्त थी. मैं भी वहां पहुंचा तो देखा आजिज़ साहब सदारत फ़रमा रहे हैं. निशस्त ख़त्म होने पर मैंने अभूतपूर्व हिम्मत जुटाते हुए आजिज़ साहब का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया और सिर्फ इतने भर से वो ख़ुशी महसूस की जो ऑस्कर या नोबेल मिलने पर भी ख़ाक होती होगी.

एक रोज़ सुबह-सुबह आजिज़ साहब को फोन किया, पता पूछकर उनसे मिलने माती आने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की तो उन्होंने मुझसे कहा कि अरे तुम कहां आओगे इतनी दूर. मैं आता हूं तुम्हारे पास और यूं आजिज़ साहब पहली बार घर आए. मेरे लिए ये सब किसी ख़्वाब के पूरा होने से कम नहीं था कि ख़ुद आजिज़ मातवी साहब मेरे घर आएं. बड़ी देर तक उनसे बात होती रही. ज़ाहिर है कि बातें इधर-उधर की ज़्यादा हुईं कि उनको “रिसीव” करने लायक भी अभी नहीं हुआ था मैं. ये भी याद आता है कि घर पर एक पपीते का पेड़ था. एक ताज़ा पपीता उनकी नज़्र किया गया, तो उसकी तारीफ़ भी उन्होंने वैसे ही की जैसे अक्सर साइब और मशहदी, हाफिज़ और सा’दी के फ़ारसी शेरों की किया करते थे.

आजिज़ साहब कहते थे, भइया बड़ा आदमी वही है जिसके साथ बैठ के छोटा महसूस न हो

आजिज़ साहब खुद इसकी जिंदा मिसाल थे और हमेशा रहे. इसके बाद तो उनसे यादगार मुलाक़ातों के सिलसिले रहे. वो अक्सर अपने किए तब्सरों की ज़ीरॉक्स मुझे दे देते थे कि इन्हें पढ़ लेना और मैं उन्हें बग़ौर पढ़ता भी था. जब सभी ये कहते थे कि अरूज़ की तरफ भूल के भी न जाना, वरना शाइरी भूल जाओगे. आजिज़ साहब अकेले मुझे प्रोत्साहित करते रहे. लोग उन्हें छेड़ते हुए उनके सामने ही उन्हें “बहरूद्दीन अरूज़ी” कहते थे, साथ ही ये भी कि इनके सामने मतला अर्ज़ है कहने से कहीं बेहतर है कि “बहर अर्ज़ है” कहा जाए. वो चुपचाप अपनी बेहद प्यारी मुस्कान बिखेरते हुए ये सब सुना करते थे. आजिज साहब उर्दू, फ़ारसी और उसके छंदशास्त्र पर यकसां उबूर रखते थे. अध्ययन उनकी ज़ात का अभिन्न हिस्सा था. अक्सर मैं उन्हें फ़ोन करता और पूछता, दद्दा क्या कर रहे हैं, जवाब आता, “पढ़ रहा हूं.” मुझे हैरत होती थी उनकी ऐसी लगन देखकर कि पचहत्तर साल की उम्र में भी एक शख़्स में कुछ नया पढ़ने-सीखने का ये जज़्बा है. घर जाता तो उन दिनों पढ़ीं किताबें ऐसे दिखाते जैसे छोटे बच्चे अपने संगी-साथियों को अपने खिलौने दिखाते हैं. ये देखो रशीद हसन खां की किताब. ये चिराग़े सुख़न यग़ाना की और न जाने क्या-क्या. उनका आंखों के सामने होना भर मुझे इतनी नम्रता और श्रद्धा से भर देने वाला होता था कि मैं बयान नहीं कर सकता.

मेरी नज़र में किसी इंसान की इंसानी सतह पर सबसे बड़ी तारीफ़ यही है कि तमाम दुनिया देखने के बावजूद उसके अंदर एक बच्चा बाक़ी रहे. आजिज़ साहब बिल्कुल बच्चों जैसे थे. वैसे ही मासूम, निश्चल और बेहद प्यारे. हंसी तो इतनी प्यारी थी कि आप बार-बार उन्हे हंसाना चाहें, और वो हंसना भी ख़ूब जानते थे. हंसी-हंसी में जाने क्या-क्या सिखा जाते थे मुझे. मुझसे कहते थे कि भइया जिस लफ़्ज़ का तलफ़्फ़ुज़ न मालूम हो उसे बोलो मत, इमला न पता हो उसे लिखो मत. तस्दीक़ करके ही बरतो. आज भी सोचता हूं तो लगता है कि ग़ैर-मामूली सबक़ है ये ज़बान सीखने के एतबार से. उनसे मेरी अक़ीदत का आलम ये था कि मैं चौबीसों घंटे उनको देख-सुन सकता था. वो एक ऐसी शख़्सियत थे कि जैसी एक ज़िंदगी में दूसरी मिलना किसी मोजिज़े से कम न होगा. आजिज़ साहब की शेरी ख़िद्मात की बात की जाए तो उनके दो मजमुए छपे थे. एक का नाम था महबस ए ग़म था और दूसरे का हंसती शबनम रोते फूल. शेर वो उसी रवायती क्लासिकल लबो लहजे में कहते थे जिस पर तरक़्कीपसंद तहरीक, जदीदियत या माबादे जदीदियत का साया तक नहीं पड़ा था. और शायद इसीलिए मेरे नज़दीक उनका मर्तबा माहिरे अरूज़ और माहिरे लिसानियात के तौर पर ज़्यादा बड़ा था, बतौर इंसान तो ख़ैर वो इन सबसे बहुत बड़े थे. मेरे जैसे नए लिखने वाले ही नहीं बल्कि प्रोफ़ेसर वारिस किरमानी प्रोफ़ेसर मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद,प्रोफ़ेसर वली उल हक़ अंसारी तक उनका बड़ा अदबो अहतराम करते थे. वो सरापा मोहब्बत थे और मोहब्बत कब कहां किसको अपना बना ले कुछ पता नहीं होता.

उनके क़द का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि एक बार मैने एक बड़ी अजीबो-ग़रीब अफ़वाह उनके बारे में सुनी कि हिन्दू होने के बावजूद उनकी इस्लामियात पर नज़र और उर्दू की बेलौस ख़िद्मात के सबब उन्हे हज करने की इजाज़त दी गई थी. मुझे याद आता है कि तब मेरे साथ उर्दू अकादमी के शोबा-ए-इशाअत से मंसूब मख़मूर काकोरवी साहब भी थे. मैं बताता चलूं कि आजिज़ साहब का असल नाम हनुमान प्रसाद शर्मा था. अदबी हलक़ों में आजिज़ मातवी नाम से याद किया जाता है उन्हे. मातवी माती गांव की मुनासिबत से इस्तेमाल करते थे.

बाराबंकी ज़िले में स्थित माती गांव ही आजिज़ साहब की जा ए पैदाइश है. आजिज़ साहब उसी परंपरा के संवाहक थे जो चंद्रभान बिरहमन दयाशंकर नसीम और फिराक गोरखपुरी से होती हुई आज डा. निर्मल दर्शन, मनीष शुक्ला, डा. बलराम शुक्ला और मुझ हक़ीर तक आई है. मुझे ये कहने में कोई मुश्क़िल नहीं कि किसी जोश मलीहाबादी की ज़िंदगी और अदबी ख़िद्मात पर बातचीत किसी रघुपति सहाय “फिराक़” की ज़िंदगी और अदबी ख़िद्मात पर बातचीत के बग़ैर अधूरी है. किसी मीर हसन का ज़िक्र किसी दयाशंकर नसीम के ज़िक्र के बग़ैर अधूरा है. यही नहीं किसी शम्सुररहमान फारूक़ी पर बात करते हुए मुमकिन ही नहीं के किसी गोपीचंद नारंग का ज़िक्र न आए. ज़बान पर बात होगी तो अल्लामा दत्तात्रेय “कैफ़ी”या ज्ञानचंद जैन मरहूम का ज़िक्र आएगा ही आएगा. ये वो लोग हैं जिन्हे तारीख़ चाहे भी तो नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती.

आजिज़ साहब जैसे लोग अक्सर गर्दे फ़रामोशी झाड़कर उस वक़्त की बहसों में अचानक नुमाया नज़र आने लगते हैं. उनको उनकी अदबी ख़िद्मात की बिना पर याद किया जाने लगता है. नज़ीर अकबराबादी की नज़ीर सामने है. आजिज़ साहब जैसे लोग अपने किरदार अपनी ज़ात में उस पुल की तरह होते हैं जो दो क़ौमों को एक दूसरे की सांस्कृतिकी से जोड़ता है. ऐसे लोग नवरात्र में हवन करने के बाद उसी श्रद्धा उसी अक़ीदत से नातिया मुशायरों में भी शरीक होते हैं.

मुझे अच्छे से याद है शौक़ अस्री साहब से उनका अदबी मार्का जिसमें एक लफ़्ज़ के इस्तेमाल पर बहस हुई थी और आजिज़ साहब ने उनको लिखे ख़त में क़ुरआन की एक आयत कोट करते हुए उस लफ्ज़ का सही तलफ़्फ़ुज़ और इस्तेमाल उनको बताया था. यहां ये ज़िक्र भी शायद बेबुनियाद न होगा कि उनका सिलसिला उनके उस्ताद सैयद सज्जाद हुसैन शदीद लखनवी से होता हुआ प्यारे साहब रशीद और फिर मीर अनीस तक जाता था. भारत भूषण पंत साहब ने बातचीत के दौरान कभी मुझसे कहा था कि अभिषेक मेरे उस्ताद वाली आसी जिन चंद लोगों के मकतबा ए दीनो अदब में तशरीफ लाने पर अपनी कुरसी छोड़ कर उन्हे बैठने के लिए कहते थे उनमें एक आजिज़ मातवी साहब भी थे. आजिज़ साहब की शख़्सियत थी ही ऐसी कि उनपर जितनी बात की जाए कम है. एक बार उनको माती छोड़ने जाते वक़्त मैने एक फ़ारसी शेर का मतलब उनसे पूछा. शेर था कि..

“जफ़ा कमकुन कि फ़र्दा रोज़ ए महशर

मियान ए आशिकां शर्मिंदा बाशी”

शेर का सीधा मतलब ये था कि जफ़ा कम करो वर्ना कल प्रलय के दिन आशिकों के दरमयान तुमको शर्मिन्दा होना पड़ेगा. मुझे ये तो याद नहीं कि शेर का मतलब जानकर मैने क्या कहा मगर उनका कहा याद है कि “सब दुनिये शर्मिन्दा होई” और वाक़ई हम लोग आज भी जफ़ा कम करते नज़र नहीं आ रहे. आजिज़ साहब उर्दू-फ़ारसी या गांव जवार की बोलचाल का मुस्तनद हवाला थे मेरे लिए. उनसे पूछ लिया करता था जो भी समझ में नहीं आता था. वक्त गुज़रने के साथ-साथ उनकी क़द्रो मंज़िलत में लगातार इज़ाफा होता रहा मेरी नज़र में. वो बेहद खरे आदमी थे यहां तक कि उनको इंसानी जज़्बों की सदाक़त का पैमाना भी कहा जा सकता है. आजिज़ साहब ने अपने बेहद क़रीबी दोस्तों को उनकी ज़रूरत के वक़्त एक बड़ी रक़म जो लाखों में थी, उधार दी थी.ये लोग आजिज़ साहब को देखने जब हॉस्पिटल आते भी थे तो अपनी तरफ़ से रूपए लौटाने की बात कभी नहीं करते थे और आजिज़ साहब के मांगने का तो सवाल ही नहीं उठता था. उनके क़र्ज़दारों में एक तो उसी वक़्त हज पर भी जाने को थे, मुझे याद है. लोग आज सौ रूपए के लिए भी सब्र करने को तैयार नहीं हैं वहीं मैने कैंसर जैसी बीमारी से लड़ते वक़्त भी एक ऐसे शख़्स को देखा है जो अपने लाखों रूपयों को लेकर भी ख़ामोश रहा. हॉस्पिटल में भी जाने कितनी निशस्तें हुईं. तक़रीबन रोज़ ही चार पांच शाइर उनसे मिलने आते थे और महफ़िल जम जाती थी.

उन्ही दिनों उन्होने ग़ालिब की इस्तेमालकर्दा सख़्ततरीन बहर के बारे में मुझे बताया था. ग़ालिब की मशहूर ग़ज़ल,”आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है, ताक़ते बेदादे इंतज़ार नहीं है” इसी बहर में है.“बेशतर असातेज़ा के दीवान में इस बहर में शेर नहीं मिलते..” उनका ये कहना था कि अगले रोज़ मैने इसी बहर में एक मुकम्मल ग़ज़ल कही कि आजिज़ साहब को शायद अच्छा लगेगा. हुआ भी यही. अब अस्पताल में उनसे जो कोई शायर मिलने आता उसके सामने मुझसे उसी ग़ज़ल की फरमाइश करते, और मैं सुनाता भी था. “फिराक़”के मशहूर शेर “इक्का दुक्का सदा-ए-ज़ंजीर, ज़िंदान में रात हो गयी है” में तस्कीने औसत क्या कर रहा है ये भी उन्ही दिनों उन्होने मुझे समझाया था. उन्ही दिनों मुझे अक्सर ये डर भी सताने लगा था कि आजिज़ साहब नहीं रहे तो ? जबकि मैं पहला शख़्स था जिसके आगे उनकी बीमारी खुली थी और मैं अच्छी तरह जानता था कि ज़िंदगी मेहरबान नहीं है उन पर. मैने उन्हे आख़िरी स्टेज के कैंसर की बात कभी नहीं बताई. मुझमें इतनी हिम्मत थी ही नहीं.

एक शाम मैं उनसे मिलने गया तो उन्होने एक मतला सुनाया जिसका मिसरा-ए-सानी था- “ऐ काश कोई डाल दे रौग़न चिराग़ में.” मैं कमरे से बाहर आकर खूब रोया. मुझे यक़ीन हो गया कि आजिज़ साहब को सब पता है. मेरा कुछ भी छिपाना मेरे किसी काम नहीं आया. उनकी सख़्त बीमारी के दिनों का ही एक वाक़या है. डाक्टर ईश्वर दयाल उनको देखने कमरे में आए. आजिज़ साहब ने मुस्कुराना तक़रीबन छोड़ दिया था उन दिनों. डाक्टर साहब ने पूछा दर्द में कुछ कमी है ? आजिज़ साहब ने उनकी तरफ देखकर कहा-“बराय नाम” है. बराय नाम ? बराय नाम सुनकर डाक्टर ईश्वर दयाल के माथे पर ईश्वर जाने कैसे कैसे बल पड़े . वो तो मैंने कहा कि डॉक्टर साहब ये कह रहे हैं कि नाम मात्र है. तो स्थिति ठीक हुई. बाद में मै आजिज़ साहब को बराय नाम कह कह कर छेड़ता रहा और आख़िरश वो अपने कहे पर मुस्कुरा भी उठे. उन्हीं दिनों एक शख़्स उनसे मिलने वहां आ जाया करते थे. जिनका पसंदीदा मश्ग़ला दूसरों की दिल खोल कर बुराई करना था. ग़ीबत करना शौक़ था उनका. मैं जब भी आजिज़ साहब के पास पहुंचता इत्तेफाक़ से कई बार ऐसा हुआ ये निन्दक महोदय वहां से जा चुके होते थे. आजिज़ साहब मुझसे कहते- “ग़ीबती आए थे” और हम दोनो आजिज़ साहब द्वारा रखे गए इस नाम पर ख़ूब हंसते.

आजिज़ साहब एक बेहद घना दरख़्त थे. उनके साये से फ़ैज़ उठाने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है. इस फेहरिस्त में एक नाम मेरा भी है. आज सोचता हूं तो हैरत होती है कि अपने इंतक़ाल से दो तीन दिन पहले उन्होने अरूज़ी नुक़्ता-ए-नज़र से मुझे अपना एक मिसरा समझाया था. वो मिसरा यूं था- “ताकुजा बरदाश्त आजिज़, हम तो महफ़िल से चले.”

मुझे ज़रा भी इल्म नहीं था कि वो सिर्फ़ एक मिसरे पर बातचीत नहीं बल्कि साफ़ साफ़ ये महफिल छोड़कर जाने का इशारा था. 27 सितंबर 2014 जिस दिन उनका इंतक़ाल हुआ उस दिन शारिक़ कैफी साहब का ये शेर मुझ पर पूरी तरह खुल गया कि

ये सच है कि अब बेसहारा हूं मैं,

मगर उसके मरने का डर तो गया

मैं जानता हूं कि अभिषेकों के लिए आजिज़ मातवी कभी मरा नहीं करते. न ही महफिलें छोड़कर जाया करते हैं. मैं ये भी जानता हूं कि किसी को ख़िराज देने का कोई वक़्त नहीं होता. ख़ासकर तब जब उस ख़िराज में अक़ीदत की कोई कमी न हो. अंत में ज़िंदगी से मुकालमें की सूरत आजिज़ साहब का एक शेर ख़ुद आजिज़ साहब की नज़्र-

डुबो कर मेरी कश्ती मुस्तक़िल बेचैनियां ले लीं

ये मौजें हश्र तक साहिल से टकराएंगीं सर अपना !

 

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